एईएस से निपटने को जिले के  स्वास्थ्य संस्थानों में खुलेगा नियंत्रण कक्ष 

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– सिविल सर्जन के पत्र जारी कर जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थानों के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी को दिए निर्देश
– 24×7 नियंत्रण कक्ष होगा, मरीजों को सुविधाजनक तरीके से उपलब्ध कराई जाएगी स्वास्थ्य सुविधा
लखीसराय, 01 अप्रैल।
एईएस/जेई (मस्तिष्क ज्वर/चमकी बुखार) से निपटने एवं मरीजों को बेहतर से बेहतर से बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने को लेकर स्थानीय स्वास्थ्य विभाग आवश्यक तैयारी में जुट गया है । इसे सार्थक रूप देने के लिए जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थानों में एक-एक नियंत्रण कक्ष खोला जाएगा। जिसको लेकर सिविल सर्जन डाॅ देवेन्द्र चौधरी ने पत्र जारी कर जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थानों के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी को आवश्यक निर्देश दिए हैं। जिस पत्र प्राप्ति के 24 घंटे के अंदर अपने-अपने स्वास्थ्य संस्थानों में 24×7 नियंत्रण कक्ष शुरू कराना सुनिश्चित कराने को कहा। ताकि जरूरत पड़ने पर संबंधित मरीजों को किसी प्रकार की कोई असुविधा नहीं हो और सुविधाजनक तरीके से बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा सके।
– एईएस/जेई से निपटने के लिए की जा रही है व्यापक तैयारी :
सिविल सर्जन डाॅ चौधरी ने बताया, जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थानों में नियंत्रण कक्ष की स्थापना कराने का निर्देश प्राप्त हुआ है। जिसे सुनिश्चित करने को लेकर जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थानों के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा एईएस/जेई के किसी भी स्थिति से निपटने के लिए व्यापक तैयारी की जा रही है। ताकि मरीजों को किसी प्रकार की अनावश्यक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़े और बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा सके। वहीं, उन्होंने जिले के तमाम पदाधिकारियों, कर्मियों से एकजुट होकर एईएस/जेई के खिलाफ कार्य करने और लोगों से चिकित्सा परामर्श का पालन करने की अपील की है।
– कोविड नियंत्रण कक्ष के साथ ही एईएस कक्ष की होगी स्थापना :
जिला भीबीडी सलाहकार नरेंद्र कुमार ने बताया, जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थानों में कोविड नियंत्रण कक्ष के साथ  ही एईएस/जेई नियंत्रण कक्ष की भी स्थापना की जाएगी। कोविड मरीजों के साथ ही एईएस मरीजों को नियंत्रण कक्ष में तैनात मेडिकल टीम द्वारा चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जाएगी। साथ ही नियंत्रण कक्ष के मुख्य द्वार पर दूरभाष संख्या भी लिखा जाएगा। ताकि जरूरत पड़ने पर संबंधित मरीज टेलीफोन से भी आवश्यक चिकित्सा परामर्श प्राप्त कर सके और चिकित्सा परामर्श के अनुसार अगला स्टेप ले सके। वहीं, उन्होंने बताया, इसके अलावा जिले में जन जागरूकता अभियान भी चलाकर एईएस से बचाव के लिए लोगों को जागरूक किया जाएगा।
– ये है चमकी बुखार के प्रारंभिक लक्षण :
– लगातार तेज बुखार रहना।
– बदन में लगातार ऐंठन होना।
– दांत पर दांत दबाए रहना।
– सुस्ती चढ़ना।
– कमजोरी की वजह से बेहोशी आना।
– चिउटी काटने पर भी शरीर में कोई गतिविधि या हरकत न होना आदि।
– चमकी बुखार से बचाव के लिए ये सावधानियाँ हैं जरूरी :
– बच्चे को बेवजह धूप में घर से न निकलने दें।
–  गन्दगी से बचें , कच्चे आम, लीची व कीटनाशकों से युक्त फलों का सेवन न करें।
– ओआरएस का घोल, नीम्बू पानी, चीनी लगातार पिलायें।
– रात में भरपेट खाना जरूर खिलाएं।
– बुखार होने पर शरीर को पानी से पोछें।
–  पारासिटामोल की गोली या सिरप दें।

