जिले के आंगनबाड़ी केंद्र पर नियमित टीकाकरण का हुआ आयोजन

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– कंटेनमेंट इलाके को छोड़कर  प्रत्येक आंगनबाड़ी केंद्र पर हुआ आयोजन
– महिलाओं को स्तनपान तथा स्वच्छता के बारे में भी किया गया जागरूक
– टीकाकरण के दौरान सामाजिक दूरी का रखा गया ख्याल
– रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने पर विशेष बल
लखीसराय 7 अगस्त :कोरोना संकटकाल में भी बच्चों व गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखा जा रहा है। इसको लेकर स्वास्थ्य विभाग और आईसीडीएस की ओर से कई कार्यक्रम चलाये जा रहें है। इसी क्रम में जिले में बुधवार को नियमित टीकाकरण का आयोजन सभी आंगनबाड़ी केंद्रों के साथ अतरिक्त केंद्रो पर किया गया।  ये आयोजन कंटेनमेंट जोन को छोड़कर सभी केंद्रो पर किया गया। साथ ही आंगनवाड़ी केंद्रों पर आई हुयी गर्भवती तथा धात्री महिलाओं को स्तनपान की आवश्यकता तथा महत्व के बारे में जानकारी दी गयी। साथ ही कोरोना के विषय में जागरूक करते हुए उन्हें सोशल डिस्टेन्सिंग एवं हाथ की धुलाई के बारे में भी बताया गया। कार्यक्रम में इस बात का भी ध्यान रखा गया की किसी भी तरह की लापरवाही न हो।
नियमित टीकाकरण तथा स्वच्छता के महत्व को लेकर किया गया जागरूक:  जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ अशोक कुमार भारती ने बताया नियमित टीकाकरण का आयोजन जिले कंटेनमेंट क्षेत्र को छोड़कर सभी आगनवाड़ी एवं अतिरिक्त केन्द्रों पर किया गया। टीकाकरण कार्य में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने गर्भवती माताओं को कोरोना संक्रमण से बचाव व टीकाकरण की जरूरत तथा महत्व के बारे में लोगों को जागरूक किया। साथ ही आंगनबाड़ी केंद्रों के साथ अतिरिक्त केंद्रो पर भी आशा व एएनम के साथ अन्य मोबिलाइजरों द्वारा लाभार्थी अथवा उसके अभिभावकों में भी बुखार, सर्दी-खांसी के लक्षण की भी जांच की। इसके साथ ही व्यक्तिगत दूरी, मुंह को ढककर रखने व नियमित 40 सेकेंड तक हाथ धोने आदि की भी जानकारी दी गयी।
छह माह तक नियमित स्तनपान का बताया  महत्व:
डॉ अशोक कुमार भारती ने बताया प्रारंभिक अवस्था में उचित पोषण नहीं मिलने से बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास अवरुद्ध हो सकता है। इसलिए 0 से 6 माह के बच्चे को सिर्फ स्तनपान और 6 माह के बाद शिशुओं को स्तनपान के साथ पौष्टिक ऊपरी आहार देना चाहिए। 6 माह तक शिशु को केवल स्तनपान कराने से दस्त और निमोनिया के खतरे से बचाया जा सकता है।
जानिए क्या है टीकाकरण; डॉ अशोक कुमार भारती ने बताया टीका एक जीवन रक्षक है जो बच्चे का रक्षा कवच बनकर उसके जीवन की सुरक्षा करता है। टीका बच्चे के शरीर को संक्रामक रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है ताकि नवजात शिशु को कोई भी संक्रामक रोग छू न सकें। बच्चों को टीका लगवाने की यह क्रिया वैक्सीनेशन कहलाती है। संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिये यह प्रक्रिया सबसे सस्ती और सबसे प्रभावी है।
1. प्राथमिक टीकाकरण
नवजात शिशु संक्रामक रोगों से बचा रहें और उसके शरीर में रोगों से लड़ने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत हो इसके लिए नवजात शिशु के जन्म के समय से ही प्राथमिक टीकाकरण किया जाता है। समय समय पर दिए जाने वाले टीके बच्चे को कई जान लेवा बीमारियों से बचाते है इसलिए समय पर बच्चों को टीका अवश्य लगवाएं।
2. बूस्टर टीकाकरण
बूस्टर खुराकें प्राथमिक टीकाकरण के प्रभाव को बढ़ाने के लिए दी जाती हैं। ताकि जिन शिशुओं में पहले टीके के बाद प्रतिरक्षण क्षमता विकसित नही हुई हो, उन्हें बूस्टर ख़ुराक़ देकर रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित की जाए ताकि शिशु हमेशा रोगों से बचा रहें।
3. सार्वजनिक टीकाकरण
जब किसी जगह किसी विशेष बीमारी का भयावह रूप बच्चों पर दिखने लगता है तो उस बीमारी से सभी बच्चों की रक्षा के लिए और उस बीमारी को जड़ से ख़तम करने के लिए सार्वजनिक टीकाकरण कार्यक्रम चलाया जाता है। जैसे पल्स पोलियों अभियान सरकार के द्वारा पोलियो को जड़ से ख़तम करने के लिए चलाया गया और जनता के सहयोग से यह अभियान सफल रहा जिससे आज भारत पोलियो मुक्त बन चुका है।
नियमित टीकाकरण कई तरह की बीमारियों से करता है बचाव: डॉ भारती ने बताया शिशुओं व गर्भवती महिलाओं के रूटीन इम्यूनाइजेशन, उन्हें कई तरह की बीमारियों से बचाता है।  साथ ही टीकाकरण से बच्चों के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जाता है ताकि उनके रोग से लड़ने की क्षमता विकसित हो सके।  बीमारियां जैसे खसरा, टिटनेस, पोलियो, क्षय रोग, गलाघोंटू, काली खांसी व हेपेटाइटिस बी आदि बीमारियों से यह बच्चों की सुरक्षा करता है।

