कोरोना के डर से नवजात को स्तनपान कराना नहीं भूलें

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मां के दूध में कोरोना वायरस होने का नहीं मिला है कोई प्रमाण
स्तनपान नहीं कराने से बच्चे दूसरी बीमारी का हो सकता है शिकार
  भागलपुर, 18 जुलाई
कोरोना वायरस को लेकर लोगों के मन में तमाम तरह के भ्रम हैं। इस वजह से लोग बहुत सारे आवश्यक काम भी डर-डरकर कर रहे हैं। एक भ्रम यह भी है कि स्तनपान कराने से बच्चे को कोरोना हो सकता है, लेकिन अभी तक इसका कोई प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए नवजात को स्तनपान कराना मां को नहीं छोड़ना चाहिए। ऐसा करने से दूसरी समस्या हो सकती है।
नारायणपुर पीएचसी प्रभारी डॉ  विजयेंद्र कुमार विद्यार्थी कहते हैं कि स्तनपान के जरिए कोरोना संक्रमण का खतरा नहीं है और इसलिए कोरोना पीड़ित महिलाएं भी शिशु को अपना दूध पिला सकती हैं। कोरोना से संक्रमित या संक्रमण का संदेह होने पर भी शिशु को अपना दूध पिलाने के लिए मां को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। जब तक मां बहुत ज्यादा बीमार नहीं हैं, बच्चे को उससे अलग नहीं किया जाना चाहिये।
डॉ.  विद्यार्थी कहते हैं कि कहते हैं स्तनपान के जरिये कोरोना संक्रमण का अबतक कोई प्रमाण नहीं मिला है। मां के दूध में जिंदा वायरस नहीं मिला है। इसलिए मां से बच्चे को कोरोना संक्रमण होने का अबतक कोई प्रमाण नहीं है। बच्चों में कोविड-19 का खतरा कम होता है, जबकि कुछ ऐसी अन्य बीमारियों का खतरा अधिक रहता है, जिन्हें स्तनपान के जरिये रोका जा सकता है।
स्तनपान से पहले मां लगाएं मास्क:
स्तनपान से पहले मां को मास्क लगाना चाहिये। शिशु को छूने से पहले और बाद में अपने हाथ धोने चाहिये और नियमित रूप से आसपास की सतहों को साफ और संक्रमणमुक्त करना चाहिए। दरअसल, कई बार देखा गया है कि स्तनपान के दौराम मां को खांसी होने लगती है या फिर अन्य कोई समस्या। उस लिहाज से ऐसा करने से कोरोना के संक्रमण का खतरा कम रहेगा और बच्चे भी सुरक्षित रहेंगे।
यदि मां स्वस्थ नहीं हैं तो कटोरी में निकालकर दें दूध
यदि मां स्वस्थ नहीं हैं और स्तनपान कराने की स्थिति में नहीं है तो वह मास्क पहनकर अपना दूध साफ कटोरी में निकालकर और साफ कप या चम्मच से बच्चे को दूध पिला सकती हैं। इसके लिए भी बहुत ही सावधानी बरतने की जरूरत है कि अपना दूध निकालने से पहले हाथों को साबुन व पानी से अच्छी तरह से धोएं, जिस कटोरी या कप में दूध निकालें उसे भी साबुन और पानी से अच्छी तरह धो लें।
छह माह से बड़े बच्चों को आहार भी दें
छह माह से बड़े बच्चों को स्तनपान कराने के साथ पूरक आहार देना भी शुरू करना चाहिए। यह उनके शारीरिक और मानसिक विकास का समय होता है। इस दौरान दाल, दूध, दूध से बने पदार्थ, मौसमी फल और हरी सब्जियां भी देना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास ठीक से होता है।

