बच्चों के गृह आधारित देखभाल को लेकर आशा कार्यकर्ताओं को दिया जा रहा प्रशिक्षण

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– खगड़िया सदर अस्पताल स्थित रीजनल ट्रेनिंग सेंटर में प्रशिक्षण  का आयोजन
– गोगरी और परबत्ता प्रखंड की आशा कार्यकर्ताओं को मिल रहा एचबीवाईसी प्रशिक्षण
खगड़िया, 26 मई
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत खगड़िया सदर परिसर स्थित रीजनल ट्रेनिंग सेंटर में छोटे बच्चों की गृह आधारित देखभाल (एचबीवाईसी) से संबंधित विषय पर आशा कार्यकर्ताओं को पाँच दिवसीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह प्रशिक्षण गोगरी और परबत्ता प्रखंड में संचालित स्वास्थ्य संस्थानों में कार्यरत आशा कार्यकर्ताओं को दिया जा रहा है। सोमवार से शुरू हुए उक्त प्रशिक्षण का शुक्रवार को समापन होगा। इस दौरान प्रशिक्षण में मौजूद सभी प्रतिभागियों को छोटे बच्चों की गृह आधारित देखभाल से संबंधित विस्तृत जानकारी दी जा रही है। जिसमें गृह भ्रमण के तहत छोटे बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित देखभाल, बच्चों की देखभाल कैसे करनी है, इस दौरान किन-किन बातों का ख्याल रखना, बच्चों के स्वास्थ्य और मजबूत शरीर निर्माण को लेकर माता-पिता को दी जाने वाली आवश्यक जानकारी आदि दी जा रही है। यह प्रशिक्षण प्रशिक्षक मदन कुमार एवं चंदन कुमार द्वारा सभी प्रतिभागियों को दिया जा रहा है।
– बच्चों के माता-पिता को प्रशिक्षण प्राप्त प्रशिक्षणार्थियों द्वारा दी जाएगी आवश्यक जानकारी :
प्रशिक्षक मदन कुमार एवं चंदन कुमार ने बताया, छोटे बच्चों की गृह आधारित देखभाल को बढ़ावा देने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को पाँच दिवसीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद सभी प्रशिक्षणार्थी अपने-अपने पोषक क्षेत्र में घर-घर जाकर छोटे-छोटे बच्चों का स्वास्थ्य से संबंधित देखभाल करेंगे और बच्चों के स्वस्थ और मजबूत शरीर निर्माण के लिए बच्चों के माता-पिता को आवश्यक जानकारियाँ देंगे। जिसके दौरान जन्म के एक घंटे के अंदर स्तनपान कराना, छः माह तक सिर्फ स्तनपान कराने, छः माह की उम्र पार करने के बाद दो वर्षों तक स्तनपान के साथ उचित और पर्याप्त ऊपरी आहार देने, नियमित टीकाकरण कराने, साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखने समेत तमाम जानकारियाँ दी जाएगी।
– छोटे बच्चों की देखभाल से संबंधित दी जा रही है विस्तृत जानकारी :
केयर इंडिया के डीटीओ-ऑन चंदन कुमार ने बताया, प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षक द्वारा मौजूद सभी प्रतिभागियों को छोटे बच्चों की नियमित तौर पर स्वास्थ्य से संबंधित देखभाल की विस्तृत जानकारी दी जा रही है। जिसमें बच्चों की देखभाल कैसे करनी है, देखभाल के दौरान किन-किन बातों को ख्याल रखना, बच्चों के शारीरिक विकास, कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों की पहचान करने आदि समेत बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए माता-पिता को दी जाने वाली आवश्यक और जरूरी सलाह की जानकारी विस्तारपूर्वक दी जा रही है। ताकि प्रशिक्षण प्राप्त करने के उपरांत सभी प्रशिक्षणार्थी अपने कार्य का मुस्तैदी के साथ निर्वहन कर सकें और बच्चों की उचित देखभाल सुनिश्चित हो सके।

