घर-घर पोषण और स्वच्छता की अलख जगा रही हैं सेविका पूनम कुमारी

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• ‘पोषण अभियान’ में उत्कृष्ट कार्य के लिए हो चुकी हैं सम्मानित
• पोषण गतिविधियों पर देती हैं विशेष ध्यान
लखीसराय, 31 अगस्त:
कोरोना संक्रमण काल में पोषण कार्यक्रमों के कुशल संचालन में चुनौतियाँ बढ़ने के बाद आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका में बदलाव देखने को मिले हैं. जिले के पिपरिया प्रखंड, पंचायत वलीपुर, आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 18 के वार्ड नंबर 10 की आंगनबाड़ी सेविका पूनम कुमारी ने भी कोरोना के मद्देनजर अपनी भूमिका में बदलाव लाकर पोषण सेवाओं को सुचारू रखने में सफ़ल हुयी हैं. पोषण अभियान में उनके उत्कृष्ट कार्य को देखते हुए उन्हें सम्मानित भी किया गया है. इस वर्ष कोरोना संक्रमण के कारण आंगनबाड़ी केन्द्र के बंद होने के बाद भी वह अपने पोषक क्षेत्र में पोषण गतिविधियों को सुचारू रखी हैं. गृह भ्रमण के जरिए संपूरक आहार, स्तनपान एवं अन्य महत्वपूर्ण गपोषण गतिविधियों पर समुदाय को जागरूक करने में उनकी भूमिका सराहनीय रही है. यही वजह है कि पूनम के पोषक क्षेत्र में उनकी पोषण दीदी के रूप में पहचान भी बनी है.
घर-घर में पहुंच रही पूनम कुमारी की आवाज:
सेविका पूनम कुमारी ने बताया स्वच्छता एवं साफ-सफाई को पोषण अभियान में प्रमूख रूप से शामिल किया गया है। किसी भी बीमारी से लड़ने में ये सबसे बड़े हथियार साबित होते है। वह गर्भवती एवं महिलाओं को समझाती हैं कि खाने से पहले और शौच के बाद विधिवत रूप से हाथ धोते रहें। उन्होंने बताया पोषण पर सामुदायिक जागरूकता बढ़ाने के क्रम में वह साफ़-सफाई पर विशेष जोर देती है. साफ़-सफाई पोषण व्यवहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो कुपोषण से सुपोषण की तरफ बढ़ने में सहयोग करता है. वह गृह भ्रमण के दौरान साफ़-सफाई की महता को लेकर महिलाओं के साथ पुरुषों से भी संवाद करती है. पूनम बताती है कोरोना संक्रमण के कारण लोग स्वच्छता को लेकर पहले से अधिक सतर्क भी हुए हैं एवं उनका भी निरंतर प्रयास जारी है कि लोगों में इसको लेकर गंभीरता बने रहे.
खानपान में पौष्टिक आहार शामिल करने पर दे रही हैं जोर:
पूनम कुमारी बताती हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में पौष्टिक आहार की उपलब्धता तो है, लेकिन जानकारी के अभाव में महिलाएं इससे वंचित रह जा रही थी। इसलिए उन्होंने इस पर अधिक ध्यान दिया. इसको लेकर वह घर-घर जाकर महिलाओं को पोषण से संबंधित सही जानकारी दी एवं उन्हें खाने में हरी पत्तेदार सब्जियों में जैसे सहजन का पत्ता, धनिया का पत्ता, पालक की साग का सेवन और पीले नारंगी और फलों को शामिल करने पर जोर दिया. साथ ही गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं एवं किशोरियों को आयरन की गोलियां भी लेने की सलाह देती हैं. उन्होंने बताया महिलाओं, उनकी सास व घर के मुखिया को समझाती हैं कि गर्भवती महिलाओं एवं धात्री महिलाओं को स्वयं व बच्चे के स्वस्थ रहने के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत होती है। पोषण की कमी से महिलाओं में खून की कमी हो जाती है, जिससे जन्म लेने बच्चों के कुपोषण के शिकार होने की संभावना बढ़ जाती है.
गोदभराई और अन्नप्राशन को नियमित रखने का प्रयास:
पूनम कुमारी ने बताया गोदभराई और अन्नप्राशन महत्वपूर्ण पोषण गतिविधियों में शामिल है. लॉकडाउन के दौरान आंगनबाड़ी केंद्र बंद होने के बाद भी उन्होंने गोदभराई और अन्नप्राशन को लाभुकों के घरों पर ही आयोजन कराया. साथ ही उन्होंने इन गतिविधियों के घर पर आयोजन होने के दौरान कोरोना रोकथाम के नियमों का शत-प्रतिशत अनुपालन भी सुनिश्चित करायी.
मिल चुका है पुरस्कार :
पूनम कुमारी के बेहतर कार्य को देखते हुए विगत माह में जिला कार्यक्रम पदाधिकारी द्वारा उन्हें ‘पोषण अभियान’ में उत्कृष्ट कार्य के लिए जिला स्तरीय समूह पोषण पुरस्कार से सम्मानीत किया गया है. पूनम कुमारी कहती है, ‘‘ मेरा पूरा ध्यान अपने पोषक क्षेत्र को सुपोषित करने की है. पोषण अभियान का लक्ष्य भी बच्चों, गर्भवती महिलाओं धात्री माताओं एवं किशोरियों में पोषण स्तर को बढ़ाना है. इसके लिए मैं निरंतर प्रयास कर रही हूँ एवं मेरी इस प्रयास में लोगों का भी सहयोग मिल रहा है. मैं आश्वस्त भी हूँ कि हम कुपोषण के दंश से मुक्त हो सकेंगे’