हाईपरटेंशन से ग्रसित लोग तनाव से रहें दूर

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नियमित दिनचर्या से कोरोना को दें मात
जीवनशैली में बदलाव लाकर रहें स्वस्थ
बांका, 7 अगस्त
कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। लोग भी घरों में कैद हैं। इस वजह से लोगों का घूमना-फिरना भी बंद है। मॉर्निग वॉक करने वाले चाहकर भी नहीं जा पाते हैं। दिनचर्या प्रभावित होने से कुछ लोग तनाव में आ जाते हैं। हाईपरटेंशन से ग्रसित लोगों के लिए ऐसी परिस्थिति खतरनाक हो सकती है। ऐसे में जरूरी है कि घर पर ही रहकर अपनी जीवनशैली को इस तरह बनाएं कि तनाव नहीं हो। नियमित दिनचर्या से आप हाईपरटेंशन से मुक्त हो सकते हैं साथ ही कोरोना को मात दे सकते हैं। आइए हम आपको बताते हैं कुछ तरीके, जिसे अमल में लाकर आप स्वस्थ रह सकते हैं।
खान-पान में करना होगा सुधार: हाईपरटेंशन से बचाव के लिए हमें सबसे पहले खान-पान में सुधार करना होगा। शहरी पीएचसी के प्रभारी डॉ सुनील कुमार चौधरी बताते हैं कि इस तरह की बीमारियों से बचने के लिए सही खानपान होना बहुत जरूरी है। नमक और हाई पोटेशियम वाले पदार्थों का कम से कम सेवन करना चाहिए। भोजन में कम मात्रा में नमक लेने से हाईपरटेंशन की समस्या से बचा जा सकता हैं। खाने में हरी सब्जियों और सलाद का प्रयोग अधिक से अधिक करें। अधिक तेल मसाले के सेवन से बचना चाहिए। दूध और दही के ऊपर से छाली को हटाकर उसका सेवन करें।
लें भरपूर नींद: डॉ. चौधरी कहते हैं नींद पूरी नहीं होने से भी तनाव बढ़ता है। अभी जब घर में ही रहना है तो आठ घंटे सोने की कोशिश करें। हां, एक रूटिन के तहत नींद को पूरी करें। रात में जल्द सोएं और सुबह जल्द उठें। सुबह जल्द उठने से दिनभर ताजगी का अहसास होता है। कोशिश करें कुछ समय तक योग भी करें। इससे दिन खुशनुमा बीतेगा और तनाव से भी मुक्त रहेंगे।
सकारात्मक सोच रखे: तनाव से खुद को दूर रखने के लिए खुश रहना भी जरूरी है। इसके लिए सबसे जरूरी है खुशमिजाज और सकारात्मक सोच वाले लोगों के साथ रहें। नकारात्मक लोगों के साथ उठने-बैठने से बचें, क्योंकि उससे आप भी नकारात्मक हो सकते हैं। दिमाग में सकारात्मक सोच लाने की कोशिश करें। यह तरीका अपनाने से भी तनाव से मुक्त रहेंगे।
नशें को कहें ना: जैसा कि हम सभी जानते हैं कि नशा एक बुरी लत है। इससे सभी लोगों को दूर रहना चाहिए। हाईपरटेंशन के शिकार लोगों को तो इससे खास दूरी बनाकर रहना चाहिए। शराब, धूम्रपान या फिर तंबाकू को बिल्कुल भी हाथ नहीं लगाएं।
दवा का सेवन नहीं छोड़े: हाईपरटेंशन के मरीज को नियमित दवा लेनी चाहिए। दवा छूटने से यह बीमारी खतरनाक स्टेज में पहुंच जाता है। सभी तरह की सावधानियों को बरतते हुए डॉक्टर के बताए अनुसार दवा को लेते रहें। साथ ही अगर संभव हो तो नियमित तरीके से हाईपरटेंशन की जांच भी कराते रहें।
इन बातों का रखें ध्यान
1. विटामिन-सी से भरपूर फल खाएं।
2.  हरे पत्तेदार सब्जियां खाएं।
3. ऑयली चीजों और जंक फूड से बचें।
4. चीनी का इस्तेमाल कम से कम करें।
5. केवल पौष्टिक और संतुलित आहार ही लें।

कोरोना से लड़ने में बच्चों का करें सहयोग , आपका सकारात्मक व्यवहार है जरुरी 

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• हर बच्चे के साथ अलग से समय बिताएं
• अपने बच्चे की जरूरतों को सुनें
• अच्छा व्यवहार करने पर बच्चे की करें प्रशंसा
• किशोर-किशोरियों की पसंद का रखें ख्याल
लखीसराय –
: दिन व् दिन कोरोनावायरस संक्रमण के मामलों में वृद्धि हो रही है. इसको लेकर लोगों के मन में डर भी बढ़ता जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में बच्चे एवं किशोर भी मानसिक रूप से परेशान हो रहे हैं।  बच्चों एवं किशोरों के स्कूल एवं कॉलेज बंद हों के कारण वे घर पर बैठने को मजबूर हैं। बाल्यवस्था एवं किशोरवस्था उत्साह एवं उर्जा का समय होता है। ऐसे में यदि उन्हें अचानक घर पर बैठना पड़ जाए तो उनके मानसिक स्वास्थ्य पर यह प्रतिकूल असर भी डालता है।  इसलिए ऐसे समय में जरुरी है कि घर के माता-पिता बच्चों एवं किशोरों को अधिक समय दें।  उनकी समस्या सुनें एवं उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय व्यतीत करें ताकि उनके ऊपर संक्रमण का डर हावी ना हो सके. इसको लेकर पेरेंटिंग फॉर लाइफ लॉन्ग हेल्थ, द यूरोपियन रिसर्च काउंसिल, यूनिसेफ,सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन, द लीवरहुलम ट्रस्ट, द इकोनॉमिक एंड सोशल रिसर्च काउंसिल एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अन्य संस्थाओं के सहयोग से दिशा-निर्देश जारी किया गया है।
हर बच्चे के साथ समय बिताने के लिए अलग समय तय करें:
पूरे देश में बढ़ते संकर्मण के कारण बच्चे घर पर रहने को मजबूर हैं।  वह घर से बाहर निकलकर ना अपने दोस्तों से मिल सकती हैं और ना ही अपने पसंद के खेल बाहर खेल सकते हैं। इसलिए यह जरुरी है कि माता-पिता घर के हर बच्चे के साथ समय बिताने के लिए अलग समय तय करें।  यह सिर्फ 20 मिनट या उससे अधिक समय के लिए भी हो सकता है।  समय का निर्धारण माता-पिता अपने सुविधा के अनुसार करें. हर रोज एक ही समय हो सकता है ताकि बच्चे इस समय का इंतजार करें।
अपने बच्चे से पूछें कि वे क्या चाहते हैं:
बच्चे से जरुर पूछें कि घर पर रहकर वे क्या करना चाहते हैं। इससे बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ेगा एवं यदि बच्चे अपने पसंद की चीजें करेंगे तब वे कोरोना संक्रमण की बातें सोचने से कुछ देर मुक्त हो सकेंगे. साथ ही वे आपके और करीब आ सकेंगे।
अपने बच्चे के साथ ऐसे बिताएं समय:
• गाना गायें, चम्मच एवं बर्तनों से संगीत बनायें
• उनके चेहरे के भाव और आवाजों को दोहराएँ
• कप या ब्लॉक को एक के ऊपर दूसरे को रखें
• किताब पढ़ कर या चित्र दिखाकर, एक कहानी बताएं
• स्कूल के काम में बच्चों की मदद करें
किशोर-किशोरियों की भावनाओं का भी रखें ख्याल:
बच्चों के साथ घर के किशोर एवं किशोरियों की भावनाओं का भी ऐसे समय में ख्याल रखें. उनसे भी बात करें एवं उनके मन में चल रही बातों को जानने की कोशिश करें।
• उनकी पसंदीदा चीजों जैसे खेल, टीवी शो एवं उनके दोस्तों के बारे में बात करें
• साथ में व्यायाम करें
• उनकी हॉबी के बारे में बात करें
• उनकी बातें सुनें, उनकी तरफ देखें. उनपर अपना पूरा ध्यान दें
आपका सकारात्मक व्यवहार है जरुरी:
अपने बच्चे के प्रति अभी आपके सकारात्मक व्यवहार की अधिक जरूरत है. कोरोना संक्रमण की बातें सुनकर घर के बच्चे अधिक डर सकते हैं. इसलिए अभी आपको अपने व्यवहार में परिवर्तन लाने की सख्त जरूरत है।
यह जरुर करें:
• अच्छा व्यवहार करने पर अपने बच्चों की प्रशंसा करें
• बच्चों को घर में रहकर अपनी मर्जी की कुछ चीजें करने की छूट दें
• बच्चों पर गुस्सा ना करें. बच्चों से प्यार से बात करें
• अपने बच्चों की जरूरतों को सुनें एवं उनपर ध्यान दें

