महामारी कोविड-१९ःके.आई.आई.टी एवं के.आई.एस.एस. ने बनाया असंभव को संभव

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महामारी कोविड-१९ ने पूरे विश्व में सामान्य जन-जीवन और आजीविका को बाधित और तबाह कर दिया है। ओडिशा भी बुरी तरह से इस महामारी की चपेट में आ गया है। इस आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए कई संगठन और व्यक्तिप्राय सरकार के प्रयासों को पूरा करने हेतु आगे आए हैं। ओडिशा में कोरोना वायरस बीमारी के फैलने के विरुद्व चल रहे संघर्षीय अभियान की श्रृंखला की इस कड़ी में कलिंग इन्सटीच्यूट ऑफ इंडस्ठिªयल टेक्नोलोजी (के .आई.आइ.टी.), भुवनेश्वर और इसकी सहयोगी संस्था कलिंग इन्स्टीच्यूट ऑफ सोशल साइन्स (के.आई.एस.एस) ने अपने संस्थापक प्रो. अच्युत सामंत के नेतृत्व में एक पहल की है।
राज्य के स्वास्थ्य देखभाल सम्बन्धी संरचना को सुदृढ़ बनाने में के.आई.आई.टी. और के.आई.एस.,एस. ने लोक कल्याण हेतु कुछ अलग हटकर मानवीय कार्य करके सर्वाधिक उपेक्षित एवं अनदेखा किये जाने वाले वर्गों की पीड़ा को अपने सराहनीय प्रयास से बहुत तेजी से दूर किया है। कोविड-१९ के विरुद्व ओडिशा में चल रहे इस युद्व के महत्त्वपूर्ण उपायों में एक है कलिंग इन्सटीच्यूट ऑफ मेडिकल साइन्स जो के.आई.आई.टी. का एक घटक विश्वविद्यालय है, ने ओडिशा सरकार के सहयोग से चार परोपकारी समर्पित अत्याधुनिक कोविड अस्पताल की स्थापना की, जिनमें से एक भुवनेश्वर में तथा तीन आदिवासी वाहुल्य जिलों में स्थित है। इन अस्पतालों की संयुक्त बेड क्षमता १२॰॰ है। के.आई.आई.एम.एस. कोविड अस्पताल, भुवनेश्वर में ५॰ महत्त्वपूर्ण देखभाल बेड  सहित ५॰॰ बेड वाला भारत का पहला अत्याधुनिक स्वचलित  सुविधा केन्द्र है। इतने अल्प समय में कोविड अस्पतालों की स्थापना से हजारों लोगों की जान बचाई जा सकी है।
कोविड-१९ महामारी न केवल एक वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल है, अपितु लम्बे समय तक लॉकडाउन और लाखों लोगों की आजीविका के नुकसान के कारण यह एक गंभीर मानवीय संकट का कारण भी है। एक विशालकाय समुदाय की सेवा के परिप्रेक्ष्य में के.आई.आई.टी. और के.आइ.,स.,स. ने उन विभिन्न समूहों तक अपनी सहायता पहुंचाई, जो बार-बार बढ़ाये गये लॉक डाउन के कारण मुश्किलों का सामना कर रहे थे। तीन लाख से अधिक महामारी से प्रभावित विभिन्न झुग्गियों में रहने वाले वंचित लोगों, फंसे हए प्रवासी मजदूरों एवं कनटेनमेंट जोन में रहने वालों के लिए खाद्य सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं का वितरण शामिल था, जिन्हें अस्थायी आश्रय भी
प्रदान किया गया। विभिन्न समुदायों तक पहुँचने की गतिविधि में के.आई.आई.टी. और के.आई.एस.एस. कठिन दौर से गुजर रहे उन प्रभावित लोगों, उपेक्षित समुदायों, किन्नरों, खिलाड़ियों, विकलांगों, यौनकर्मियों, इत्यादि तक पहुँच कर सहायता करने के लिए प्रयासरत रहा। लंबे समय तक लॉकडाउन से निपटने के लिए भुवनेश्वर, कटक, पुरी और आसपास के शहरों में कई आध्यात्मिक केंद्रों के पुजारियों और अन्य श्रमिकों को भत्ता प्रदान किया गया है, तीन महीने के लिए अन्य खर्चों को पूरा करने के लिए खाद्य सामग्री और नकद दिए गए हैं। दोनों संस्थानों ने कंधमाल जिले के ४॰ से अधिक अनाथालयों, वृद्वाश्रमों और कुष्ठ केंद्रों में विविध खर्चों के लिए किराने का सामान और नकदी उपलब्ध करा रहे हैं।
छात्र समुदाय, कोविद-१९ महामारी में सबसे बुरी तरह प्रभावित समूहों में से एक है। के.आई.एस.एस. संस्था, ओडिशा के इंटीरियर जिलों के ३॰,॰॰॰ आदिवासी छात्र.छात्राओं का एक आश्रय/निवास है जहाँ कक्षा १ से स्नात्कोत्तर/पी.,च.डी. स्तर तक की शिक्षा विद्यार्थियों को दी जाती है। महामारी के प्रकोप के दिनों से पहले ही उन्हें ओडिशा के विभिन्न जिलों में अपने घरों में भेज दिया गया था। जैसाकि छात्र अपने-अपने घरों में हैं, क.ेआई.एस.एस. उन्हें अप्रैल माह से हर माह घर-घर अध्ययन सामग्री, कपड़े (पोशाक), और सूखे खाद्य पदार्थों की बड़ी मात्रा भेज रही है। मासिक सामग्री में किशोर छात्राओं के लिए सैनिटरी नैपकिन भी हैं। के.आई.एस.एस. के फिर से खुलने तक यह प्रेशण जारी रहेगा। के.आई.एस.एस. ने अपने छात्रों को स्वस्थ, सुरक्षित और यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे अपनी पढ़ाई से जुड़े हुए हैं, इसका पता लगाने के लिए एक प्रमुख कदम उठायी है। प्रो. सामंत, जिन्होंने सदैव इन आदिवासी छात्रों की शिक्षा को हर चीज से ऊपर रखा है, नए शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत में छात्रों के घर पर पाठ्यपुस्तिकां, अध्ययन सामग्री और सूखे खाद्य पदार्थों के वितरण की व्यवस्था की है। सभी स्तरों पर ऑनलाइन कक्षा,ँ आरम्भ करने के लिए पूरी तरह से शैक्षणिक कार्यक्रम बनाए रखने में के.आइ.एस.एस. अग्रिणी संस्थानों में से एक रहा है।
प्रधानमंत्री द्वारा संचालित ‘‘आत्मनिर्भर भारत’’ योजना से प्रेरित होकर के.आइ.एस.एस. ने कोविड-१९ महामारी के दरम्यान अपने व्यावसायिक कौशल केंद्र की गति तीव्र कर दी है। मध्यम आकार का उद्योग बनाने के लिए केंद्र को विकसित किया गया है और अब यह २५ विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक उत्पाद बना रहा है। के.आई.आई.टी. एव्ंा के.आइ.एस.एस.में इन उत्पादों की आन्तरिक आवश्यकताओ ं को पूरा करने के अलावा इनका विपणन अच्छी तरह से विकसित वितरण चौनल के माध्यम से किया जाता है। आशा की जा रही है कि आने वाले वर्षों में केंद्र से बिक्रित उत्पादों की आय से के.आइ.एस.एस. को आत्मनिर्भर बनाया जा सकेगा। एक अद्वितीय पहल के तहत के.आइ.आई.टी. डीम्ड विश्वविद्यालय ओडिशा में कोविड से मरने वाले आश्रित बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने का निर्णय लिया है। यह सुविधा दो शैक्षणिक वर्षों २॰२॰-२१ एवं २॰२१-२२ के लिए उपलब्ध रहेगी। पहले छह महीने की महामारी ने कई बच्चों को अनाथ बना दिया। ऐसे बच्चे, जो विशेष रूप से गरीब तबके के हैं, एक अनकही त्रासदी झेल रहे हैं। वे बाल दुर्व्यवहार और मानव तस्करी के शिकार बनने की चपेट में हैं। केआइ.आई.टी. और के.आइ.एस.एस. ने ऐसे १॰॰ अनाथ बच्चों को अपनाया है और उनकी देखभाल के लिए परिवार की संख्या के आधार पर उन्हें रुपये ५॰॰॰ से १॰,॰॰॰ तक मासिक भत्ता प्रदान कर रहे हैं। जब भी ये शैक्षणिक संस्थान फिर से खुलेंगे, के.आई.आई.टी. एवं के.आई.एस.एस. में उन्हें निःशुल्क शिक्षा एवं बाद में उच्च शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। इन संस्थाओं के संस्थापक, प्रो. अच्चयुत सामंत के चार वर्ष की अल्पायु में ही अपने पिताजी का स्वर्गवास हो जाने के कारण एवं बचपन में भूख और गरीबी के निजी अनुभव के कारण ही कोविड-मृतक अनाथ बच्चों को ये सारी सुविधा,ँ प्रदान कराना सम्भव हो सका हैं। वह हमेशा यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते रहे हैं कि माता-पिता की असामयिक मृत्यु अथवा गरीबी के कारण कोई भी बच्चा गणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित न रह जाय।

