‘न्यू इंडिया’ के सपने को साकार करेगा लीडरशिप स्किल- एली

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नई दिल्ली। एक अच्छी लीडरशिप स्किल की बदौलत ही कोई सफल लीडर या कारोबारी बन सकता है। आम इंसान को अच्छा लीडर बनने के लिए सबसे पहले अपनी सोच को एक लीडर के दिमाग की तरह बनाना होता है। इसके साथ ही अपने तौरतरीको में भी बदलाव लाना पड़ता है। एसोसिएशन ऑफ लीडर्स एण्ड इंडस्ट्रीज (एली) के निदेशक नीरज कुमार मिश्रा लीडरशिप स्किल पर कहते हैं कि युवाओं और खासकर छात्रों में लीडरशिप स्किल को विकसित करने की जरूरत है। आज के युवा महज पारंपरिक शिक्षा पद्धति के आधार पर आपने भविष्य को तब तक बेहतर नहीं कर सकते हैं जबतक कि उनके अंदर लीडरशिप स्किल बेहतर हो। उदारीकरण के इस दौर में लीडरशिप स्किल का महत्व व्यवस्थाकारोबारगर्वनेंशराजनीति और विज्ञान हर क्षेत्र में बढ़ चढ़कर है। आज बड़े से बड़े कारपोरेट कंपनियां भी लीडरशिप स्किल के महत्व को देखकर ही युवाओं को उच्च से उच्च पदों पर चयनित करती है। लीडरशिप स्किल में इम्प्रूवमेंट लाने के लिए सबसे पहला पहलु है अपने अंदर आत्मविश्वास लाना। सेल्फ कॉन्फिडेंस जब तक हमारे अंदर नहीं आएगीतब तक हम एक अच्छा लीडर नहीं बन सकते हैं। सेल्फ कॉन्फिडेंस के साथ ही हमें अपने काम और दायित्व के प्रति ईमानदार होना भी बहुत जरूरी है। अगर एक बेहतर लीडर और सफल कारोबारी बनने के लिए ईमानदारी को ही अपना हथियार बनाए। ईमानदार होने के साथ ही आपके अंदर एक समुह को प्रतिनिध्त्वि करने की क्षमता और मोटिवेशन का होना बहुत ही आवश्यक है। इसके लिए हमें हमेशा ही अच्छे और महान लोगों की विचार और कार्यशैली को पढ़ना चाहिए। स्वामी विवेकानंदस्टीव जॉब्समहात्मा गांधी और दुनिया के तमाम बड़े लीडरों के बारे में हमें ज्यादा से ज्यादा पढ़ना चाहिए। वहीं एक बेहतर लीडर बनने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण गुण है वह है हमारी कम्युनिकेशन स्किल। बेहतर कम्युनिकेशन स्किल के बिना तो कोई बड़ा लीडर या कामयाब आदमी बन ही नहीं सकता। भारत ही नहीं विश्व भर में लीडरशिप स्किल को आज ज्यादा से ज्यादा तरजीह दी जा रही है और इसके आधार पर युवा ना सिर्फ आगे बढ़ रहे हैं बल्कि अपनी इस काबिलियत के आधार पर अपने आप को स्थापित भी कर रहे हैं।

एसोसिएशन ऑफ लीडर्स एण्ड इंडस्ट्रीज देश भर में लीडरशिप की सोच के साथ एक अग्रणी थिंक टैंक के रूप में जानी जाती है और उसका यह प्रयास है कि आने वाले समय में ज्यादा से ज्यादा युवाओं में लीडरशिप स्किल डेवलप करवाने में सहायक बने।

 

आदिवासियों की मनोवृति से ना हो खिलवाड़’

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नईदिल्ली

– गांवों और आदिवासियों की स्थिति पर हुआ गंभीर मंथन
– ककसाड़ पत्रिका के प्रकाशन के तीन वर्ष पूर्ण
– पत्रिका की वेबसाइट का किया गया लोकार्पण

भाद्र मास का अंतिम दिन… बारिश की बूंदा-बांदी, फिर भी उमस. मौसम के मिजाज जैसा ही ककसाड़ के दिल्ली स्थित दफ्तर में गर्मागर्म बहस। दरअसल ककसाड़ पत्रिका के तीन वर्ष पूरे होने पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया था। परिचर्चा विषय था- ‘लेखन में गांव व आदिवासी’.
वैश्विक मामलों की अंग्रेजी पत्रिका ‘कल्ट करंट’ के संपादक श्रीराजेश ने सभी अतिथियों का स्वागत किया तथा ककसाड़ पत्रिका के उद्देश्यों को रेखांकित करते हुए वर्तमान दौर में मीडिया में गांव व आदिवासियों के सरोकारों से जुड़ी खबरों के नदारद होने पर चिंता व्यक्त करते हुए पत्रकारों से इनके सरोकारों को अपने लेखन का विषय बनाने का आग्रह किया, तो वहीं ककसाड़ के संपादक डॉ राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि वर्तमान दौर में विकास की बात करते हुए गांवों की मौलिकता और उसकी नैसर्गिकता को खत्म किया जा रहा है, आदिवासियों को अपने स्थान से विस्थापित किया जा रहा है। वास्तव में विकास सिर्फ जीडीपी के आंकड़ों तक सिमटने के बजाय गांवों व जंगलों तक पहुंचना चाहिए और कल्याणकारी राज व्यवस्था की सबसे पहली प्राथमिकता यहीं होती है। डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि गांव कस्बे में तब्दिल हो रहे हैं, और इसे विकास मान लिया जाता है। जबकि गांवों को कस्बा बनाने की बजाय आदर्श गांव बनाने की दिशा में प्रयास किये जाने चाहिए। आदिवासियों की स्थिति तो और भयावह हो उठी है। उन्हें साजिशन जंगलों से बाहर निकाला जा रहा है। आदिवासियों के लिए जंगल केवल पेड़-पौधे-झाड़ियां नहीं हैं, यह उनकी अस्मिता, संस्कृति, संस्कार और सरोकार हैं। जंगल के बगैर आदिवासी जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।