कोरोना मरीजों की सेवा करते-करते खुद भी हो गई संक्रमित पर हिम्मत नहीं हारी

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-पंजवारा अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात एएनएम सविता कुमारी की कहानी
-कोरोना काल में बेहतर कार्य करने के लिए प्रमंडल स्तर पर भी मिल चुका है पुरस्कार
बांका, 26 मई
चुनौतियों को मात देना आसान नहीं होता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो न सिर्फ चुनौतियों को मात देते हैं, बल्कि उससे आगे भी निकल जाते हैं। इसी श्रेणी में आती हैं बाराहाट प्रखंड के पंजवारा स्थित अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात एएनएम सविता कुमारी। कोरोना काल की जब शुरुआत हुई थी तो हर किसी के मन में भय था। लोग कोरोना का नाम सुनकर ही डर जाते थे, लेकिन सविता कुमारी न सिर्फ अपनी ड्यूटी पर मुस्तैदी से डटीं रहीं, बल्कि लोगों को जागरूक करने से लेकर मानसिक तौर पर समर्थन देने का भी काम किया। एक समय तो ऐसा आया जब सविता खुद भी संक्रमित हो गईं। साथ में परिवार के सभी सदस्य भी कोरोना की चपेट में आ गए। ऐसी परिस्थिति में इन्होंने सेवा करने का दूसरा जरिया अपनाया। मोबाइल फोन के माध्यम से कोरोना मरीजों औऱ क्षेत्र के लोगों की सेवा जारी रखी। लोगों को फोन पर ही कोरोना के प्रति जागरूक करती रहीं।
सविता कुमारी अपने क्षेत्र में भी लोगों से काफी घुली-मिली हैं। इस वजह से जब भी लोगों को किसी भी तरह की आशंका होती तो सविता को ही कॉल करते थे। फोन पर ही वह लोगों को कोरोना के लक्षण और उससे बचाव के बारे में बतातीं। अगर किसी में लक्षण दिखता तो उसे तत्काल कोरोना जांच कराने और एहतियात बरतने की सलाह देती थीं। सविता के काम को स्वास्थ्य विभाग ने भी पहचाना और प्रमंडल स्तर पर भागलपुर में उन्हें कोरोना काल में बेहतर कार्य करने के लिए सम्मानित किया गया।
लोगों को समझने की करती हूं कोशिशः सविता कहती हैं कि मैंने 2005 से बतौर एएनएम कार्य करना शुरू किया है। कई जगहों पर मेरी पोस्टिंग हुई। सभी जगहों पर मैंने अपना काम ईमानदारी से किया। मैं जहां भी जाती हूं, सबसे पहले वहां के लोगों को समझने की कोशिश करती हूं। लोगों को जब समझ लेती हूं तो उनके साथ काम करना आसान हो जाता है। इस बात को समझ जाती हूं कि इनके साथ कैसे काम करना है। अभी दो साल से कोरोना आया है, लेकिन इसके पहले टीकाकरण करने, प्रसव कराने या फिर काउंसिलिंग के काम में भी मैंने क्षेत्र के लोगों को लगातार जागरूक किया।
टीकाकरण में भी अहम योगदानः क्षेत्र के लोगों को जागरूक कर टीका लगाने में सविता को महारत हासिल है। सविता कुमारी कहती हैं कि जब कोरोना टीकाकरण की शुरुआत हुई थी तो लोग इससे घबराते थे। कोरोना टीका का नाम सुनकर ही लोग भागने लगते थे। तब मैंने समझा कि इसे लेकर पहले लोगों को जागरूक करना होगा। घर-घर गई। घर की महिलाओं को समझाया। इससे मेरा काम आसान हो गया। आज हमारे क्षेत्र के अधिकतर लोगों का टीकाकरण हो चुका है। अब तो कोरोना टीका के साथ नियमित टीकाकरण भी चल रहा है। क्षेत्र के लोग बढ़-चढ़कर भागीदारी कर रहे हैं।

सदर अस्पताल एनक्वास के पैमाने पर भी खरा उतरेगा, तैयारी शुरू

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-एचएमआईएस के डिप्टी डायरेक्टर पहुंचे भागलपुर, तीन दिनों तक रहेंगे
-पहले दिन एडमिन और ओटी का लिया जायजा, कुल छह विभाग परखेंगे
भागलपुर, 26 मई
लक्ष्य और कायाकल्प में बेहतर करने के बाद नेशनल क्वालिटी एश्योरेंस स्टैंडर्ड (एनक्वास) के पैमाने पर भी सदर अस्पताल खरा उतरेगा। इसे लेकर तैयारी शुरू हो गई है। हेल्थ मैनेजमेंट इनफॉरमेशन सिस्टम (एचएमआईएस) के डिप्टी डायरेक्टर रंजन कुमार गुरुवार को सदर अस्पताल, भागलपुर पहुंचे। उनके साथ सिविल सर्जन डॉ. उमेश कुमार शर्मा, अस्पताल प्रभारी डॉ. राजू, मैनेजर जावेद मंजूर करीमी, केयर इंडिया के डीटीओ फैसिलिटी डॉ. राजेश कुमार मिश्रा और डॉ. प्रशांत भी मौजूद थे। वे यहां पर तीन दिनों तक रहेंगे और एनक्वास के पैमाने पर खरा उतरने के लिए सदर अस्पताल में और किस तरह की तैयारी करनी है, इसे लेकर यहां के अधिकारियों के साथ चर्चा करेंगे। पहले दिन उन्होंने एडमिन और ओटी की जानकारी ली और उसमें क्या बेहतर हो सकता है, इसके बारे में बताया। शुक्रवार और शनिवार को भी वह दो-दो विभागों को परखेंगे।
रंजन कुमार ने बताया कि भागलपुर सदर अस्पताल की व्यवस्था बेहतर है। इसी का परिणाम है कि लक्ष्य और कायाकल्प में बेहतर रिजल्ट मिला। अब एनक्वास को लेकर तैयारी चल रही है। पहले दिन तो मैंने एडमिन और ओटी को देखा, जो मुझे ठीक लगा। जो सुधार करने की जरूरत है, उसके बारे में बता दिया। अभी दो और दिन रहेंगे। इस दौरान अन्य विभागों के बारे में भी जानकारी लेंगे। उस दौरान भी जो सुधार की बात होगी, उसे यहां के अधिकारियों से साझा करेंगे। अगर वैसा हो गया तो सदर अस्पताल एनक्वास के पैमाने पर भी खरा उतर जाएगा। मुझे ऐसी उम्मीद है।
यहां के मरीजों को मिलेगी बेहतर सुविधाः सिविल सर्जन डॉ. उमेश कुमार शर्मा ने बताया कि सदर अस्पताल की व्यवस्था में लगातार सुधार हो रहा है। अब यहां पर हड्डी और अन्य तरह की सर्जरी भी जल्द शुरू होने वाली है। इसे लेकर सर्जन को सूचना दे दी गई है। ओपीडी, ओटी, लेबर रूम इत्यादि पहले से ही बेहतर काम कर रहा है। इसका परिणाम भी सामने आ चुका है। लक्ष्य और कायाकल्प में बेहतर प्रदर्शन इसका प्रमाण है। मुझे उम्मीद है कि जल्द ही भागलपुर सदर अस्पताल एनक्वास के पैमाने पर भी खरा उतरेगा और यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों को बेहतर सुविधा मिलेगी।
एनक्वास से सर्टिफिकेट मिलने के बाद सुविधाएं बढ़ेंगीः अगर भागलपुर सदर अस्पताल को एनक्वास सर्टिफिकेशन मिल जाता है तो एक प्रमाण पत्र के साथ तय राशि मिलेगी। साथ ही अस्पताल के छह विभागों को आयुष्मान योजना के तहत प्रतिदिन प्रति बेड 10-10 हजार रुपये तीन सालों तक दिया जाएगा। इससे यहां पर इलाज कराने आने वाले मरीजों को फायदा होगा। उन्हें गंभीर बीमारी के इलाज के लिए मायागंज अस्पताल नहीं जाना पड़ेगा।