गर्भाश्य में गांठ बनने व मासिक धर्म से जुड़ी जटिलता को जन्म देता है हिस्टरेक्टमी

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हिस्टरेक्टमी के लिए डॉक्टरी सलाह जरूर लें,  सही अस्पताल का करें चयन
कोरोना संक्रमण काल में किशोरी व महिलाएं प्रजनन स्वास्थ्य का भी रखें ध्यान
लखीसराय,18 जुलाई: कोविड संक्रमण काल में प्रजनन स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाना जरूरी है. कई बार एक संक्रमण से बचाव करते करते हम दूसरे संक्रमण के शिकार हो सकते हैं. लेकिन हमें सभी प्रकार के संक्रमण से बचाव की जानकारी तो अवश्य होनी चाहिए. प्रजनन स्वास्थ्य में गर्भाश्य से जुड़ी समस्याएं भी शामिल हैं.  प्रजनन संबंधित आपातकालीन जटिलताओं में हिस्टरेक्टमी (गर्भाशय को शरीर से निकालना) की सलाह दी जाती है. इस प्रक्रिया के तहत गर्भाशय को निकाल दिया जाता है जिससे माँ बनने की संभावनाएं खत्म हो जाती है. इसलिए हिस्टरेक्टमी के वक़्त योग्य चिकित्सक की सलाह एवं उपयुक्त स्वास्थ्य केंद्र का चुनाव जरूरी है.
40 सा से कम उम्र की महिलाओं के लिए हिस्टरेक्टमी सही नहीं:
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ सदर अस्पताल की डॉ रूपा ने बताया कि 40 साल से पहले हिस्टरेक्टमी से परहेज करना चाहिए. गर्भाशय में गाँठ बनने, मासिक धर्म से जुड़ी गंभीर जटिलताएं एवं गर्भाशय से असामान्य रक्त निकलने की आपातकालीन परिस्थिति में ही गर्भाशय सर्जरी की सलाह दी जाती है. हिस्टरेक्टमी के बाद कोई महिला माँ नहीं बन सकती. इसलिए हिस्टरेक्टमी से पहले दवाओं की मदद से जटिलता प्रबंधन पर ध्यान दिया जाता है. निजी अस्पतालों की अपेक्षा सरकारी अस्पतालों में हिस्टरेक्टमी की सही सलाह दी जा सकती है. योग्य चिकित्सक के राय के बिना हिस्टरेक्टमी नहीं करानी चाहिए. हिस्टरेक्टमी टालने के लिए दवाओं के अलावा अन्य वैकल्पिक साधन भी उपलब्ध हैं. इसलिए सर्जरी कराने की कभी भी जल्दीबाजी नहीं करनी चाहिए.
तीन सहज विधियों से गर्भाश्य की समस्या की जाती है दूर:
हिस्टरेक्टमी करने की कुल तीन विधियाँ हैं. इनमें एब्डोमिनल हिस्टरेक्टमी, लैप्रोस्कोपिक व वजाइनल हिस्टरेक्टमी शामिल हैं. एब्डोमिनल हिस्टरेक्टमी एक शल्य क्रिया है जिसमें पेट में एक बड़ा काट बनाया जाता है और इसके द्वारा गर्भाशय को निकाला जाता है. इस क्रिया के बाद अपने रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में वापस लौटने में कुछ वक़्त लगता है. लैप्रोस्कोपिक हिस्टरेक्टमी में पेट में कम से कम काट किए जाते हैं। पेट के निचले हिस्से में एक छोटा सा काट किया जाता है जिससे एक छोटी ट्यूब जैसे लैप्रोस्कोप को अंदर डाली जाती है। इस लैप्रोस्कोप में एक कैमरा लगा होता है जिससे सभी अंगों को साफ़-साफ़ देखने में मदद मिलती है. वजाइनल हिस्टरेक्टमी में पेट में कोई काट ना करके गर्भाशय को योनि के द्वारा निकाला जाता है। प्रक्रिया कराने के बाद मरीज़ का हॉस्पिटल में केवल एक या दो दिनों के लिए ठहराव होता है और यह प्रक्रिया लगभग दर्द रहित होती है।
हिस्टरेक्टमी के बाद इन बातों का रखें ख्याल
• अपने रोज़मर्रा के काम करते रहें। अधिक आराम ना करें
• भारी चीज़ें ना उठाए
• रोज़ हल्का व्यायाम करे जैसे की स्ट्रेचिंग एवं योग
• अधिकतर फाइबर वाला खाना खाएं ताकि कब्ज से बचा जा सके
• ज़्यादा तनाव ना लें और अपने शरीर में होने वाले बदलावों को अपनाएं
• वजाइनल हिस्टरेक्टमी कराने के बाद कुछ दिन यौन-संबंध करने से परहेज़ करें
क्या कहते हैं आंकड़ें: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के अनुसार बिहार में 30 साल से कम उम्र की 1 प्रतिशत, 30 से 39 साल की 8.2 प्रतिशत एवं 40 से 49 वर्ष की 14.5 महिलाएं हिस्टरेक्टमी कराती हैं। बिहार के शहरी क्षेत्र में 5.2 एवं ग्रामीण क्षेत्र में 5.4 प्रतिशत महिलाएं हिस्टरेक्टमी कराती हैं