वरिष्ठ पत्रकार शैलेंद्र मौर्या ने तीन वर्ष पूरे होने पर ककसाड़ पत्रिका के संपादक को बधाई देते हुए कहा कि आज ऐसे पत्रिका की जरूरत है जो गांव घर की बात कर सके। आदिवासियों की बात को समाज के सभी तबकों तक पहुंचाये जाने की जरूरत है। जिसे पूरा करने में ककसाड़ पत्रिका कोई कसर नहीं छोड़ी है। जिस प्रकार से गांव घर की बात इस पत्रिका में उठती रही है जिससे आज समाज के अन्य वर्गों को भी काफी कुछ ऐसी जानकारी मिली है जिसके बारे में वह सोच भी नहीं सकते हैं। हमारे गांव घर और आदिवासियों के पास संस्कृति के कई मूल धरोहर आज भी जीवित हैं जिसे पत्रिका ने आगे लाया है। ककसाड़ पत्रिका डॉ. राजाराम त्रिपाठी के मार्गदर्शन में निश्चिततौर पर नित्य नए कीर्तिमान स्थापित करेगा ऐसी हमारी शुभकामना है। डॉ.राजाराम त्रिपाठी की खास खूबी है कि खूद जमीनी पत्रिकारिता के पक्षधर हैं जिसका जीता जागता स्वरूप काकसाड़ में साफ देखने को मिलता है। आने वाले दिनों में काकसाड़ पत्रिका जगत में मील का पत्थर साबित होगा।

आदिवासी मामलों पर लगातार रचनात्मक कर्म से जुड़े तथा बस्तर के आदिवासियों पर कई पुस्तकें लिख चुके राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि हमारा कथित सभ्य समाज अपने हितों के लिए रहन-सहन के हिसाब से आदिवासियों का भी वर्गीकरण कर दिया और उनकी एकता को खंडित करने का काम किया है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की मनोवृति से लगातार खिलवाड़ किया जा रहा है। इसकी परिणति बड़े खौफनाक ढंग से सामने आने वाली है। उन्होंने कहा कि बस्तर के आदिवासियों पर लिखा तो बहुत गया है, लेकिन वह टूकड़े- टूकड़े में है। आदिवासियों की जो समस्याएं हैं, उसे दिल्ली जिस नजर से देखती है, वह हकीकत से कोसो दूर है। लेकिन इनकी समस्याओं को समझने तक की फूर्सत राजसत्ताओं की नहीं है। यहां नक्सली उग्रवाद बढ़ा है लेकिन इससे आदिवासी समुदाय किस तरह पिस रहा है, इसका आकलन दिल्ली नहीं कर पा रही है।
वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्रनाथ श्रीवास्तव ने कहा कि गांवों की समस्याओं का बारिक अध्ययन किया जाता है तो देखा जाता है कि देश के हर हिस्से के गांवों की समस्याएं एक जैसी है। इसी तरह गांवों में रहने वालें मुसहर या ऐसी पिछड़ी जातियों को भी आदिवासियों के रूप में स्वीकार कर आदिवासी शब्द की परिभाषा को व्यापक बनाया जा सकता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि लोकतंत्र में जनशक्ति सबसे बड़ी ताकत होती है और इससे ही बदलाव आता है।
वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि लेखन में जब गांवों, आदिवासियों और जंगल का वर्णन आता है तो वहां के रहन सहन, कला संस्कृति, पर्व त्योहार की चर्चा आती है और ये चर्चाएं संबंधित समय और संबंधित वर्ग के बारे में जानकारी देने वाले दस्तावेज होते हैं। अगर हमें अपने पर्यावरण को बचाना है तो सबसे पहले गांव औऱ जंगलों का संरक्षण करना आवश्यक होता है। विकास के नाम पर जंगलों की कटाई लंबे समय से चल रहा है, विरोध में आवाजें भी उठती रही है, लेकिन जंगल का रकबा लगातार कम होते जा रहा है। हालात ये है कि बाजार विचार बना रहे हैं औऱ विचार बाजार बना रहे हैं। ये स्थिति ठीक नहीं है।
वरिष्ठ साहित्यकार व आलोचक डॉ ओम निश्चल ने कहा कि भले कि विकास घोड़े पर चढ़ कर आ रहा हो, लेकिन गांवों की मौलिकता बरकरार रहनी चाहिए। कई पुराने लेखकों ने अपने लेखन में जिस गांव को रेखांकित है, आज वैसे गांव कही नहीं है। हाल में बालेंदु द्विवेदी की मदारीपुर जक्शन में जिस प्रकार गांव के माहौल की चर्चा की गई है वह बदलते गांव को परिभाषित करता है। उन्होंने गांव और गांव की वैशिष्ठता पर केंद्रित अपनी कविता का पाठ किया, जिसे श्रोताओं ने काफी पसंद किया। चित्रकार व गजलकार विज्ञान व्रत और कवि विपीन जैन ने भी अपनी कविता से विषय वस्तु को रेखांकित किया। ककसाड़ पत्रिका की प्रबंधक व परामर्श संपादक कुसुमलता सिंह ने कहा कि ककसाड़ जनजातीय सरोकारों के साथ ग्रामीण भारत के सरोकारों से संबंधित रचनाओं के निरंतर प्रकाशन के प्रति प्रतिबद्ध है। कार्यक्रम में पत्रिका की वेबसाइट www.kaksaad.in का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन पत्रिका की वरिष्ठ संपादक पुनम श्रीवास्तव कुदैसिया ने किया तथा संयोजन में राजेश कुमार, संतोष कुमार, पीयुष की महती भूमिका थी।

सीईजीआर एकेडमीक लीडर वर्कशॉप 6 अक्टूबर को

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नईदिल्ली-

सेंटर फॉर एजुकेशन ग्रोथ एंड रिसर्च (सीईजीआर) का 06 अक्टूबर को एक दिवसीय वर्कशॉप न्यू देहली इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में आयोजन किया गया है। इस खास वर्कशॉप में टॉप एकेडमेशियन प्रो.एपी मित्तल मेम्बर सेक्रेटरी एआईसीटीई, प्रो. दिलीप मालखेडे, एडवाइजर एआईसीटीई, प्रो. राजीव कुमार एडवाइजर (प्लानिंग एंड एकेडमिक), एआईसीटीई, डॉ. रमेश उन्नीकृष्णन, डायरेक्टर, एआईसीटीई, कुंवर शेखर विजेंद्र, चांसलर, शोभित यूनिवर्सिटी, प्रो. डीएस चौहान, वाइस चांसलर जीएलए यूनिवर्सिटी एंड मेंटर सीईजीआर, प्रो. केके अग्रवाल, मेंटर सीईजीआर एंड भूतपूर्व वाइस चासंलर, जीजीएसआईपी यूनिवर्सिटी, प्रो. वीएम बंसल, चेयरमैन, एनडीआईएम, प्रो. एनके सिन्हा, प्रेसिडेंट सीईजीआर व वाइस चांसलर, हिमालयन ग्रेवाल यूनिवर्सिटी मुख्य वक्ता होंगे।

इस खास वर्कशॉप में फेकल्टी के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम का आयोजन किया गया है। जो पूरे दिन चलेगा। गौरतलब है कि सीईजीआर में देश के टॉप एकेडमीशियन सहित 5000 एकेडमिशियन जुड़े हुए हैं। सीईजीआर लगातार ऐसे वर्कशॉप का आयोजन करती रहती है जिससे की देश की शिक्षा जगत में आमूलचूल परिवर्तन हो सके।