शिविरों में बच्चों, गर्भवती और धातृ महिलाओं के लिए विशेष व्यवस्था

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बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम  से कराया गया सर्वे
गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने की होगी व्यवस्था
भागलपुर-
कोरोना संक्रमण को देखते हुए इस बार जिले में बाढ़ राहत शिविरों में रहने की विशेष व्यवस्था की गयी है। सामाजिक दूरी का पालन करने के लिए शिविरों की संख्या बढ़ायी गयी है। बच्चे, गर्भवती और धातृ महिलाओं को रखने के लिए अलग से व्यवस्था की गई है।
आपदा प्रबंधन शाखा के प्रभारी सह वरीय उपसमाहर्ता विकास कुमार कर्ण ने बताया कि बाढ़ से पहले आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से प्रभावित क्षेत्र के छह माह से छह साल तक के बच्चे, गर्भवती और धातृ महिलाओं के अलावा वैसी महिलाओं का सर्वे कराया गया है, जो तीन माह के अंदर मां बनने वाली है। जिला प्रोग्राम शाखा द्वारा आपदा प्रबंधन को सूची उपलब्ध करा दी गयी है। इन्हें बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का संकटग्रस्त समूह माना गया है। साथ ही पंचायतवार सूची तैयार की गयी है। 99 पंचायतों के अलावा शहरी क्षेत्र के निचले हिस्से के आठ आंगनबाड़ी केन्द्रों के क्षेत्र का सर्वे कराया गया है। ताकि बाढ़ से जो पंचायत प्रभावित होगा, वहां के राहत शिविरों में चिह्नित लोगों की तत्काल मदद की जा सके। इसके साथ ही राहत शिविरों में संकटग्रस्त समूहों के रहने की अलग से व्यवस्था की जाएगी। बच्चों को दूध सहित अन्य सुविधायें उपलब्ध होंगी। गर्भवती महिलाओं की जानकारी संबंधित स्वास्थ्य केन्द्रों को भी भेजी गयी है, ताकि समय से गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए अस्पताल पहुंचाया जा सके। उन्होंने बताया कि सूची सभी सीओ को भेज दी गयी है। सीओ को जरूरत के अनुसार राहत सुविधायें उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। संकटग्रस्त समूहों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा तथा गर्भवती महिलाओं को प्रसव से लिए तत्काल अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था होगी।
24 से अधिक होंगे राहत शिविर
इस बार राहत शिविरों की संख्या 24 से अधिक होगी। पिछली बार इसकी संख्या 12 थी। छोटे कमरे में चार और बड़े कमरे में छह लोगों को रहने की व्यवस्था की जाएगी। इसे देखते हुए सभी सीओ को ऊंचे स्थानों पर अधिक से अधिक सरकारी भवनों को चिह्नित करने का निर्देश दिया गया है। सामुदायिक भोजन भी खुले में नहीं बनेगा। सरकारी स्कूल या पंचायत सरकार भवन में इसकी व्यवस्था की जाएगी। रहने की जगह पर सुरक्षा, निजिता खासकर महिलाओं, विधवा, विकलांगों के लिए व्यवस्था होगी। दरी चटाई की व्यवस्था की जाएगी। साथ ही रोशनी की भी विशेष व्यवस्था होगी।
जिले के कई प्रखंड हैं बाढ़ प्रभावित क्षेत्र
जिले के नवगछिया और कहलगांव प्रखंड बाढ़ से प्रभावित प्रखंड हैं। खासकर नवगछिया के इस्माइलपुर प्रखंड के लोगों को बारिश के मौसम में तीन महीने तक बाढ़ के कारण काफी परेशानी झेलनी पड़ती है। दियारा प्रभावित क्षेत्र के लोगों को मवेशियों के साथ ऊंचे स्थानों पर जाना पड़ता है। इसी तरह कहलगांव अनुमंडल के सदर और पीरपैंती प्रखंड के लोगों को मुसीबत झेलनी पड़ती है। खासकर रानीदियारा और टपुआ दियारा के लोग तीन महीने तक सुरक्षित क्षेत्र में रहने के लिए चले जाते हैं। इसी तरह सुल्तानगंज, नारायणपुर, और नाथनगर प्रखंड के लोग भी प्रभावित होते हैं।
कोसी और गंगा से घिरा हुआ है भागलपुर
जिले का नवगछिया अनुमंडल बुरी तरह से कोसी और गंगा की चपेट में है। हर साल इस इलाके के लोगों को बाढ़ की विभिषिका झेलनी पड़ती है। वहीं कहलगांव, पीरपैंती, नाथनगर और सुल्तानगंज प्रखंड के लोग गंगा की बाढ़ से प्रभावित होते हैं। जहां सभी प्रकार की आपदाओं के दौरान स्थापित किए जाने वाले राहत शिविरों में आपदा पीड़ितों के लिए शरण स्थल, भोजन, पेयजल, चिकित्सा सुविधा एवं स्वच्छता के संबंध में निर्धारित न्यूनतम मानदंड भी तय किया गया है।