केयर इंडिया ने स्वास्थ्य विभाग को उपलब्ध कराया पाँच हजार एन-95 फेस मास्क 

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– केयर इंडिया की स्थानीय टीम ने सिविल सर्जन को सुपुर्द किया मास्क
– जिले के विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों को उपलब्ध कराया जाएगा मास्क
खगड़िया, 01 अप्रैल
स्वास्थ्य विभाग की मेहनत और जिलेवासियों के सहयोग से कोविड संक्रमण का दौर थमा है जिससे लोगों को इस घातक महामारी से राहत मिली है। किन्तु, पूर्ण रूप से खतरा अभी खत्म नहीं हुआ। जिसे पूर्ण रूप से खत्म करने के लिए जिले में स्वास्थ्य विभाग द्वारा लगातार वैक्सीनेशन अभियान चलाकर हर आयु वर्ग के लोगों को वैक्सीनेट किया जा रहा है।  केयर इंडिया भी स्वास्थ्य विभाग के साथ कदम से कदम मिलाकर जरूरी पहल में जुटा है। इसी कड़ी में शुक्रवार को केयर इंडिया द्वारा स्वास्थ्य विभाग को पाँच हजार एन-95 फेस मास्क उपलब्ध कराया गया।  केयर इंडिया की स्थानीय टीम के डीटीएल अभिनंदन आनंद एवं डीटीओ-ऑन चंदन कुमार समेत अन्य प्रतिनिधियों द्वारा संयुक्त रूप से सिविल सर्जन को यह मास्क सुपुर्द किया गया। मौके पर  सिविल सर्जन ने केयर इंडिया टीम की इस पहल की सराहना करते हुए धन्यवाद दिया। इस मौके पर डीपीएम (हेल्थ) पवन कुमार, सदर अस्पताल के उपाधीक्षक (डीएस) डाॅ योगेन्द्र नारायण प्रेयसी समेत अन्य पदाधिकारी मौजूद थे।
– सभी स्वास्थ्य संस्थानों में भेजा जाएगा फेस मास्क :
सिविल सर्जन डाॅ अमरनाथ झा ने बताया, केयर इंडिया द्वारा उपलब्ध कराये गये फेस मास्क को जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थानों में भी भेजा जाएगा। जहाँ स्वास्थ्य संस्थान में कार्यरत एएनएम के बीच वितरित किया जाएगा। ताकि एएनएम खुद को सुरक्षित महसूस करते हुए वैक्सीनेशन समेत स्वास्थ्य से संबंधित अन्य कार्यों को बेहतर तरीके से कर सके। वहीं, उन्होंने बताया, मास्क सिर्फ कोविड ही नहीं, बल्कि अन्य कई तरह के संक्रामक बीमारी से बचाव करता है। इसलिए, मैं जिले के तमाम पदाधिकारियों, कर्मियों के साथ-साथ आमजनों से भी अपील करता हूँ कि मास्क का उपयोग जारी रखें और विभिन्न संक्रामक बीमारियों से सुरक्षित रहें।
– केयर इंडिया शुरुआती दौर से ही कर रहा सराहनीय सहयोग :
डीपीएम (हेल्थ) पवन कुमार ने बताया केयर इंडिया की टीम कोविड के शुरुआती दौर से ही सहयोग एवं  कोविड से बचाव के लिए पहल भी करती रही है। मैं इसके लिए केयर इंडिया के डीटीएल, डीटीओ-ऑन समेत स्थानीय पूरी टीम को धन्यवाद देता हूँ। वहीं, उन्होंने बताया, जिले में संचालित वैक्सीनेशन अभियान में केयर इंडिया का सराहनीय सहयोग मिलता रहा है।

22 अप्रैल को जिलाभर में मनाया जाएगा राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस

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– सरकारी और निजी विद्यालयों सहित आंगनबाड़ी केंद्रों पर 26 अप्रैल को आयोजित होगा मॉप अप दिवस
– 1 से 19 वर्ष तक सभी  बच्चों और किशोर-किशोरियों को खिलाई जाएगी अल्बेंडाजोल की कृमि नाशक दवा
मुंगेर, 1 अप्रैल। आगामी 22 अप्रैल को मुंगेर सहित राज्य के 31 जिलों में राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस और 26 अप्रैल को मॉप अप दिवस मनाया जाएगा। भारत सरकार के दिशा-निर्देश के अनुसार 1 से 19 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों और किशोरों को कृमि से बचाने के लिए आगामी 22 अप्रैल को राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस मनाया जाना है। इस दौरान जिला के सभी सरकारी और निजी विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, मदरसा, संस्कृत विद्यालय सहित तकनीकी संस्थान, पॉलिटेक्नीक और आईटीआई संस्थान के साथ-साथ आगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से 1 से 19 आयु वर्ग के बच्चों और किशोर-किशोरियों को कृमि नाशक दवा अल्बेंडाजोल 400 एमजी का सेवन कराया जाएगा। इस दौरान कोरोना प्रोटोकॉल का अक्षरशः पालन किया जाएगा।
जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ. राजेश कुमार रौशन ने कहा कि बच्चों में कृमि संक्रमण , व्यक्तिगत अस्वच्छता तथा संक्रमित दूषित मिट्टी  सम्पर्क से होता है। कृमि के संक्रमण से बच्चों के पोषण स्तर एवम हीमोग्लोबिन स्तर पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ता है। जिससे बच्चों का शारीरिक और बौद्धिक विकास प्रभावित होता है। उन्होंने बताया कि पीजीआई चंडीगढ़, आरएमआरआई पटना, एनआईई चेन्नई, सहयोगी संस्था एविडेंस एक्शन एवम राज्य स्वास्थ्य समिति बिहार के द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार बच्चों में कृमि संक्रमण का दर 2011 की तुलना में सन 2019 में 65 प्रतिशत से घटकर 24 प्रतिशत पर आ गया है ।
उन्होंने बताया कि 1 से 2 वर्ष के बच्चों के अल्बेंडाजोल 400 एमजी टैबलेट का आधा चूरकर पानी के साथ खिलाना है वहीं 2 से 3 वर्ष के बच्चों को अल्बेंडाजोल 400 एमजी का एक टैबलेट चूरकर पानी के साथ खिलाना है। इसके साथ ही 3 से 19 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों और किशोरों को एक पूरी टैबलेट चबाकर खिलानी है। इसके बाद ही पानी का सेवन करना है। इस अति महत्वपूर्ण कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए आशा कार्यकर्त्ता, आंगनबाड़ी सेविका- सहायिका, जीविका दीदियों सहित स्वास्थ्य विभाग के सहयोगी संस्थाएं एवं हितधारी संगठनों से भी अपेक्षित सहयोग लिया जाएगा । इसके साथ ही इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए आवश्यक प्रचार- प्रसार भी किया जाएगा।
शारीरिक एवं मानसिक विकास बाधित करते हैं कृमि –
कृमि संक्रमण के प्रभाव एवं संचरण चक्र पर प्रकाश डालते हुए जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डा. राजेश कुमार रौशन ने बताया कि कृमि ऐसे परजीवी हैं जो मनुष्य के आंत में रहते हैं। आंतों में रहकर ये परजीवी जीवित रहने के लिए मानव शरीर के आवश्यक पोषक तत्वों पर ही निर्भर रहते हैं। जिससे मानव शरीर आवश्यक पोषक तत्वों की कमी का शिकार हो जाता जिससे वे कई अन्य प्रकार की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। खासकर बच्चों और किशोर एवं किशोरियों पर कृमि के कई दुष्प्रभाव पड़ते हैं। जैसे- मानसिक और शारीरिक विकास का बाधित होना, कुपोषण का शिकार होने से शरीर के अंगों का विकास अवरूद्ध होना, खून की कमी होना आदि जो आगे चलकर उनकी उत्पादक क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। कृमि का संचरण चक्र संक्रमित बच्चे के खुले में शौच से आरंभ होता है। खुले में शौच करने से कृमि के अंडे मिट्टी में मिल जाते और विकसित होते हैं। अन्य बच्चे जो नंगे पैर चलते हैं या गंदे हाथों से खाना खाते हैं या बिना ढके हुए भोजन का सेवन करते हैं आदि लार्वा के संपर्क में आकर संक्रमित हो जाते हैं। इसके लक्षणों में दस्त, पेट में दर्द, कमजोरी, उल्टी और भूख का न लगना आदि हैं। संक्रमित बच्चों में कृमि की मात्रा जितनी अधिक होगी उनमें उतने ही अधिक लक्षण परिलक्षित होते हैं। हल्के संक्रमण वाले बच्चों व किशोरों में आमतौर पर कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ते हैं।