फेस्टीव सीजन में होगी बेहतर डिमांड- डॉ कुलनीत सुरी, नेशनल सेक्रेटरी, आईसीसीआई

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नईदिल्ली-

इंटीग्रेटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (आईसीसीआई) के नेशनल सेक्रेटरी डॉ कुलनीत सुरी ने कहा है कि इस बार के फेस्टीव सीजन में काफी अच्छे डिमांड होंगे। इस कारण से लगभग सभी नामी गिरामी ब्रांड्स के दाम आकर्षक स्तर पर होंगे। खास बात यह है कि यह डिमांड पिछले साल से बेहतर रहने की उम्मीद है। डॉ कुलनीत सुरी ने कहा कि इस फेस्टीव सीजन में नोटबंदी और जीएसटी का कोई खास असर नहीं दिखेगा। साफ तौर पर दिख रहा है कि बाजार में जोरदार बिक्री होगी। कंपनियों ने पिछले साल के बाजार को ध्यान में रखते हुए कई तरह के ऑफर की सुविधा देने का वादा किया है। जिस प्रकार सरकार लगातार बाजार को उदार बनाने और आगे बढ़ाने के लिए कई नीतियां लाई हैं इससे बाजार में उत्साह आया है। ग्राहकों के लिए भी यह फेस्टीव सीजन काफी अच्छा रहने वाला है खास तौर पर इंडस्ट्री नोटबंदी के असर से पूरी तरह और जीएसटी के असर से काफी हद तक उबर चुकी है। जिसके कारण ग्राहकों को फेस्टीव सीजन में डिस्काउंट ज्यादा मिलने की संभावना है।

आईसीसीआई के नेशनल सेक्रेटरी ने कहा कि बाजार को देखने पर साफ पता चल रहा है कि एफएमसीजी की बिक्री में 10-12 फीसदी की ग्रोथ होगी। जिस प्रकार से ग्रामीण बाजार में तेजी आई है यह सुखद है। खास तौर पर यहां भी दस फीसदी तक ग्रोथ है।

 

किसान सेना करेगी विजय का मार्ग प्रशस्त : वीरेंद्र सिंह मस्त

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नई दिल्ली। भारत किसान प्रधान देश है। अब तक जिन लोगों ने किसानों का भला नहीं किया है, उनको मुंह की खानी पड़ी है। भाजपा लगातार देश के अन्नदाताओं की बेहतरी के लिए प्रयत्नशील है। सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर कई कार्य किए गए हैं। भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा के राष्ट्ीय अध्यक्ष व सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त ने कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों के समर्थन में पूरे देश में हर बूथ पर किसान सेना खड़ी रहेगी। किसान मोर्चा अपने युवा किसान समिति और महिला मोर्चा के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर विशाल किसान सेना का निर्माण करेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा अन्य पार्टियों की तरह सियासी नौटंकी नहीं करती है। किसानों के लिए घड़ियाली आंसू नहीं बहाती है। केंद्र सरकार और हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों के लिए जो कार्य किया है, वह अब तक के किसी सरकार ने नहीं किया है। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम भी अपने अन्नदाताओं को पहले से अधिक संबल बनाएं।
सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त भाजपा किसान मेर्चा के पदाधिकारियों के बैठक को संबोधित कर रहे थे। इस बैठक में तमाम प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश महामंत्री उपस्थित थे। पदाधिकारियों को किसान मोर्चा के मार्गदर्शक हृदयनाथ सिंह, राष्ट्ीय महामंत्री शुणाकर राव ने भी संबोधित किया। युवा किसान समिति के राष्ट्ीय संयोजक शक्ति सिंह ने व्यवस्था संचालन में महत्ती भूमिका निभाई। अपने अध्यक्षीय संबोधन ने सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त ने कहा कि मोर्चा का हर कार्यकर्ता देश के हर गांव में है। हम अपने संगठन का और भी विस्तार कर रहे हैं। कई राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीख का जल्द एलान हो जाएगा। अगले साल लोकसभा चुनाव होना है। इसलिए हमारी रणनीति है कि हम हर बूथ पर कम से कम एक किसान सेना खड़ा करेंगे। अन्नदाता के हाथों में जब बागडोर होगी, तो वो बेहतर विकल्प लोगों ेको सुझाएंगे।

दमनकारी नीति अपना रही है तमिलनाडु पुलिस : रंजीत कुमार

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पटना। स्वराज इंडिया पार्टी के नेता योगेंद्र यादव को शनिवार को तमिलनाडु पुलिस ने हिरासत में ले लिया। बता दें कि राज्य के तिरुवन्नमलाई में वो 8-लेन सलेम चेन्नई एक्सप्रेसवे के विरोध में किसानों के साथ प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे थे । उन्हें विरोध करने वाले अन्य साथियों के साथ पास के ही एक मैरिज हाल में रखा गया है। योगेंद्र यादव ने पुलिस पर मारपीट का आरोप लगाया है। उन्होंने एक विडियो जारी करके कहा है कि यहाँ किसानों की जमीन बिना उसकी मर्जी के अधिग्रहण किया जा रहा है। मैं उन किसानों के बुलावे पर यहाँ आया हूँ। उन्होंने आगे कहा कि हम यहाँ जांच करने आए हैं कि आखिर किसानों की समस्या क्या है? उनका मत क्या हैं? उनके अनुसार वो सुबह एक गॉव में कुछ किसानों के साथ मीटिंग करने के बाद एक दुसरे गॉव में किसानों से मिलने जा रहे थे उसी समय उन्हें पुलिस ने कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए रोक लिया और उन्हें और उनके साथी को घसीटते हुए हिरासत मे ले लिया।
इस घटना पर स्वराज इण्डिया पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रंजित कुमार ने कड़ी प्रतिक्रिया दिया है। उन्होंने कहा कि पुलिस की यह करतूत स्वस्थ्य लोकतंत्र का गला घोटने का काम किया है। क्या किसानों कि समस्या सुनना और उनसे मिलना ,समर्थन करना ,मदद करना गलत है ? लगता है सरकार की नज़र में यह एक गुनाह का रूप लेता जा रहा है, जिसका लोकतंत्र में कहीं जगह नहीं है। लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से योगेन्द्र यादव जी तथ्यों को जानने का प्रयास कर रहे थे। तमिलनाडु सरकार और पुलिस के द्वरा किसानों के आवाज को दबाने का प्रयास किया गया है। उनकी इस करतूत जितनी भी निंदा किया जाए कम है। उन्होंने आगे कहा सरकार चाहे कितनी भी दमन क्यों न करें लेकिन स्वराज इंडिया किसानों के हक़ के लिए संघर्ष करती रहेगी।
बता दें कि सुबह ही योगेंद्र यादव ने कलेक्टर कंडासामी से फोन पर भूमि अधिग्रहण और बाकी शिकायतों के बारे में बात की। कलेक्टर साहब ने मामले में पुलिस की किसी भी दखलंदाज़ी से इनकार किया था। लेकिन कुछ ही मिनटों में तमिल नाडु पुलिस ने योगेंद्र यादव को हिरासत में ले लिया। योगेंद्र यादव तमिल नाडु में चल रहे भूमि अधिग्रहण को लेकर एक  फैक्ट फाइंडिंग टीम का नेतृत्व करेंगे और उन गाँव वालों के साथ उनके दुःख दर्द को साझा करेंगे। जानकारी मिली है कि पुलिस ने जबरदस्ती सबों का फोन छीना और हाथापाई भी की। फिलहाल पुलिस उन्हें किसी अज्ञात जगह ले गयी है। तमिल नाडु में इस तरह से पुलिस राज का होना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। ज्ञात हो कि स्वराज इंडिया पार्टी किसानों के हित में लगातार संघर्ष कर रही है। देश में कहीं भी अन्नदाता किसानों की जमीन अवैध ढंग से हड़पने नहीं दी जाएगी। पार्टी ने देश के किसानों और नौजवानों के लिए अंतिम दम तक संघर्ष करने का भरोसा दिलाया है।