जिले के पीएचसी में संचालित टीकाकरण केंद्र मॉडल टीकाकरण कार्नर के रूप में होगा विकसित

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– गुणवत्तापूर्ण एवं खुशनुमा वातावरण में लोगों को मिलेगी टीकाकरण की सुविधा

– राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक ने पत्र जारी कर दिए निर्देश

लखीसराय, 05 अक्तूबर, 2020
जिले के पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) में संचालित नियमित टीकाकरण केंद्र मॉडल टीकाकरण कार्नर के रूप में विकसित होगा। जिससे लोगों को गुणवत्तापूर्ण एवं खुशनुमा वातावरण में टीकाकरण की सुविधा मिलेगी। इसे शीघ्र सुनिश्चित कराने को लेकर राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक मनोज कुमार ने पत्र जारी कर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी को निर्देश दिए हैं। जिसमें कहा है कि जल्द से जल्द इसे सुनिश्चित कराने के लिए आवश्यक कार्य पूरा किया जाय। ताकि लोगों को जल्द से जल्द बेहतर टीकाकरण सुविधा का लाभ मिल सकें। जिला अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. देवेन्द्र चौधरी ने बताया ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में टीकाकरण का दर कम है। राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन का मुख्य उद्देश्य शहरी, खासकर स्लम बस्तियों में रहने वालों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है। जिसमें गर्भवती महिलाओं और बच्चों पर विशेष ध्यान देना है।

शिशुओं के साथ गर्भवती महिलाओं को दिए जाएंगे टीके :
डॉ. देवेन्द्र चौधरी ने बताया मॉडल टीकाकरण कार्नर के रूप में विकसित होने से लोगों को गुणवत्तापूर्ण एवं खुशनुमा वातावरण में टीकाकरण की सुविधा मिलेगी। सरकार व स्वास्थ्य विभाग का मुख्य उद्देश्य नवजात शिशुओं में शत प्रतिशत टीकाकरण कराना है। जिसके प्रति आम लोगों को जागरूक करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। साथ ही गुणवत्तापूर्ण तरीके से टीकाकरण की बेहतर सुविधा उपलब्ध कराया जाना है। इन टीकाकरण कार्नर में गर्भवती महिलाओं और जन्म के बाद के शिशुओं को टीका दिया जाएगा जो पूरी तरह नि:शुल्क होगा। इसकी खासियत है कि यह सुबह 11 बजे से रात को 7 बजे तक खुला रहेगा। अभी सदर अस्पताल में सुबह आठ बजे से 2 बजे दिन तक टीका दिया जा रहा है।