फुल्लीडुमर पीएचसी में परिवार नियोजन कार्यक्रम ने पकड़ी रफ्तार

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• एक सप्ताह में लगभग 40 महिलाओं का हुआ ऑपरेशन
• ओपीडी में भी इलाज करवाने के लिए आ रहे काफी मरीज
बांका, 17 जुलाई
फुल्लीडुमर पीएचसी में ओपीडी सेवा का संचालन बेहतर तरीके से चल रहा है। अस्पताल की बेहतर व्यवस्था को देखकर काफी संख्या में मरीज इलाज करवाने के लिए आ रहे हैं। पिछले एक सप्ताह में अस्पताल में 40 महिलाओं का परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत आपरेशन हुआ है। इलाके में परिवार नियोजन कार्यक्रम को गति देने के लिए पीएचसी में तैनात डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मियों की टीम लगातार प्रयास कर रही है।
पीएचसी प्रभारी डॉ. संजीव कुमार ने बताया कि कोरोना को लेकर कुछ दिनों के लिए स्वास्थ्य सेवा रोक दी गई थी,लेकिन निर्देश मिलने के बाद से ओपीडी सेवा को फिर से बहाल कर दी गयी है। अभी जनसंख्या स्थिरता पखवाड़ा चल रहा है, जो 11 जुलाई से शुरू होकर 31 जुलाई तक चलेगा.  इसलिए अभी परिवार नियोजन कार्यक्रम पर जोर दिया जा रहा है. वहीं ओपीडी में सभी तरह के मरीजों का इलाज चल रहा है। डॉक्टरों की टीम मरीजों के इलाज में लगे हुए हैं। साथ ही अस्पताल में मौजूद स्वास्थ्यकर्मी उनकी हर तरह से देखभाल कर रहे हैं।
गर्भवती महिलाओं व शिशुओं को लेकर बरती जा रही सतर्कता:
डॉ. संजीव कुमार ने बताया पीएचसी में आने वाली गर्भवती महिलाओं के इलाज को लेकर विशेष सतर्कता बरती जा रही है। उनके इलाज को लेकर सरकार की गाइडलाइन का पालन किया जा रहा है। अस्पताल की नर्स व एएनएम पूरी तरह से सुरक्षित होकर गर्भवती महिलाओं की जांच करते हैं। डॉक्टर भी सावधानीपूर्वक इनका इलाज करते हैं।
सामाजिक दूरी का रखा जा रहा ख्याल:
अस्पताल में आने वाले मरीजों व उनके परिजनों से सामाजिक दूरी का पालन करवाया जा रहा है। दो लोगों के बीच दो मीटर की दूरी हो, इसका ख्याल रखा जा रहा है। बाहर से आने वाले मरीजों को देखने से पहले विशेष सतर्कता बरती जा रही है। यहां आने वाले मरीजों को मास्क और सेनिटाइजर भी उपलब्ध करवाया जा रहा है। डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी पूरी तरह मास्क और ग्लब्स पहनकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
सभी लोगों की हो रही थर्मल स्कैनिंग:
अस्पताल में आने वाले सभी व्यक्ति, चाहे मरीज हो या फिर उसके परिजन उसकी थर्मल स्कैनिंग की जा रही है। शरीर के तापमान को नापने के बाद ही इलाज किया जा रहा है। इस दौरान अगर कोई संदिग्ध मरीज दिखता है तो उसे सैंपलिंग के लिए भेज दिया जाता है। स्वास्थ्यकर्मी पूरी मुस्तैदी से अपने मोर्चे पर डटे हुए हैं।

अच्छे पोषण से दिमागी बुखार को मात

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• बेहतर पोषण दिमागी बुखार से बचाव में सहायक
• दिमागी बुखार से बचाव के लिए दोनों टीके जरूरी
जमुई /17, जुलाई :अभी पूरा स्वास्थ्य बिभाग कोविड-19 के महामारी से हर  पल जंग कर रहा है ताकि इस संकर्मण से बचा जा सके. पर क्या हम ये जानते हैं कि  पूरी तरह से स्वस्थ्य बच्चा ही बीमारियों से लड़ने में सक्षम होता है। कुपोषण सिर्फ शरीर को कमजोर ही नहीं करता बल्कि अन्य बीमारियों से होने वाले प्रभावों में भी वृद्धि करता है. बच्चों में होने वाले दिमागी बुखार ऐसे तो मच्छर द्वारा काटने से होता है, लेकिन कुपोषित बच्चों में होने वाले दिमागी बुखार एक स्वस्थ बच्चे में होने वाले दिमागी बुखार की तुलना में अधिक गंभीर एवं जानलेवा साबित हो सकता है.
बेहतर पोषण कई रोगों से बचाव का रास्ता:
 बच्चों को जन्म से ही बेहतर पोषण की आवश्यकता होती है. बच्चे के जन्म के एक घंटे के भीतर माँ का गाढ़ा पीला दूध एवं अगले छह महीने तक सिर्फ़ माँ का दूध बच्चे को इस उम्र में होने वाली बहुत सी बीमारियों जैसे डायरिया, निमोनिया, ज्वर एवं अन्य घातक रोगों से बचाव करता है. छह माह तक माँ का दूध एवं इसके बाद मसला हुआ अनुपूरक आहार के साथ 2 साल तक नियमित स्तनपान बच्चों को कुपोषण से दूर रखता है. मच्छरों से फैलने वाले कई रोग जैसे डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया एवं दिमागी बुखार जैसे घातक एवं गंभीर रोगों से होने वाले प्रभावों में बच्चों के बेहतर पोषण के कारण बहुत हद तक कमी आती है एवं बच्चा आसानी से इन रोगों के प्रभावों से बाहर भी आ जाता है.
टीका है बचाव का रास्ता:
दिमागी बुखार का पहला टीका 9 से 12 महीने तक के बच्चों को एवं 1 से 2 वर्ष की उम्र के बच्चों को दूसरा ख़ुराक दिया जाता है जिसे बूस्टर डोज़ भी कहते हैं. दिमागी बुखार क्यूलेक्स नामक मच्छर के काटने से इसका वाइरस शरीर में प्रवेश करता है और सीधे दिमाग पर असर करता है. इससे बच्चों को दिमागी बुखार हो जाता है.  जापानी बुखार में शुरू में फ्लू जैसे लक्ष्ण के साथ बुखार आना, ठंड लगना, थकान होना, सिर दर्द, उल्टी एवं दौरे आना आदि दिखाई देते हैं.  यह बुखार काफी ख़तरनाक हो सकता है जिससे बच्चा अपंग एवं समुचित चिकित्सीय जाँच के अभाव में जानलेवा भी हो जाता है.
इस गंभीर रोग से मजबूती से लड़ने के लिए बच्चे का सुपोषित होना फायदेमंद होता है. सुपोषित बच्चे में दिमागी बुखार प्रभाव डालने के बाद भी काफी हद तक जानलेवा नहीं हो पता है. इसलिए बच्चों को दिमागी बुखार से बचाने के लिए टीके के साथ उनका बेहतर पोषण भी जरूरी है