बस में यात्रा करते वक्त नहीं करें लापरवाही, रहें सतर्क

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सरकार की गाइडलाइन के अनुसार ही बसों में यात्रा करें
सफाई का ध्यान रखते हुए शारीरिक  दूरी का रखें ध्यान
 भागलपुर,  29 अगस्त
कोरोना संक्रमण की दर कम होने के साथ ही सरकार ने बसों के परिचालन की अनुमति दे दी है. लोगों ने भी बस से सफर करना शुरू कर दिया है. देखा जा रहा है कि कुछ लोग बस यात्रा के दौरान ना तो सामाजिक दूरी का पालन कर रहे हैं और ना ही मास्क पहन रहे हैं. ऐसी लापरवाही भूल से भी नहीं करें. सरकार ने बसों के परिचालन की अनुमति के साथ कुछ गाइडलाइन भी जारी की है जिसका पालन आवश्यक रूप से करें.
 स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के माध्यम से जारी गाइलाइन में कहा गया है कि बस यात्रा करते समय शारीरिक-दूरी का पालन अवश्य करें. संचालक सीट के मुताबिक यात्रियों को बिठाए. यात्रियों को अनिवार्य रूप से मास्क पहनना होगा. साथ ही बस यात्रा शुरू होने के पूर्व एवं संपन्न होने के बाद वाहनों को सैनिटाइज कराने का निर्देश दिया गया है. जिला प्रशासन द्वारा भी स्थानीय वाहन मालिकों को सरकार के सभी शर्तो का हरसंभव पालन करने को कहा गया है. संचालकों को सख्त लहजे में निर्देश दिया गया है कि गाइलाइन के अनुसार ही बस चलाएं, ताकि यात्रियों एवं बस चालकों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हो.
यात्रा के दौरान मास्क का करें उपयोग: बस यात्रा के दौरान फेस कवर या मास्क पहनें और सहयात्रियों से पर्याप्त दूरी बना कर रखें. वाहन को बेवजह न छुएं. वाहन से उतरते वक्त भी सामाजिक दूरी का पालन करें. यात्रा के समय हैंड सैनिटाइजर अपने पास जरूर रखें. एक निश्चित अंतराल पर हाथ को सैनिटाइज करते  रहें. व्यवहार में बदलाव लाकर आप कोरोना के संक्रमण से बच सकते हैं और दूसरों को भी बचा सकते हैं. इस संबंध में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक पोस्टर जारी करते हुए सार्वजनिक यात्रा के दौरान तीन बातों का ख्याल रखने को कहा है, जिसमें  2 गज की दूरी,  हाथ को तुरंत साफ करना और खांसते या छींकते समय मुंह पर रूमाल या टिश्यू पेपर रखने की बात बताई गयी है.
साफ-सफाई का रखें ख्याल: बसों की साफ-सफाई का भी विशेष ख्याल रखने कहा गया है. साफ-सफाई के बाद ही बस चलाने की अनुमति दी जाएगी. लोग भी अब सफाई का ध्यान रखने लगे हैं एवं बाहर कुछ भी खाने-पीने से बच रहे हैं.
इन बातों का भी रखें ख्याल
-वाहनों की प्रतिदिन धुलाई के साथ आवश्यक साफ-सफाई करें.
– यात्रा के बाद बस की सफाई आवश्यक रूप से करें
-वाहनों के अंदर चढ़ने, उतरने के समय यात्रियों को शारीरिक दूरी का अनुपालन करना होगा.
-बिना मास्क पहने बस में सफर की अनुमति नहीं होगी.
-यात्री वाहनों की रेलिंग का उपयोग कम से कम करें.
-वाहनों के अंदर पान, खैनी, तम्बाकू, गुटखा आदि का उपयोग वर्जित होगा. पकड़े जाने पर दंडात्मक करवाई होगी

शिशु-मृत्यु दर में सुधार लाने में आशा का अहम योगदान

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• एसआरएस की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 में शिशु-मृत्यु दर 48 थी, जो 2018 में 32 हो गई
• अस्पताल से लेकर घर और समुदाय स्तर पर नवजात पर आशा रखती हैं नजर
• नवजात के पोषण, टीकाकरण, शारीरिक व मानसिक विकास की करतीं हैं निगरानी
• चार चरणों में गृह भ्रमण और स्वास्थ्य रिपोर्ट के आधार पर इन्हें दी जाती है प्रोत्साहन राशि
