वेक्टर जनित रोग से बचाव के लिए जन-जागरूकता और सतर्कता बेहद  जरूरी : प्रभारी सिविल सर्जन 

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– वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम पर जन-जागरूकता को ले एक दिवसीय मीडिया कार्यशाला
– सीफार के सहयोग से स्वास्थ्य विभाग के द्वारा क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रबंधन इकाई सभागार में आयोजित की गई कार्यशाला
मुंगेर, 30 मई-
सोमवार को मुंगेर क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रबंधन इकाई (आरपीएमयू) सभागार में वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम पर स्वास्थ्य विभाग एवं सेंटर फाॅर एडवोकेसी एंड रिसर्च (सीफार) के संयुक्त तत्वावधान में जन-जागरूकता के लिए एक दिवसीय मीडिया कार्यशाला  आयोजित की गयी । कार्यशाला में उपस्थित अतिथियों के द्वारा वेक्टर जनित 6 रोग से संबंधित चर्चा की गई। इस अवसर पर मुख्य रूप से एईएस- जेई, डेंगू- चिकनगुनिया, कालाजार, फाइलेरिया और मलेरिया सहित अन्य रोगों के लक्षण और रोकथाम के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए विस्तृत चर्चा की गई। कार्यशाला को सम्बोधित करते हुए जिला के प्रभारी सिविल सर्जन डाॅ. आनंद शंकर सिंह ने कहा कि वेक्टर जनित रोग नियंत्रण पर रोकथाम एवं इससे बचाव के लिए जागरूकता के साथ-साथ सतर्कता भी बेहद जरूरी है। इसलिए, मैं तमाम जिलावासियों से अपील करता हूँ कि वो कालाजार, फाइलेरिया, मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया से बचाव के लिए साफ-सफाई सहित अन्य सावधानियों का ख्याल रखें और इन बीमारियों का कोई भी  लक्षण दिखते ही तुरंत स्थानीय स्वास्थ्य संस्थान में जाकर जाँच कराएं। उन्होंने बताया कि ऐसे मरीजों के लिए जिला में ना सिर्फ निःशुल्क जांच की सुविधा उपलब्ध है बल्कि सरकार के द्वारा ऐसे मरीजों को सरकार के द्वारा सहायता राशि भी दी जाती है।
इस अवसर पर जिला वेक्टर जनित रोग नियंत्रण पदाधिकारी डॉ. अरविंद कुमार सिंह, केयर इंडिया के डीपीओ मानस कुमार नायक, डीटीओएफ डाॅ. नीलू, डब्ल्यूएचओ के पदाधिकारी सहित जिला मलेरिया कार्यालय के कई पदाधिकारी और प्रखण्ड स्तर और कार्यरत स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और केयर इंडिया के अधिकारी उपस्थित थे।
– जन- जागरूकता से ही वेक्टर जनित रोग पर रोकथाम संभव :
कार्यशाला को संबोधित करते हुए जिला वेक्टर जनित रोग नियंत्रण पदाधिकारी डॉ. अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि वेक्टर जनित रोग से संबंधित सभी रोगों से बचाव के लिए जन- जागरूकता के साथ-साथ सतर्कता बेहद जरूरी है। इसी उद्देश्य से इस कार्यशाला का आयोजन भी किया गया है ताकि सामुदायिक स्तर पर लोगों को उक्त बीमारी से बचाव के लिए आवश्यक जानकारी के साथ-साथ मरीजों के लिए सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध सुविधा की जानकारी ससमय मिल सके। उन्होंने बताया कि आम लोगों की जागरूकता से ही वर्तमान में मात्र पीकेडीएल  कालाजार (चमड़ा वाला) का एक मरीज है जबकि, मलेरिया और डेंगू का एक भी मरीज नहीं है। बावजूद इसके लोगों को अभी भी बचाव के लिए जागरूक और सतर्क रहने की जरूरत है । अभी भी उक्त बीमारी के दौर के शुरू होने की संभावना प्रबल है।
– कालाजार के लक्षण :
– लगातार रुक-रुक कर या तेजी के साथ दोहरी गति से बुखार आना।
– वजन में लगातार कमी होना।
– दुर्बलता।
– मक्खी के काटे हुए जगह पर घाव होना।
– व्यापक त्वचा घाव जो कुष्ठ रोग जैसा दिखता है।
– प्लीहा में नुकसान होता है।
– छिड़काव के दौरान इन बातों का रखें ख्याल :
– छिड़काव के पूर्व घर की अन्दरूनी दीवार की छेद/दरार बंद कर दें।
– घर के सभी कमरों, रसोई घर, पूजा घर, एवं गोहाल के अन्दरूनी दीवारों पर छः फीट तक छिड़काव अवश्य कराएं। छिड़काव के दो घंटे बाद घर में प्रवेश करें।
– छिड़काव के पूर्व भोजन समाग्री, बर्तन, कपड़े आदि को घर से बाहर रख दें।
– ढाई से तीन माह तक दीवारों पर लिपाई-पोताई ना करें, जिसमें कीटनाशक (एसपी) का असर बना रहे।
– अपने क्षेत्र में कीटनाशक छिड़काव की तिथि की जानकारी आशा दीदी से प्राप्त करें।