सामाजिक तिरस्कार के खतरे के बीच कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ रही पिंकी

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• धांधी बेलारी पंचायत की आशा फेसिलिटेटर  पिंकी कुमारी 14 वर्षों से दे रही सेवा
• मुख्य धारा से कटे हुए गांवों में लोगों को पहुंचा रहीं स्वास्थ्य सेवा
भागलपुर, 17  जुलाई
कोरोना का संक्रमण दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है. राज्य में फिर से  लॉकडाउन लगाना पड़ा है. सभी लोग घरों में कैद हैं. ऐसे में घर-घर जाकर लोगों को कोरोना के प्रति जागरूक करना आसान काम नहीं है. साथ में संक्रमण के खतरे के बीच लोगों की स्क्रीनिंग करना किसी चुनौती से कम नहीं है. समाज में वैसे भी लोग हैं जो इस तरह के काम करने वालों को  तिरस्कार कर रहे हैं. लेकिन इस चुनौती को स्वीकर कर घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करने में सुल्तानगंज प्रखंड की घांधी बेलारी पंचायत की आशा फैसिलिटेटर पिंकी कुमारी दिन रात जुटी है. वह गांव के लोगों को कोरोना से बचाव के तरीके भी बता रही हैं. साथ ही संदिग्धों की पहचान कर उसका सैंपलिंग भी करवा रही हैं.
पिंकी कुमारी कहती हैं, वह अभी तक सैकड़ों लोगों की थर्मल स्क्रीनिंग कर चुकी है. वह जिस इलाके में काम करती है, वह मुख्य धारा से कटा हुआ है. वहां पर स्वास्थ्य सेवा पहुंचाना आसान नहीं है, लेकिन उन्हें इस काम को करने से संतुष्टि मिल रही है. साथ ही वहां के लोग भी बहुत ज्यादा जागरूक नहीं हैं. इसलिए उन्हें सफाई के प्रति जागरूक करना व मास्क पहनने की सलाह देना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन यह जरूरी भी है. गांव के लोगों को स्वास्थ्य सेवा पहुंचाकर संतुष्टि मिलती है.
14 सालों से कर रहीं सेवा:
पिंकी कुमारी 2006 से ही बतौर आशा के तौर पर काम कर रही हैं. इन 14 सालों में इन्होंने 500 से अधिक महिलाओं का सफलतापूर्वक प्रसव कराया है. इतने लंबे समय तक सेवा देने से वह गांव के लोगों में पिंकी दीदी के तौर पर काफी लोकप्रिय हैं. अपने क्षेत्र के किसी भी गांव में जब भी ये जाती हैं तो लोग समझ जाते हैं कि स्वास्थ्य के प्रति ये कुछ समझाने आई हैं. साथ ही बच्चों और महिलाओं के टीकाकरण में भी बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं.
पति का भी मिल रहा सहयोग:
पिंकी कुमारी के पति स्वास्थ सेवा से जुड़े हैं. वह पल्स पोलियो अभियान में अपना योगदान देते हैं. दो बच्चे हैं. इसके बावजूद वह अपने काम को पूरी ईमानदारी से करती हैं. वह कहती हैं कि वह जब काम पर रहती हूं तो पति घर में बच्चे को संभालते हैं. इससे मैं अपना काम बेफिक्र होकर कर पाती हूं. अगर परिवार का सहयोग नहीं मिलता तो मैं अपना काम उतनी शिद्दत से नहीं कर पाती, जितना की आज कर रही हूं.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने की थी ललक:
पिंकी कुमारी कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि वह सिर्फ आर्थिक जरूरत के लिए इस काम को कर रही हूं. वह बचपन से ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करना चाहती थी. यही कारण है कि जब 2005 में ट्रेनिंग की शुरुआत हुई तो वह उसमें शामिल हो गई. काम करने के प्रति ललक उन्हें जिम्मेदार बनाती है. यही कारण है कि वह अपना काम पूरी ईमानदारी से कर पाती हैं.