लखीसराय जिले के पोषण पुनर्वास केंद्र में बच्चों को मिल रही है बेहतर स्वास्थ्य सुविधा 

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– भर्ती 17 बच्चों को मिल रही है स्वास्थ्य सुविधा का लाभ, दी जाती है आवश्यक चिकित्सा परामर्श
– अति कुपोषित बच्चों को चिह्नित कर भेजा जाता है पोषण पुनर्वास केंद्र
लखीसराय, 25 मई।
कुपोषणमुक्त समाज निर्माण के उद्देश्य से प्रदेश के सभी जिले में सरकार द्वारा खोले गए पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) कुपोषण की समस्या से पीड़ित बच्चों के लिए वरदान साबित हो रहा है। जिले में संचालित पोषण पुनर्वास केंद्र में बच्चों का ना सिर्फ आवश्यकतानुसार समुचित इलाज हो रहा बल्कि, इलाज के दौरान दी जाने वाली अन्य सुविधाएं भी बेहतर तरीके से उपलब्ध कराई जा रही है। ताकि भर्ती बच्चे जल्द से जल्द स्वस्थ हो सकें और कुपोषण मुक्त समाज निर्माण को बढ़ावा मिल सके। वर्तमान में जिले के एनआरसी में 17 बच्चे भर्ती हैं। सभी भर्ती बच्चों को एनआरसी में सुविधाजनक तरीके से बेहतर चिकित्सकीय सुविधाएं प्रदान कराई जा रही और अन्य जरूरी बातों का उचित ख्याल रखा जा रहा है।
– कुपोषित बच्चों के लिए संजीवनी है पोषण पुनर्वास केंद्र :
सिविल सर्जन डॉ देवेन्द्र कुमार चौधरी ने बताया, राज्य सरकार के निर्देशानुसार जिले में भी बच्चों में पोषण की कमी से निपटने के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र की स्थापना की गई है। जो कुपोषण की समस्या से पीड़ित बच्चों के बीच संजीवनी साबित हो रही है। वहीं, उन्होंने बताया, कुपोषण की समस्या से जूझ रहे बच्चों को 21 दिनों के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र में रखा जाता है। जहाँ कुपोषित बच्चों को डाक्टर्स की सलाह के अनुसार ही उनका खानपान का विशेष ख्याल रखा जाता है। पोषण पुनर्वास केंद्र में मिलने वाली सभी सुविधाएं नि:शुल्क होती है। यहां भर्ती हुए बच्चों के वजन में न्यूनतम 15 % की वृद्धि के बाद ही उसे यहां से डिस्चार्ज किया जाता है। वहीं, उन्होंने कहा, मैं जिले वासियों से अपील करता हूँ कि जिनका भी बच्चा कुपोषण की समस्या से पीड़ित है, वह स्थानीय आंगनबाड़ी सेविकाओं से संपर्क कर अपने बच्चों को लखीसराय सदर अस्पताल परिसर स्थित एनआरसी में भर्ती कराएं। अगर इस दौरान उन्हें किसी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होती हो तो वह अपने स्थानीय स्वास्थ्य संस्थान या फिर स्वास्थ्य विभाग के जिला मुख्यालय और एनआरसी जाकर भी आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
– पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती होने के लिए तय किए गए हैं ये मानक :
डीपीसी सुनील कुमार ने बताया, कुपोषण के शिकार बच्चे को पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती करने के लिए कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। इसके तहत बच्चों की विशेष जांच, जैसे उनका वजन व बांह आदि की माप की  जाती है। इसके साथ ही छह माह से अधिक एवं 59 माह तक के ऐसे बच्चे जिनकी बाई भुजा 11.5 सेमी हो और उम्र के हिसाब से लंबाई व वजन न बढ़ता हो वो कुपोषित माने जाते है। वैसे बच्चों को ही पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती किया जाता है। इसके साथ ही दोनों पैरों में पिटिंग एडीमा हो तो ऐसे बच्चों को भी यहां पर भर्ती किया जाता है।