खगड़िया, 29 अगस्त। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम के तहत देश में शिशु-मृत्यु दर को कम करना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। सरकार और स्वास्थ्य विभाग की सकारात्मक पहल और शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम योजना के बेहतर क्रियान्वयन का ही परिणाम है कि पिछले कुछ वर्षों में देश में शिशु-मृत्यु दर में काफी कमी आई है। सैंपल रेजिसट्रेशन सर्वे एसआरएस) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 में राज्य की शिशु मृत्यु दर 48 ( प्रति हजार जीवित जन्म) थी, जो वर्ष 2018 में घट कर 32( प्रति हजार जीवित जन्म) हो गयी. इसमें 79 प्रतिशत नवजात की मृत्यु जन्म के चार सप्ताह के अंदर हो जाती है। इसमें कम वजन वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा रहती है। सामान्य वजन की तुलना में कम वजन वाले बच्चों का जल्द संक्रमण के प्रभाव में आने, उनमें  मानसिक विकास में कमी तथा कुपोषण का प्रभाव अधिक होना शिशु मृत्यु का मुख्य कारण बनता है। इसलिए ऐसे नवजात बच्चों की ससमय पहचान कर उनकी देखभाल और उचित इलाज की व्यवस्था कर शिशु-मृत्यु दर में कमी लाई जा रही है। इस कार्य में आशा कार्यकर्ताओं का अहम योगदान है। ये गृह स्तर पर नवजात के स्वास्थ्य पर नजर रखते हुए उनके विकास के लिए कार्य कर रही हैं।
आशा व नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए उठाए जा रहे कदम:
जन्म के समय सामान्य से कम वजन वाले नवजात व शिशुओं की नियमित जांच व पहचान के लिए मुख्य रूप से चार कदम उठाए जा रहे हैं। पहले कदम के रूप में नवजात शिशु जिनका जन्म अस्पताल या घर में हुआ है, उनकी वजन की जाँच नर्सिंग स्टाफ तथा आशा द्वारा सुनिश्चित करना है। दूसरे पहल के रूप में कम वजन वाले नवजात को चिन्हित कर उनकी जानकारी संबंधित प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी को देना सुनिश्चित कराना है, ताकि चिकित्सा पदाधिकारी अपने स्तर पर संबंधित आशा को कम वजन वाले शिशुओं की सुधारात्मक जांच हेतु आदेश दे सकें। तीसरे और चौथे पहल के तहत प्रत्येक कम वजन वाले नवजात, जिनकी जांच आशा द्वारा की गई है, उनकी समीक्षा एएनएम की साप्ताहिक बैठक तथा प्रत्येक माह में आशा दिवस पर प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी द्वारा की जानी है।
तीसरे, छठे, नौवें और बारहवें माह में आशा द्वारा किया जाता है फॉलोअप:
न केवल सामान्य प्रसव बल्कि एसएनसीयू (स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट) से डिस्चार्ज शिशुओं का फॉलोअप आशा द्वारा किया जाता है। विशेष रूप से कम वजन वाले शिशुओं की बेहतर देखभाल सुनिश्चित करना इनके जिम्मे है। इसके लिए तीसरे, छठे, नौवें और बारहवें माह में आशा द्वारा इनके फॉलो-अप किए जाने का प्रावधान है। इसका लाभ यह होता है कि शिशु के स्वास्थ्य की स्थिति से आशा अवगत रहती हैं। वहीं शिशु के बीमार रहने पर अस्पताल रेफर करती हैं। इस फॉलोअप कार्य के लिए आशा को प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है।
गृह भ्रमण व बेहतर कार्य के लिए आशा को दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि:
बच्चे के स्वास्थ्य में सकारात्मक परिणाम सुनिश्चित होने तक आशा द्वारा नवजात के जन्म के बाद और एसएनसीयू से डिस्चार्ज शिशु का चार अनुवर्तन(फॉलो-अप) किया जाता है। इसके लिए आशा को प्रोत्साहन के रूप में 50 रुपए प्रति मुलाकात की दर पर कुल चार बार मुलाकात के पश्चात एकमुश्त 200 रूपये दिए जाते हैं। आशा द्वारा चार अनुवर्तन शिशु के जन्म के तीसरे, छठे, नवें एवं 12वें माह में गृह भ्रमण कर किया जाता है। गृह भ्रमण के दौरान मुख्य रूप से पोषण, टीकाकरण, शारीरिक व मानसिक विकास की निगरानी के साथ उचित सलाह भी देनी है। साथ ही गंभीर रूप से बीमार बच्चों को रेफर भी करना है। वहीं एसएनसीयू से डिस्चार्ज शिशु का निर्धारित माह में फैकल्टी फॉलोअप हेतु शिशु को एसएनसीसू/नीकू में रेफर करना सुनिश्चित करना है।
आशा के लिए प्रोत्साहन राशि के लिए यह दायित्व निभाना है जरूरी:
• यह सुनिश्चित कर लिया गया है कि मातृत्व एवं बाल रक्षा (एमसीपी) कार्ड में जन्म के समय बच्चे का वजन दर्ज किया गया है।
• यह सुनिश्चित कर लिया गया है कि बच्चे को एक वर्ष तक पूर्ण प्रतिरक्षण दिया गया हो और उसे एमसीपी कार्ड में दर्ज किया गया है।
• यह सुनिश्चित कर लिया गया है कि नवजात के जन्म का पंजीकरण कर लिया गया है।
• नवजात शिशु प्रसव के बाद एक वर्ष से जीवित है, और उसका स्वास्थ्य बेहतर है।
• आशा कार्यकर्ता का मॉड्यूल 6 एवं 7 में प्रशिक्षित होना भी जरूरी है।
• आशा द्वारा भरा गया प्रपत्र आशा फैसिलिटेटर/एएनएम द्वारा सत्यापित है।