स्तनपान से बच्चों को ही नहीं, मां को भी होते हैं कई फायदे

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प्राकृतिक ढंग से वजन कम करने में है सहायक
मां व शिशु के बीच भावनात्मक रिश्ते होता है मजबूत
भागलपुर-
अभी विश्व स्तनपान सप्ताह चल रहा है। जिले की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा और एएनएम घर-घर जाकर महिलाओं को स्तनपान कराने के लिए जागरूक कर रही हैं। बच्चों में इससे होने वाले फायदे बताए जा रहे हैं, लेकिन स्तनपान के फायदे सिर्फ बच्चों को ही नहीं होता है। बच्चों की मां को स्तनपान के कई फायदे हैं। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रतिभा सिंह कहती हैं कि बच्चे को स्तनपान कराने वाली महिला स्वस्थ रहती हैं। उन्हें स्तनपान नहीं कराने वाली महिलाओं के अपेक्षा दूसरी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। साथ ही हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे से भी स्तनपान कराने वाली महिला बची रहती हैं, उस महिला के मुकाबले जो स्तनपान नहीं कराती हैं। साथ ही स्तनपान कराने से माँ और शिशु के बीच भावनात्मक रिश्ते को बढ़ाता और मजबूत करता है।
गर्भाशय के कैंसर से होता है बचाव
डॉ. सिंह कहती हैं कि कई अध्ययन में यह बात सामने आई है कि स्तनपान कराने से मां को गर्भाशय के कैंसर का खतरा कम हो जाता है। इसलिए मांओं को छह माह तक तो बिना संकोच के स्तनपान कराना चाहिए। इससे उन्हें दोहर फायदा होता है। एक तो बच्चे स्वस्थ रहते हैं। साथ ही उनका भविष्य भी रोगमुक्त हो जाता है।
प्राकृतिक ढंग से वजन कम करने में है सहायक
डॉ. सिंह कहती हैं कि आमतौर पर मां बनने के बाद महिलाओं का शरीर काफी भारी हो जाता है। कई महिलाओं का वजन तो 20 किलो तक बढ़ तक जाता है। स्तनपान, वजन कम करने में सहायक होता है, जब मां, अपने शिशु को स्तनपान कराती है तो उसका शरीर लगभग 450 से 500 कैलोरी खर्च करता है, इससे प्राकृतिक ढंग से वजन कम करने मे मदद मिलती है।
पेट दर्द से मिलती है राहत
डॉ. सिंह कहती हैं कि बच्चे के जन्म के बाद से ही मां में ब्लीडिंग की समस्या हो जाती है, जिस वजह से महिलाओं को पेट दर्द की समस्या का भी सामना करना पड़ता है। वहीं, अगर महिला अपने बच्चे को नियमित रूप से स्तनपान कराती है तो ऐसे में उसकी ब्लीडिंग के कारण होने वाले दर्द से तो राहत मिलती ही है साथ ही ब्लीडिंग कम भी होती है। इसलिए स्तनपान कराने में कोताही नहहीं बरतें।
बीमारियों से लड़ने में हो जाता है सक्षम
डॉ. सिंह कहती हैं कि मां के दूध में सभी वो पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शुरुआती बीमारियों से लड़ने में सक्षम हो सकते हैं। शुरुआती छह महीने तक बच्चों को स्तनपान कराना बहुत जरूरी होता है। इससे उनके शरीर को विकसित होने में काफी मदद मिलती है। जन्म के बाद बच्चे काफी नाजुक होते हैं। उन्हें कोई भी संक्रमण या बीमारी अपनी चपेट में ले सकता है। इससे बचने के लिए मां का स्तनपान समय-समय पर कराना काफी जरूरी होता है। इससे उसके शरीर में धीरे-धीरे ताकत मिलती रहती है, जिस वजह से वह बीमारियों से लड़ने में कामयाब हो पाता है।
सही मात्रा में मिलते हैं मिनिरल्स
डॉ. सिंह कहती हैं कि बच्चे के जन्म के बाद उसके शरीर को सबसे ज्यादा जरूरत होती है मिनिरल्स की, जो उसकी मां के द्वारा ही दिया जा सकता है। बच्चे के जन्म के तुरंत बाद से ही स्तनपान शुरू हो जाता है, जिससे बच्चे को पर्याप्त मात्रा में मिनिरल्स मिल जाते हैं। यही वजह है कि बच्चे की मां के दूध को ही शुरुआती छह महीने तक काफी जरूरी और फायदेमंद माना जाता है।