कुपोषित बच्चों के लिए संजीवनी है सदर अस्पताल का पोषण पुनर्वास केंद्र

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– यहां कुपोषित बच्चों के खानपान के साथ-साथ स्वास्थ्य की सम्पूर्ण देखभाल की है विशेष सुविधा
– एनएफएचएस 5 के आंकड़ों के अनुसार जिला में नाटापन के शिकार बच्चों की कुल संख्या में आई है 11 प्रतिशत की कमी
मुंगेर, 25 मई। बच्चों को कुपोषण जैसी समस्या से मुक्त कराने के लिए राज्य सरकार और जिला प्रशासन काफी गंभीर है। इसको ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने कुपोषण की इस समस्या से निबटने के लिए प्रत्येक जिला के सदर अस्पताल परिसर में पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) की स्थापना की है।
मुंगेर सदर अस्पताल परिसर स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र के नोडल अधिकारी विकास कुमार ने बताया कि राज्य सरकार के निर्देशानुसार जिला में भी बच्चों में पोषण की कमी से निपटने के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र की स्थापना की गई है। उन्होंने बताया कि कुपोषण की समस्या से जूझ रहे बच्चों और उसकी मां या अन्य परिजन को 14 से 28 दिनों के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र में रखा जाता है। इन दिनों पोषण पुनर्वास केंद्र में स्थित सभी बेड पूरी तरह से भरे हुए हैं। यहां फीडिंग डिमोस्ट्रेटर रचना भारती और सतीश कुमार के नेतृत्व में कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य की नियमित मॉनिटरिंग की जाती है। इस दौरान बच्चे और उनके परिजन के खाने और पीने के लिए नियमित रूप से पोष्टिक भोजन और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है। 14 दिनों तक कुपोषित बच्चे के स्वास्थ्य की नियमित जांच के बाद यदि उसके स्वास्थ्य में मानक के अनुसार सुधार होता है तो उसे डिस्चार्ज किया जाता है। अन्यथा पुनः उसे अगले 14 दिन के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र में ही रखा जाता है। यहां से डिस्चार्ज होने के बाद भी स्थानीय आशा कार्यकर्ता या आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका के द्वारा उनके स्वास्थ्य की नियमित मॉनिटरिंग की जाती है।
एनएफएचएस 5 के आंकड़ों के अनुसार जिला में बच्चों में नाटापन के प्रतिशत में हुआ 11 प्रतिशत का सुधार :
उन्होने बताया कि एनएफएचएस 5 (2019-20) के आंकड़ों के अनुसार जिला में बच्चों के नाटापन के प्रतिशत में 11 प्रतिशत का सुधार हुआ है। उन्होंने बताया कि
एनएफएचएस 4 (2015- 16) के आंकड़ों के अनुसार जिला में 46.6 प्रतिशत बच्चे नाटापन के शिकार थे जो अब एनएफएचएस 5 (2019-20) के आंकड़ों के अनुसार घटकर मात्र 35.5 प्रतिशत रह गए हैं।
पुनर्वास केंद्र में बच्चों का रखा जाता है विशेष ख्याल :
पुनर्वास पुनर्वास केंद्र में कार्यरत सतीश कुमार ने बताया कि यहां भर्ती कुपोषित बच्चों को डाक्टर की सलाह के अनुसार हीं उनके खानपान का विशेष ख्याल रखा जाता है। यहां रखे गए बच्चे यदि 14 दिनों के अंदर कुपोषण से मुक्त नहीं हो पाते  तो वैसे बच्चों को एक माह तक विशेष रूप से देखभाल की जाती है।
पुनर्वास केंद्र में भर्ती हुए बच्चे के वजन में न्यूनतम 15 प्रतिशत की वृद्धि के बाद ही किए जाते हैं डिस्चार्ज :
उन्होंने बताया कि पोषण पुनर्वास केंद्र में मिलने वाली सभी सुविधाएं नि:शुल्क होती हैं। यहां भर्ती हुए बच्चों के वजन में न्यूनतम 15 प्रतिशत की वृद्धि के बाद ही उसे यहां से डिस्चार्ज किया जाता है।
पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती होने के लिए तय किए गए हैं ये मानक :
उन्होंने बताया कि कुपोषण के शिकार बच्चे को एनआरसी में भर्ती करने के लिए कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। इसके तहत बच्चों की विशेष जांच जैसे उनका वजन व बांह आदि की माप की जाती है। इसके साथ हीं छह माह से अधिक एवं 59 माह तक के ऐसे बच्चे जिनकी बाईं भुजा 11.5 सेमी हो और उम्र के हिसाब से लंबाई व वजन न बढ़ता हो वो कुपोषित माने जाते हैं। वैसे बच्चों को ही पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती किया जाता है। इसके साथ ही दोनों पैरों में पिटिंग एडीमा हो तो ऐसे बच्चों को भी यहां पर भर्ती किया जाता है।

कालाजार और फाइलेरिया से बचाव: लोगों को जागरूक करने स्वास्थ्य संस्थानों को उपलब्ध कराया गया साउंड बाॅक्स 