चिकित्सकों की तत्परता ने बचा ली गर्भवती महिला की जान

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• गर्भ में ही बच्चे की हो गई थी मौत, रेफरल अस्पताल से पहुंची थीं जिला अस्पताल
• प्लेसेंटा प्रीविया के कारण पीड़ा के साथ रक्तस्राव अत्याधिक रूप से बढ़ गया था
• हिमोग्लोबिन का स्तर था काफी कम, नाजुक स्थिति में पति, ब्लड बैंक कर्मी और केयर इंडिया का मिला सहयोग
• जिला अस्पताल की महिला चिकित्सक डॉ. कविता व नर्सिंग कर्मियों ने दी महिला को नई जिंदगी
जमुई, 29 अगस्त।
कोविड-19 के दौर में लोग न केवल कोरोना वायरस बल्कि अन्य गंभीर बीमारियों से भी ग्रसित हैं। खासकर नवजात और गर्भवती महिलाओं की इस वक्त सबसे ज्यादा देखभाल की जरूरत है।  यद्यपि, स्वास्थ्य विभाग व अस्पताल प्रबंधन द्वारा कोरोना के साथ अन्य गंभीर बीमारियों से ग्रसित लोगों के इलाज पर भी पूरा ध्यान दिया जा रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पताल तक बेहतर रूप से सुविधाएं दी जा रही हैं। अस्पताल आने वालों की पूर्ण देखभाल और उनके जीवन की रक्षा का दायित्व स्वास्थ्य कर्मी, नर्स और डॉक्टर पूर्ण रूप से निभा रहे हैं। इसी क्रम में जिला अस्पताल जमुई के डॉक्टर और नर्सों ने एक महिला की जान बचाकर मिसाल पेश की है। दरअसल, महिला गर्भवती थी और गर्भाशय में ही उनके बच्चे की मौत हो गई थी। इसके बाद अत्याधिक रक्तस्त्राव से उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। तुरंत परिजन उन्हें लेकर रेफरल अस्पताल, लक्ष्मीपुर पहुंचे। यहां स्थिति बिगड़ती देख उन्हें जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। इधर, जिला अस्पताल आते-आते उनकी स्थिति और खराब हो गई। गर्भवती की स्थिति गंभीर होने के कारण उचित उपचार के लिए उच्च संस्था में रेफर करने की आवश्यकता थी। लेकिन चिकित्सकों एवं कर्मियों ने गर्भवती महिला की नाजुक स्थिति को देखते हुए वहीं इलाज करने का निर्णय लिया। इसके बाद गर्भवती की उपचार की व्यवस्था में सभी लग गए। उनका प्रयास रंग लाया और ना केवल महिला की जान बची, बल्कि कठिन समय में चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मियों ने समाज के लिए एक मिसाल भी पेश की।
गर्भ में ही बच्चे की हो गई थी मौत :
जमुई के हरमा पहाड़ी, लक्ष्मीपुर निवासी मनोज मांझी की पत्नी रेखा देवी (24 वर्षीय) गर्भवती थी। कुछ दिनों से पीड़ा के साथ रक्तस्राव काफी बढ़ गया। पत्नी की लगातार खराब होती स्थिति को देखते हुए मनोज मांझी उन्हें लेकर उपचार के लिए रेफरल अस्पताल, लक्ष्मीपुर पहुंचे। यहां प्राथमिक उपचार के बाद उनकी खराब स्थिति को देखते हुए बेहतर इलाज के लिए उन्हें जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। पत्नी की जान बचाने के लिए 24 अगस्त की सुबह 11:40 बजे मनोज मांझी उन्हें लेकर जिला अस्पताल के लिए निकले पड़े। दोपहर के करीब एक बजे वे जिला अस्पताल पहुंचे। उस वक्त जिला अस्पताल में सिस्टर अनीता एवं डोली मौजूद थीं। उन्होंने तत्काल गर्भवती का उपचार शुरू किया। बीपी और हिमोग्लोबिन चेक किया। हिमोग्लोबिन का स्तर काफी कम (6.2) था। जांच के दौरान पता चला कि गर्भवती को प्लेसेंटा प्रीविया है, और बच्चे की मौत हो चुकी है। इसके कारण उनकी स्थिति लगातार खराब होती चली जा रही है। उन्होंने इसकी जानकारी तत्काल अस्पताल की महिला चिकित्सक डॉक्टर कविता को दी। इस दौरान महिला का काफी रक्तस्राव हो चुका था। उन्हें तत्काल ब्लड चढ़ाने की जरूरत थी। ऐसे में उनके पति ने उन्हें एक यूनिट ब्लड दिया एवं रेखा देवी को ब्लड चढ़ाया गया। वहीं इलाज के दौरान दूसरे शिफ्ट में सिस्टर ​बिंदा कुमारी और रंजू कुमारी तथा तीसरे शिफ्ट में सिस्टर मीना कुमारी और बबीता कुमारी ने रेखा देवी का पूरा ख्याल रखा।
क्या होता है प्लेसेंटा प्रीविया:
गर्भावस्था के दौरान, यदि गर्भनाल इस तरह से विकसित होती है कि यह पूरी तरह से या आंशिक रूप से प्लेसेंटा ग्रीवा को ढक देती है, तो इस स्थिति को ‘प्लेसेंटा प्रीविया’ या ‘लो–लाइंग प्लेसेंटा’ कहा जाता है। इससे प्रसव के दौरान शिशु और मां को खतरा रहता है, क्योंकि गर्भाशय ग्रीवा खुलने पर यह क्षतिग्रस्त हो सकती है। गर्भनाल समय से पहले प्लेसेंटा से अलग हो सकती है जिससे मां को गंभीर रक्तस्राव होता है जो बच्चे को भी प्रभावित कर सकता है। गंभीर स्थिति में बच्चे और मां दोनों की जान जाने का खतरा बढ़ जाता है।
डॉक्टर और नर्सों की बेहतर देखभाल रंग लायी:
गर्भवती की स्थिति को देखते हुए एक समय जिला अस्पताल से भी उन्हें रेफर करने की बात हुई। लेकिन, लगातार नाजुक होती स्थिति को देखते हुए उनके इलाज का जिम्मा डॉक्टर कविता और उनकी टीम ने उठाया। गर्भवती को सामान्य स्थिति में लाने के लिए बल्ड की जरूरत हुई तो केयर इंडिया और ब्लड बैंक के सहयोग से बल्ड उपलब्ध कराया गया। एक यूनिट ब्लड महिला को रात में दिया गया। वहीं इस दौरान डॉक्टर और नर्सों की बेहतर देखभाल और इलाज से रेखा देवी की स्थिति थोड़ी सामान्य हुई और इसी दौरान सामान्य डिलीवरी सुनिश्चित हो पाई। इस सफलता के बाद से रेखा देवी के स्वास्थ्य में लगातार सुधार आता गया। अगले दिन सुबह उन्होंने हल्का भोजन भी लेना शुरू कर दिया। हालांकि अत्याधिक रक्तस्राव और अधिक कमजोरी की वजह से अभी वह डॉक्टरों और नर्सों की निगरानी में स्वास्थ्य लाभ ले रही हैं। वहीं केयर इंडिया के सदस्य भी लगातार उनके संपर्क में रहते हुए हालचाल ले रहे हैं।
अत्याधिक रक्तस्राव से महिला की स्थिति नाजुक बन गई थी:
जिला अस्पताल की महिला चिकित्सक डॉक्टर कविता बताती हैं गर्भवती को जब उन्होंने देखा तो उनकी स्थिति काफी खराब हो चुकी थी। गर्भ में ही बच्चे की मौत हो गई थी। साथ ही अत्याधिक रक्तस्राव से महिला की स्थिति नाजुक बन गई थी। परेशानी बढ़ती ही जा रही थी। ऐसी स्थिति में  जो सुविधाएं अस्पताल में उपलब्ध थी उसी के तहत इलाज शुरू कर दी गई। सभी कर्मियों ने भी तत्परता दिखाई। अंतत: सबकी मेहनत रंग लाई और ना केवल महिला की जान बची, बल्कि बिना ऑपरेशन के बच्चा मां के गर्भ से भी बाहर आ गया। समय पर इलाज नहीं होता तो महिला की जान भी जा सकती थी।
डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मियों ने जिंदा रखी उम्मीद:
रेखा देवी के पति मनोज मांझी कहते हैं पत्नी की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए एक समय वह काफी घबरा गए थे। रेफरल अस्पताल से जिला अस्पताल और वहां से भी रेफर की बात सुनकर और काफी परेशान हो गए। उनकी उम्मीद दम तोड़ती जा रही थी, लेकिन जिला अस्पताल के चिकित्सक, कर्मी एवं केयर इंडिया के सहयोग और बेहतर इलाज से पत्नी की जान बच गई। वह सबका धन्यवाद करते हुए कहते हैं कोविड 19 के दौर में भी स्वास्थ्य कर्मियों और डॉक्टरों की सेवा ने साबित किया है कि धरती पर ये भगवान के रूप में ही मौजूद हैं। इनकी सेवा का कोई मोल नहीं है।