एनीमिया की बीमारी, जान पर पड़ सकती है भारी

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– खून की कमी से होता है एनीमिया, बचाव को लेकर खान-पान का रखें ख्याल
-ससमय कराएं इलाज और चिकित्सकों की सलाह का करें पालन
लखीसराय-
आज की जीवनशैली में एनीमिया एक आम बीमारी हो गई है, लेकिन इसके प्रति लापरवाही जान जोखिम में डाल सकती है। व्यक्ति के शरीर में आयरन की कमी के कारण जब हीमोग्लोबिन का बनना सामान्य से कम हो जाता है, तब शरीर में खून की कमी होने लगती है। इस स्थिति को ही एनीमिया कहा जाता है। सिविल सर्जन डॉ आत्मानंद राय ने बताया कि इस बीमारी से बचाव के लिए लोगों को जीवनशैली बदलने एवं आयरन युक्त आहार का सेवन करने की जरूरत है।
ये हैं एनीमिया के लक्षण :
एनीमिया का शुरुआती लक्षण थकान, कमजोरी, त्वचा का पीला होना, दिल की धड़कन में बदलाव, सांस लेने में तकलीफ, चक्कर आना, सीने में दर्द, हाथों और पैरों का ठंडा होना, सिरदर्द आदि है। ऐसे लक्षण महसूस होते ही ससमय इलाज कराएं।
गर्भवती महिलाएं रखें विशेष ख्याल :
गर्भवती महिलाओं के गर्भ में पल रहे शिशु के विकास के लिए शरीर में रक्त का निर्माण होते रहना जरूरी होता है। इसमें कमी के कारण एनीमिया होने की प्रबल संभावना रहती है।इसलिए गर्भवती महिलाओं को नियमित हीमोग्लोबीन समेत अन्य आवश्यक जांच कराते रहना चाहिए। चिकित्सकों के मुताबिक वैसे तो बच्चों से लेकर बड़ों तक हर उम्र के लोग एनीमिया ग्रस्त हो जाते हैं, लेकिन किशोरावस्था, प्रसव के बाद और रजोनिवृत्ति के बीच की आयु में यह समस्या अधिक देखी जाती है। आमतौर पर ऐसा तब होता है, जब शरीर में लाल रक्त कणों की कोशिकाओं के नष्ट होने की दर उनके निर्माण की दर से अधिक होती है।
चिकित्सकों की सलाह का करें पालन :
एनीमिया के लक्षण महसूस होने पर तुरंत किसी अच्छे चिकित्सक से परामर्श लें। चिकित्सकों के अनुसार आवश्यक जांच कराएं। खानपान का खास ख्याल रखें। आयरन और प्रोटीनयुक्त आहार लें। एनीमिया के दौरान प्रोटीन युक्त भोजन जैसे- पालक, सोयाबीन, चुकंदर, लाल मांस, मूँगफली, मक्खन, अंडे, टमाटर, अनार, शहद, सेब, खजूर आदि पका सेवन करें, जो कि आपके शरीर में खून की कमी को पूरा करता है।

कोरोना काल में दोहरी चुनौती को दे रही मात

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– बांका शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की एएनएम रानी कुमारी की कहानी
– भय को पीछे छोड़ टीकाकरण के महत्व को लेकर लगातार कर रही जागरूक
– कोविड केयर सेंटर में कोरोना मरीजों  की कर रही देखभाल
बांका-
कोरोना काल स्वास्थ्य विभाग के कर्मियों के लिए दोहरी चुनौती लेकर आया. एक तो वह संक्रमण के खतरे के बीच अपना कार्य कर रहे हैं, ऊपर से सामाजिक बहिष्कार के खतरे का दंश भी झेल रहे हैं. खुशी की बात यह है कि इस दोहरी चुनौती के बीच भी स्वास्थ्यकर्मी दिन-रात लोगों को जागरूक करने तथा संक्रमण का फैलाव रोकने में लगे हुये हैं. इसी बीच बांका शहरी पीएचसी में तैनात एएनएम रानी कुमारी विषम परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ रही हैं. कोरोना काल की जब शुरुआत हुई थी तो उस समय वह लोगों को जागरूक कर रही थी. साथ में टीकाकरण अभियान में लगी थी. अभी कुछ दिनों से उनकी ड्यूटी लकड़ीकोला स्थित कोविड केयर सेंटर में लगी है. जहां पर वह कोरोना मरीजों की देखभाल कर रही हैं.
कोविड केयर सेंटर में कोरोना मरीजों की कर रही देखभाल : जांच में पॉजिटिव पाए जाने वाले मरीजों को इलाज के बारे में परामर्श देती है. मरीजों की काउंसलिंग कर उन्हें कोविड केयर सेंटर में भर्ती कराती है या फिर मरीज को होम आइसोलेशन में भेजती हैं. होम आइसोलेशन में जाने वाले मरीजों को वह स्वास्थ्य विभाग का किट देती हैं. साथ में घर में रहने के दौरान बरती जाने वाली सावधानी के बारे में बताती है. रानी बताती हैं कि अब जब हमारी ड्यूटी लकड़ीकोला स्थित कोविड केयर सेंटर में लगी है तो मैं मरीजों को उचित सलाह देती हूं कि कैसे इससे उबरना है. इसके साथ ही वह प्रतिदिन अपने कार्यक्षेत्र में लोगों को शारीरिक दूरी के महत्व के बारे में बताती हैं. लोगों को भीड़ वाली जगहों पर नहीं जाने की सलाह देती हैं. वह कहती हैं, लोगों को हाथों की सफाई का सही तरीका बताना एक अहम कार्य है. गांव में लोग अधिक हाथ साफ करने के आदि नहीं हैं. लेकिन धीरे-धीरे लोगों में बदलाव दिख रहे हैं. लोग अपने मुंह एवं नाक को ढंकने के साथ हाथों की भी सफाई कर रहे हैं.
भय को पीछे छोड़ टीकाकरण के महत्व को लेकर समुदाय को कर रही जागरूक: रानी कुमारी कहती हैं कोरोना कि जब शुरुआत हुई थी तो उस समय थोड़ा सा मन में भय जरूर हुआ था, लेकिन जैसे ही काम का सफर आगे बढ़ता गया यह बात समझ में आ गई कि काफी जिम्मेदारी वाला काम है. इसलिए इस काम में पूरी ताकत झोंकना होगा. पहले तो घर-घर जाकर लोगों को जागरूक किया. टीकाकरण के बारे में उन्हें समझाया. लोगों को यह बताया कि कोरोना काल में भी टीकाकरण बहुत जरूरी है.  यह बात गांव के लोगों को समझाया.  टीकाकरण से रोग – प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है. टीकाकरण नहीं कराने से आगे चलकर इसका नुकसान होना उठाना पड़ सकता है.
वहीं शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ सुनील कुमार चौधरी कहते हैं रानी हर काम को जिम्मेदारी से करती है. जब कोरोना की शुरुआत हुई थी, उस समय हमने रानी की ड्यूटी पंचायत में लगाई थी. जहां पर इसने बढ़िया काम किया तो अब उसकी ड्यूटी लकड़ीकोला स्थित कोविड केयर सेंटर में लगा दी गई है. जहां पर वह मरीजों को परामर्श दे रही  हैं.
2012 से स्वास्थ्य के क्षेत्र में कर रही काम: रानी कुमारी 2012 में कॉन्ट्रैक्ट पर एएनएम के रूप में भर्ती हुई थी. उसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. मेहनत और ईमानदारी से लगातार अपना काम कर रही है. इसी का परिणाम रहा कि 2016 में उनको परमानेंट कर दिया गया. अब वह बांका शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में में एक स्थाई कर्मचारी के तौर पर काम कर रही हैं.
परिवार का मिल रहा है साथ:  एएनएम रानी कुमारी को इस काम में परिवार का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है. पति घर में अन्य काम में सहयोग करते हैं. साथ ही बच्चे भी को काम के लिए प्रोत्साहित करते हैं. रानी को दो बेटी हैं. दोनों पढ़ाई कर रही हैं. जब रानी फील्ड में अपना कार्य कर रही होती है तो दोनों बेटियां और पति घर के काम करते हैं. ताकि रानी पर घर के काम करने का दबाव नहीं हो