संगठन को मजबूत बनाने का निर्णय

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लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्क्षय एवं केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने लोजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं सचिव अजय कुमार को आंध्र प्रदेश का इंचार्ज मनोनीत किया है पेशे से वरिष्ठ पत्रकार एवं अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया को तेलेंगाना का भी अतिरिक्त प्रभार दिया गया है कुमार इन दो प्रदेशों में बतौर सामाजिक सेवक और पत्रकार लम्बे समय तक कार्य करते रहे हैं इस अवसर पर पासवान और सीनियर लीडरशिप का आभार व्यक्त करते हुए कुमार ने कहा की वो जल्द ही दोनों प्रदेशों का दौरा कर पार्टी की स्थिति का जायज़ा लेगें और आने वाले चुनाव के लिए पार्टी को तैयार करने का काम करेगें वर्तमान में पार्टी केंद्र के अलावा बिहार एवं मणिपुर में सरकार में शामिल है

इंदिरा की गलती सुधारने की जरूरत

इंदिरा की गलती सुधारने की जरूरत

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एक देश-एक चुनाव

रास बिहारी

वरिष्ठ पत्रकार
पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय पत्रकार संघ

पिछले लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, सिक्किम, ओडिशा, और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभाओं के चुनाव हुए। लोकसभा चुनाव के कुछ महीने बाद हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव हुए। 2015 में झारखंड, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और बिहार की विधानसभाओं के चुनाव हुए। 2016 में पश्चिम बंगाल, केरल, पुद्दूचेरी, तमिलनाडु की विधानसभाओं के चुनाव हुए। 2017 में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मणिपुर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव हुए। 2018 में गुजरात, त्रिपुरा,नगालैंड, मेघालय और कर्नाटक की विधानसभाओं के चुनाव हुए। त्रिपुरा की 59 विधानसभा सीटों के लिए 18 फरवरी को चुनाव हुआ था। मेघालय में 27 फरवरी और नागालैंड में 27 फरवरी को चुनाव संपन्न कराए गए थे। इसके बाद अगला विधानसभा चुनाव कर्नाटक में 12 मई को हुआ। यानी हर साल पांच-छह विधानसभाओं के चुनाव होते रहे। इनके साथ ही हर राज्य में अलग-अलग समय पर स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव भी हुए। इस वर्ष के आखिर में मिजोरम, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होंगे हैं। 40 सीटों वाली मिजोरम में अक्टूबर-नवंबर के महीने में चुनाव हो सकते हैं। इसके बाद राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में चुनाव होने हैं।  राजस्थान की 200 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा का कब्जा है इन तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है। छत्तीसगढ़ विधानसभा का कार्यकाल जनवरी 2019 में खत्म हो रहा है। 200 सीटों वाली राजस्थान विधानसभा में कब्जा बरकरार रखने के लिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जनता के बीच घूम रही हैं। इसी तरह 230 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव से पहले जनता का आशीर्वाद चौथी बार पाने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शहर और गांवों में जा रहे हैं। 90 सदस्यीय विधानसभा में चौथी बार जीत का परचम फहराने के लिए मुख्यमंत्री रमन सिंह को कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। इन राज्यों में विधानसभाओं के गठन के साथ ही देश में आमचुनाव की तैयारियां शुरु हो जाएंगी। लोकसभा चुनाव के समय ही आंध्र प्रदेश, सिक्किम, ओडिसा और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभाओं के चुनाव होंगे।

लोकसभा चुनाव के बाद सितंबर-अक्टूबर माह में हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हैं। इसके बाद दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में 2020 में विधानसभा चुनाव होने हैं। दिल्ली की 70 और जम्मू-कश्मीर की 87 सीटों के लिए चुनाव जनवरी-फरवरी,2020 में कराए जाएंगे। इस तरह देश में लगातार चुनाव होते रहे हैं और होते रहेंगे। बार-बार होने वाले चुनावों के मद्देनजर आचार संहिता के लागू होने के कारण विकास कार्यों में रुकावट आने, सरकारी खर्च में बढ़ोतरी और राजनीतिक दलों का ज्यादातर समय चुनावी कार्यों मे लगने के कारण पिछले लंबे समय से देश में चुनाव सुधार की जरूरत बताई जा रही है। देश में एक साथ चुनाव को लेकर जारी बहस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत बताकर आगे बढ़ा दिया है। ‘मन की बात’ कार्यक्रम में वाजपेयी सरकार में हुए बुनियादी सुधारों का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आजकल देश में एक साथ केंद्र और राज्यों के चुनाव कराने पर चर्चा हो रही है। इस विषय पर सरकार और विपक्ष के लोग अपनी-अपनी बातें रख रहे हैं। यह अच्छी बात है और लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत भी है। उन्होंने आगे कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं और चर्चा जारी है। प्रधानमंत्री ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘मजबूत लोकतंत्र के लिए स्वस्थ परंपरा का विकास, लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए लगातार प्रयास, खुले विचारों के साथ चर्चा को प्रोत्साहन अटलजी को उपयुक्त श्रद्धांजलि होगी। इससे पहले भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने विधि आयोग के अध्यक्ष को पत्र भेजकर एक साथ चुनाव कराने का सुझाव दिया था। उनकाह कहना है कि देश में लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से चुनावों पर होने वाले बेतहाशा खर्च पर लगाम कसने और संघीय ढांचे को मजबूत करने में मदद मिलेगी। विधि आयोग को अपने सुझावों के साथ लिखे पत्र में शाह ने कहा कि एक साथ चुनाव कराना केवल परिकल्पना नहीं है, बल्कि एक सिद्धांत हैं जिसे लागू किया जा सकता है। आयोग को लिखे लिखे आठ पृष्ठों के पत्र में शाह ने कहा कि एक साथ चुनाव कराने का विरोध करना राजनीति से प्रेरित लगता है। शाह ने कहा है कि इससे चुनाव पर सरकारी खर्च में कमी आएगी और आचार सहिंता से विकास कार्य रुक जाने से प्रगति में होने वाली बाधा को भी दूर किया जा सकेगा। शाह ने उदाहरण देते हुए कहा कि महाराष्ट्र में संसदीय विधानसभा, स्थानीय निकाय के लगातार चुनाव होने से राज्य में 365 दिनों में से 307 दिन आचार सहिंता लागू रही। शाह ने विपक्षी दलों के इस डर को भी सही नहीं बताया कि एक साथ चुनाव कराने से एक ही पार्टी जीतती है। 1980 में कर्नाटक में जनता ने लोकसभा में कांग्रेस व विधानसभा में जद (एस) को चुना था।