सुरक्षित जीवन के लिए सतर्कता ही है एकमात्र उपाय

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– बाजार और सड़कों पर न लगाएं भीड़, शारीरिक दूरी का करें पालन
– प्रशासन ने जरूरत को देखते हुए नियमों में छूट दी है, नहीं हुआ है संक्रमण अभी खत्म
– लोगों को करें जागरूक, एक-दूसरे के सहयोग से ही कोविड-19 पर लगेगा लगाम
मुंगेर, 28 अगस्त। सूबे में लॉकडाउन के मध्य अब जीवन सामान्य रूप से पटरी पर लौटने लगा है। प्रशासन की ओर से लोगों की आवश्यकता को देखते हुए नियमों में छूट भी दी जाने लगी है। बाजार और दुकानों के खुलने के साथ अब व्यापार और परिवहन के क्षेत्र में स्थिति सामान्य होने लगी है। हालांकि अभी कोरोना संक्रमण का खतरा टला नहीं है, इसलिए सरकार व स्थानीय प्रशासन द्वारा हरेक पहलू पर नजर रखी जा रही है। साथ ही इस दौरान दिए गए नियमों का सही से पालन करने की अपील भी लोगों से की जा रही है। हालांकि कुछ बाजारों में शारीरिक दूरी का पालन नहीं होता दिख रहा है। जल्दबाजी के चलते लोग अक्सर दुकानों के आगे भीड़ लगा दे रहे हैं। यह वक्त है सजग और सतर्क रहते हुए कोविड-19 के संकमण के प्रसार को रोकने का। लेकिन यह समाज के पूर्ण सहयोग के बिना संभव नहीं है।
अपनी जिम्मेदारी समझें, मास्क व सैनिटाइजर को बनाएं जीवन का अहम हिस्सा:
मुंगेर के स्थानीय युवा व्यवसायी प्रशांत कुमार मिश्रा कहते हैं कि सरकार और प्रशासन हरेक जगह आपकी सुरक्षा के लिए खड़ा नहीं रह सकता। इसलिए इस महामारी के दौरान हरेक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए, स्वयं से पहल करनी होगी। उन लोगों को समझाना होगा जो अक्सर नियमों की अनदेखी करते हैं। हम घर और अपने आसपास से इसकी शुरुआत कर सकते हैं। दुकान और बाजार जाना तो जरूरी है, लेकिन इस दौरान अपने साथ दूसरों की सुरक्षा का भी ख्याल रखना होगा। आज बेहद जरूरी है कि सभी मास्क, शारीरिक दूरी और सैनिटाइजर को अपने जीवन का अहम हिस्सा बना लें।
सुरक्षा के नियमों का पालन करेंगे तो रहेंगे सुरक्षित:
मुंगेर के स्थानीय बड़ी बाजार निवासी निखिल बताते हैं कि इस वक्त जब सभी लोग अपने सामान्य कार्यों के लिए घर से निकल रहे हैं। बैंक, कार्यालय और व्यापार के कार्यों में लौट रहे हैं, ऐसे में सुरक्षा और सतर्कता बरतने की सबसे ज्यादा जरूरत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भी हम कोविड-19 के संक्रमण से तबतक ही सुरक्षित हैं, जबतक की सुरक्षा के नियमों को बेहतर रूप से अपनाते रहेंगे। सड़कों और बाजारों में नियमों की अनदेखी कर लोग स्वयं खतरे को निमंत्रण दे रहे हैं, यह उन्हें समझना होगा।
घर से बाहर निकलने पर इन बातों का रखें ख्याल, रहें सुरक्षित:
रोजमर्रा के कामों के लिए घर से बाहर निकलना जरूरी है, ऐसे में कुछ सावधानियों को ध्यान में रखते हुए आप स्वयं को संक्रमण के प्रभाव से दूर रख सकते हैं। सबसे पहले घर से बाहर निकले तो शारीरिक दूरी का पालन करें। अपनी आंखों को छूने से बचें, नाक और मुंह पर भी हाथ लगाने से बचें। अक्सर देखा गया है कि घर से बाहर हम अपने हाथ से कई सतहों को छूते हैं और इस दौरान संभव है कि हमारे हाथ में वायरस चिपक जाए। अगर हम उसी अवस्था में अपने नाक, मुंह और आंख को छूते हैं तो वायरस के शरीर में प्रवेश की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए सावधानी बेहद जरूरी है। इसके साथ ही मास्क को अच्छे से पहने और सैनेटाइजर अपने साथ रखें। हाथों को भी समय-समय पर साफ करते रहें।
नई जीवनशैली में यूं बरतें सावधानी:
-घर से बाहर निकलने के दौरान विशेष सतर्कता बरतें, मास्क पहनें और सैनिटाइजर साथ ले लें।
-दुकान, कार्यालय और बाजार में स्वच्छता और लोगों की संख्या को देखते हुए ही प्रवेश करें।
-कर्मियों, दोस्तों और समाज के लोगों का अभिवादन हाथ जोड़कर नमस्ते करते हुए करें।
-सड़क व बाजार में खड़े होकर वार्ता की जगह फोन, वीडियो कॉल या सोशल मीडिया का प्रयोग करें।
-अपने स्वास्थ्य का बेहतर रूप से ध्यान रखें, नियमित व्यायाम और खान-पान का ध्यान दें।
-कोई भी नई सूचना या जानकारी को साझा करने से पहले उसके सोर्स की जानकारी रख लें।
-अपने व्यवहार को नियंत्रण में रखें, दूसरों को जागरूक करते हुए सकारात्क बातों पर बल दें।
-घबराने की जगह शांति से काम लें, वर्तमान पर ध्यान दें, याद रखें कि यह समय चिर-स्थायी नहीं है।
-प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग के बताए नियमों का पालन करें, आरोग सेतू एप का उपयोग करें।