विश्व स्तनपान सप्ताह: कुपोषण और संक्रामक बीमारियों से नवजात को सुरक्षित रखता है स्तनपान

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• 6 माह तक सिर्फ स्तनपान करने वाले शिशुओं में डायरिया से 11% एवं निमोनिया से 15% तक कम मृत्यु की होती है संभावना
• शिशु जन्म के 1 घन्टे के भीतर शिशुओं को स्तनपान कराने से नवजात मृत्यु दर में 20% की लायी जा सकती है कमी
• सावधानी बरतकर संक्रमित माताएं भी करा सकती हैं शिशु को स्तनपान
बांका, 5 अगस्त: कोरोना आपदा के बीच नवजात शिशुओं के पोषण को ध्यान में रखते हुए 7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाना है. स्तनपान का मुख्य उद्देश्य नवजात एवं शिशुओं में बेहतर पोषण को सुनिश्चित कराना है. साथ ही उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत कर उन्हें संक्रामक रोगों के प्रति सुरक्षित करना है. ​स्तनपान सप्ताह के मद्देनजर स्वास्थ्य विभाग ने आशा व आंगनबाड़ी सेविकाओं सहित अस्पतालों के स्टाफ नर्स, एएनएम, आरएमएनसीएच प्लस ए काउंसलर, ममता, चिकित्सक एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मी को प्रसूताओं व धात्री महिलाओं को नियमित स्तनपान के फायदों के बारे में बताने के लिए कहा है.
स्तनपान एवं संपूरक आहार देता है बेहतर स्वास्थ्य:
बाल स्वास्थ्य के राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ. विजय प्रकाश राय ने बताया विश्व स्तनपान सप्ताह 1 अगस्त से 7 अगस्त तक मनाया जा रहा है. इस दौरान नवजात के लिए स्तनपान की जरूरत पर जागरूकता लाने का काम किया गया है. शिशु जन्म के 1 घन्टे के भीतर शिशुओं को स्तनपान कराने से नवजात शिशु मृत्यु दर में 20% की कमी लायी जा सकती है. वहीँ 6 माह तक सिर्फ स्तनपान करने वाले शिशुओं में डायरिया से 11% एवं निमोनिया से 15% तक कम मृत्यु की संभावना होती है. 6 माह तक शिशुओं को सिर्फ स्तनपान कराना चाहिए एवं 6 माह के बाद शिशु को संपूरक आहार देना शुरू कर देना चाहिए. साथ ही शिशु के बेहतर विकास के लिए कम से कम 2 साल तक शिशु को स्तनपान कराना जारी रखना चाहिए. संपूरक आहार से बच्चे का उपयुक्त शारीरिक एवं मानसिक विकास होता है तथा बच्चा कुपोषणजनित कई तरह के बीमारियों से बचा रहता है. इसलिए यह जरुरी है कि कोरोना महामारी के दौरान चिकित्सक के साथ अन्य स्वास्थ्य कर्मी नवजात शिशुओं के स्तनपान एवं शिशुओं के संपूरक आहार की जरूरत के विषय में आम-जनता को जागरूक एवं जानकारी प्रदान करें.
1 घंटे के भीतर स्तनपान एवं 6 माह तक केवल स्तनपान जरुरी:
• शिशु जन्म के 1 घन्टे के भीतर स्तनपान कराना जरुरी होता है. माँ का दूध शिशु को कई तरह के संक्रमण से बचाव करता है
• माँ के दूध में एंटीबॉडी होते हैं जो बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं
• स्वास्थ्य संस्था में या किसी स्वास्थ्य कर्मी के द्वारा दूध की बोतलें, निप्पल या डमीज को बढ़ावा न दें
माँ में बुखार, खाँसी या सांस लेने में कोई तकलीफ़ जैसे लक्षण दिखने पर
• तुरंत चिकित्सक से सलाह लें
• बच्चे के संपर्क में आने पर मास्क पहनें. खांसते या छींकते समय मुँह को रुमाल या टिश्यू पेपर से ढकें
• छींकने या खांसने के बाद, दूध पिलाने से पहले एवं बाद हाथों को पानी एवं साबुन से 40 सेकंड तक धोएं
• किसी भी तरह के सतह को छूने के बाद हाथों को पानी एवं साबुन से 40 सेकंड तक धोएं या अल्कोहल बेस्ड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें
माँ यदि स्तनपान नहीं करा सकती हैं तो ये करें:
• अपना दूध कटोरे में निकाल लें. इसके लिए मां अपने हाथों को 40 सेकेंड तक साबुन से धोंये या अल्कोहल आधारित सेनेटाइजर से हाथों को सेनेटाइज करें. जिस कटोरी में दूध निकालें उसे अच्छी तरह गर्म पानी एवं साबुन से धो लें.
• अपना निकला हुआ दूध पिलाने से पहले भी मास्क का इस्तेमाल करें. साथ ही चम्मच को भी अच्छी तरह साफ़ कर लें
यदि माँ कोविड 19 से संक्रमित है या उसकी संभावना है:
• कोविड-19 संबंधी प्रोटोकॉल का पालन करते हुए बच्चे को 1 जन्म के पहले घंटे एवं 6 माह तक केवल माँ का ही दूध पिलायें
• शिशु की देखरेख एवं स्किन टू स्किन संपर्क के लिए घर की किसी स्वस्थ महिला का सहयोग लिया जा सकता है
शिशु के समग्र विकास के लिए जरूरी है स्तनपान  :
स्तनपान कराने से शिशु का समग्र शारीरिक ​और मानसिक विकास होता है. साथ ही बच्चों का आइक्यू लेवल उंचा रहता है. नवजात को मां का पहला गाढ़ा व पीला दूध अवश्य पिलायें. यह रोग प्रतिरोधक एंटीबॉडीज व प्रोटीन से भरपूर होता है व कई तरह के संक्रमण से रक्षा करता है. समुचित स्तनपान करने वाले बच्चों में मोटापा, उक्त रक्त चाप एवं डायबिटीज होने की संभावना भी कम होती है. यह मां के स्वास्थ्य की भी रक्षा करता है.
6 महीने पूरे होने के बाद बच्चे को दें संपूरक आहार:
शिशु के 6 महीने पूरे होने के बाद उनके बेहतर मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए स्तनपान के साथ  संपूरक आहार की जरूरत होती है. 6 माह के बाद स्तनपान के साथ संपूरक आहार शिशुओं को देना चाहिए. साथ ही शिशु को 2 साल तक स्तनपान करवाना जारी रखना चाहिए. इसके लिए बच्चे को अलग से कटोरी में खाना खिलाना चाहिए. खाना बनाने, खिलाने या कहने से पहले 40 सेकंड तक पानी एवं साबुन से हाथ धोना जरुरी है. 6 महीने के बच्चे को 2-3 चम्मच खाना दिन में 2 से 3 बार. 6 से 9 महीने के बच्चे को आधा कटोरी खाना दिन में 2 से 3 बार. 9 से 12 महीने  के बच्चे को आधा कटोरी खाना दिन में 2 से 3 बार. 1 से 2 साल तक के बच्चे को 1 कटोरी खाना दिन में 3 से 4 बार देना जरुरी है.