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– जिला वेक्टर जनित रोग कार्यालय ने जिले के स्वास्थ्य संस्थानों को उपलब्ध कराया
– अस्पताल आने वाले मरीज साउंड बॉक्स के माध्यम से सुन सकेंगे कालाजार और फाइलेरिया के लक्षण
खगड़िया, 25 मई।
कालाजार और फाइलेरिया उन्मूलन को लेकर सरकार एवं स्वास्थ्य विभाग काफी गंभीर और सजग है। जिसे सार्थक रूप देने के लिए सरकार के निर्देशानुसार प्रशासनिक स्तर से हर जरूरी निर्णय भी लिए जा रहे हैं। इसी कड़ी में बुधवार को जिला वेक्टर जनित रोग कार्यालय द्वारा जिले में संचालित सभी स्वास्थ्य संस्थानों को चार्जेबल साउंड बाॅक्स उपलब्ध कराया गया। यह साउंड बाॅक्स सभी स्वास्थ्य संस्थानों के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी को सुपुर्द किया गया। जिसे स्वास्थ्य संस्थानों में लगाया जाएगा। जिसमें कालाजार और फाइलेरिया को लेकर एक धुन बजेगी और इलाज के लिए सरकारी स्वास्थ्य संस्थान आने वाले सभी मरीज इस धुन के माध्यम से उपरोक्त दोनों बीमारियों के लक्षण सुन और जान सकेंगे। ताकि लक्षण महसूस होने पर संबंधित डाक्टरों से ससमय अपना जाँच और सुविधाजनक तरीके से इलाज शुरू करवा सकें।
– सुविधाजनक तरीके से लोगों को मिलेगी बीमारी के लक्षण की जानकारी :
जिला वेक्टर जनित रोग नियंत्रण पदाधिकारी डॉ विजय कुमार ने बताया, इस पहल से लोगों को सुविधाजनक तरीके से कालाजार और फाइलेरिया के लक्षण की जानकारी मिलेगी। दरअसल, स्वास्थ्य संस्थान में अधिक भीड़ होने के कारण संबंधित मरीज को जानकारी प्राप्त करने में काफी असुविधा होती थी। जिसके कारण मरीजों की सुविधा का ख्याल रखते हुए केयर इंडिया की टीम के प्रयास से इस सुविधा की व्यवस्था की गई। अब अस्पताल आने वाले सभी मरीजों को उक्त दोनों बीमारियों के लक्षण की धुन के माध्यम से जानकारी मिलेगी और संबंधित मरीज सुविधाजनक तरीके से अपनी परेशानी की पहचान कर संबंधित चिकित्सकों से जाँच करा सकेंगे। इस व्यवस्था से अस्पताल कर्मियों को भी सुविधा होगी और सामुदायिक स्तर पर लोग जागरूक भी होंगे। वहीं, उन्होंने बताया, कालाजार और फाइलेरिया उन्मूलन को सरकार की ओर से अन्य कई योजनाएं भी चलाई जा रही है।
– रजिस्ट्रेशन काउंटर पर लगाया जाएगा साउंड बाॅक्स, डेटा ऑपरेटर को ऑपरेट की दी जाएगी जिम्मेदारी :
केयर इंडिया के डीपीओ कृष्ण कुमार भारती ने बताया, जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थानों में रजिस्ट्रेशन काउंटर पर साउंड लगाया जाएगा। जिसके ऑपरेट की जिम्मेदारी डेटा ऑपरेटर को दी जाएगी। साउंड बाॅक्स के माध्यम से अस्पताल आने वाले सभी मरीजों को सुविधाजनक तरीके से कालाजार और फाइलेरिया के लक्षण की जानकारी मिलेगी।
– ये हैं कालाजार के लक्षण :
– लगातार रुक-रुक कर या तेजी के साथ दोहरी गति से बुखार आना।
– वजन में लगातार कमी होना।
– दुर्बलता।
– मक्खी के काटे हुए जगह पर घाव होना।
– व्यापक त्वचा घाव जो कुष्ठ रोग जैसा दिखता है।
– प्लीहा में नुकसान होता है।
– जानें, फाइलेरिया क्या है ?
– फाइलेरिया मच्छर के काटने से होने वाला एक संक्रामक रोग है।
– किसी भी उम्र के व्यक्ति फाइलेरिया से संक्रमित हो सकता है।
– फाइलेरिया के लक्षण हाथ और पैर में सूजन (हाँथीपाँव) व हाइड्रोसील (अण्डकोष में सूजन) है।
– किसी भी व्यक्ति को संक्रमण के पश्चात बीमारी होने में 05 से 15 वर्ष लग सकते हैं।