कोरोना संक्रमण के प्रति रहें सतर्क

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बाजारों में लोग भीड़ लगाने से बचें
शारीरिक दूरी का हर हाल में करें पालन
बांका, 28 अगस्त
वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण से बचाव को लेकर स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की ओर से तमाम प्रयास किये जा रहें हैं। विभाग द्वारा व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है। जिले के कटोरिया प्रखंड में 15 दिन पहले कोरोना मरीजों की संख्या प्रतिदिन दर्जनों के हिसाब से बढ़ रही थी, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के प्रयास से अब मामलों में काफी कमी आई है. पहले जहां प्रतिदिन 25 मरीज सामने आ रहे थे, वहां अब 1 दिन में दो से तीन मरीज ही आ रहे हैं. इसके बावजूद लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है. अभी यह खुशफहमी का वक्त नहीं आया है कि हमने कोरोना को मात दे दी है. इसलिए लोगों को सरकारी गाइडलाइन का पालन करते हुए अपनी तरफ से पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए.
कटोरिया रेफरल अस्पताल के प्रभारी डॉ विनोद कुमार कहते हैं कि पिछले 15 दिनों में रेफरल अस्पताल की टीम ने कोरोना के प्रति लोगों को जागरूक किया है. इसका असर भी देखने को मिला, लेकिन लोगों से मेरी अपील है कि वह अभी भी सतर्क रहें. खासकर बाजारों में भीड़ नहीं बढ़ाएं. अक्सर देखा जा रहा है कि हाट में सब्जी खरीदने के लिए लोगों की भीड़ लग जा रही है. लोग शारीरिक दूरी का पालन नहीं कर रहे हैं जो ठीक नहीं है. बहुत जरूरी होने पर ही घरों से निकलें. बेवजह बाजारों में भीड़ नहीं बढ़ाएं.
आशा और एएनएम कर रहीं जागरूक: डॉ विनोद कुमार ने कहा कि प्रखंड क्षेत्र के लोगों को आशा कार्यकर्ता और अस्पताल में तैनात एएनएम लगातार जागरूक कर रही हैं. ये लोग घर-घर जाकर लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक कर रही हैं. साथ ही लोगों से घर से बाहर निकलते वक्त मास्क पहनने की अपील कर रही हैं. बहुत जरूरत पड़ने पर ही लोगों से घरों से निकलने को कहा जा रहा है. साथ ही बाहरी सामान- जैसे सब्जी और फल को अच्छी तरह से गर्म पानी में धोकर उसका सेवन करने की लोगों से अपील कर रही हैं.
शारीरिक दूरी का करें पालन: सरकार के तमाम प्रयास के बावजूद लोग बाजारों में भीड़ लगा रहे हैं. इसे लेकर लोगों से हर हाल में 6 मीटर की शारीरिक दूरी का पालने की अपील की जा रही है.  आशा और एएनएम लोगों को बता रही हैं कि जागरूकता से ही कोरोना को मात देना संभव है. इसलिए शारीरिक दूरी का पालन हर हाल में करें.
सर्दी खांसी होने पर नजदीकी अस्पताल आएं: आशा और एएनएम घर-घर जाकर लोगों से सर्दी और खांसी या फिर कोरोना के कोई भी लक्षण दिखने पर तत्काल नजदीकी अस्पताल आने की अपील कर रही हैं. अभी बारिश का मौसम चल रहा है, इसलिए सर्दी और खांसी होना आम बात है. इसलिए लोगों से अस्पताल आकर इलाज करवाने की अपील की जा रही है. लोगों से खुद ही डॉक्टर नहीं बनने की अपील की जा रही है. साथ ही बारिश में भीगने से बचने की सलाह दी जा रही है.
 इन बातों का रखें ख्याल
1. खांसी या छींक आने के दौरान अपने मुंह को टिशू पेपर से कवर करें और उसे तुरंत किसी बंद डस्टबिन में फेंक दें.
2. अगर आपको बुखार, खांसी और सांस में लेने में दिक्कत जैसी समस्या है तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें। चिकित्सक से सलाह लेते वक्त मुंह को मास्क या कपड़े से अच्छे से ढकें.
3. अगर आप कोरोना वायरस का शिकार हैं तो अपना ध्यान रखने के साथ-साथ किसी भी व्यक्ति के नजदीक न जाएं. इससे बढ़ते खतरे को रोकने में आसानी होगी.
4. अपने हाथों से आंख, मुंह या नाक पर बार-बार न छूएँ. यदि ऐसा करते भी हैं तो साबुन या सेनिटाइजर से हाथों को अच्छी तरह साफ करें.
5. सार्वजनिक स्थलों पर भी स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें. राह चलते यूं ही सकड़ों पर न थूकें.

अतिकुपोषित बच्चों को मिलेगा विशेष देखभाल 

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• एनएससीयू से डिस्चार्ज के पश्चात एक वर्ष तक स्वास्थ कर्मी बच्चे का रखेंगे ख्याल
• राज्य स्वास्थ्य समिति के राज्य कार्यक्रम प्रबंधक ने दिए पत्र जारी कर दिए निर्देश
लखीसराय, 28 अगस्त, 2020
इस कोविड-19 के दौर में भी सरकार एवं स्वास्थ्य विभाग प्रात्येक आयु वर्ग तक के हर लोगों के स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रख रही है। इसी कड़ी में अति-कुपोषित बच्चे की देखभाल के लिए सरकार के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग ने नया प्लान तैयार की है। जिसमें ऐसे शिशु का एक साल तक देखरेख करने का निर्णय लिया गया है एवं उनके स्वस्थ शरीर निर्माण के लिए हर आवश्यक पहल करने का योजना तैयार की है। इसको लेकर राज्य स्वास्थ्य समिति के राज्य कार्यक्रम प्रबंधक ने पत्र जारी कर आवश्यक निर्देश दिए हैं। जिसमें कहा गया है कि अतिकुपोषित बच्चे की देखभाल के लिए अति कुपोषित बच्चे को एसएनसीयू से डिस्चार्ज के बाद एक वर्ष तक उनकी देखभाल की जाएगी.
आशा करेंगी अति कुपोषित बच्चे का देखभाल:
एसएनसीयू से डिस्चार्ज के बाद स्वास्थ्य विभाग जुड़ी आशा कार्यकर्ता ऐसे बच्चों का अगले एक वर्ष तक देखभाल करेंगी। इस दौरान वह बीच-बीच में गृहभेंट की तरह बच्चे का घर जाएंगे और बच्चे की स्थिति से अवगत होंगी। साथ परिजनों ने आवश्यक जानकारी लेंगे। जिसके बाद बच्चे के शरीर की वर्तमान स्थिति का स्थानीय या पीएचसी या अस्पताल को रिपोर्ट करेंगी। उसके बाद निर्देशानुसार आगे की प्रक्रिया करेंगी। जिस क्षेत्र में आशा चयनित नहीं है उस क्षेत्र की ऑगनबाड़ी सेविका उक्त कार्य करेंगी।
जरूरतमंद बच्चों का इलाज में भी करेंगी सहयोग:
आशा या ऑगनबाड़ी सेविका ना सिर्फ बच्चे का हालचाल जानेंगे बल्कि जरूरतमंद बच्चों का आवश्यकता समुचित इलाज के बच्चे के परिजनों को सरकारी संस्थान जाने के लिए प्रेरित करेंगी और अस्पताल जाने तक हर आवश्यक मदद करेंगे। इसके लिए विभाग द्वारा प्रोत्साहन राशि भी दी जाएगी।
बढ़ती कुपोषण के शिकायत पर रोकथाम के लिए लिया गया निर्णय
सरकार एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा लगातार बढ़ रहे कुपोषण की शिकायत पर यह निर्णय लिया गया है। ताकि स्वस्थ बच्चे का निर्माण हो सकें और कुपोषण की शिकायत पर विराम लग सके। कुपोषण के कारण शिशुओं की शारीरिक एवं मानसिक विकास अवरुद्ध तो होती है. साथ ही कुपोषण के कारण शिशुओं का बौद्धिक विकास भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है. इससे उनके जीवन में शिक्षा एवं रोजगार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