विश्व स्तनपान सप्ताह: कुपोषण और संक्रामक बीमारियों से नवजात को सुरक्षित रखता है स्तनपान

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• 6 माह तक सिर्फ स्तनपान करने वाले शिशुओं में डायरिया से 11% एवं निमोनिया से 15% तक कम मृत्यु की होती है संभावना
• शिशु जन्म के 1 घन्टे के भीतर शिशुओं को स्तनपान कराने से नवजात मृत्यु दर में 20% की लायी जा सकती है कमी
• सावधानी बरतकर संक्रमित माताएं भी करा सकती हैं शिशु को स्तनपान
 जमुई, 5 अगस्त: कोरोना आपदा के बीच नवजात  शिशुओं के पोषण को ध्यान में रखते हुए 7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाना है. स्तनपान का मुख्य उद्देश्य नवजात एवं शिशुओं में बेहतर पोषण को सुनिश्चित कराना है. साथ ही उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत कर उन्हें संक्रामक रोगों के प्रति सुरक्षित करना है. ​स्तनपान सप्ताह के मद्देनजर स्वास्थ्य विभाग ने आशा व आंगनबाड़ी सेविकाओं सहित अस्पतालों के स्टाफ नर्स, एएनएम, आरएमएनसीएच प्लस ए काउंसलर, ममता, चिकित्सक एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मी को प्रसूताओं व धात्री महिलाओं को नियमित स्तनपान के फायदों के बारे में बताने के लिए कहा है.
स्तनपान एवं संपूरक आहार देता है बेहतर स्वास्थ्य:
बाल स्वास्थ्य के राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ. विजय प्रकाश राय ने बताया विश्व स्तनपान सप्ताह 1 अगस्त से 7 अगस्त तक मनाया जा रहा है. इस दौरान नवजात के लिए स्तनपान की जरूरत पर जागरूकता लाने का काम किया गया है. शिशु जन्म के 1 घन्टे के भीतर शिशुओं को स्तनपान कराने से नवजात शिशु मृत्यु दर में 20% की कमी लायी जा सकती है. वहीँ 6 माह तक सिर्फ स्तनपान करने वाले शिशुओं में डायरिया से 11% एवं निमोनिया से 15% तक कम मृत्यु की संभावना होती है. 6 माह तक शिशुओं को सिर्फ स्तनपान कराना चाहिए एवं 6 माह के बाद शिशु को संपूरक आहार देना शुरू कर देना चाहिए. साथ ही शिशु के बेहतर विकास के लिए कम से कम 2 साल तक शिशु को स्तनपान कराना जारी रखना चाहिए. संपूरक आहार से बच्चे का उपयुक्त शारीरिक एवं मानसिक विकास होता है तथा बच्चा कुपोषणजनित कई तरह के बीमारियों से बचा रहता है. इसलिए यह जरुरी है कि कोरोना महामारी के दौरान चिकित्सक के साथ अन्य स्वास्थ्य कर्मी नवजात शिशुओं के स्तनपान एवं शिशुओं के संपूरक आहार की जरूरत के विषय में आम-जनता को जागरूक एवं जानकारी प्रदान करें.
1 घंटे के भीतर स्तनपान एवं 6 माह तक केवल स्तनपान जरुरी:
• शिशु जन्म के 1 घन्टे के भीतर स्तनपान कराना जरुरी होता है. माँ का दूध शिशु को कई तरह के संक्रमण से बचाव करता है
• माँ के दूध में एंटीबॉडी होते हैं जो बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं
• स्वास्थ्य संस्था में या किसी स्वास्थ्य कर्मी के द्वारा दूध की बोतलें, निप्पल या डमीज को बढ़ावा न दें
माँ में बुखार, खाँसी या सांस लेने में कोई तकलीफ़ जैसे लक्षण दिखने पर
• तुरंत चिकित्सक से सलाह लें
• बच्चे के संपर्क में आने पर मास्क पहनें. खांसते या छींकते समय मुँह को रुमाल या टिश्यू पेपर से ढकें
• छींकने या खांसने के बाद, दूध पिलाने से पहले एवं बाद हाथों को पानी एवं साबुन से 40 सेकंड तक धोएं
• किसी भी तरह के सतह को छूने के बाद हाथों को पानी एवं साबुन से 40 सेकंड तक धोएं या अल्कोहल बेस्ड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें
माँ यदि स्तनपान नहीं करा सकती हैं तो ये करें:
• अपना दूध कटोरे में निकाल लें. इसके लिए हाथों को साबुन या अल्कोहल बेस्ड सैनिटाइजर से 40 सेकंड तक साफ़ करें. जिस कटोरी में दूध निकालें उसे अच्छी तरह गर्म पानी एवं साबुन से धो लें
• अपना निकला हुआ दूध पिलाने से पहले भी मास्क का इस्तेमाल करें. साथ ही चम्मच को भी अच्छी तरह साफ़ कर लें
यदि माँ कोविड 19 से संक्रमित है या उसकी संभावना है:
• कोविड-19 संबंधी प्रोटोकॉल का पालन करते हुए बच्चे को 1 जन्म के पहले घंटे एवं 6 माह तक केवल माँ का ही दूध पिलायें
• शिशु को संक्रमित माता से 6 फीट की दूरी पर रखा जाए जबतक कि माँ का टेस्ट दो बार नेगेटिव न आ जाए
• शिशु की देखरेख एवं स्किन टू स्किन संपर्क के लिए घर की किसी स्वस्थ महिला का सहयोग लिया जा सकता है
6 महीने पूरे होने के बाद बच्चे को दें संपूरक आहार:
शिशु के 6 महीने पूरे होने के बाद उनके बेहतर मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए स्तनपान के साथ  संपूरक आहार की जरूरत होती है. 6 माह के बाद स्तनपान के साथ संपूरक आहार शिशुओं को देना चाहिए. साथ ही शिशु को 2 साल तक स्तनपान करवाना जारी रखना चाहिए. इसके लिए बच्चे को अलग से कटोरी में खाना खिलाना चाहिए. खाना बनाने, खिलाने या कहने से पहले 40 सेकंड तक पानी एवं साबुन से हाथ धोना जरुरी है. 6 महीने के बच्चे को 2-3 चम्मच खाना दिन में 2 से 3 बार. 6 से 9 महीने के बच्चे को आधा कटोरी खाना दिन में 2 से 3 बार. 9 से 12 महीने  के बच्चे को आधा कटोरी खाना दिन में 2 से 3 बार. 1 से 2 साल तक के बच्चे को 1 कटोरी खाना दिन में 3 से 4 बार देना जरुरी है