नये हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम वेब पोर्टल पर दर्ज होंगी स्वास्थ्य केंद्रों के लोकेशन

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राज्य की ओर से जिला अनुश्रवण व मूल्यांकन पदाधिकारियों को दी गयी है ट्रेनिंग
कार्यपालक निदेशक मनोज कुमार ने पत्र लिख कर सिविल सर्जन को दिये आदेश
लखीसराय, 17 जुलाई: जिला के सदर अस्पताल को छोड़र शहरी क्षेत्रों में स्थित अस्पतालों का पूरी जानकारी नये हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम वेब पोर्टल पर दर्ज की जायेगी. राज्य स्वास्थ्य समिति की ओर से इससे संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने एवं नये हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम वेब पोर्टल पर आंकड़ा अपडेट कराने के निर्देश को सिविल सर्जन को दिये गये हैं. राज्य में कूल 12 नगर निगम व 49 नगर ​परिषद हैं जहां स्थित स्वास्थ्य केंद्रों की जानकारी अपडेट करना है.
नये एचएमआइएस वेब पर स्वास्थ केंद्रों की होगी मैपिंग:
राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक मनोज कुमार द्वारा सिविल सर्जन को भेजे गये पत्र में कहा गया है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा नया एचएमआइएस वेब पोर्टल की शुरूआत की गयी है. इस पोर्टल पर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में संचालित अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रों को अलग अलग मैपिं​ग किया जाना है. नये एचएमआइएस वेब पोर्टल पर संं​बंधित जानकारी दर्ज करने को लेकर जिला अनुश्रवण एवं मूल्यांकन पदाधिकारी को राज्य की ओर से प्रशिक्षण दिया गया है. निर्देश के मुताबिक सदर अस्पताल को छोड़कर नगर निगम एवं नगर परिषद क्षेत्रों में स्थित या संचालित सभी अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्रों का अर्बन कैटेगरी में मैपिंग या मानचित्रण किया जाना है.   इस कार्य में जिला शहरी स्वास्थ्य सलाहकार से आवश्यक सहयोग लेने की बात कही गयी है.
लोकेशन व मौजूद बेड सहित विस्तार से देनी है जानकारी:
अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी डॉ देवेंद्र चौधरी ने बताया कि इसके तहत जिलावार प्रखंडों के नाम के साथ स्वास्थ्य केंद्रों का पूरा पता व उसकी श्रेणी सहित स्वास्थ्य केंद्र के लोकेशन व उसमें मौजूद बेड की संख्या की भी जानकारी देनी है. इसके साथ यह भी जानकारी देनी है कि स्वास्थ्य केंद्र कितनी आबादी को कवर करता है. इसके साथ ही उसमें शहरी व स्लम बस्ती में कवर किये जाने वाली आबादी की जानकारी देनी होगी.