 

लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर देश में पहली बार सुझाव नहीं मिले हैं। पहले भी कई मौकों पर एक साथ चुनाव कराने की चर्चा हुई है। देश के पहले आमचुनाव 1952 से लेकर चौथे आमचुनाव 1967 तक विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते थे। चौथी लोकसभा के पूरे कार्यकाल के तय समय से पहले भंग होने के साथ ही यह एक साथ चुनाव की परम्परा समाप्त हो गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी के कार्यकाल में एक साथ चुनाव की परम्परा समाप्त हुई। चौथे आम चुनाव (1967) के बाद पहली बार राज्यों में संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनी। 1967 में पहली बार कांग्रेस को लोकसभा में क़रीब 60 सीटें खोनी पड़ी।  कांग्रेस को 283 सीटों पर जीत हासिल हुई। 1952 में पार्टी ने 74 फीसदी सीटें जीती थीं. 1957 में यह आंकड़ा 75, 1962 में 72 और 1967 में 54 फीसदी हो गया. उसका वोट प्रतिशत गिरकर महज़ 40 फीसदी ही रह गया था। इसके साथ ही बिहार, केरल, उड़ीसा, मद्रास, पंजाब एवं पश्‍चिम बंगाल में ग़ैर-कांग्रेस सरकारें बनीं। इंदिरा गांधी को 13 मार्च को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में बढ़ते असंतोष के मद्देनजर मोरारजी देसाई को भारत का उप-प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री नियुक्त किया। 1967 से कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी दलों की ताकत बढ़ी।  क्षेत्रीय राजनैतिक दलों का अपने राज्यों में ताकत बनकर उभरे। इंदिरा गांधी ने केरल की कम्युनिस्ट सरकार को  जवाहरलाल नेहरू के शासन में ही असंवैधानिक ठहराकर वहां राष्ट्रपति शासन लगवा दिया था। केरल में कांग्रेस को करारी हार मिली। कांग्रेस के सबसे बड़े गढ़ तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने 234 विधानसभा सीटों में से 138 जीतकर मैदान मार लिया। वहां तो कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मद्रास के भूतपूर्व मुख्यमंत्री के कामराज भी हार गए थे। पश्चिम बंगाल, ओडिसा और गुजरात भी कांग्रेस के हाथ से निकल गए। उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़कर विपक्षी दलों के साथ सरकार बना ली।

नर्मदा बचेगी तो संस्कृति बचेगी

एक साथ चुनाव का विरोध करने में कांग्रेस सबसे आगे हैं। देश में एक साथ चुनाव का सिलसिला खत्म करने का दोष भी कांग्रेस का ही है। 1952 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव लगातार साथ होते रहे। इस दौरान केरल तथा उड़ीसा में 1960 तथा 1961 में मध्यावधि चुनाव हुए थे। 1968 से विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव अलग-अलग होने का सिलसिला शुरु हुआ। 1967 के चौथे आम चुनाव में कांग्रेस के ग्राफ गिरावट शुरु हुई। कांग्रेस में बिखराव भी हुआ। कई राज्यों में सरकारे गिरने के कारण मध्यावधि चुनाव हुए। 1969 में कांग्रेस दोफाड़ हो गई। ऐसे में इंदिरा गांधी ने 1971 में लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर डाली। उस समय आमचुनाव एक साल दूर थे। इस प्रकार पहली बार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होने का सिलसिला पूरी तरह टूट गया। इंदिरा गांधी ने 1971 में गरीबी हटाओं का नारा देकर 352 सीटों पर कांग्रेस को विजय दिलाई। भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण औद्योगिकों की हालत खराब हो गई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1975 में इंदिरा गांधी की चुनाव अवैध ठहरा दिया। उसके बाद देश में एमरजेंसी थोंप दी गई। विपक्ष के नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। इंदिरा गांधी ने ही 1972 में 18 विधानसभाओं को भंग करके चुनाव कराए। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद मोरारजी देसाई सरकार ने विधानसभाओं को भंग कर दिया। 1980 में इंदिरा गांधी ने फिर से सत्ता में लौटकर गैर कांग्रेसी सरकारों भंग कर राज्यों में मध्यावधि चुनाव कराए। अपनी सरकार बचाए रखने के लिए इंदिरा गांधी लोकसभा का कार्यकाल भी एक साल के बढ़ा दिया।

कांग्रेस ने नेताओं ने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, पी चिदंबरम,सिब्बल और सिंघवी ने विधि आयोग से कहा कि एक साथ चुनाव भारतीय संघवाद की भावना के खिलाफ है। इससे पहले अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि ‘एक राष्ट्र एक चुनाव में कोई दम नहीं है। यह सिर्फ जुमला है. इसका मकसद लोगों को बरगलाना और मूर्ख बनाना है। एक साथ चुनाव की बात सुनने में अच्छी लगती है. इस विचार के पीछे इरादा अच्छा नहीं है।यह प्रस्ताव लोकतंत्र की बुनियाद पर कुठाराघात हैं। यह जनता की इच्छा के विरुद्ध है। इसके पीछे अधिनायकवादी रवैया है। चुनाव सुधारों के लिए प्रस्ताव का समर्थन करने वालों में जदयू और अकाली दल (एनडीए), अन्नाद्रमुक, समाजवादी पार्टी और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) शामिल हैं। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, तेलुगू देशम पार्टी, द्रमुक, जेडीएस, एआईएफबी, माकपा, एआईडीयूएफ, गोवा फार्वर्ड पार्टी (भाजपा की सहयोगी) विरोध में हैं।