2025 तक टीबी को खत्म करने के लिए हर मोर्चे पर चल रहा कामः सीडीओ

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बांका, 25 मई-
सरकार 2025 तक टीबी को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसे लेकर लगातार काम हो रहा है। जागरूकता कार्यक्रम से लेकर जांच और इलाज की गति को तेज कर दिया गया है। बांका जिले में इसे लेकर क्या सब हो रहा है, आइए जानते हैं प्रभारी सीडीओ डॉ. सोहैल अंजुम से।
1. बांका जिले को टीबी से मुक्त करने को लेकर क्या तैयारी है?
सीडीओः देश औऱ राज्य के अन्य जिलों की ही तरह यहां पर भी टीबी को 2025 तक खत्म करने को लेकर काम चल रहा है। क्षेत्र से लेकर अस्पतालों तक में इसकी व्यवस्था है। हर मोर्चे पर काम चल रहा है। आशा कार्यकर्ता के जरिये क्षेत्र में टीबी मरीजों की पहचान की जा रही है। संदिग्ध मरीज मिलने पर उसकी जांच कराई जाती है। जांच में टीबी की पुष्टि हो जाने पर उसका निःशुल्क इलाज किया जाता है। जिले के सभी सरकारी अस्पतालों में टीबी की जांच से लेकर इलाज तक की व्यवस्था है। इलाजरत टीबी मरीजों की निगरानी भी की जा रही है।
2. टीबी को खत्म करने के लिए इसके अतिरिक्त और क्या प्रयास हो रहे हैं?
सीडीओः पिछले दिनों हमलोगों ने ग्रामीण डॉक्टरों के लिए एक वर्कशॉप का आय़ोजन किया था। जिला में हुई इस वर्कशॉप में सभी प्रखंडों से ग्रामीण डॉक्टर पहुंचे थे। हमलोगों ने सभी को बताया कि अगर आपको क्षेत्र में इलाज के दौरान कोई टीबी के मरीज मिलते हैं और जांच में इसकी पुष्टि हो जाती तो इसके लिए आपको भी प्रोत्साहन राशि मिलेगी। इसका असर भी हो रहा है। ग्रामीण डॉक्टर के अलावा कोई अन्य लोग भी अगर टीबी मरीज को पहली बार लाते हैं तो उसे भी प्रोत्साहन राशि मिलेगी। टीबी ही नहीं, किसी भी बीमारी को खत्म करने के लिए सामुदायिक स्तर पर भी समर्थन जरूरी होता है।
3. टीबी मरीजों को दवा के अलावा अन्य क्या सुविधा मिलती है?
सीडीओः टीबी मरीजों की जांच और इलाज तो मुफ्त में होता ही है। साथ में उन्हें पौष्टिक आहार के लिए 500 रुपये प्रतिमाह दिया जाता है, जबतक इलाज चलता है। टीबी के मामले ज्यादातर घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। वहां के लोग अधिक मात्रा में पौष्टिक आहार नहीं ले पाते हैं। इस वजह से इस तरह का सहयोग टीबी मरीजों को मिलता है।
4. आप अपनी तरफ से टीबी मरीजों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
सीडीओः मैं तो उन्हें यही सलाह देना चाहूंगा कि दवा का सेवन नियमित तौर पर करें। बीच में नहीं छोड़ें। बीच में दवा छोड़ने पर एमडीआर टीबी होने का खतरा रहता है। अगर किसी को एमडीआर टीबी हो जाता है, उसे ठीक होने में ज्यादा समय लगता है। इसलिए टीबी के मरीज नियमित तौर पर दवा खाते रहें। जब तक कि डॉक्टर जांच के बाद उन्हें पूरी तरह से स्वस्थ्य घोषित नहीं कर दे, तबतक वे दवा लेते रहें।
5. अबतक के अनुभवों से आपको क्या लग रहा है, जिले में 2025 तक टीबी खत्म हो जाएंगे?
सीडीओः बिल्कुल। सरकार के स्तर के साथ-साथ जिले में सामुदायिक स्तर पर भी लोगों का समर्थन मिल रहा है। हमलोग लगातार जागरूकता कार्य़क्रम चला रहे हैं। लोगों को बता रहे हैं कि अगर दो हफ्ते से अधिक समय तक खांसी हो, बलगम में खून आना, शाम के समय में ज्यादा पसीना आना आदि लक्षण दिखे तो तत्काल टीबी की जांच करा लें। अगर पुष्टि हो जाती है तो इसका इलाज करवाएं।

अस्पतालों में चिकित्सक अधिक मरीजों की जांच कर सके इसके लिए और अधिक सुविधा हो : मंगल पाण्डेय

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– राज्य स्वास्थ्य मंत्री ने की राज्यस्तरीय मासिक समीक्षात्मक बैठक
पटना, 24 मई –
राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान, पटना के सभागार में मंगलवार को राज्य स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय की अध्यक्षता में राज्यस्तरीय मासिक समीक्षात्मक बैठक का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन अंतर्गत विभिन्न स्वास्थ्य कार्यक्रमों की भौतिक एवं वित्तीय प्रगति एवं अद्यतन स्थिति की समीक्षा हेतु सभी क्षेत्रीय अपर निदेशक, स्वास्थ्य सेवाएं, सिविल सर्जन, क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रबंधक एवं जिला कार्यक्रम प्रबंधक की राज्यस्तरीय मासिक समीक्षात्मक बैठक में शामिल हुए।
स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने उक्त अवसर पर कहा कि राज्य में स्वास्थ्य संबंधी जो कार्यक्रम चल रहे हैं, उसकी समीक्षा की गयी है। आने वाले समय में चिकित्सकों को अस्पतालों में मरीज देखने में अधिक सुविधा हो ताकि वह अधिक मरीज को देख सकें। दवाईयों की व्यवस्था और बेहतर हो। जो दवाईयां हमारे स्टॉक में उपलब्ध हैं, वो अधिक से अधिक अस्पतालों तक पहुंच सकें। जांच संबंधी सुविधाओं में यदि कठिनाई हो रही हो, तो उसमें और सुधार की जाए। उसके अलावे ऐसे मानक जिनके कारण स्वास्थ्य विभाग के कार्यों की समीक्षा की जाती है, उस पर भी चर्चा की गयी। उनमें मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, नवजात शिशु मृत्यु दर, टीबी नियंत्रण, मलेरिया नियंत्रण, कालाजार समेत अन्य कार्यक्रमों सबंधी समीक्षा की गयी।
उन्होंने आगे कहा कि तीन वर्षों में स्वास्थ्य क्षेत्र में योदगान देने वाले चिकित्सक एवं अन्य स्वास्थ्यकर्मी (लगभग 29 हजार) के आसपाल बहाली हुई है। मानवबल की कमियों को दूर किया जा रहा है। तीन जिले जो बेहतर कार्य करेंगे उनको सम्मानित किया जाएगा। जहां भी कमियां हैं। उसे दूर किया जा रहा है।
 बैठक में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के विभिन्न स्वास्थ्य कार्यक्रमों की अद्यतन स्थिति (एईएस/जेई सहित), स्वास्थ्य कार्यक्रमों हेतु निर्धारित सूचकांकों की प्रगति, कार्यक्रमवार आवंटित राशि की व्यय की अद्यतन स्थिति एवं समय-समय पर मुख्यालय स्तर से निर्गत दिशा-निर्देशों के अनुपालन की भी समीक्षा की गई।
बैठक में कार्यपालक निदेशक, राज्य स्वास्थ्य समिति श्री संजय कुमार सिंह, श्री केशवेंद्र कुमार, अपर-कार्यपालक निदेशक, राज्य स्वास्थ्य समिति, श्री शशांक शेखर सिन्हा, माननीय स्वास्थ्य मंत्री के आप्त सचिव, श्री कमल नयन, प्रशासी पदाधिकारी, राज्य स्वास्थ्य समिति, श्री राजेश कुमार उप सचिव, राज्य स्वास्थ्य समिति, श्री अविनाश कुमार पाण्डेय, राज्य कार्यक्रम प्रबंधक, राज्य स्वास्थ्य समिति समेत अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित थे।