विश्व तंबाकू दिवस आज-आज तंबाकू का सेवन नहीं करने का लें संकल्प

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-तंबाकू का सेवन कैंसर जैसी कई घातक बीमारियों का बनता है कारण
-जागरूकता अभियान चलाकर इससे होने वाली बीमारियों को करें कम

बांका, 30 मई-

आज विश्वा तंबाकू निषेध दिवस है। इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य तंबाकू के खतरों और स्वास्थ्य पर इसके नकारात्मक प्रभावों के प्रति लोगों में जागरूकता फैलानी है। साथ ही, निकोटीन और तंबाकू व्यवसाय का पर्यावरण पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों के प्रति जागरूकता अभियान चलाना और इससे होने वाली बीमारियों व मौतों को कम करना भी है। इस बार का थीम पर्यावरण की रक्षा करे हैं। यानी कि लोगों को जागरूक कर तंबाकू की आदत को छुड़ाएं। इससे न सिर्फ लोग बीमारियों से बचेंगे, बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।
एसीएमओ डॉ. अभय प्रकाश चौधरी कहते हैं कि तम्बाकू में जिस रसायन की मात्रा सबसे अधिक पायी जाती है वह निकोटिन है। निकोटिन स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है। यह इन्सान को नशे का आदी तो बनाता ही है। साथ में इसके प्रभाव से मानव शरीर में अनेकों प्रकार की कैंसर जैसी भयंकर बीमारियों को जन्म भी देती है। निकोटिन के प्रभाव के चलते व्यक्ति को भूख, प्यास, दिमाग आदि काम करना बंद कर देता है। इसके चलते धीरे-धीरे व्यक्ति पूर्ण रूप से बिना नशे के जीवित नहीं रह पाता है। वहीं नशा एक दिन व्यक्ति के जीवन के अंत का कारण भी बनता है। ऐसे में एक तरफ जहां व्यक्ति खुद को नशे के चलते बर्बाद तो करता ही है और नशे के कारण उसके साथ के रहने वाले परिवार और आसपास के लोग भी बहुत अधिक प्रभावित होता है। इसलिए आज से ही शपथ लें कि तंबाकू का सेवन नहीं करेंगे। साथ ही अगर कोई कर रहा होगा तो उसे इसके प्रति जागरूक करेंगे। ताकि वह भी इसका सेवन नहीं करे औऱ इससे होने वाली बीमारियों से बच जाए।
1987 में पहली बार मनाया गया तंबाकू दिवसः डॉ. चौधरी ने बताया कि विश्व तंबाकू दिवस के दिन तंबाकू के खतरे के बारे में जागरूकता फैलाई जाती है। तंबाकू का उपयोग किस तरह से शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, इसके बारे में तमाम जानकारियां इस खास दिन पर दी जाती हैं। इस खास दिन पर लोगों को तंबाकू के उपयोग के खतरों, तंबाकू कंपनियों के व्यवसाय प्रथाओं, डब्लूएचओ के प्लान के बारे में लोगों को सूचना दी जाती है। 1987 में पहला विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया गया। इसके बाद से लगातार इस दिन लोगों को तंबाकू और इसके सेवन के घातक परिणामों के प्रति लोगों में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। आज जिलेभर में जागरूकता कार्यक्रम चलाया जाएगा। तंबाकू के खतरों के प्रति आगाह किया जाएगा।
मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है तंबाकूः डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, तंबाकू का उपयोग वैश्विक स्तर पर मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। वर्तमान में दुनिया भर में 10 वयस्कों में से एक की मौत के लिए भी यह जिम्मेदार है। इसलिए तंबाकू से आज ही तौबा करें। किसी भी तरह के तंबाकू के सेवन से बचें। खैनी, पान, पुड़िया, गुटखा इत्यादि को सदा के लिए ना कहें। इसे खुद भी हाथ नहीं लगाएं और घर के सदस्य या फिर जानने वालों को भी इससे बचाए रखें।