छह माह के बाद नवजात को स्तनपान के साथ अनुपूरक आहार जरूरी

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-बच्चे के पोषण के प्रति जागरूक रहने से बीमारियों से होता है बचाव
-बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने से मिलती है बड़ी राहत
बांका, 1 अप्रैल-
नवजात की देखभाल में आहार का बहुत महत्व होता है। शुरुआती छह महीने तक तो स्तनपान कराया जाता है, लेकिन छह महीना पूरा हो जाने के बाद सिर्फ स्तनपान से बच्चे का काम नहीं चलता है। उसे स्तनपान के साथ-साथ अनुपूरक आहार की जरूरत होती है। दरअसल, शिशुओं को कुपोषण से बचाने के लिए उसके पोषण पर ध्यान देना बहुत जरूरी होता है। इसके लिए शुरुआत से ही एक-एक चीजों पर नजर रखनी होती है। शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार चौधरी कहते हैं कि सही और संतुलित आहार मिलने से बच्चे स्वस्थ तो रहते ही हैं। साथ में वह किसी बीमारी की भी चपेट में नहीं आता है। बच्चे को अगर सही पोषण न मिले तो वह बौनेपन का शिकार हो सकता है। इसलिए प्रसव के एक घन्टे के भीतर ही शिशु को स्तनपान जरूर कराना चाहिए। इससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। जबकि शिशु जन्म के 6 महीने तक बच्चे को केवल स्तनपान ही कराना चाहिए। इस दौरान ऊपर से पानी भी शिशु को नहीं देना चाहिए।
6 माह के बाद शारीरिक एवं मानसिक विकास में तेजीः डॉ. चौधरी बताते हैं कि 6 माह के बाद बच्चों में शारीरिक एवं मानसिक विकास तेजी से शुरू हो जाता है। इसलिए 6 माह के बाद सिर्फ स्तनपान से जरूरी पोषक तत्त्व बच्चे को नहीं मिल पाता है। इसलिए छ्ह माह के उपरान्त अर्ध ठोस आहiर जैसे खिचड़ी, गाढ़ा दलिया, पका हुआ केला एवं मूंग का दाल दिन में तीन से चार बार जरूर देना चाहिए। दो साल तक अनुपूरक आहार के साथ मां का दूध भी पिलाते रहना चाहिए, ताकि शिशु का पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक विकास हो पाए। उन्होंने बताया कि उम्र के हिसाब से ऊंचाई में वांछित बढ़ोतरी नहीं होने से शिशु बौनेपन का शिकार हो जाता है। इसे रोकने के लिए शिशु को स्तनपान के साथ अनुपूरक आहार जरूर देना चाहिए।
मोटापा और जटिल रोगों से बचाने की जरूरतः  डॉ. चौधरी ने बताया कि पहले 1000 दिन नवजात के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है जो कि महिला के गर्भधारण करने से प्रारम्भ हो जाते हैं। आरंभिक अवस्था में उचित पोषण नहीं मिलने से बच्चों का शारीरिक एवं बौद्धिक विकास अवरुद्ध हो सकता है, जिसकी भरपाई बाद में नहीं हो पाती है। शिशु जन्म के बाद पहले वर्ष का पोषण बच्चों के मस्तिष्क और शरीर के स्वस्थ्य विकास और प्रतिरोधकता बढ़ाने में बुनियादी भूमिका निभाता है। शुरुआती के 1000 दिनों में बेहतर पोषण सुनिश्चित होने से मोटापा और जटिल रोगों से भी बचा जा सकता है।
गर्भवती महिलाओं को आहार सेवन में विविधता लाने की जरूरतः डॉ. चौधरी ने बताया गर्भावस्था के दौरान महिला को प्रतिदिन के भोजन के साथ आयरन और फॉलिक एसिड एवं कैल्सियम की गोली लेना भी जरूरी है। एक गर्भवती महिला को अधिक से अधिक आहार सेवन में विविधता लानी चहिए। गर्भावस्था में बेहतर पोषण शिशु को भी स्वस्थ रखने में मदद करता है। गर्भावस्था के दौरान आयरन और फॉलिक एसिड के सेवन से महिला एनीमिया से सुरक्षित रहती एवं इससे प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव से होने वाली जटिलताओं से भी बचा जा सकता है। वहीँ कैल्सियम का सेवन भी गर्भवती महिलाओं के लिए काफ़ी जरूरी है। इससे गर्भस्थ शिशु के हड्डी का विकास पूर्ण रूप से हो पाता एवं जन्म के बाद हड्डी संबंधित रोगों से शिशु का बचाव भी होता है।