कोरोना काल में दोहरी चुनौती को मात दे रहे हैं डॉक्टर विनोद कुमार

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• कोरोना की चपेट में आने के बाद भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे
• नारायणपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में 10 सालों से दे रहे हैं अपनी सेवा
भागलपुर, 28 अगस्त
कोरोना काल में हर कोई सावधानी बरत रहे हैं. घर से कम निकल रहे हैं. लोगों से मिलने से बच रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्यकर्मियों के सामने दोहरी चुनौती है. उन्हें अपना बचाव करते हुए लोगों की सेवा भी करनी है. खुशी की बात यह है कि बहुत सारे स्वास्थ्यकर्मी इस काम को बखूबी अंजाम दे दे रहे हैं. नारायणपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात डॉ विनोद कुमार ना सिर्फ मरीजों का इलाज कर रहे हैं, बल्कि उन्हें कोरोना से बचाव के लिए जागरूक भी कर रहे हैं. इस दरम्यान वह कोरोना की चपेट में भी आए, लेकिन स्वस्थ होने के बाद दोबारा अपने काम में लग गए.
डॉ विनोद कुमार कहते हैं उनकी जिम्मेदारी है कि लोगों को कोरोना के प्रति जागरूक करें. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में उनकी नियुक्ति डॉक्टर के रूप में है. इस वजह से मरीजों का इलाज तो करना है, लेकिन वह यह समझते हैं कि इस संकट के समय अपनी तरफ से और क्या कर सकते हैं. यही सोच कर वह और उनकी पूरी टीम नारायणपुर प्रखंड के लोगों की सेवा में लगी हुई है. इसका परिणाम भी सामने आने लगा है. कुछ दिन पहले तक लोग जांच कराने से घबराते थे, लेकिन आज ऐसी स्थिति हो गई है प्रतिदिन दो सौ से अधिक लोगों की जांच हो रही है. अब तो कोरोना के मामले भी कम हो रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद मैं और मेरी पूरी टीम लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दे रही है.
टीम के सदस्यों का बढ़ा रहे हैं मनोबल: नारायणपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ बिजेंद्र कुमार विद्यार्थी कहते हैं कि डॉक्टर विनोद कुमार की जीवटता से हर किसी को सीख लेनी चाहिए. कोरोना काल में इन्होंने जिस प्रकार अपने कर्तव्य का निर्वाहन किया है वह काबिलेतारीफ है, खुद तो आगे बढ़कर काम किया ही. साथ में टीम के सदस्यों का भी मनोबल बढ़ाया. यही वजह है कि नारायणपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की टीम कोरोना काल में बेहतर तरीके से अपनी जिम्मेदारी को निभा रही है. सबसे प्रेरणा वाली बात यह है कि कोरोना की चपेट में आने के बाद वह अपने कर्तव्य से नहीं डिगे. स्वस्थ होते ही अपने काम में टीम के साथ फिर से लग गए.
मरीजों में विश्वास का दूसरा नाम बन चुके हैं डॉक्टर विनोद कुमार: नारायणपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पिछले 10 साल से डॉ विनोद कुमार अपनी सेवा दे रहे हैं. क्षेत्र का हर व्यक्ति इनके नाम से वाकिफ है. कई मरीज तो इनके समय में इलाज कराने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आते हैं. क्षेत्र के लोगों के लिए विश्वास का दूसरा नाम बन गए हैं डॉक्टर विनोद कुमार.
परिवार से दूर रहकर भी कर्तव्य से नहीं हट रहे पीछे:  कोरोना काल में जब हर कोई अपने परिवार के सदस्यों के साथ रहना चाह रहा है तो ऐसे समय में डॉ विनोद कुमार अपने परिवार से दूर हैं. नारायणपुर में अकेले रहते हैं. परिवार के बारे में पूछने पर वह कहते हैं कि घर परिवार के सदस्य से सुबह-शाम फोन पर बात  हो जाती है. अभी संकट का समय है. जिन मरीजों का वह पिछले 10 साल से इलाज कर रहे हैं , वह उनकी तरफ आस भरी नजरों से देख रहे हैं. ऐसे में उन्हें छोड़कर वह कैसे जा सकते हैं.