मायागंज अस्पताल प्रशासन ने कसी कमर, सामान्य मरीज नहीं होगे संक्रमित

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इमरजेंसी में भर्ती होने वाले मरीजों की डॉक्टर करेंगे कोरोना स्क्रीनिंग
 संदिग्ध होने पर एंटीजन टेस्ट किट से मरीज की कराई जाएगी जांच
भागलपुर-
मायागंज अस्पताल के इमरजेंसी में इलाजरत मरीज कोरोना से संक्रमित नहीं हो, इसे लेकर अस्पताल प्रशासन ने तैयारी तेज कर दी है। इमरजेंसी में भर्ती मरीज, इलाज करने वाले डॉक्टर, नर्स व कर्मचारियों में कोरोना के संक्रमण का खतरा रहता है। इसलिए इनलोगों को संक्रमण से बचाने के लिए अस्पताल प्रशासन ने संदिग्ध मरीजों की कोरोना जांच कराने का निर्णय लिया है।
इमरजेंसी को कोरोना से सुरक्षित करने के उद्देश्य से यहां पर भर्ती के लिए आने वाले मरीजों की डॉक्टर कोरोना स्क्रीनिंग करेंगे। अगर मरीज में कोरोना के लक्षण पाये गये या फिर डॉक्टर को लगा कि मरीज कोरोना पॉजिटिव हो सकता है तो उसका पहले एंटीजन टेस्ट किट से कोरोना जांच करायेंगे। तब तक उस मरीज को सामान्य मरीजों से अलग रखकर इलाज किया जाएगा। अगर मरीज कोरोना पॉजिटिव पाया गया तो उसे एमसीएच कोरोना आइसोलेशन वार्ड में भर्ती करा दिया जायेगा। अगर पॉजिटिव नहीं रहा तो इमरजेंसी में भर्ती कर इलाज शुरू किया जायेगा। प्रभारी अस्पताल अधीक्षक डॉ. कुमार गौरव ने कहा कि गुरुवार से इमरजेंसी में आने वाले मरीजों को जरूरत के अनुसार, एंटीजन जांच किट से कोरोना जांच कराने की सुविधा शुरू कर दी जायेगी। इससे इमरजेंसी में इलाज कराने वाले मरीज कोरोना से संक्रमित होने से बच जाएंगे।
झारखंड समेत 15 जिलों से आते हैं मरीज: मायागंज अस्पताल में भागलपुर और आस-पास जिलों समेत कोसी और  सीमांचल के जिलों से भी मरीज यहां पर आते हैं। साथ ही झारखंड के गोड्डा, साहेबगंज से भी बड़ी संख्या में भी मरीज यहां इलाज कराने के लिए आते हैं। पास के किसी जिले में इतनी सुविधाओं वाला सरकारी या निजी अस्पताल नहीं है। इस वजह से भी यहां पर इलाज कराने के लिए आने वाले मरीजों की भीड़ बढ़ती है। इस वजह से यहां पर अस्पताल प्रशासन को व्यवस्था को दुरस्त रखना पड़ता है, ताकि मरीजों को उत्तम सुविधाएं मिले और वे स्वस्थ हों।
अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है मायागंज अस्पताल: यहां पर मरीजों की भीड़ बढ़ने का एक यह भी कारण है कि यहां जांच और इलाज की अत्याधुनिक सुविधाएं  उपलब्ध हैं। कई आधुनिक फीचर के साथ उपकरण लगाए गए हैं। अस्पताल लेटेस्ट उपकरणों से लैस है। यहां पर लगभग हर तरह की जांच मरीजों को कम कीमत पर उपलब्ध हो जाती है। विशेषज्ञ चिकित्सकों एवं अन्य स्टाफ के जरिए तथा विभिन्न प्रकार के उपकरणों की सहायता से रोगियों का  इलाज किया जाता है। इस अस्पताल में मरीज को बचान के लिए हर संभव साजो सामान उपलब्ध है जिससे मरीजों को काफी लाभ हो रहा हैं। वहीं अस्पताल को कीटाणुरहित के लिए हर तरह की तैयारी की गई है जिससे मरीजों को कोई असुविधा नहीं होती है। मायागंज अस्पताल जैसी इतनी सुविधाओं वाला आस-पास अस्पताल नहीं है।

बच्चों को टीका दिलवाने ले जाते वक्त बरतें सावधानी

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• टीके दिलवाने में एक सप्ताह से अधिक की देरी न करें
• बच्चों को टीका पड़ने से बढ़ती है शरीर की प्रतिरोधक क्षमता
बांका-
कोरोना काल में बच्चों के टीकाकरण को लेकर परिजन असमंजस में हैं। दरअसल, एक-एक कर स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित होते जा रहे हैं। पिछले दिनों कई एएनएम और आशा कार्यकर्ता कोरोना पॉजिटिव पाई गईं। ऐसे में परिजनों का डर स्वाभाविक ही है। वहीं दुविधा यह भी है कि कोरोना काल कब खत्म होगा, इसका पता नहीं है। पहले लगा था कि कुछ दिनों में समाप्त हो जाएगा, लेकिन संक्रमण धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। सरकार को फिर से लॉकडाउन लगाना पड़ा। यानी की संकट बड़ा है। ऐसे में बच्चों को टीके पड़ने में ज्यादा देरी नहीं की जा सकती। ऐसे में जरूरी है कि टीका दिलाने जाने के दौरान कुछ सावधानियां बरती जाएं।
बांका शहरी पीएचसी के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार चौधरी कहते हैं कि बच्चों के टीकाकरण में ज्यादा देरी नहीं की जा सकती। एक सप्ताह से अधिक की देरी ठीक नहीं रहेगा। टीकाकरण का मुख्य उद्देश्य बच्चों में प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करना होता है। इसलिए बच्चों के समय से ही टीके दिलवाना चाहिए। हां, टीका दिलवाने जाते वक्त सावधानी का जरूर ख्याल रखें।
सामाजिक दूरी का रखें ख्याल:
बच्चे को टीका दिलवाने ले जाते वक्त सामाजिक दूरी का ख्याल रखें। एक दूसरे से कम-से-कम दो मीटर की दूरी बनाए रखें। अस्पताल में कोशिश करें कि लोग आसपास नहीं आ सके। इससे कोरोना के संक्रमण का खतरा कम हो जाएगा।
समय तय कर जाएं
टीकाकरण के लिए बच्चों को ले जाते वक्त पहले डॉक्टर से समय ले लें। इससे आपको वहां पर ज्यादा देर तक रुकना नहीं पड़ेगा। आपके अस्पताल जाते ही बच्चे को टीके पड़ जाएंगे। इससे आपका अधिक लोगों से मुलाकात नहीं होगी और आप पूरी तरह से सुरक्षित रहेंगे।
वरिष्ठ सदस्य को साथ नहीं ले जाएं
बच्चे को टीका दिलवाने ले जाते वक्त घर के वरिष्ठ सदस्य को साथ नहीं ले जाएं। ऐसा देखा जाता है कि लोग बच्चे के नाना-नानी, दादा-दादी को लेकर अस्पताल जाते हैं। ऐसा करने से उन्हें कोरोना के संक्रमण का ख़तरा रहता है। फिर इससे पूरे परिवार को ख़तरा हो सकता है। इसलिए ऐसा करने से बचें।
बच्चे को ढककर ले जाएं:
अस्पताल जाते वक्त कोशिश करें कि बच्चे पूरी तरह से ढका हो। अगर संभव हो तो ले जाने वाला व्यक्ति भी पूरी तरह से कवर्ड हो। बड़े लोग मास्क पहनकर जा सकते हैं, लेकिन बच्चे को मास्क नहीं पहनाएं। वह बहुत छोटे होते हैं। इसलिए उनके चेहरे को ढक दें। इससे कोरोना के संक्रमण का खतरा कम रहेगा।