आधुनिक सुविधाओं से है सुसज्जित :
डॉ. देवेन्द्र चौधरी ने बताया मॉडल टीकाकरण कार्नर में बच्चों को खेल-खेल में टीका देने के उद्देश्य से दीवारों पर कई कार्टून कैरेक्टर बनाकर उनके मनोरंजन का ख्याल रखने का प्रयास किया गया है। इससे सरकारी केंद्रो में टीकाकरण कराने से परहेज करने वाले इसके प्रति आकर्षित होंगे। स्वच्छ एवं बेहतर वातावरण में अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होगा। इन केंद्रों में बच्चों को सुलाने, समुचित प्रकाश की व्यवस्था, टीकाकरण कराने के लिए आने वाली माताओं तथा अभिभावकों के बैठने की व्यवस्था होगी। कर्मियों के बैठने की व्यवस्था के अलावा वैक्सीन के रख-रखाव की समुचित व्यवस्था की गयी है और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया गया है। साथ ही टीकाकरण के फायदों को बोर्ड- पोस्टर के माध्यम से भी बताया गया है।

डेंगू को लेकर रहें सतर्क, मच्छरों से करें अपना बचाव

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सदर अस्पताल में डेंगू मरीजों के लिए  6 वर्ड का अलग से है वार्ड
घर के आसपास नहीं होने दें पानी का जमाव, डेंगू से होगा बचाव
बांका, 5 अक्टूबर
स्वास्थ विभाग डेंगू को लेकर 25 जून से ही अलर्ट है. इसे लेकर सदर अस्पताल में अलग से 6 बेड का वार्ड भी बनाया गया है. डेंगू से पीड़ित मरीजों का वहां पर बेहतर इलाज की व्यवस्था है. लेकिन डेंगू को लेकर अब मौसम अनुकूल होता जा रहा है. तापमान गिरकर 30 के करीब पहुंच गया है. अभी के मौसम में ना गर्मी ज्यादा है और ना ही सर्दी. ऐसे मौसम में डेंगू के मच्छर ज्यादा पनपते हैं. ऐसा मौसम डेंगू के लिए अनुकूल माना जाता है. इसलिए अभी सावधान रहने की जरूरत है.
शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार चौधरी ने कहा कि सदर अस्पताल में डेंगू के मरीजों के लिए अलग से इलाज की व्यवस्था है. लोग डेंगू के प्रति सचेत रहें. घर के आसपास पानी का जमाव नहीं होने दें. इससे मच्छर नहीं पनपेगा और आपका डेंगू से बचाव होगा. इसके बावजूद भी अगर आप डेंगू का शिकार हो ही गए तो सदर अस्पताल आ जाइए. यहां पर इलाज की समुचित व्यवस्था है. सदर अस्पताल के मैनेजर अमरेश कुमार ने बताया कि यहां पर 6 बेड का अलग से डेंगू मरीजों के लिए वार्ड चल रहा है. जहां पर डेंगू मरीजों का इलाज किया जा रहा है.
अभी के मौसम में डेंगू का खतरा ज्यादा: शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ सुनील कुमार चौधरी ने कहा कि हमलोग काफी पहले से डेंगू को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं. जब बारिश का मौसम समाप्त होता है और सर्दी शुरू होने वाली रहती है उस दौरान डेंगू के ज्यादा मामले सामने आते हैं. अभी से लेकर नवंबर महीने तक लोगों में डेंगू होने की आशंका अधिक रहती है. डॉ. चौधरी ने कहा अगर मरीज को साधारण डेंगू बुखार है तो उसका इलाज व देखभाल घर पर की जा सकती है. डॉक्टर की सलाह लेकर दवाई ले सकते हैं. बिना चिकित्सक की सलाह से दवा लेने पर शरीर से प्लेटलेट्स अचानक कम हो सकते हैं. सामान्य रूप से खाना देना जारी रखें, बुखार की हालत में शरीर को और ज्यादा खाने की जरूरत होती है.
मच्छरदानी का करें इस्तेमाल: डॉ. चौधरी ने कहा कि घरेलू स्तर पर सावधानी बरतने से भी डेंगू को पांव पसारने से रोका जा सकता है. इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि घर के आसपास पानी को जमने नहीं दें. रात में सोते समय मच्छदानी का प्रयोग करें. डेंगू का मच्छर दिन में काटता है, इसलिए दिन में विशेष तौर पर सतर्क रहें. घर में कूलर के पानी को बार-बार बदलते रहें. साथ ही घर के आसपास कोई ऐसा सामान हो, जिसमें पानी जमा हो जाता है तो उसे तत्काल हटा दें.
कैसे और कब होता है डेंगू: डेंगू मादा एडीज इजिप्टी मच्छर के काटने से होता है. इन मच्छरों के शरीर पर चीते जैसी धारियां होती हैं. ये मच्छर दिन में, खासकर सुबह काटते हैं. डेंगू बरसात के मौसम और उसके फौरन बाद के महीनों यानी जून-जुलाई से अक्टूबर में सबसे ज्यादा फैलता है. इस मौसम में मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां होती हैं. एडीज इजिप्टी मच्छर बहुत ऊंचाई तक नहीं उड़ पाते हैं.
ये हैं डेंगू के लक्षण:
ठंड लगने के बाद अचानक तेज बुखार चढ़ना
सिर, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होना
आंखों के पिछले हिस्से में दर्द होना, जो आंखों को दबाने या हिलाने से और बढ़ जाता है
बहुत ज्यादा कमजोरी लगना, भूख न लगना और जी मितलाना और मुंह का स्वाद खराब होना
गले में हल्का-सा दर्द होना
शरीर खासकर चेहरे, गर्दन और छाती पर लाल-गुलाबी रंग के रैशेज होना

‘सकारात्मक सोच और नियमित दवा सेवन से दी कोरोना को मात’

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– माधोपुर के हिमांशु शेखर आ गये थे संक्रमण के प्रभाव में
– लगातार रह रहा था बुखार, जांच कराई तो रिपोर्ट आई पॉज़िटिव
– होम आइसोलेशन में रहते हुए कोविड-19 को दी मात
– कहा, डरने की नहीं हैं जरूरत, सतर्कता से बचाव है संभव
– समाज दे सकरात्मक माहौल, रखें एक-दूसरे का ख्याल