एक साथ चुनाव कराने का विरोध कर रहे राजनीतिक दलों के अपने सवाल हो सकते हैं। 1983 में चुनाव आयोग ने 1971 में लोकसभा चुनाव, 1972 में 18 विधानसभाओं को भंग करने, 1977 में लोकसभा चुनाव फिर विधानसभाओं के चुनाव, 1980 में लोकसभा चुनाव और गैर कांग्रेसी सरकारों को गिराने की घटनाओं के मद्देजनर एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव पेश किया था। एक साथ चुनाव करान के साथ ही कांग्रेस इलैक्ट्रानिक वोटिंग मशीन से चुनाव कराने के खिलाफ हैं।

राजनीतिक दलों के साथ बातचीत के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में गड़बड़ी संबंधी तमाम दलों की चिंताओं पर आयोग गंभीर है और आम चुनाव से पहले इसका निराकरण कर देगा। कांग्रेस सहित तमाम अन्य दलों द्वारा मतपत्र से मतदान कराने की मांग के सवाल पर रावत ने कहना है कुछ दलों का कहना है कि मतपत्र पर वापस लौटना अच्छा नहीं होगा, क्योंकि हम नहीं चाहते हैं कि बूथ कैप्चरिंग का दौर वापस आए। हालांकि ईवीएम गड़बडियों की शिकायतों पर चुनाव आयोग ने ध्यान देने की बात कही है। चुनाव आयोग के साथ बैठक में सभी सात राष्ट्रीय और 51 राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दलों के 41 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कांग्रेस, एसपी, बीएसपी, तृणमूल कांग्रेस और आप सहित तमाम विपक्षी दलों ने मतपत्र से चुनाव कराने का सुझाव दिया। 1999 में विधि आयोग और 2015 को संसदीय समिति ने एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश की है। उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अगस्त 2003 में भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल की बैठक में दोनों चुनाव साथ-साथ कराने का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने कहा था इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों से विचार-विमर्थ करने के बाद ही इस पर फ़ैसला किया जाएगा। उस समय तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह ने इस प्रस्ताव को सिरे से ख़ारिज कर दिया था। इसके बाद आडवाणी लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे। 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले भी उन्होंने यह सुझाव रखा था।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने का समर्थन किया था। मुखर्जी ने एक कार्यक्रम ने कहा था कि बार-बार होने वाले चुनावों से प्रशासनिक एवं वित्तीय संसाधनों पर अनावश्यक बोझ पड़ता है और इस बारे में सभी पक्षों को विचार करना चाहिए। चुनावों के दौरान प्रशासनिक एवं विकास के कार्य बुरी तरह प्रभावित होते हैं, क्योंकि इस दौरान विकास की कोई नई परियोजनाएं शुरू नहीं की जा सकती। राज्यों में विधानसभा चुनावों के दौरान केंद्र से जुड़ी परियोजनाओं पर असर नहीं पड़ना चाहिए। इसके लिए चुनाव आयोग, राज्य तथा केंद्र सरकारों एवं राजनीतिक दलों को मिलकर विचार करना चाहिए। मुखर्जी ने तो लोकसभा की सीटें बढ़ाने का भी सुझाव दिया था। उनकी राय थी कि लोकसभा सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के अनुसार निर्धारित है और अब समय आ गया है कि सीटों की संख्या बढ़ाए जाने को लेकर कानूनी प्रावधान किए जाएं।

भारत में चुनाव कराना एक बड़ी प्रक्रिया है। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय देश में कुल 83.41 करोड़ वोटर थे। उस चुनाव में 9.27 लाख पोलिंग बूथ थे। नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की चौथी बैठक में पीएम मोदी ने कहा था कि ‘हमने लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एकसाथ कराने पर विचार-विमर्श का आह्वान कई पहलुओं को ध्यान में रखकर किया है, जिसमें वित्तीय बचत व संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की बात शामिल है। प्रधानमंत्री के अनुसार 2009 के आम चुनाव के दौरान 1,100 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि 2014 के चुनाव में 4,000 करोड़ रुपये खर्च हुए। एक अनुमान के अनुसार राजनीतिक दलों ने लोकसभा में 30 हजार करोड़ खर्च किए।

एक साथ चुनाव कराने को लेकर विपक्षी दलों की आशंका यह है कि अगर एक साथ चुनाव हुए तो उन्हें हार का सामना कर पड़ सकता है। खासतौर पर क्षेत्रीय दलों को हार की ज्यादा आशंका सता रही है। एक सर्वे के अनुसार यदि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते हैं 77 फीसदी वोट एक पार्टी को जा सकते हैं। वैसे तो तेलंगाना राष्ट्र समिति एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में हैं। चर्चा यह भी है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री राज्य में बदलते राजनीतिक हालातों के मद्देनजर जल्दी चुनाव कराना चाहते हैं। तेलंगाना में जल्दी चुनाव कराने की घोषणा की जा सकती है। तेलंगाना में लोकसभा चुनाव के समय मतदान होना है। लेकिन तेजी से बदल रही राजनीति में  टीआरएस की मंशा है कि लोकसभा चुनाव के दौरान उसका ध्यान विधानसभा चुनाव पर ही न रहे। विधानसभा चुनाव से निश्चित होने के बाद टीआरएस के पास किसी भी गठबंधन के साथ जुड़ने की स्वतंत्रता भी होगी। यही कारण है कि टीआरएस नवंबर में ही चुनाव चाहता है। भाजपा के एक नेता ने भी तेलंगाना विधानसभा जल्दी भंग होने की संभावना जताई है। तेलंगाना राष्ट्र समिति ने एक बड़ी रैली करने का भी ऐलान किया है।

यह तो तय है आगामी लोकसभा चुनाव अगले साल अपने तय समय पर अप्रैल-मई महीने में ही कराए जाएंगे। साथ ही यह भी साफ हो गया है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव भी नियत समय पर होंगे। ऐसे में सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की संभावना नहीं है। अब यह भी रणनीत बन रही है कि झारखंड, हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव समय से पहले कराएं जाएं। इन तीनों का कार्यकाल 2019 तक है। भाजपा नेताओं का मानना है कि इन राज्यों में एक बार फिर से मोदी की छवि का फायदा पार्टी को मिल सकता है। तीन राज्यों के चुनाव तो भाजपा लोकसभा चुनाव के साथ कराने का विचार कर रही है। लेकिन टीआएस की चिंता यह भी है कि विधानसभा भंग करने पर अगर चुनाव आयोग ने पहले चुना नहीं कराए तो क्या होगा। नीति आयोग की रिपोर्ट में भी 2024 से लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव किया गया। देश में इस मुद्दे पर बहस जारी है। नीति आयोग ने एक साथ चुनाव दो चरणों में कराने का प्रस्ताव रखा है। पहला चरण 2019 में 17वें आम चुनाव के साथ और दूसरा 2021 में। 17वीं लोकसभा के चुनाव के समय कुछ विधानसभाओं की अवधि को घटा कर तथा कुछ की अवधि को बढ़ा कर किया जा सकता है। इसी कारण हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव समय से पहले लोकसभा चुनाव के समय कराने पर चर्चा चल रही है। यह भी तर्क रखे गए है कि एक साथ चुनाव कराने से मतदाताओं की दिलचस्पी बढ़ेगी और धन कम खर्च होगा। बार-बार लगने वाली आचार संहिता बचा सकता है, जिससे विकास कार्यों पर असर नहीं पड़ेगा।