कोरोना टीकाकरण को लेकर महीने में 12 दिन चलेगा महाअभियानः सिविल सर्जन

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-शत प्रतिशत टीकाकरण को लेकर स्वास्थ्य विभाग ने कसी कमर
-कोरोना और नियमित टीकाकरण को लेकर बनाई गई है रणनीति
भागलपुर, 28 मई।
कोरोना टीकाकरण के शत प्रतिशत लक्ष्य को पूरा करने के लिए महीने में 12 दिन अभियान चलाया जाएगा। सप्ताह में तीन दिन महाअभियान चलेगा। हर सप्ताह के सोमवार, गुरुवार औऱ शनिवार को कोरोना टीकाकऱण को लेकर महाअभियान चलाने का फैसला लिया गया है। साथ ही टीकाकरण को लेकर चलने वाला अभियान भी प्रतिदिन जारी रहेगा। इसके अलावा हर बुधवार और शुक्रवार को नियमित टीकाकरण का भी आयोजन किया जाता रहेगा। बुधवार और शुक्रवार के अतिरिक्त अन्य दिन भी सरकारी अस्पतालों में जाकर बच्चे या गर्भवती महिला टीका ले सकती हैं। जिले में टीकाकरण को लेकर व्यापक स्तर पर काम चल रहा है।
उक्त बातें सिविल सर्जन डॉ. उमेश कुमार शर्मा ने शनिवार को भीखनपुर स्थित एक होटल में आयोजित कार्य़शाला के दौरान कही। कार्यशाला का आयोजन सेंटर फॉर एडवोकेशी एंड रिसर्च (सीफार) और केयर इंडिया के सहयोग से स्वास्थ्य विभाग ने किया। कार्यशाला में एसीएमओ डॉ. अंजना, जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ. मनोज कुमार चौधरी, डीएचएस के डॉ. प्रशांत, केयर इंडिया के डीटीएल डॉ.  निनकुश अग्रवाल, डीटीओ डॉ. राजेश कुमार मिश्रा व डॉ. सुपर्णा टाट, डैम विकास कुमार, यूनिसेफ के अमित कुमार, यूएनडीपी के संदीप सिंह समेत स्वास्थ्य विभाग के कई कर्मचारी मौजूद थे। सिविल सर्जन ने कहा कि शहरी क्षेत्र में टीकाकरण की गति को बढ़ाने के लिए भी योजना बनाई गई है, जिसे जल्द ही जमीन पर उतारा जाएगा। मौके पर मौजूद शहरी स्वास्थ्य सलाहकार दयानंद मिश्र को उन्होंने शहरी क्षेत्र में टीकाकरण की गति को बढ़ाने के लिए और जोर लगाने के लिए कहा।
आरबीएसके की गाड़ी से भी किया जाएगा टीकाकरणः मौके पर मौजूद एसीएमओ डॉ. अंजना ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में टीकाकरण की गति को बढ़ाने के लिए आरबीएसके का भी सहयोग लिया जाएगा। सभी प्रखंडों में एक या दो गाड़ी आरबीएसके की है। उस गाड़ी में एएनएम को भी बिठाकर टीकाकऱण की गति को तेज किया जा सकता है। आरबीएसके की गाड़ी जहां-जहां जाएगी, वहां पर अगर कोई टीका लेने वाला दिखता है तो उसका टीकाकरण किया जाएगा। इससे जिले में टीका लेने वालों की संख्या बढ़ेगी और लक्ष्य की ओर हमलोग अग्रसर होंगे।
प्रीकॉशन डोज पर फोकसः कार्य़शाला में मौजूद जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ. मनोज कुमार चौधरी ने कहा कि अब प्रीकॉशन डोज पर फोकस किया जा रहा है। हालांकि इसके साथ-साथ पहली और दूसरी डोज देने का भी काम जारी रहेगा। लेकिन प्रीकॉशन डोज को पैसे देकर खरीदा गया है औऱ एक निश्चित समय के बाद यह एक्सपायर भी हो जाएगी। इसलिए अधिक-से-अधिक लोगों को प्रीकॉशन डोज देना जरूरी है। इसे लेकर जागरूकता अभियान भी चलाया जाएगा। जिनलोगों का समय पूरा हो गया है, उन्हें चिह्नित कर प्रीकॉशन डोज दी जाएगी।
नियमित टीकाकरण को लेकर सर्वे जल्दः जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी ने कहा कि कोरोना के साथ-साथ नियमित टीकाकरण पर भी जोर दिया जा रहा है। कोरोना काल में बहुत से बच्चे नियमित टीका नहीं ले सके हैं। हाल में चलाए गए मिशन इंद्रधनुष अभियान के दौरान सौ प्रतिशत से अधिक सफलता मिली, लेकिन इसे लेकर और काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि नियमित टीकाकरण को लेकर जल्द ही जिले में सर्वे का काम शुरू किया जाएगा। आशा कार्यकताओं के जरिये एक-एक घर का सर्वे कर बच्चों और महिलाओं को चिह्नित किया जाएगा और उन्हें टीका लगाने का काम किया जाएगा।