मुंगेर, 05 अक्टूबर।

“कोविड 19 संक्रमण एक ऐसा संक्रामक रोग है, जिससे हम सुरक्षा के नियमों का पालन करके, सतर्कता बरतकर और जागरूक रहकर ही बच सकते हैं।” यह कहना है माधोपुर के रहने वाले हिमांशु शेखर का। हिमांशु शेखर कोरोना संक्रमण के प्रभाव में तो जरूर आएं, लेकिन जरूरी नियमों का पालन कर जल्द ही उसे मात दे दिया। उन्होने बताया, कोविड-19 ने हमें सीख दी है कि हम किसी भी बिमारी को हल्के में न लें। जीवन अनमोल है, इसलिए हमें इसका कद्र करना चाहिए। भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग खानपान से लेकर स्वास्थ्य की जो अनदेखी करते हैं, उसका नुकसान आगे चलकर अनावश्यक बीमारी के रूप में देखने को मिलता है। कोविड-19 ने हमें यह भी बताया कि हमारे जीवन में स्वच्छता का कितना महत्व है। यह भी सीख मिली कि हमें अपने साथ-साथ दूसरों का भी ख्याल रखना चाहिए। उन्हें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करते रहना चाहिए। क्योंकि हम अपना ख्याल रख सकते हैं, सतर्कता बरत सकते हैं। लेकिन अगर अगले ने इसकी अनदेखी की और हम उसके प्रभाव में आए तो हम भी लंबे समय तक बचे नहीं रह सकते हैं।

बुखार और सांस लेने में होती थी परेशानी:
हिमांशु शेखर (47 वर्षीय) मुंगेर पीएचडी कार्यालय में अकाउंट क्लर्क के पद पर कार्यरत हैं। वह बताते हैं कि संक्रमण के प्रभाव वाले दिनों में उन्हें बुखार की समस्या ज्यादा रहती थी। आगे चलकर उन्हें सांस लेने में भी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इन सबको देखकर वह सचेत हो गए। उन्हें और कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे थे। हालांकि उन्होंने जांच करवाना बेहतर समझा। 09 जुलाई को उनकी संक्रमित होने की रिपोर्ट आई। रिपोर्ट आते ही वह तुरंत घर में ही अलग व्यवस्था में आइसोलेशन में चले गए। चिकित्सीय परामर्श से लेकर सुबह से लेकर शाम तक की दिनचर्या और दवा लेने की विधि उन्हें बताई गई। वह स्वयं भी सभी नियमों के साथ दवा लेने लगे। लगभग 25 दिनों के होम क्वारंटाइन में रहने और पूर्ण स्वस्थ और बेहतर महसूस करने के बाद उन्होंने अपने सामान कार्य करने शुरू कर दिए।

जीवनशैली में बदलाव लाकर दे सकते हैं संक्रमण जैसी बिमारियों को मात:
हिमांशु शेखर कहते हैं कि संक्रमण के दौर में कौन, कब इसकी चपेट में आ जाए कह नहीं सकते हैं। इसलिए इससे बचाव और सतर्कता ही सुरक्षा का एकमात्र उपाय है। संक्रमण के दौर में जरूरी है कि लोग अपनी दिनचर्या में बदलाव लाएं। खानपान में विशेष ध्यान देने के साथ योगाभ्यास नियमित रूप से करें। वे बताते हैं कि संक्रमण के प्रभाव वाले दिनों में जैसे लोग सामान्य तौर पर सर्दी-जुकाम होने पर भाप लेते हैं। उसी तरह वह भाप यानि स्टीम थेरपी भी लेते रहे। इससे उन्हें सांस लेने में जो परेशानी होती थी, उससे काफी राहत मिलती रही। उन्होंने खाने में इम्यूनिटी मजबूत करने वाले व्यंजनों को शामिल किया। काढ़ा आदि का भी नियमित रूप से सेवन करते रहे। सकारात्मक सोच रखी, खानपान और दवाइयों को समय पर लेने से वह संक्रमण को हराकर आज पूर्ण रूप से स्वस्थ हो अपने कार्यों को अंजाम दे रहे हैं।

संक्रमण के दौर में समाज का साथ मिलना बेहद जरूरी:
उपचाराधीन से भेदभाव पर वह कहते हैं कि प्रभावित को समाज से पृथक कर देना गलत है। उन्होंने बताया कि कोविड-19 से उपचाराधीन और उसके परिवार के प्रति लोग अलग नजरिया रखते हैं। उनकी सोच बदलने लगती है। ऐसा नहीं होना चाहिए। संकट और परेशानी के वक्त हम एक-दूसरे का साथ छोड़ दें ऐसा न हो। सभी समाज के अभिन्न अंग हैं। कोविड-19 ने हमें सीख दी है कि लोगों की सुरक्षा उनके अपने हाथों में है। इसलिए इसके प्रभाव में आए व्यक्ति या उसके परिवार से दूरी बनाने की जगह उन्हें एक सकारात्मक माहौल देने की जरूरत है। सभी एक-दूसरे का साथ देते हुए सुरक्षा के नियमों को अपनाएंगे, सतर्क और जागरूक रहेंगे तो निश्चय ही संक्रमण दूर रहेगा।

कोरोना के मरीज होम आइसोलेशन में नियमों का करें पालन, रहें सतर्क

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• लापरवाही बरतने पर दोबारा आ सकते हैं कोरोना की चपेट में
• किसी तरह की परेशानी होने पर तत्काल डॉक्टर से करें संपर्क

भागलपुर, 5 अक्टूबर

कोरोना पर काबू पाने के लिए स्वास्थ्य विभाग युद्धस्तर पर पर काम कर रहा है. जिले में जगह-जगह जांच शिविर आयोजित किए जा रहे हैं. शिविर में जांच के बाद लक्षण वाले गंभीर मरीजों को कोविड केयर सेंटर या फिर मायागंज अस्पताल में भर्ती किया जाता है. साथ ही जो बिना लक्षण वाले मरीज होते हैं उन्हें होम आइसोलेशन में भेजा जाता है. ऐसे में होम आइसोलेशन में रहने वाले मरीजों को थोड़ा सतर्क रहने की जरूरत है. साथ ही सरकारी गाइडलाइन का भी पालन करने की आवश्यकता है. ऐसा नहीं करने से वह दोबारा कोरोना की चपेट में आ सकते हैं. साथ ही घर के अन्य सदस्य भी संक्रमित हो सकते हैं. इसलिए होम आइसोलेशन में रहते वक्त सरकार की गाइडलाइन का पूरी तरह से पालन करना चाहिए.