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह द्वारा देश में समकालिक चुनाव (एक राष्ट्र, एक चुनाव) के संबंध में विधि आयोग को लिखे गए पत्र के मुख्य बिंदु

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जी के पत्र के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी ने देश में समकालिक चुनाव (एक राष्ट्र, एक चुनाव) कराये जाने के संबंध में अपना दृष्टिकोण विधि आयोग के सामने रखा। भारतीय जनता पार्टी की यह प्रतिबद्धता है, स्पष्ट विचार है कि भारत जैसे प्रगतिशील लोकतंत्र में चुनाव एक निश्चित समय में और एक निश्चित कार्यकाल के लिए होना चाहिए जिसके कारण जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी को प्रभावी ढंग से पूरा कर सकें।

समकालिक चुनाव केवल एक सिद्धांत नहीं बल्कि 1952 से 1967 तक यह देश में सफल भी रह चुका है। समकालिक चुनाव को लेकर 1970 के बाद जब चुनाव का चक्र बिगड़ा तब उसके बाद निर्वाचन आयोग ने 1983 में, विधि आयोग ने 1999 में और संसदीय समिति ने 2015में भी इसको कराने की सिफारिश की है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी और वर्तमान राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोबिंद जी ने भी अपने संबोधन में इस विचार को देश के सामने रखा है।

समकालिक चुनाव से जहां एक ओर प्रशासनिक व्यय में कमी आयेगी, वहीं आचार संहिता के कारण रुक जाने वाले विकास कार्यों में भी प्रगति आयेगी और राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च में भी कमी आयेगी। 2014 के लोक सभा चुनाव में 2009 के लोक सभा चुनाव की तुलना में चुनाव का खर्च तीन गुना बढ़ा है, एक साथ चुनाव कराने से उसमें कमी आ सकती है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि 2016 में महाराष्ट्र में संसद, लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनाव लगातार होने के कारण पूरे राज्य में 365 दिनों में से 307 दिनों तक आचार संहिता कहीं न कहीं लगी रही जिससे राज्य के विकास में अवरोध उत्पन्न हुआ। ऐसे उदाहरण अनेक राज्यों में देखने में आते हैं।

भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि देश ने ऐसे भी उदाहरण देखे हैं जब एक ही राज्य में लोक सभा और विधान सभा चुनावों में जनता ने अलग-अलग पार्टी को शासन करने का अधिकार दिया है। 1980 में कर्नाटक की जनता ने केंद्र के लिए कांग्रेस और राज्य के लिए जनता दल सेक्युलर की सरकार को चुना. हमारे देश में स्वस्थ मतदान की परम्परा है, अतः मतदाता अपने निर्णय के हिसाब से अपनी सरकार को चुनेंगे, इसमें किसी भी चीज का अतिरिक्त प्रभाव नहीं हो सकता और यह देश की संघवाद की भावना के भी अनुरूप है।

वर्तमान में एक समय चुनाव कराने के लिए देश में संविधान तथा जनप्रतिनिधि क़ानून में संशोधन की आवश्यकता है जिस पर आम सहमति बनानी जरूरी है। एक साथ चुनाव् होने से देश के संघीय ढाँचे की स्थिरता को मजबूती और स्थिरता मिलेगी। इसके साथ ही एक समय चुनाव कराने के लिए एक मतदाता सूची, राज्यों के चुनाव नियंत्रित करने वाले अधिनियमों में समानता, चुनाव में एकरूपता और कार्यपद्धति में भी एकरूपता लाने की आवश्यकता है।ऐसा लगता है कि ‘समकालिक चुनाव’ सिद्धांत की आलोचना राजनीतिक रूप से प्रेरित है तथा अनुचित भी है। सार्वजानिक हितों को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग को ऐसे फैसले लेने का अधिकार दिया जाता है, जिसमें अल्पकालिक असुविधा तो हो सकती है लेकिन निश्चित रूप से देश लंबे समय तक ऐसे निर्णयों से लाभान्वित  होगा। यह निर्वाचित सरकार को चुनावों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय विकास और सुशासन के लिए काम करने के लिए प्रेरित करेगा। अन्य विषय जो इससे सम्बंधित हैं, जैसे ईवीएम, वर्क फोर्स, सुरक्षा व्यवस्था इत्यादि वे महत्वपूर्ण पहलू हैं, लेकिन समय के साथ उन्हें भी समाधान किया जा सकता है।

देश के लोगों के दीर्घकालिक और सार्वजानिक हित में, भारतीय जनता पार्टी विनम्रता से यह कहती है कि कई कठिनाइयों के बावजूद, भारतीय लोकतंत्र की सराहनीय विशेषताओं में से एक चुनाव में उच्च मतदाता भागीदारी है। यह लोगों के इस देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में गहरे विश्वास को दर्शाता है।हमें इस विश्वास को अपने ही नागरिकों पर भारी पड़ने वाले चुनावी खर्चों और इसके दुष्प्रभावों के बोझ के नीचे नहीं दबाना चाहिए। भारत को एक विकासशील देश होने के नाते चुनावों की बढ़ती लागत, संबंधित सरकारों और चुनाव आयोग पर प्रशासनिक आवश्यकताओं  के साथ-साथ चुनाव की अवधि के दौरान‘आचार संहिता’ लागू होने के कारण हो रहे प्रशासनिक घाटे जैसे मुद्दों से बोझिल नहीं होना चाहिए।भारतीय जनता पार्टी विनम्रतापूर्वक कहती है और चाहती है कि उपरोक्त उल्लिखित तथ्य और विषय अन्य राजनीतिक दलों के साथ बहस के दरवाज़े खोलेगा और यह आयोग इस बहस को इसके तार्किक निष्कर्ष की ओर अवश्य ले जायेगा।