‘सच्चाई सामने लाना सिनेमा की जिम्मेदारी’- राम गोपाल वर्मा

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डेंजरस के ट्रेलर रिलीज में वर्मा ने तहे-दिल से की ‘दि कश्मीर फाइल्स’ की तारीफ
देश के नामचीन फिल्म निर्देशकों में शुमार होनेवाले राम गोपाल वर्मा ने कश्मीर घाटी से हिन्दुओं के निर्वासन पर आधारित बहुचर्चित फिल्म ’दि कश्मीर फाइल्स’ की दिल खोलकर तारीफ करते हुए कहा है कि सिर्फ मनोरंजन करना ही नहीं बल्कि समाज की सर्च्चाइयों को सामने लाना भी सिनेमा की जिम्मेदारी है। अपनी लेस्बियन थ्रिलर फिल्म ’डेजरस’ का ट्रेलर रिलीज करने के लिए राजधानी दिल्ली आए वर्मा ने इस मौके पर कहा कि आज नेशनलिस्टिक व रियलिस्टिक सिनेमा का जिस तरह से दर्शकों द्वारा स्वागत किया जा रहा है वह ना सिर्फ सुखद है बल्कि सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्मों की सफलता का स्कोप भी बढ़ा है। उन्होंने कहा कि सिनेमा में दिखाई जाने वाली घटनाएं और उसमें उठाए जाने वाले विषय समाज के एक वर्ग को असहज कर सकते हैं लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि उन हकीकतों पर पर्दा डाल दिया जाए और उसकी अनदेखी कर दी जाए। उन्होंने विश्वास जताया है कि रियलिस्टिक सिनेमा के मौजूदा दौर में अब विभिन्न विषयों पर फिल्में बनाने के लिए लोग प्रोत्साहित होंगे और दर्शकों को भी इसका लाभ मिलेगा।
दरअसल सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्मों को जिस तरह अक्सर विवाद और प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है वैसा ही कुछ दि कश्मीर फाइल्स के मामले में भी देखा गया और इसे पुराने जख्मों को कुरेदने और समाज के एक खास वर्ग को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करने वाला करार देते हुए सड़क से लेकर अदालत तक में विरोध दर्ज कराके इसका प्रदर्शन रूकवाने की भरसक कोशिश की गई। यहां तक कि समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने भी इस फिल्म को नकारात्मक प्रतिक्रिया ही दी और इसे बनाने के पीछे की मंशा पर सवाल खड़ा करते हुए इससे सिने जगत के ’धर्मनिरपेक्ष’ स्वरूप और स्वभाव को नुकसान पहुंचने की बात कही गई। लेकिन समाज के एक बड़ा वर्ग इसके समर्थन में भी आया जिसमें राम गोपाल वर्मा सरीखे दिग्गज भी शामिल हैं। आगामी आठ अप्रैल को रिलीज होने जा रही दो महिलाओं के आपसी प्रेम सम्बंध सरीखे बोल्ड विषय पर आधारित नैना गांगुली और अप्सरा रानी अभिनीत अपनी फिल्म डेंजरस का ट्रेलर रिलीज के मौके पर वर्मा ने दि कश्मीर फाइल्स की तारीफ करते हुए कहा कि इसने हर नियम को ध्वस्त कर दिया। फिल्म में स्टार्स नहीं हैं। यहां तक कि डायरेक्टर ने दर्शकों को इम्प्रेस करने की कतई कोशिश नहीं की, जो कि हर फिल्ममेकर करता है। उन्होंने यह भी कहा कि अब जब भी कोई डायरेक्टर फिल्म बनाने की कोशिश करेगा तो द कश्मीर फाइल्स का रिफरेंस लेगा और इसे स्टडी करेगा।

परिवार नियोजन में उत्कृष्ट कार्य करने वाले स्वास्थ्य कर्मियों को किया गया पुरस्कृत