मायागंज अस्पताल के कोरोना वार्ड के नोडल प्रभारी डॉ हेमशंकर शर्मा का कहना है कि जिले में अब तक 13 से अधिक मरीज दोबारा कोरोना की चपेट में आए हैं. यह सभी वैसे मरीज हैं, जिनमें लक्षण नहीं थे. अभी तक लक्षण वाले किसी मरीज के दोबारा कोरोना की चपेट में आने की बात सामने नहीं आई है. हालांकि लक्षण वाले मरीज दोबारा कोरोना की चपेट में नहीं आएंगे इसकी गारंटी नहीं है, लेकिन बिना लक्षण वाले घर में अगर लापरवाही बरतते हैं तो उनमें दोबारा कोरोना होने का खतरा अधिक रहता है. साथ ही उनके घर के अन्य सदस्य भी इसकी चपेट में आ सकते हैं. दरअसल, कुछ लोग यह मान बैठते हैं कि कोरोना से ठीक होने के बाद उनमें एंटीबॉडी विकसित हो गई है जो कि पूरी तरह से सही नहीं है. अगर आप घर में रहते वक्त सरकार की गाइडलाइन का पालन करेंगे और दवा का सही से सेवन करेंगे तभी आपमें एंटीबॉडी विकसित होती है. इसलिए कोरोना मरीजों को होम आइसोलेशन में लापरवाही नहीं करनी चाहिए.

40 दिन के बाद शरीर के अंदर एंटीबॉडी भी खत्म होने लगती है: डॉक्टर शर्मा कहते हैं कि अगर कोरोना मरीज ठीक हो गए हैं और उनमें एंटीबॉडी विकसित भी हो गई है तो 40 दिन के बाद यह खत्म होने लगती है. इसके बाद उस व्यक्ति के दोबारा संक्रमण की जद में आने की आशंका रहती है. इसलिए यह तो बिल्कुल भी नहीं मान लें कि अगर हम एक बार कोरोना से ठीक हो गए हैं तो दोबारा नहीं होगा.

घर में सरकार की गाइडलाइन का करें पालन: कोरोना मरीज को जब होम आइसोलेशन मे भेजा जाता है तो उन्हें सरकार की गाइडलाइन के बारे में बताया जाता है. साथ ही एक किट भी दिया जाता है. किट में दवा के साथ मास्क, ग्लव्स और अन्य जरूरी सामान रहते हैं. मरीज को दवा का कैसे इस्तेमाल करना है, यह भी बताया जाता है. इन बातों पर ध्यान देने की जरूरत है. इसके बावजूद अगर मरीजों को समझने में कोई परेशानी है तो वह डॉक्टर से संपर्क कर सकते हैं.

घर के सदस्यों से दूरी बनाकर रहें: होम आइसोलेशन के बाद कोरोना के मरीज को घर के दूसरे सदस्यों से दूरी बनाकर रहना चाहिए. इससे उनमें कोरोना के संक्रमण का खतरा नहीं होगा. हमेशा मास्क पहनते रहना चाहिए. मास्क अगर गीली हो जाए तो उसे तत्काल बदल लेना चाहिए.इससे वह तो सुरक्षित रहेंगे ही घर के अन्य सदस्य भी कोरोना से सुरक्षित रहेंगे

बापू जयंती पर फाइलेरिया एवं कालाजार को खत्म करने का स्वास्थ्य कर्मियों ने लिया संकल्प

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• बापू के स्वस्थ भारत के सपने होंगे साकार, स्वास्थ्य कर्मी देंगे इसे आकार
• ‘स्वास्थ्य ही अनमोल धन है’ इसको समुदाय को करेंगे प्रचारित
• नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज को खत्म करने के लिए करेंगे सामूहिक प्रयास

लखीसराय / 3, अक्टूबर: ‘‘स्वास्थ्य ही धन है. सोने एवं चाँदी कभी भी वास्तविक धन नहीं हों सकते’’. बापू यानी महात्मा गाँधी के ये वचन स्वस्थ भारत के सपने को साकार करने वाले एवं प्रासंगिक अभी भी दिखते हैं. यह सत्य है कि स्वास्थ्य की बेहतर बुनियाद ही किसी समाज एवं राष्ट्र की समग्र प्रगति को इंगित करते हैं. देशभर में 2 अक्टूबर को बापू जयन्ती मनाया गया. लेकिन इस बार के बापू जयंती पर सिर्फ़ बापू को याद ही नहीं किया गया, बल्कि उनके सपनों को साकार करने की दिशा में स्वास्थ्य कर्मियों ने नया संकल्प भी लिया है. यह संकल्प नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज( यानी फाइलेरिया एवं कालाजार) को सामूहिक प्रयास से खत्म करने का लिया गया है.

जन-जागरूकता सबसे कारगर हथियार:

जिला वेक्टर बोर्न डिजीज कण्ट्रोल पदाधिकारी डॉ धीरेन्द्र कुमार ने बताया बापू जयंती पर जिले में बापू के संघर्ष एवं उनके त्याग को सबने याद किया. यह बापू के दूरगामी सोच का ही नतीजा था कि उन्होंने स्वास्थ्य को अनमोल धन की संज्ञा दी थी. उनका यह सोच आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है. अभी भी फाइलेरिया एवं कालाजार जैसे गंभीर रोग स्वस्थ समाज निर्मित करने की दिशा में चुनौती पेश कर रहे हैं . इसलिए बापू के स्वस्थ भारत के सपने को साकार करने की दिशा में फाइलेरिया एवं कालाजार जैसे रोग को ख़त्म करने के लिए विभाग ने नया संकल्प लिया है. इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए जन-जागरूकता सबसे कारगर हथियार साबित हो सकता है.

स्वास्थ्य कर्मियों ने ली प्रतिज्ञा:

जिले के मानपुर बस्ती की आशा निर्मला कुमारी .ने बतया बापू ने देशहित में कई कुर्बानियां दी थी. उनका इसके पीछे एक ही मकसद था कि देश स्वस्थ एवं खुशहाल हो सके. उन्होंने बताया बापू जयंती पर उन्होंने भी यह ठाना है कि लोगों को फाइलेरिया एवं कालाजार जैसे रोगों के बारे में जागरूक करेंगी. साथ ही समुदाय को बापू के स्वस्थ भारत के सपने के बारे में भी बताएंगी ताकि फाइलेरिया एवं कालाजार को सब मिलकर ख़त्म कर सकें.