विश्व स्तनपान अभियान को बढ़ावा देने के लिए वेबिनार का हुआ आयोजन

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-वेबिनार के माध्यम से जिला अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी ने दिया प्रशिक्षण
– शुरूआती स्तनपान से शिशुओं के रोग प्रतिरोधक क्षमता का होता है विकास
– जन्म के बाद छः माह तक नियमित स्तनपान से नवजात का होता है सर्वांगीण बिकास
-टारगेट पूरा करने को लेकर दिए गए आवश्यक सुझाव
लखीसराय,05 अगस्त,2020
कोरोना काल के बीच राज्य स्वास्थ समिति द्वारा विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जा रहा है। नियमित स्तनपान कराने से बच्चों में निमोनिया व डायरिया जैसी गम्भीर रोगों के होने की सम्भावना कम होती है तथा रोग-प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। स्तनपान अभियान को बढ़ावा देने तथा लक्ष्य हासिल करने के लिए तरह सजग एवं गंभीर है।  इसको लेकर जिला अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी एवं जिला कार्यक्रम समन्वयक ने संयुक्त रूप से वेबिनार के माध्यम से जिले के सभी पीएचसी प्रबंधक एवं बीसीएम को एक साथ प्रशिक्षण दिया गया। जिसमें निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए आवश्यक जानकारी दी गई ।
वर्ष 2030 तक 70% पूरा करने का है लक्ष्य
डॉ आत्मानंद राय ने बताया वर्ष 2025 तक 50% सफल बनाने एवं वर्ष 2030 तक 70% पार करने का लक्ष्य रखा गया है। हर हाल में लक्ष्य पूरा किया जाना है। इसको लेकर गाँव-गाँव अभियान चलाकर स्वास्थ टीम लोगों को जागरूक करेंगे।
शुरूआती स्तनपान से शिशुओं के रोग प्रतिरोधक क्षमता का होता है विकास
डॉ आत्मानंद राय ने बताया नवजात शिशुओं को जन्म लेने के एक घण्टे के भीतर स्तनपान कराना जरूरी होता है. शिशु जन्म से पहले से ही प्राकृतिक रूप से स्तनपान करने में सक्षम होते हैं. इसलिए जन्म के शुरुआती 1 घण्टे के अंदर उन्हें स्तनपान कराने की सलाह दी जाती है. कोरोना संक्रमण के कारण बहुत से लोग ऐसा नहीं कराना चाहते जो बिल्कुल गलत है. शुरुआत के स्तनपान से ही शिशुओं के रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है. इसलिए इस संक्रमण के दौर में भी जरूरी साफ सफाई का ध्यान रखते हुए शिशु को पहले 1 घण्टे में स्तनपान जरूर कराना चाहिए.
जन्म के बाद छः माह तक स्तनपान से नवजात का होता है सर्वांगीण बिकास
जन्म लेने से 6 माह तक नवजात शिशुओं को केवल मां का दूध ही पिलाना चाहिए।  यह नवजात के स्वस्थ शरीर का निर्माण के लिए भरपूर उर्जा है एवं इससे ही नवजात का सर्वांगीण बिकास होता है। नियमित स्तनपान कराने से बच्चों में निमोनिया व डायरिया जैसी गम्भीर रोगों के होने की सम्भावना कम होती है. नियमित स्तनपान कराने से शिशुओं के बाल मृत्यु दर में भी कमी होती है. स्तनपान शिशुओं को श्वसन संक्रमण सम्बधी होने वाले खतरों से भी बचाव करने में सहायक होता है. इसलिए बच्चों को पहले 6 माह सिर्फ और सिर्फ मां का स्तनपान ही करना चाहिए.
गाँव-गाँव जाकर लोगों को जागरूक करेंगे स्वास्थ टीम
निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए गाँव-गाँव जाकर स्वास्थ टीम नवजात की माँ समेत पूरे परिवार को जागरूक करेंगे एवं स्तनपान से होने वाले लाभ की जानकारी देंगे।  साथ ही अपने आसपास के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे। इस दौरान खासकर शिक्षित लोगों का भी सहयोग लिया जाएगा।
जिले में चल रहे विश्व स्तनपान सप्ताह में महिलाओं को किया जा रहा है प्रोत्साहित
वर्तमान में भी पूरे जिले में विश्व स्तनपान सप्ताह अभियान कार्यक्रम का संचालन हो रहा है। जिसमें उक्त अभियान को बढ़ावा देने के पहली बार माँ बने महिलाओं को कोविड़-19 के प्रोटोकाल के अनुसार भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाता है। एवं कार्यक्रम में उन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है। ताकि अन्य महिलाओं भी जागरूक हो एवं उत्साह के साथ इसे अपनाएँ।