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– जिले के दो डाॅक्टर समेत विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों के 16 स्वास्थ्य कर्मियों को किया गया सम्मानित
– सिविल सर्जन कार्यालय परिसर में आयोजित समारोह में किया गया पुरस्कृत
लखीसराय, 31 मार्च-
अपने-अपने क्षेत्र में बेहतर और उत्कृष्ट कार्य करने वाले जिले के तमाम पदाधिकारियों और कर्मियों को लगातार सम्मानित और पुरस्कृत किया जा रहा है। इसी कड़ी में गुरुवार को सिविल सर्जन कार्यालय परिसर स्थित सभागार हाॅल में एक जिला स्तरीय पुरस्कार वितरण सह सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें परिवार नियोजन अभियान में तमाम चुनौतियों के बावजूद बेहतर और उत्कृष्ट कार्य करने वाले जिले के डाॅक्टर, एएनएम एवं आशा कार्यकर्ताओं को सिविल सर्जन डाॅ देवेन्द्र चौधरी, एसीएमओ सह डीआईओ डाॅ अशोक कुमार भारती, डीपीएम (हेल्थ) मो खालिद हुसैन, केयर इंडिया के डीटीएल नवेद उर रहमान, एफपीसी अनुराग गुंजन के हाथों पुरस्कृत किया गया।साथ ही सभी के उज्जवल भविष्य की कामना की गई। इस मौके पर डीपीसी सुनील कुमार, आरबीएसके कंसल्टेंट डाॅ शिवशंकर कुमार समेत अन्य पदाधिकारी और कर्मी मौजूद थे।
– जिले के दो डाॅक्टर समेत विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों के 16 स्वास्थ्य कर्मियों को किया गया पुरस्कृत :
सिविल सर्जन डाॅ देवेन्द्र चौधरी ने बताया पुरस्कार वितरण सह सम्मान शिविर में जिले के दो डाॅक्टर समेत कुल 16 चयनित प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया। जिसमें हलसी सीएचसी के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डाॅ राजेश भारती एवं रेफरल अस्पताल बड़हिया के चिकित्सा पदाधिकारी डाॅ उमेश प्रसाद सिंह समेत विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों के 06 एएनएम एवं 08 आशा कार्यकर्ताओं को पुरस्कृत किया गया। कहा कि सभी प्रतिभागी ने तमाम चुनौतियों के बाबजूद परिवार नियोजन में पूरी मजबूती के साथ उत्कृष्ट कार्य किए थे। मैं सभी प्रतिभागियों की मेहनत की सराहना करते हुए उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ।
– पुरस्कृत होने वाले प्रतिभागियों का परिवार नियोजन में रहा सराहनीय योगदान :
एसीएमओ सह डीआईओ डाॅ अशोक कुमार भारती ने बताया सभी पुरस्कृत होने वाले प्रतिभागियों का परिवार नियोजन अभियान में सराहनीय योगदान रहा है। तमाम चुनौतियों के बावजूद ये लोग अपनी जिम्मेदारी पर पूरी मुस्तैदी के साथ डटे रहे और घर-घर जाकर एक-एक योग्य लाभार्थियों को परिवार नियोजन के साधन को अपनाने के लिए प्रेरित किया। जिसका सकारात्मक परिणाम भी रहा। उन्होंने बताया इस तरह का सम्मान समारोह उत्कृष्ट और बेहतर कार्य करने वाले कर्मियों का हौसला बढ़ाने के लिए अच्छी पहल है। इससे ना सिर्फ सम्मानित होने वाले कर्मियों को सम्मान मिलता बल्कि, पूरे इलाके का मान-सम्मान भी बढ़ता है। इसलिए, मैं सभी कर्मियों से अपील करता हूँ कि सभी लोग इसी तरह अपनी मेहनत की बदौलत आगे बढ़ते रहें और पूरे संस्थान व इलाके का मान-सम्मान बढ़ाते रहें।
– कोविड के दौर में भी घर-घर जाकर पहुँचाते परिवार नियोजन के संदेश :
केयर इंडिया के एफपीसी अनुराग गुंजन ने बताया, कोविड के मुश्किल भरे दौर में जहाँ लोग घरों से बाहर निकलना खुद को महफूज नहीं समझ रहे थे व अपनों से दूरी बनाने लगे थे। उस मुश्किल भरे दौर में पुरस्कृत होने वाले सभी एएनएम और आशा अपने-अपने पोषक क्षेत्र में घर-घर जाकर सामुदायिक स्तर पर सभी लोगों तक परिवार नियोजन के संदेश को पहुँचाने में सफल रहे। उस मुश्किल भरे दौर में भले ही स्वास्थ्य संस्थानों में परिवार नियोजन के स्थाई साधन बंद हो गए थे। किन्तु, ये सभी पुरस्कृत होने वाले स्वास्थ्य कर्मी प्रत्येक योग्य और इच्छुक लाभार्थियों को तमाम चुनौतियों के बावजूद तत्काल अस्थाई साधन को अपनाने के लिए सुरक्षा किट उपलब्ध कराते रहे। जिसका सकारात्मक परिणाम भी रहा और बड़ी संख्या में लाभार्थी वैकल्पिक तौर पर अस्थाई साधन को अपनाने के लिए आगे आए।

मधुमेह पीड़ित गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति सतर्क और सावधान रहना बहुत जरूरी