नियमित टीकाकरण और गैर-संचारी रोग पर एएनएम को दिया गया प्रशिक्षण 

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– लखीसराय सदर पीएचसी के  सभागार हाॅल में दिया गया एक दिवसीय प्रशिक्षण
– डीआईओ, पीएचसी प्रभारी और बीएचएम ने दिया प्रशिक्षण
लखीसराय, 24 मई-
लखीसराय सदर पीएचसी परिसर में स्थित सभागार हाॅल में मंगलवार को नियमित टीकाकरण और गैर-संचारी रोग से संबंधित विषय पर पीएचसी में कार्यरत एएनएम को स्वास्थ्य विभाग द्वारा एक दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। जिसमें पीएचसी की सभी एएनएम शामिल हुईं। उक्त प्रशिक्षण के दौरान डीआईओ सह एसीएमओ डाॅ अशोक कुमार भारती एवं सदर पीएचसी के प्रखंड स्वास्थ्य प्रबंधक निशांत राज द्वारा नियमित टीकाकरण विषय पर मौजूद एएनएम को विस्तृत जानकारी दी गई। जिसमें नियमित टीकाकरण ऑनलाइन रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने, शत-प्रतिशत लाभार्थियों का समय पर नियमित टीकाकरण करने समेत अन्य आवश्यक और जरूरी जानकारी विस्तारपूर्वक दी गई। जबकि, पीएचसी प्रभारी डॉ रौशेक कुमार द्वारा गैर संचारी रोग से संबंधित विस्तृत जानकारी दी गई। जिसमें गैर-संचारी रोग की ससमय ऑनलाइन रिपोर्टिंग, पीड़ित व्यक्ति की पहचान करने और ससमय आवश्यक चिकित्सा शुरू करवाने समेत अन्य आवश्यक और जरूरी जानकारी दी गई।
– गर्भवती और शिशु के लिए नियमित टीकाकरण जरूरी :
एसीएमओ सह डीआईओ डाॅ अशोक कुमार भारती ने प्रशिक्षण के दौरान मौजूद प्रतिभागियों को बताया, सुरक्षित प्रसव को बढ़ावा देने एवं शिशु के स्वस्थ्य शरीर निर्माण के लिए समय पर नियमित टीकाकरण जरूरी है। इसलिए, समय पर सभी योग्य लाभार्थियों का टीकाकरण सुनिश्चित कराने को जिले में लगातार अभियान चलाकर टीकाकृत किया जा रहा है। ताकि ससमय पर नियमित टीकाकरण सुनिश्चित हो सके। वहीं, उन्होंने बताया, नियमित टीकाकरण के दौरान शून्य से दो वर्ष तक के बच्चों को बीसीजी, ओपीवी, पेंटावेलेंट, रोटा वैक्सीन, आईपीवी, मिजल्स, विटामिन ए, डीपीटी बूस्टर डोज, मिजल्स बूस्टर डोज और बूस्टर ओपीवी के टीके लगाए जाते  और गर्भवती को टेटनेस-डिप्थीरिया (टीडी) का टीका भी लगाया जाता है। नियमित टीकाकरण बच्चों और गर्भवती महिलाओं को कई गंभीर बीमारी से बचाव करता है। साथ ही प्रसव के दौरान जटिलताओं से सामना करने की भी संभावना नहीं के बराबर रहती है।
– अभियान चलाकर लोगों को करें जागरूक और टीकाकृत :
प्रशिक्षण के दौरान सदर पीएचसी के प्रखंड स्वास्थ्य प्रबंधक निशांत राज ने कहा, अभियान चलाकर योग्य लाभार्थियों को नियमित टीकाकरण के लिए जागरूक करें। जिसके दौरान लाभार्थियों को नियमित टीकाकरण से होने वाले फायदे, स्वस्थ्य शरीर निर्माण और गंभीर बीमारी से बचाव के लिए नियमित टीकाकरण कितना जरूरी है, इसका क्या उदेश्य और महत्व है तमाम जानकारियाँ दें। साथ ही टीकाकरण के लिए प्रेरित कर टीकाकृत करें।
– गैर-संचारी संबंधित रोगों से बचाव के लिए जागरूकता जरूरी :
प्रशिक्षण के दौरान सदर पीएचसी के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डाॅ रौशेश कुमार ने मौजूद एएनएम को बताया, गैर-संचारी रोग से बचाव के लिए जागरूकता जरूरी है। इसलिए, गैर-संचारी रोग से बचाव के लिए लोगों को जागरूक करें। जिसके दौरान लोगों को साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखने समेत अन्य आवश्यक जानकारी देकर जागरूक करें। साथ ही लक्षण दिखते ही तुरंत आवश्यक जाँच कराने एवं जाँच के उपरांत आवश्यक चिकित्सा परामर्श का पालन करने के लिए भी प्रेरित करें।