अतिकुपोषित बच्चों को मिलेगा विशेष देखभाल 

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• एनएससीयू से डिस्चार्ज के पश्चात एक वर्ष तक स्वास्थ कर्मी बच्चे का रखेंगे ख्याल
• राज्य स्वास्थ्य समिति के राज्य कार्यक्रम प्रबंधक ने दिए पत्र जारी कर दिए निर्देश
लखीसराय, 28 अगस्त, 2020
इस कोविड-19 के दौर में भी सरकार एवं स्वास्थ्य विभाग प्रात्येक आयु वर्ग तक के हर लोगों के स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रख रही है। इसी कड़ी में अति-कुपोषित बच्चे की देखभाल के लिए सरकार के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग ने नया प्लान तैयार की है। जिसमें ऐसे शिशु का एक साल तक देखरेख करने का निर्णय लिया गया है एवं उनके स्वस्थ शरीर निर्माण के लिए हर आवश्यक पहल करने का योजना तैयार की है। इसको लेकर राज्य स्वास्थ्य समिति के राज्य कार्यक्रम प्रबंधक ने पत्र जारी कर आवश्यक निर्देश दिए हैं। जिसमें कहा गया है कि अतिकुपोषित बच्चे की देखभाल के लिए अति कुपोषित बच्चे को एसएनसीयू से डिस्चार्ज के बाद एक वर्ष तक उनकी देखभाल की जाएगी.
आशा करेंगी अति कुपोषित बच्चे का देखभाल:
एसएनसीयू से डिस्चार्ज के बाद स्वास्थ्य विभाग जुड़ी आशा कार्यकर्ता ऐसे बच्चों का अगले एक वर्ष तक देखभाल करेंगी। इस दौरान वह बीच-बीच में गृहभेंट की तरह बच्चे का घर जाएंगे और बच्चे की स्थिति से अवगत होंगी। साथ परिजनों ने आवश्यक जानकारी लेंगे। जिसके बाद बच्चे के शरीर की वर्तमान स्थिति का स्थानीय या पीएचसी या अस्पताल को रिपोर्ट करेंगी। उसके बाद निर्देशानुसार आगे की प्रक्रिया करेंगी। जिस क्षेत्र में आशा चयनित नहीं है उस क्षेत्र की ऑगनबाड़ी सेविका उक्त कार्य करेंगी।
जरूरतमंद बच्चों का इलाज में भी करेंगी सहयोग:
आशा या ऑगनबाड़ी सेविका ना सिर्फ बच्चे का हालचाल जानेंगे बल्कि जरूरतमंद बच्चों का आवश्यकता समुचित इलाज के बच्चे के परिजनों को सरकारी संस्थान जाने के लिए प्रेरित करेंगी और अस्पताल जाने तक हर आवश्यक मदद करेंगे। इसके लिए विभाग द्वारा प्रोत्साहन राशि भी दी जाएगी।
बढ़ती कुपोषण के शिकायत पर रोकथाम के लिए लिया गया निर्णय
सरकार एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा लगातार बढ़ रहे कुपोषण की शिकायत पर यह निर्णय लिया गया है। ताकि स्वस्थ बच्चे का निर्माण हो सकें और कुपोषण की शिकायत पर विराम लग सके। कुपोषण के कारण शिशुओं की शारीरिक एवं मानसिक विकास अवरुद्ध तो होती है. साथ ही कुपोषण के कारण शिशुओं का बौद्धिक विकास भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है. इससे उनके जीवन में शिक्षा एवं रोजगार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

जेएलएनएमसीएच को मिले 58 डॉक्टर, इलाज की होगी बेहतर व्यवस्था

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नए डॉक्टरों को जल्द ही अलग-अलग विभागों में किया जाएगा तैनात
अस्पताल में डेंगू मरीजों के लिए 20 बेड का एक अलग वार्ड हो चुका है तैयार
भागलपुर, 27 अगस्त
जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल (जेएलएनएमसीएच) को 58 नए डॉक्टर मिले हैं. इससे अस्पताल में मरीजों के इलाज की व्यवस्था और बेहतर होने की उम्मीद है. जेएलएनएमसीएच न सिर्फ पूर्वी बिहार का सबसे बड़ा अस्पताल है बल्कि राज्य के चार कोरोना अस्पतालों में से एक है. यहां पर इलाज कराने के लिए आसपास के जिलों समेत पड़ोसी राज्यों से भी मरीज आते हैं.
अस्पताल अधीक्षक डॉ अशोक कुमार भगत ने कहा कि अस्पताल में मरीजों के लिए लगातार सुविधाएं बढ़ाई जा रही हैं. पहले कोरोना मरीजों का इलाज हो रहा था, लेकिन उसके बाद इमरजेंसी और अन्य सेवाएं भी बहाल की गई. धीरे-धीरे अस्पताल को पुराने स्वरूप में लाया जा रहा है. अस्पताल में 20 बेड का अलग से डेंगू वार्ड बनकर तैयार है,जहाँ चिकित्सकों की आवश्यकता होगी . इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए
 सरकार ने अस्पताल प्रशासन को 58 डॉक्टर उपलब्ध कराया है. डॉक्टरों की तैनाती जल्द अलग-अलग विभागों में कर दी जाएगी.
अस्पताल में इलाज के लिए आने वालों की बढ़ने लगी है भीड़:  बस सेवा बहाल होने के बाद अस्पताल में इलाज कराने के लिए आने वाले मरीजों की भीड़ बढ़ने लगी है. पहले कोरोना की वजह से दूसरी बीमारी के मरीज नहीं आते थे, लेकिन अब जब अस्पताल का इमरजेंसी सामान्य मरीजों के लिए खोल दिया गया है और सभी तरह के मरीजों का इलाज होने लगा है. इससे अस्पताल में मरीजों की भीड़ भी बढ़ी है. बस सेवा जब शुरू नहीं हुई थी तो सिर्फ भागलपुर के मरीज ही आते थे या फिर दूसरे जिला से रेफर किए हुए मरीज आते थे. लेकिन अब दूसरे जिलों के सामान्य मरीज भी इलाज कराने के लिए आ रहे हैं.
झारखंड समेत 15 जिलों से आते हैं मरीज: जेएलएनएमसीएच में भागलपुर और आसपास के जिलों समेत कोशी और  सीमांचल से भी मरीज यहां पर आते हैं. साथ ही झारखंड के गोड्डा, साहेबगंज से भी बड़ी संख्या में भी मरीज यहां इलाज कराने के लिए आते हैं. पास के किसी जिले में इतनी सुविधाओं वाला सरकारी या निजी अस्पताल नहीं है। इस वजह से भी यहां पर इलाज कराने के लिए आने वाले मरीजों की भीड़ बढ़ती है. यही कारण है कि अस्पताल प्रशासन को व्यवस्था को दुरस्त रखना पड़ता है, ताकि मरीजों को उत्तम सुविधाएं मिले और वे स्वस्थ हों.
अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है जेएलएनएमसीएच: यहां पर मरीजों की भीड़ बढ़ने का एक यह भी कारण है कि यहां जांच और इलाज की अत्याधुनिक सुविधाएं  उपलब्ध हैं. कई आधुनिक फीचर के साथ उपकरण लगाए गए हैं. अस्पताल लेटेस्ट उपकरणों से लैस है. यहां पर लगभग हर तरह की जांच मरीजों को कम कीमत पर उपलब्ध हो जाती है. विशेषज्ञ चिकित्सकों एवं अन्य स्टाफ के जरिए तथा विभिन्न प्रकार के उपकरणों की सहायता से रोगियों का इलाज किया जाता है. इस अस्पताल में मरीज को बचाने के लिए हर संभव साजो सामान उपलब्ध है जिससे मरीजों को काफी लाभ हो रहा हैं. वहीं अस्पताल को कीटाणुरहित के लिए हर तरह की तैयारी की गई है जिससे मरीजों को कोई असुविधा नहीं होती है. जेएलएनएमलीएच जैसी सुविधाओं वाला आस-पास में कोई अस्पताल नहीं है.