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– गर्भावस्था के दौरान उचित प्रबंधन से सामान्य और सुरक्षित प्रसव को मिलेगा बढ़ावा
खगड़िया, 31 मार्च-
जिस तरह लोगों की जीवनशैली में बदलाव और स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बढ़ रही ,उसी तरह स्वास्थ्य से संबंधित परेशानी भी आम हो रही है। ऐसे में मधुमेह भी एक एक ऐसी परेशानी है, जो बदलते जीवनशैली और परिवेश के कारण आम हो गई है। जिससे किसी भी आयु वर्ग के दायरे वाले लोग पीड़ित हो सकते हैं। जिसका प्रमाण यह है कि दिनों-दिन लगातार ऐसे पीड़ित लोगों की संख्या में वृद्धि हो रही। अस्पतालों में इलाज कराने वाले ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में हर किसी को इससे बचाव के लिए सतर्क और सावधान रहने की जरूरत है। खासकर मधुमेह से पीड़ित गर्भवती महिलाओं को तो और सतर्क व सावधान रहने की जरूरत है। दरअसल, गर्भावस्था के दौरान ऐसी पीड़ित महिलाओं को अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने से ही सुरक्षित और सामान्य प्रसव संभव है। इसको लेकर सरकार द्वारा भी हर जरूरी प्रयास किये जा रहे और स्थानीय स्तर भी समुचित जाँच और उचित प्रबंधन की व्यवस्था की गई है। इसलिए, ऐसी पीड़ित गर्भवती को गर्भावस्था के दौरान समय-समय पर अपने नजदीकी स्वास्थ्य संस्थान में जाँच जरूर करानी चाहिए।
– गर्भावस्था के दौरान मधुमेह से पीड़ित गर्भवती को समय-समय पर जाँच कराना बेहद जरूरी :
खगड़िया सदर पीएचसी के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डाॅ राजीव रंजन ने बताया गर्भावस्था के दौरान मधुमेह से पीड़ित महिलाओं का समय-समय पर जाँच और आवश्यक उपचार जरूरी है। अन्यथा थोड़ी-सी लापरवाही बड़ी परेशानी का सबब बन सकती है। दरअसल, मधुमेह के प्रति लापरवाही करने से ना केवल गर्भवती को ही अनावश्यक परेशानियों का सामना पड़ सकता बल्कि, गर्भस्थ शिशु का विकास भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान मधुमेह की जाँच जरूर करानी चाहिए। ताकि समय पर परेशानी का पता चल सके और ससमय ही जरूरी इलाज सुनिश्चित हो सके। सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में मधुमेह जाँच की मुफ्त सुविधा उपलब्ध है।
– 30 से 60 प्रतिशत गर्भपात की भी रहती है संभावना :
यदि समय से उपचार नहीं हो पाता है तब आगे चलकर प्रसूता एवं गर्भस्थ शिशु में विभिन्न जटिलताएं हो सकती एवं दोनों टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित हो सकते हैं। इससे गर्भवती में इन्फेक्शन, प्रसव अवधि में बढ़ोतरी, जटिलतापूर्ण प्रसव, सिजेरियन प्रसव, प्रसव के बाद गर्भाशय का सिकुड़ नहीं पाना एवं प्रसव के बाद अत्यधिक रक्त स्राव जैसी जटिल समस्या उत्पन्न हो सकती है। जिससे प्रसूता की जान पर भी खतरा उत्पन्न हो सकता है। गर्भावस्था जनित मधुमेह से गर्भस्थ शिशु को भी समस्या हो सकती है। इससे गर्भस्थ शिशु की मृत्यु, मृत शिशु का जन्म, बर्थ डिफेक्ट, बर्थ इन्जरी एवं नवजात शिशु में ग्लूकोज की कमी के साथ पहले तीन महीने में अचानक गर्भपात की संभावना 30 से 60 प्रतिशत तक हो सकती है।
– गर्भवस्था में मधुमेह का उपचार :
इसके उपचार के लिए सरकार द्वारा तीन व्यवस्थाएं की गयी हैं। पहला भोजन एवं पोषण संबंधित, दूसरा दवाई द्वारा एवं तीसरा इन्सुलिन इंजेक्शन के द्वारा। गर्भावस्था में मधुमेह से पीड़ित महिला को पोषण संबंधी जानकारी दी जानी अति आवश्यक है। जिससे वह समझ सकें कि गर्भस्थ शिशु के विकास के लिए पोषण युक्त आहार क्या है। उपयुक्त वजन में बढ़ोत्तरी कितनी होनी चाहिए एवं खून में सामान्य ग्लूकोज स्तर को प्राप्त करने एवं बनाये रखने के लिए कितना और कौन सा भोजन लेना है। जिन मधुमेह पॉजिटिव महिलाओं का मधुमेह, पोषण संबंधित उपचार से नियंत्रित नहीं होता, उन्हें दवा दी जाती है। साथ ही जब दवा सेवन के बाद भी मधुमेह अनियंत्रित होता तब चिकित्सक द्वारा इंजेक्शन द्वारा इन्सुलिन की डोज दी जाती है।