नर्मदा बचेगी तो संस्कृति बचेगी

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बुधवार की शाम इंदिरागांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के लिए ख़ास थी । जाने माने पत्रकार आलोक मेहता की नई किताब नमन नर्मदा का लोकार्पण भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त श्री ओ पी रावत ने किया ।इस मौक़े पर राजधानी के विभिन्न क्षेत्रों के चुनिंदा प्रतिनिधि उपस्थित थे । अगर नाम गिनाऊँ तो कड़ी बहुत लंबी हो जाएगी ,लेकिन कला केंद्र के सचिव और शिक्षाविद सच्चिदानंद जोशी, इंटरनेशनल मेलोडी फाउंडेशन के डॉक्टर हरीश भल्ला,कला केंद्र के पुस्तकालय निदेशक डॉक्टर रमेश गौर, समाचार फॉर मीडिया के डिप्टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा, पत्रकार सुश्री मानसी की उपस्थिति से कार्यक्रम गरिमापूर्ण हो गया ।ज़ाहिर है आलोक जी मेरे वरिष्ठ रहे हैं तो मुझे वहाँ होना ही था ।


किताब के लोकार्पण के बहाने भारत की सबसे पवित्र मानी जाने वाली और मध्यप्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा और उसके इर्द गिर्द पनपी करोड़ों साल पुरानी संस्कृति के बारे में गंभीर और सार्थक चर्चा हो गई ।आलोक मेहता ने उन सभी जिज्ञासाओं का समाधान किया ,जो इस पुस्तक की ज़रूरत को लेकर उठ रही थीं ।आलोक जी ख़ुद भी उज्जैन के निवासी हैं और क्षिप्रा तथा नर्मदा नदियों के आंचल में बड़े हुए हैं ।पुस्तक अभी पढ़ने को नहीं मिली लेकिन आलोकजी ने स्पष्ट किया कि नर्मदा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्व स्वीकार किया गया है और इसे अँगरेज़ी में लिखने से विदेशों में भी नर्मदा की प्रतिष्ठा बढ़ेगी ।देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का नर्मदा पर गहराई से अध्ययन चौंकाने वाला रहा ।

भाजपा सांसदों की सांसें तेज

प्रशासनिक अधिकारी के रूप में उन्होंने मध्यप्रदेश के नर्मदा घाटी विकास में अलग अलग भूमिकाओं का निर्वहन किया ,मगर नर्मदा घाटी संस्कृति के संरक्षण को लेकर वे अभी भी संवेदनशील हैं । बड़ी बेबाक़ी से उन्होंने माना कि नर्मदा बचाओ आंदोलन ने एक दौर में बड़ी सार्थक भूमिका निभाई ।इससे बांधों की डूब में आने वाले किसानों को ज़मीनों का बेहतर मुआवज़ा मिला और अँगरेज़ों के ज़माने से चले आ रहे क़ानून से मुक्ति मिली । लेकिन बाद में आंदोलन की रचनात्मक भूमिका नहीं रही।उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने जब घाटी के किसानों की स्थिति का आकलन किया तो चौंकाने वाला तथ्य सामने आया । वह यह कि बड़े और संपन्न किसान नर्मदा किनारे अपने संसाधनों से खेती में सिंचाई तो करते थे ,लेकिन छोटे किसान बड़े घाटे में रहते थे । उन्हें भी बड़े किसान पानी देते थे लेकिन बदले में फसल या उपज का बड़ा हिस्सा हड़प लेते थे । इस पर रोक लगी है । उन्होंने नर्मदा के यायावर अमृतलाल वेगड़ को श्रद्धा से याद किया, जिन्होंने नर्मदा की अनेक परिक्रमाएँ कीं और इस प्राचीन संस्कृति के अनेक नए अध्याय खोजे । इसके अलावा अनिल माधव दवे ने भी नर्मदा रहस्यों को उदघाटित करने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है ।दुर्भाग्य से अब ये दोनों ही इस दुनिया से विदाई ले चुके हैं ।उन्होंने नर्मदा को प्रदूषित होने से बचाने और शोधपरक काम करने का आह्वान किया और समाज में पुस्तक और पुस्तकालयों की ज़रूरत को रेखांकित किया । कला केंद्र के सचिव सच्चिदानंद जोशी ने भी नर्मदा की प्राचीनता और इस क्षेत्र के सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक प्रतीकों के संरक्षण पर ज़ोर दिया ।डॉक्टर रमेश गौर ने पुस्तक पढ़ने और पुस्तकालय संस्कृति के विकास को बढ़ावा देने पर ज़ोर डाला।चित्र इसी मौके के हैं ।

सीपीजे कॉलेज में फ्रेशर्स पार्टी का आयोजन

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नईदिल्ली-

सीपीजे कॉलेज ऑफ हायर स्टडीड नरेला ने कानून 2018-23 के प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए फ्रेशर्स पार्टी का आयोजन किया गया। इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद बीसीडी के सदस्य एडवोकेट हिमल अख्तर ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि सीपीजे के छात्रों में बहुमुखी प्रतिभा है। सीपीजे के छात्र अपने करियर को लेकर सजग है। जिसके कारण इनका परिणाम भी बेहतरीन होता है। हिमल अख्तर ने कहा कि यहां के छात्रों में क्षमता है और वे अपने आप को सिद्ध भी कर चुके हैं। जिस प्रकार से पहले सत्र के छात्र यहां उपस्थित है हम उन्हें शुभकामना देते हैं और यहीं कहेंगे कि देश को बेहतरीन कानून की पढ़ाई आप कर रहे हैं। जिसका लाभ देश को मिलेगा। इस मौके पर सीपीजे के महानिदेशक युंगाक चतुर्वेदी ने छात्रों को शुभकामना दी और कहा कि निश्चिततौर पर जिस तरह से विभिन्न क्षेत्रों से यहां छात्र आए हैं और इतनी जल्दी घुल मिल गए तय है कि आने वाले दिनों में आप की पढ़ाई बेहतर होगी। संस्थान की ओर से लगातार यह कोशिश रहती है कि छात्रों को बेहतरी शिक्षा दी जाए इसके लिए फैकल्टी लगातार कार्य करती रही है। युगांक चतुर्वेदी ने कहा कि फ्रेशर पार्टी में जिस तरह से छात्रों को हौसला आफजाई हिमल अख्तर ने किया है निश्चिततौर पर आने वाले दिनों में इसके बेहतरीन परिणाम देखने को मिलेंगे। कार्यक्रम की शुरुआत विधिवत दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया।

फ्रेशर्स पार्टी में छात्रों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दी। खासतौर पर स्कीट, ग्रुप डांस, सिंगिंग, फैशन शो का प्रदर्शन किया जिससे छात्रों का खूब मनोरंजन हुआ। खास तौर पर नौटंकी ग्रुप ने अपने नाट्य मंचन से छात्रों का दिल जीत लिया फ्रेशर्स पार्टी में मिस्टर रोहन खन्ना और मिस खुशबू जैन को मिस्टर व मिस के खिताब से नवाजा गया। इस मौके पर वेल ड्रेस, मिस्टर हैंडसम, मिस ब्यूटीफुल का भी चुनाव किया गया।