मंकी पॉक्स के लक्षणों की सभी लोग रखें जानकारी, इम्युनिटी विकसित करने वाले भोज्य पदार्थो का करें सेवन 

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– मंकी पॉक्स का जोखिम नवजात शिशुओं, बच्चों तथा कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों में होता है अधिक
– पर्सनल हाइजीन और साफ सफाई का रखें विशेष ध्यान
– 1958 में बंदरों में मिला था मंकी पॉक्स, इंसानों में संक्रमण का पहला मामला कांगों में मिला था
मुंगेर, 24 मई । विश्व में अभी महामारी का दौर चल रहा है। कोविड के बाद एक नई बीमारी मंकीपॉक्स सामने आई है। अफ्रीकी देशों में यह सामान्य है लेकिन अब यह दुनिया के अन्य देशों में भी फैल रहा है। हालांकि इस रोग का व्यापक प्रभाव नहीं ,लेकिन इस रोग से बचाव के लिए लोगों में जागरूकता आवश्यक है।
जिला के प्रभारी सिविल सर्जन डॉ. आनंद शंकर शरण सिंह ने बताया कि मंकी पॉक्स वायरस जानवरों से फैलने वाली एक बीमारी है । मूल रूप से इसके वायरस जानवरोें में ही होते है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक मंकी पॉक्स कई तरह के बंदरों व अन्य जानवरों में पाया जाता है।
उन्होंने बताया कि सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन के मुताबिक मंकी पॉक्स के विभिन्न लक्षण चिह्नित किये गये हैं। मंकी पॉक्स के लक्षणों में तेज बुखार आना, तेज सिरदर्द होना, शरीर में सूजन, त्वचा पर लाल चकत्ते और कमजोरी आदि शामिल हैं। इस बीमारी के लक्षणों के सामने आने में एक से तीन दिन का समय लगता और दो से चार सप्ताह में यह बीमारी दूर हो जाती है। वैसे तो मंकी पॉक्स एक संक्रामक बीमारी है । इसका संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक हो सकता है। इस बीमारी में एक संक्रमित व्यक्ति के कपड़ा तथा दूसरी इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं से भी संक्रमण फैलता है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मंकी पॉक्स के असर कम गंभीर होते और इसका जोखिम अधिक नहीं होता है। इस संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि मंकी पॉक्स का जोखिम नवजात शिशुओं, बच्चों तथा कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों के लिए अधिक नुकसानदेह है।
मंकी पॉक्स बीमारी से बचने के लिए इन बातों का रखें ध्यान :
उन्होंने बताया कि इस संक्रामक बीमारी से बचने के लिए जानवरों से दूरी बनाकर रखना आवश्यक है। इसके अलावा मंकी पॉक्स संक्रमित या दूसरे बीमार जानवरों से संक्रमित व्यक्ति के इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए । इस बीमारी से संक्रमित व्यक्ति को आइसोलेशन में रखना आवश्यक है। इसके साथ ही साफ- सफाई के नियमों का भी विशेष तौर पर पालन करना आवश्यक है। इसके साथ ही सभी लोग अपने हाथों को नियमित रूप से अल्कोहल वाले सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें या साफ पानी साबुन से एक निश्चित अंतराल के बाद अपने हाथों को साफ करें। इसके अलावा अपने भोजन में इम्युनिटी विकसित करने वाले भोजन अधिक मात्रा में लें।
कांगों में मिला था मंकीपॉक्स का पहला मामला :
उन्होंने बताया कि 1950 के दशक में बंदरों में पाया जाने वाला मंकी पॉक्स 1970 तक इंसानों तक फैलने लगा था। इंसानों तक संक्रमण का पहला मामला कांगों में मिला था। इसके बाद अफ्रीकी देशों के लिए यह संक्रमण सामान्य रूप से समय- समय पर फैलता रहा। इसके अलावा यह अन्य जानवरों को भी होने लगा था। हालांकि वर्तमान में यह कई देशों के लिए नया रोग माना जा रहा है लेकिन वैश्विक स्तर के बायोसाइन्स शोध संस्थानों के शोधकर्ताओं ने कहा है कि मंकी पॉक्स के पूर्व के अनुभव हैं। इसके लिए चेचक के टीके व उपचार को भी प्रभावी माना गया है।