जिले के रेऔटा उपकेन्द्र की एएनएम मीना कुमारी .ने बताया कि बापू सिर्फ़ एक स्वत्रंता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि वह देश के राष्ट्रपिता भी थे. इसलिए उनकी सोच लोगों को स्वस्थ देखने की भी थी. उन्होंने बताया बापू के जन्मदिवस पर उन्होंने यह शपथ ली है कि जब तक फाइलेरिया एवं कालाजार समुदाय से खत्म नहीं होता, वह लोगों को फाइलेरिया एवं कालाजार के विषय में जागरूक करती रहेंगी.

लोगों ने भी जतायी सहमति:

जिले के व्यवसायी.निरंजन कुमार ने कहा कि फाइलेरिया एवं कालाजार ऐसे रोग हैं, जिनके विषय में अधिक चर्चा नहीं होती है. लेकिन जिन लोगों को ये रोग होते हैं, वह ही इसका दर्द बेहतर तरीके से समझ पाते हैं. उन्होंने बताया कि उन्होंने ऐसे कई लोगों को देखा है जिनके पैर काफी मोटे हो जाते हैं. उन्हें देखकर यह महसूस होता है कि सामान्य जीवन जीना उनके लिए कितना कस्टकारी होता होगा. उन्होंने बताया कि ऐसे गंभीर रोगों से लड़ने के लिए समुदाय के सभी वर्गों को पहल करनी चाहिए. यदि सभी लोग जागरूक होंगे तो निःसंदेह इस रोग को जड़ से खत्म किया जा सकता है

मायागंज में मरीजों को मिल रही 10 दिन की दवा

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डिस्चार्ज होने वक्त अस्पताल प्रशासन मरीजों को दे रहा है दवा

अस्पताल के पास काफी मात्रा में दवा का स्टॉक है उपलब्ध.

भागलपुर, 3 अक्टूबर

मायागंज अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीजों को अब मुफ्त में दवा भी दी जा रही है. मरीजों को डिस्चार्ज होते वक्त अस्पताल प्रशासन 10 दिन की दवा दे रहा है. पहले यह दवा मरीज बाहर की दुकानों से खरीदते थे. अब अस्पताल प्रशासन से दवा मिलने से मरीजों को बहुत बड़ी राहत मिली है.

मायागंज अस्पताल के अधीक्षक डॉ अशोक कुमार भगत का कहना है कि 5 महीने से अस्पताल में सामान्य मरीजों का इलाज नहीं हो रहा था. इस वजह से दवा काफी मात्रा में स्टॉक हो गई है. अस्पताल प्रशासन ने फैसला किया है कि स्टॉक दवा मरीजों को डिस्चार्ज होते वक्त दे दिया जाए. इससे मरीजों को भी राहत मिलेगी. साथ ही दवा भी एक्सपायर नहीं होगी.

पानी भी मिल रहा है सस्ती कीमत पर: मायागंज अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीजों को सिर्फ दवा ही मुफ्त में नहीं मिल रही है, बल्कि पानी भी सस्ती कीमत पर मिल रहा है. मरीजों को सिर्फ ₹2 में 1 लीटर पानी उपलब्ध कराया जा रहा है जो कि बाहर में ₹20 में मरीज या उसके परिजन खरीदते हैं.

मेडिसिन विभाग में सामान्य मरीजों की जांच व इलाज भी शुरू: मायागंज अस्पताल को कोरोना अस्पताल में बदल देने के बाद यहां पर सामान्य मरीजों का इलाज नहीं हो रहा था. सामान्य मरीज सदर अस्पताल में जाकर इलाज करवा रहे थे, लेकिन अब कोरोना मरीजों की संख्या काफी घट गई है. इस वजह से सामान्य मरीजों का इलाज भी 1 अक्टूबर से शुरू हो गया है. अस्पताल में इलाज करा रहे कोरोना मरीजों को आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है. पहले पूरे अस्पताल में कोरोना मरीजों का इलाज चल रहा था. सिर्फ इमरजेंसी में ही सामान्य मरीजों का इलाज हो रहा था, लेकिन अब इंडोर में भी सामान्य मरीजों का इलाज हो रहा है.

अस्पताल में ईसजी और इको जांच भी जल्द होगी शुरू: मायागंज अस्पताल में सामान्य मरीजों की ईसीजी और इको जांच भी जल्द शुरू होने जा रही है. मालूम हो कि मायागंज अस्पताल में इन सब जांच के बदले में बहुत ही कम कीमत अदा करनी पड़ती है. इन्हीं जांच की बाहर में बहुत ज्यादा पैसे मरीजों को खर्च करने पड़ते हैं. इस तरह से मरीजों को एक और बड़ी राहत जल्द मिलने वाली है.

फाइलेरिया की रोकथाम के लिए गृह–भ्रमण कर खिलायी जा रही है दवा

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स्वास्थ्य विभाग के साथ केयर टीम कर रही है एमडीए कार्यक्रम की मॉनिटरिंग

कोविड -19 संक्रमण दौर के कारण सिर्फ घरों की जा रही है मार्किंग

लखीसराय /03 अक्टूबर: फाइलेरिया उन्मूलन के लिए जिला सहित अन्य प्रखंडों में सर्वजन दवा सेवन कार्यक्रम(एमडीए) की शुरुआत हो चुकी है . स्वास्थ्य कर्मी घर- घर जाकर लोगों को फाइलेरिया की दवा अपनी मौजूदगी में खिला रहे हैं . दवाई सेवन के बाद उनके घर की मार्किंग भी कर रहे हैं । पूर्व में दावा खिलाने के बाद बायें हाथ की तर्जनी उंगली के नाखुन पर माîकग की जाती थी, पर अभी कोविड -19 के कारण सिर्फ घरों की ही मार्किंग की जा रही है।इस कार्यक्रम के तहत जिला के 12 लाख से अधिक लोगों को फाइलेरिया की दवा दी जायेगी. इस अभियान में स्वास्थ्य विभाग के साथ हर प्रखण्ड में केयर की दो सदस्य टीम मॉनिटरिंग कर रही है ।