गर्भवती महिलाएं एनीमिया को लेकर रहें सतर्क

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-लापरवाही बरतने से गर्भस्थ बच्चे पर भी पड़ सकता है असर
-एनीमिया से बचने के लिए प्रोटीन व आयरनयुक्त भोजन का करें सेवन
बांका, 31 मार्च-
गर्भवती महिलाओं को एनीमिया को लेकर विशेष सतर्क रहने की जरूरत है। इससे न सिर्फ उनपर प्रभाव पड़ता है, बल्कि गर्भस्थ बच्चे पर भी इसका असर पड़ता है। दरअसल, गर्भवती महिलाओं को गर्भस्थ शिशु के विकास के लिए शरीर में रक्त का निर्माण करना पड़ता है। इसमें कमी होने के कारण एनीमिया होने की प्रबल संभावना हो जाती है। इसलिए गर्भवती महिलाओं को गर्भ के दौरान लगातार हीमोग्लोबिन समेत अन्य आवश्यक जांच करानी चाहिए एवं चिकित्सकों के परामर्श का पालन करना चाहिए।
शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार चौधरी ने बताया कि एनीमिया की बीमारी खून की कमी से होती है। इसलिए इससे बचने के लिए आयरनयुक्त भोजन का सेवन जरूरी है। शरीर में पर्याप्त मात्रा में आयरन रहने से इस बीमारी के होने की संभावना न के बराबर रहती है। इसलिए, खान-पान एवं रहन-सहन का विशेष ख्याल रखें। यह बीमारी खून में पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं या हीमोग्लोबिन कम होने से होती है। इसलिए, लक्षण दिखते ही तुरंत इलाज कराएं और चिकित्सक द्वारा दिए गए चिकित्सकीय परामर्श का भी पालन करें। अन्यथा थोड़ी सी लापरवाही भी बड़ी मुसीबत और परेशानी का सबब बन सकती है। इससे घबराने की भी जरूरत नहीं है। ऐसे में समय पर जांच के लिए अस्पताल जाने एवं चिकित्सकों की सलाह का पालन करना चाहिए। जो आगे की मुसीबत उत्पन्न नहीं होने देगी, आपके लिए फायदेमंद साबित होगा तथा आसानी के साथ आपको बीमारी से छुटकारा मिल सकता है। गर्भवती महिलाओं को एनीनिया को लेकर खासा सतर्क रहना चाहिए।
ये हैं लक्षणः डॉ. चौधरी ने बताया कि एनीमिया बीमारी का शुरुआती लक्षण थकान, कमजोरी, त्वचा का पीला होना, दिल की धड़कन में बदलाव, सांस लेने में तकलीफ, चक्कर आना, सीने में दर्द, हाथों और पैरों का ठंडा होना, सिरदर्द आदि होना है। ऐसा लक्षण होते ही ससमय इलाज कराएं। एनीमिया के दौरान पालक, सोयाबीन, चुकंदर, लाल मांस, मूंगफली, मक्खन, अंडे, टमाटर, अनार, शहद, सेब, खजूर आदि प्रोटीन युक्त आहार का सेवन करें। जो आपके शरीर की कमी को पूरी करता एवं हीमोग्लोबिन जैसी कमी भी दूर होती है। इससे आपको एनीमिया बीमारी से बचाव मिल सकता है।
चिकित्सकों की सलाह का करें पालन: डॉ. चौधरी ने बताया कि एनीमिया के दौरान आप तुरंत किसी अच्छे चिकित्सक से दिखाएं एवं चिकित्सकों के अनुसार आवश्यक जांच कराएं। इसके बाद चिकित्सकों द्वारा दी गई आवश्यक चिकित्सा परामर्श का पालन करें, जो आपके लिए फायदेमंद साबित होगा। एनीमिया से बचाव के लिए समय पर खाना भी जरूरी है। इसलिए इस बात का विशेष ख्याल रखें कि समय पर खाना खाएं और परिवार के अन्य सदस्यों के भी खान-पान का ख्याल रखें। खासकर घर के बच्चे और बुजुर्गों के खान-पान को लेकर विशेष ख्याल रखें।

सन्हौला में टीबी मरीजों ने साझा की अपनी परेशानी

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-डॉक्टर ने इस तरह की परेशानी नहीं होने देने का किया वादा
-पीएचसी में केएचपीटी ने केयर और सपोर्ट ग्रुप की बैठक की
भागलपुर, 31 मार्च-
सन्हौला प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) में गुरुवार को कर्नाटका हेल्थ प्रमोशन ट्रस्ट (केएचपीटी) ने स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से केयर और सपोर्ट ग्रुप की एक बैठक की। बैठक में आठ मरीज, दो टीबी चैंपियन और 10 केयर गिवर उपस्थित थे। बैठक की अध्यक्षता डॉ अनुभव ने की। प्रभारी डॉ. लक्ष्मण मुर्मू ने भी इसमें सहयोग किया। बैठक में टीबी के मरीजों ने अपनी परेशानी को साझा किया। वहीं डॉक्टर ने इस तरह की परेशानी नहीं होने देने का वादा किया। साथ में चिकित्सकीय सलाह भी दी गयी। बैठक में केएचपीटी से दीपक और अमर सिंह शामिल हुए।
डॉ. अनुभव ने कहा कि टीबी मरीजों से समाज के लोगों को किसी तरह का भेदभाव नहीं करना चाहिए। लोगों को टीबी मरीजों के इलाज में सहयोग करना चाहिए। अगर हमलोग इलाज में सहयोग करेंगे तो जल्द से जल्द समाज टीबी से मुक्त होगा। इसलिए मरीजों के इलाज के लिए लोगों को आगे आना चाहिए। जागरूक लोगों को टीबी मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं के बारे में बात करनी चाहिए। मानसिक तौर पर मरीजों का सहयोग करना चाहिए। उन्होंने टीबी मरीजों से कहा कि यह एक संचारी रोग है, जो एक से दूसरे व्यक्ति में ड्रॉपलेट के जरिये आसानी से फैलता है। इसलिए टीबी के लक्षण दिखे तो तत्काल जांच कराएं। जांच में अगर पुष्टि हो जाती है तो दवा का सेवन शुरू कर दें। टीबी का इलाज सरकार की तरफ से बिल्कुल ही मुफ्त है और यह सभी तरह के सरकारी अस्पताल में होता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भी इसके समुचित इलाज की व्यवस्था है। यदि किसी को तीन सप्ताह तक लगातार खांसी हो या फिर खांसी में खून आने लगे, बुखार और कफ आने की शिकायत हो तो तत्काल जांच कराएं।
जिनके घर में मधुमेह के मरीज, वे रहें सावधानः डॉ. अनुभव ने कहा कि आजकल अधिकतर घरों में मधुमेह के मरीज देखे जा रहे हैं। इस वजह से लोग संतुलित आहार लेते हैं। लोग पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक आहार नहीं ले पाते हैं। इससे भी लोग टीबी की बीमारी से पीड़ित हो रहे हैं। इसलिए अगर किसी के घर में मधुमेह के मरीज हों तो डॉक्टर से पूछकर अपना आहार तालिका बनाएं, ताकि कुपोषण का शिकार होने से बचें और टीबी जैसी बीमारी से बचाव हो सके।
बच्चों के पोषण पर दें ध्यानः डॉ. अनुभव ने बताया कि टीबी को लेकर बच्चों को काफी सतर्क रहने की जरूरत है। बच्चे के पोषण में अगर कमी हो जाए तो उसे आसानी से टीबी अपनी चपेट में ले लेता है। इसलिए कम बच्चे ही अच्छे होते हैं। अगर आपके कम बच्चे होंगे तो उसका सही से ध्यान रख पाएंगे। उसके पोषण के प्रति जागरूक रहेंगे और वह टीबी समेत दूसरी बीमारियों से बचा रहेगा।
टीबी के लक्षण
1. दो हफ़्ते या अधिक खांसी आना- पहले सूखी खांसी तथा बाद में बलगम के साथ खून का आना।
2. रात में पसीना आना-चाहे मौसम ठंडे का क्यों न हो।
3. लगातार बुखार रहना
4.थकावट होना
5.वजन घटना
6.सांस लेने में परेशानी होना
बचाव के तरीके
1. जांच के बाद टीबी रोग की पुष्टि होने पर दवा का पूरा कोर्स लें।
2. मास्क पहनें तथा खांसने या छींकने पर मुंह को पेपर नैपकीन से कवर करें।
3.मरीज किसी एक प्लास्टिक बैग में थूकें।
4.मरीज हवादार और अच्छी रौशनी वाले कमरे में रहें। एसी से परहेज करें।
5. पौष्टिक खाना खाएं। योगाभ्यास करें।
6. बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, तम्बाकू, शराब आदि से परहेज करें।
7.  भीड़भाड़ वाली गंदी जगहों पर जानें से बचें।