लॉक डाउन का पालन अपना कर्तव्य समझ कर करें : सिविल-सर्जन

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• सोशल डिस्टेन्सिंग  ही है कोरोना संकर्मण को भगाने का सफल रास्ता
• यही समय है अपने और समाज को इस बीमारी से बचाने का
लखीसराय-
कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए राज्य को 31 जुलाई तक लॉकडाउन किया गया है. माननीय मुख्यमंत्री भी पूरे राज्य से अपील भी कर चुके है कि इस बीमारी को भगाने का सबसे कारगर रास्ता सामाजिक दूरी है बल्कि यूँ कहे की समाज मे ,बाजार मे या फिर किसी चौक – चौराहे पर कम निकले और अगर जरूरत पड़ने पर निकले भी तो लोगों से दूरी बना कर रहे और हमेशा मास्क पहनकर ही निकलें। फिलाहल की परिस्थियों के मुताबिक कोरोना से बचने के लिए इन्हीं उपायों को करने की जरूरत है.
सोशल डिसटेंसिंग ही बचाव का रास्ता:
जिले में भी विगत कुछ दिनों से कोरोना के मामले में वृद्धि हुयी है. इसके मद्देनजर जिला एवं स्वास्थ्य प्रशासन मुस्तैदी से कार्य भी कर रहा है. जिला सिविल सर्जन डॉ आत्मानन्द राय ने ने बताया  कोविड-19 का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बहुत तेजी से फैलता है. इस बीमारी से निजात पाने एवं संक्रमण पर रोकथाम के लिए सोशल डिसटेंसिंग महत्वपूर्ण कड़ी है। उन्होंने जिले के लोगों से अपील करते हुए कहा कि सभी लॉकडाउन का सख्ती से पालन करें. यह सिर्फ किसी एक आदमी की सुरक्षा का सवाल नहीं हैं, बल्कि जिले के सभी लोगों की सुरक्षा इससे जुडी है. उन्होंने बताया किसी एक वयक्ति की लापरवाही से उनके संपर्क में आये कई अन्य लोग भी कोरोना के चपेट में आ सकते हैं. इसलिए यह सबों के लिए जरुरी है कि लोग शत-प्रतिशत सोशल डिसटेंसिंग का अनुपालन करें. बिना किसी जरूरी कार्य के घर से निकलने में परहेज करें. जब भी घर से बाहर निकलें तो मास्क का इस्तेमाल जरुर करें. उन्होंने बताया यदि किसी में भी संक्रमण का लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या हेल्प लाइन नंबर पर संपर्क करें. किसी भी परिस्थिति में अपने लक्षणों को अनदेखा नहीं करें ताकि आपके साथ आपके परिवार के लोग संक्रमित होने से सुरक्षित रहें.
भेदभाव नहीं करें, भ्रांतियों से बचें:
कोरोना संक्रमण काल में कोई भी संक्रमित हो सकता है. इसलिए संक्रमित लोगों के प्रति अपनी सोच में बदलाव लायें. कोरोना से लड़ रहे व्यक्ति, स्वास्थ्य कर्मी या पुलिस किसी से भी मानसिक दूरी न बनायें. उनके प्रति नकारत्मक सोच नहीं रखें. कोरोना को हरा कर जंग जीतने वाले लोगों से किसी भी तरह से घबराने की कोई जरूरत नहीं है. संक्रमण ठीक होने के बाद उनके संपर्क में आने पर आप संक्रमित नहीं हो सकते. वैसे ही कोरोना योद्धाओं का सम्मान करें जो अपनी जान की परवाह किये लोगों की सेवा करने में दिन-रात जुटे हैं. साथ ही सोशल मीडिया पर कोरोना को लेकर फैलाई जा रही अफवाहों से दूरी बनाकर रखें. ऐसी जानकारियों को सच नहीं माने जिसकी पुष्टि किसी विश्वसनीय स्रोत से नहीं की गयी हो

सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को निशांत करते है जागरूक

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स्वास्थ्य सेवा के प्रति करते हैं जागरूक, देते हैं हर तरह की जानकारी
लखीसराय ,16 जुलाई: कहते हैं, ‘‘जहाँ चाह, वहाँ राह होती है’’ इस कहवात को पूरी तरह से चरितार्थ कर रहे हैं लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा पीएचसी के बीएचएम निशांत राज. निशांत राज तकनीक का इस्तेमाल कर कोविड-19 के प्रति लोगों को सतर्क और जागरूक करने की मुहिम चला रहे हैं. साथ ही वह इस कोरोना आपदा के बीच दूसरी बाधित स्वास्थ्य सेवाओं के सुचारू रूप से चलने की जानकारी देने के लिए फेसबुक जैसे सोशल मीडिया का भी इस्तेमाल कर रहे हैं. वैसे तो वह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में हमेशा अपनी सेवा देने को तैयार  रहते हैं, लेकिन उन्हें खास बनाता है सोशल मीडिया का इस्तेमाल. फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के माध्यम से वे ना सिर्फ कोरोना के बचाव के प्रति जागरूकता ला रहे हैं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी भी लोगों तक पहुंचा रहे हैं. साथ ही जिला स्वास्थ्य समिति सहित राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा जारी निर्देशों को भी फेसबुक के माध्यम से लोगों को अवगत कराने में भी वह महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं. सोशल मीडिया के माध्यम से निशांत का बड़ी संख्या में लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित सवालों का जबाब देना उन्हें अन्य स्वास्थ्यकर्मियों से अलग करता है एवं तकनीक के सार्थक इस्तेमाल का एक मजबूत संदेश समुदाय तक पहुंचाता है.
फेसबुक पेज पर गतिविधियों की जानकारी करते हैं अपडेट:
निशांत बताते है जिले में सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च के माध्यम से आयोजित कार्यशाला में उन्हें सोशल मीडिया के इस्तेमाल की ट्रेनिंग मिली थी. साथ ही प्रक्षिक्षण के दौरान उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं को आमजन तक बेहतर तरीके से पहुँचाने की जानकारी भी मिली थी. उन्होंने बताया इसके बाद उन्हें यह लगा कि सोशल मीडिया के इस माध्यम का इस्तेमाल कर वह लोगों को जिला व राज्य स्वास्थ्य समिति के हर महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की सूचना लोगों तक पहुंचा सकेंगे और जिला में स्वास्थ्य गतिविधियों व सेवाओं की जानकारी भी दे सकेंगे. इसके बाद उन्होंने कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर सूर्यगढ़ा के नाम से फ़ेसबूक पेज बनाया है और स्वास्थ्य सेवाओं संबंधी जागरूकता लाने के साथ प्रत्येक गतिविधि की जानकारी अपडेट करते हैं. इससे लोगों को जिले में आयोजित होने वाले स्वास्थ्य कार्यक्रमों के साथ अन्य स्वास्थ्य गतिविधियों की भी जानकारी मिलती है.
सोशल मीडिया के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ी जागरूकता:
निशांत बताते हैं कि प्रतिदिन फेसबुक पेज को अपडेट करने के लिए समय निकालते हैं. सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों में स्वास्थ्य सेवा के प्रति जागरूकता बढ़ी है. आशा व एएनएम के कार्यों की जानकारी भी सोशल मीडिया के माध्यम से दी जाती है, जिससे लोगों में उनके बारे में जानकारी होती है. इससे आशा व एएनएम को भी काफी प्रोत्साहन मिला है. स्वास्थ्य सेवा की सहयोगी संस्थाओं के लोग भी फेसबुक से जुड़े हैं. फेसबुक पर आशा को जोड़ा गया है और उनके बेहतरीन कार्यों का फोटो भी अपलोड किया जाता है ताकि वे भी अपने कार्यों की जानकारी ले सकें और उनके कार्यों को लोग प्रोत्साहित करें. सभी आशा व एएनएम को फेसबुक पेज का लिंक भेजा जाता है. कई पत्रकार भी इस पेज से जुड़ कर स्वास्थ्य सेवाओं के कार्यों की जानकारी लेते हैं और इससे स्वास्थ सेवाओं की छवि में सुधार हो रही है. प्रतिदिन इसके लिए समय निकालते हैं.
एएनएम और आशा को भी मिल रही जानकारी:
सोशल मीडिया के माध्यम से इस फेसबुक पेज पर 86 एएनएम और 75 से भी अधिक आशा जुड़ी हैं और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही हैं. उनके प्रशिक्षण व गतिविधियों को फेसबुक पेज पर अपलोड किया जाता है. सोशल मीडिया पर पोस्ट की गयी  प्रशिक्षण व गतिविधियों से संंबंधित जानकारियों का लाभ आशा व एएनएम भी उठा रही हैं