जिला वेक्टर जनित रोग पदाधिकारी डॉ॰ धिरेन्द्र कुमार ने बताया फाइलेरिया पर प्रभावी नियंत्रण के लिए 28 सितंबर से मिशन मोड में यह काम शुरू हो गया है. आशा अपने सामने ही फाइलेरिया की दवा खिला रही हैं. सभी लोग फाइलेरिया की दवा खायें क्योंकि इसका साइड ईफैक्ट नहीं है. यदि बुखार या चक्कर आने की समस्या होती है तो घबरायें नहीं. यह फाइलेरिया होने की संभावना की ओर ईशारा करता है।इसलिए इस स्थिति में घबराने के बजाये चिकित्सक से मिल लें. सारी सुविधाएं मुहैया करायी जायेंगी.
उन्होने बताया इस अभियान में केयर इंडिया के साथ डब्लूएचओ एवं जीविका का पूरा सहयोग मिल रहा है।

केयर इंडिया के टीम लीड नावेद उर रहमान ने बतया जिले के हर प्रखण्ड में केयर इंडिया के दो सदस्य इस अभियान की मॉनिटरिंग कर रहे हैं जिसमें वह यह सुनिश्चित करेंगे कि परिवार में फाइलेरिया की दवा खिलायी गयी है या नहीं. इस अभियान में केयर इंडिया तीन स्तर से सहयोग कर रहा है । स्पॉट मॉनिटरिंग , बैक मॉनिटरिंग एवं अपने क्षेत्र के पीएचसी प्रभारी और आशा के साथ हर शाम में सामिक्षा करना, जिसमे यह सुनिश्चित किया जाता है कि कौन सा घर या व्यक्ति इस अभियान से छूट गया है। छुटे हुए व्यक्ति की पहचान होने के बाद उनके घर पर दुबारा जा कर दवा खिलाई जाएगी।

गंभीर रोग है फाइलेरिया: फाइलेरिया एक गंभीर रोग है. इसके लक्ष्ण सामने आने में वर्षों लग जाते है. इसलिए फाइलेरिया की दवा का सेवन सभी लोगों के लिए लाभप्रद है. फाइलेरिया की पूर्णत: रोकथाम के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत यह दवा लोगों को दी जा रही हैं. देश में 256 जिले फाइलेरिया से बुरी तरह प्रभावित हैं. 65 करोड़ भारतीयों को इस बीमारी का खतरा है.विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में पाए जाने वाले फाइलेरिया के 40 फीसदी मरीज भारत में हैं. अधिकांश मामले बिना लक्षणों वाले होते हैं. क्यूलेक्स मच्छर के काटने से फाइलेरिया होता है. यह मच्छर व्यूचेरिया ब्रैंकोफ्टी नामक परजीवी को पीड़ित के शरीर में पहुंचाने का काम करता है. लिम्फ़ प्रणाली के नुकसान होने से पैरों, हाथों और जननांगों में सूजन आती है. पैरों में सूजन होने से पीड़ित हाथीपांव से ग्रसित हो जाता है. अंडकोश भी काफी बड़ा हो जाता है.

नकली और मिलावटी सैनिटाइजर हाथों की त्वचा को पहुंचा सकते हैं नुकसान

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गुणवत्ता वाले सैनिटाइजर के इस्तेमाल से ही होगा संक्रमण से बचाव

अल्कोह युक्त हैंड सैनिटाइजर ही खरीदें, निर्दशों व एक्सपायरी डेट जरूर पढ़ें

मुंगेर , 3 अक्टूबर: कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए मास्क व हाथों की नियमित सफाई जरूरी है. अमूमन हाथों की सफाई के लिए साबुन और पानी का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन यात्रा व बाजार हाट के दौरान पानी की अनुपलब्धता के कारण सैनिटाइजर का इस्तेमाल बढ़ा है. कोरोना संक्रमण की सही तरीके से रोकथाम के लिए सही मास्क के इस्तेमाल के साथ सैनिटाइजर की भी गुणवत्ता का ध्यान रखा जाना चाहिए.

सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार हाथों को धोने के लिए साबुन पानी का इस्तेमाल बेहतर है. क्योंकि यह हाथों पर मौजूद सभी तरह के रोगाणुओं व रसायनों को साफ करने के लिए सबसे प्रभावशाली है. लेकिन साबुन और पानी उपलब्ध नहीं होने पर कम से कम 60 प्रतिशत इथाइल अल्कोहल या 70 प्रतिशत आइसोप्रोपाइल अल्कोहल वाले सैनिटाइजर का इस्तेमाल जरूरी है. संगठन ने इस बात की भी जानकारी दी है कि इससे अधिक अल्कोहल आधारित हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. ये हैंड सैनिटाइजर हाथों के रोगाणुओं को खत्म करने में मददगार है. हालांकि हैंड सैनिटाइजर का बहुत अधिक इस्तेमाल से भी बचने की चेतावनी दी गयी है.

इथाइल अल्कोहल वाले सैनिटाइजर ही खरीदें:
सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक इथाइल या आइसोप्रोपाइल अल्कोहल आधारित हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल सुरक्षित है. वहीं मिथाइल अल्कोहल से तैयार किया गया सैनिटाइजर नुकसानदेह है. मिथाइल अल्कोहल जहरीला होता है और त्वचा के संपर्क में आने पर यह एलर्जी पैदा कर सकता है. यह आंखों और सांसों के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंच कर उसे नुकसान पहुंचाता है. इसलिए सैनिटाइजर खरीदते समय कंपोजिशन संबंधी निर्दशों को देख लिया जाना सही है.

बच्चों की पहुंच से दूर रखें हैंड सैनिटाइजर:
हैंड सैनिटाइजर को सुरक्षित रखा जाना भी आवश्यक है. यह ज्वलनशील होता है इसलिए इसे गर्म स्थान तथा आग से दूर रखें. सैनिटाइजर इस्तेमाल के समय ध्यान रखें कि यह आंखों के संपर्क में नहीं आये. त्वचा पर किसी तरह की एलर्जी होने पर डॉक्टर से परामर्श लें. सैनिटाइजर को बच्चों की पहुंच से दूर रखें. सैनिटाइजर खरीदते समय उसके एक्सपायरी डेट जरूर देंखें और आवश्यक निर्देशों को पढ़ें. अभिभावक बच्चों को हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल अपनी निगरानी में करवायें. खुशबू वाले सैनिटाइजर के इस्तेमाल से बचें.