किलकारी मोबाइल एप से रखा जा रहा गर्भवती महिलाओं एवं शिशुओं की सेहत का ख्याल

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– फोन कर गर्भवती महिलाओं को दी जा रही जानकारी
 – टोल फ्री नंबर से भी ली जा सकती है जानकारी
मुंगेर, 30 मार्च। गर्भवती महिलाओं एवं शिशु के बेहतर स्वास्थ्य के लिए सरकार द्वारा विभिन्न स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। प्रत्येक योजना की सफलता जन-समुदाय की जागरूकता पर भी निर्भर करती है। इस दिशा में मोबाइल आधारित एप किलकारी प्रभावी साबित हो रही है। अब गर्भवती और एक साल तक के बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े जरूरी संदेश को किलकारी एप्लिकेशन के जरिये दिया जा रहा है। इसके लिए एएनएम या आशा की सहायता से गर्भवती माता का पूरा विवरण स्वास्थ्य विभाग द्वारा संचालित मदर एंड चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम (एमसीटीएस) पोर्टल पर दर्ज कराना अनिवार्य है।
फोन कर दी जा रही जानकारी :
अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी सह प्रभारी सिविल सर्जन डॉ. आनंद शंकर शरण सिंह ने बताया किलकारी एप्लिकेशन का मुख्य उद्देश्य गर्भवती माताओं एवं एक साल तक के शिशुओं को उनके स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी प्रदान कराना है। जिसमें प्रसव पूर्व जांच, संस्थागत प्रसव एवं शिशु देखभाल संबंधित जानकारी गर्भवती माता या उनके अभिभावक के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर कॉल या मैसेज कर दी जाती है। इसके लिए गर्भवती माता का पूरा ब्योरा जिला एमसीटीएस पोर्टल पर दर्ज कराया जाता है।
जागरूकता में सहयोग :
उन्होंने बताया कि किलकारी एप सरकार की अनूठी पहल है। इससे गर्भवती महिलाएं एवं एक साल तक के बच्चों को संदेश के जरिये जागरूक किया जा रहा है। इसके लिए सभी आशा एवं एएनएम को जानकारी भी दी गई है। इसके साथ ही अधिक से अधिक गर्भवती महिलाओं को इस मुहिम से जोड़ने की भी उनसे अपील की गयी है।
एक साल तक दी जा रही सुविधा :
केयर इंडिया मुंगेर की डीटीओ ऑफ डॉ. नीलू ने बताया कि मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए गर्भावस्था की बेहतर देखभाल जरूरी  है। इसमें प्रसव पूर्व जाँच से लेकर पोषण का ख्याल रखना मुख्य रूप से शामिल होता है। साथ ही शिशु के स्वास्थ्य की एक साल तक बेहतर देखभाल भी जरूरी मानी जाती है। जिसमें शिशु का टीकाकरण भी महत्वपूर्ण होता है। इसको ध्यान में रखते हुए किलकारी एप की मदद से एक साल तक प्रत्येक सप्ताह फोन के जरिये संदेश प्रदान करने का प्रावधान बनाया गया है।
ऐसे कार्य करता है एप :
उन्होंने बताया कि किलकारी एप की सहायता से गर्भवती माताओं एवं उनके शिशु का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। इस एप के जरिये रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर लगभग 72 मैसेज भेजे जाते हैं। जिसमें गर्भावस्था के दौरान बेहतर पोषण, प्रसव पूर्व जाँच एवं बच्चों के लिए टीकाकरण के समय के बारे में जानकारी दी जाती है।