सैनिटाइजर व साबुन के इस्तेमाल को समझें:
कोरोना संक्रमण काल में सैनिटाइजर की मांग बढ़ी है. दफ्तर, बाजार हाट व यात्रा के दौरान सैनिटाइजर रखना जरूरी है, ताकि हाथों की नियमित सफाई की जा सके. लेकिन कुछ काम ऐसे होते हैं जिसमें हाथ अधिक गंदे होते हैं. ऐसे में हाथों को सिर्फ साबुन और पानी से ही धोयें

साबुन पानी का इस्तेमाल:
खाना बनाने व खाने, शौच के बाद, मरीज की देखभाल, कटने व जख्म होने, डायपर बदलने, खांसने, छींकने, जानवरों को खाना देने व उनकी साफ सफाई, कूड़ा कचड़ा के निष्पादन व हाथों के बहुत अधिक गंदे और चिकना होने के बाद और वैसे सभी काम जिनमें हाथ बहुत अधिक गंदे हों.

सैनिटाइजर का इस्तेमाल:
साबुन पानी उपलब्ध नहीं होने पर, हाथ मिलाने के बाद, यात्रा के दौरान, हाथों के हल्के गंदे होने पर.

बापू के स्वस्थ भारत के सपने होंगे साकार, स्वास्थ्य कर्मी देंगे इसे आकार

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• बापू जयंती पर फाइलेरिया एवं कालाजार को खत्म करने का स्वास्थ्य कर्मियों ने लिया संकल्प
• ‘स्वास्थ्य ही अनमोल धन है’ इसको समुदाय को करेंगे प्रचारित
• नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज को खत्म करने के लिए करेंगे सामूहिक प्रयास

भागलपुर/ 3, अक्टूबर: ‘‘स्वास्थ्य ही धन है. सोने एवं चाँदी कभी भी वास्तविक धन नहीं हों सकते’’. बापू यानी महात्मा गाँधी के ये वचन स्वस्थ भारत के सपने को साकार करने वाले एवं प्रासंगिक अभी भी दिखते हैं. यह सत्य है कि स्वास्थ्य की बेहतर बुनियाद ही किसी समाज एवं राष्ट्र की समग्र प्रगति को इंगित करते हैं. देशभर में 2 अक्टूबर को बापू जयन्ती मनाया गया. लेकिन इस बार के बापू जयंती पर सिर्फ़ बापू को याद ही नहीं किया गया, बल्कि उनके सपनों को साकार करने की दिशा में स्वास्थ्य कर्मियों ने नया संकल्प भी लिया है. यह संकल्प नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज( यानी फाइलेरिया एवं कालाजार) को सामूहिक प्रयास से खत्म करने का लिया गया है.

जन-जागरूकता सबसे कारगर हथियार:

जिला वेक्टर बोर्न डिजीज कण्ट्रोल पदाधिकारी डॉ कुंदन भाई पटेल ने बताया बापू जयंती पर जिले में बापू के संघर्ष एवं उनके त्याग को सबने याद किया. यह बापू के दूरगामी सोच का ही नतीजा था कि उन्होंने स्वास्थ्य को अनमोल धन की संज्ञा दी थी. उनका यह सोच आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है. अभी भी फाइलेरिया एवं कालाजार जैसे गंभीर रोग स्वस्थ समाज निर्मित करने की दिशा में चुनौती पेश कर रहे हैं . इसलिए बापू के स्वस्थ भारत के सपने को साकार करने की दिशा में फाइलेरिया एवं कालाजार जैसे रोग को ख़त्म करने के लिए विभाग ने नया संकल्प लिया है. इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए जन-जागरूकता सबसे कारगर हथियार साबित हो सकता है.

स्वास्थ्य कर्मियों ने ली प्रतिज्ञा:

जिले के लोकमानपुर गाँव की आशा ममता ने बतया बापू ने देशहित में कई कुर्बानियां दी थी. उनका इसके पीछे एक ही मकसद था कि देश स्वस्थ एवं खुशहाल हो सके. उन्होंने बताया बापू जयंती पर उन्होंने भी यह ठाना है कि लोगों को फाइलेरिया एवं कालाजार जैसे रोगों के बारे में जागरूक करेंगी. साथ ही समुदाय को बापू के स्वस्थ भारत के सपने के बारे में भी बताएंगी ताकि फाइलेरिया एवं कालाजार को सब मिलकर ख़त्म कर सकें.

जिले के नारायणपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की एएनएम रेनू ने बताया कि बापू सिर्फ़ एक स्वत्रंता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि वह देश के राष्ट्रपिता भी थे. इसलिए उनकी सोच लोगों को स्वस्थ देखने की भी थी. उन्होंने बताया बापू के जन्मदिवस पर उन्होंने यह शपथ ली है कि जब तक फाइलेरिया एवं कालाजार समुदाय से खत्म नहीं होता, वह लोगों को फाइलेरिया एवं कालाजार के विषय में जागरूक करती रहेंगी.

लोगों ने भी जतायी सहमति:

जिले के व्यवसायी ने श्रवण बाजोरिया कहा कि फाइलेरिया एवं कालाजार ऐसे रोग हैं, जिनके विषय में अधिक चर्चा नहीं होती है. लेकिन जिन लोगों को ये रोग होते हैं, वह ही इसका दर्द बेहतर तरीके से समझ पाते हैं. उन्होंने बताया कि उन्होंने ऐसे कई लोगों को देखा है जिनके पैर काफी मोटे हो जाते हैं. उन्हें देखकर यह महसूस होता है कि सामान्य जीवन जीना उनके लिए कितना कस्टकारी होता होगा. उन्होंने बताया कि ऐसे गंभीर रोगों से लड़ने के लिए समुदाय के सभी वर्गों को पहल करनी चाहिए. यदि सभी लोग जागरूक होंगे तो निःसंदेह इस रोग को जड़ से खत्म किया जा सकता है