सहयोगी द्वारा सात दिवसीय अभियान चला दी गयी माहवारी पर जानकारियां

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अभियान के दौरान आयोजित किये गये माहवारी मेला व प्रशिक्षण कार्यक्रम
पुरुषों की सहभागिता पर बल ताकि घर में महिलाओं को मिले स्वस्थ्य माहौल
पटना, 28 मई:
प्रत्येक वर्ष 28 मई को विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस मनाया जाता है। सभी महिलाएं माहवारी के दौरान अलग—अलग अनुभवों से गुजरती हैं। पीरियड्स का प्रारंभ होने से उसके समाप्त होने तक विभिन्न समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। किशोरियों में पीरियड्स की जरूरत, शारीरिक रूप से परिपक्व होना, माहवारी के दौरान दर्द, देर से माहवारी का आना या अधिक रक्तस्राव आदि पर समझ बढ़ाने की जरूरत है ताकि ताकि पीरियड्स के प्रति नकारात्मक भाव को दूर किया जा सके।
अभियान चला कर दी गयी माहवारी स्वच्छता पर जानकारियां:
माहवारी के दौरान सफाई व स्वच्छता प्रबंधन पर जागरूकता लाने के लिए सहयोगी संस्था द्वारा सात दिवसीय अभियान चलाया गया. अभियान का उद्देश्य महिलाओं तथा किशोरियों में माहवारी विषय पर जागरूकता लाते हुए पुरानी धारणाओं व वर्जनाओं को दूर करना और उन्हें एक स्वस्थ्य माहौल मुहैया कराना था। अभियान के दौरान विभिन्न कार्यक्रम जैसे माहवारी मेला, जेंडर रिसोर्स सेंटर की स्थापना, माहवारी स्वच्छता प्रबंधन प्रशिक्षण, रेड डॉट, माहवारी ब्रेसलेट, पेंटिंग, सोप बैंक तथा पैड बैंक तथा पहली माहवारी का अनुभव सांझा कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।
पुरुष समाज भी हों जागरूक, महिलाओं को दें स्वस्थ्य माहौल:
सहयोगी की कार्यकारी निदेशक रजनी ने बताया मासिक धर्म के विषय में पुरानी धारणाओं को दूर करना जरूरी है। जीवन की इस प्रक्रिया पर पुरुष समाज को भी जागरूक करने की जरूरत है। सात दिवसीय अभियान के दौरान विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी सहभागिता सुनिश्चित की गयी ताकि घरों में किशोरियों व महिलाओं को एक बेहतर और स्वस्थ्य माहौल मिल सके और वे गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें। माहवारी महिलाओं के स्वस्थ होने का सूचक है। मां, बहनें व बेटियां  मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता को अपनायें। स्वस्थ्य यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य के लिए यह महत्वपूर्ण है। माहवारी के दौरान स्वच्छता प्रबंधन नहीं अपनाया जाना बीमारी का कारण बन जाता है।
जेंडर रिसोर्स सेंटर व प्रशिक्षण से दूर होंगी भ्रांतियां:
उन्होंने बताया महावारी पर जागरूकता लाने के लिए जेंडर रिसोर्स सेंटर और माहवारी स्वच्छता प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर पीरियड्स को लेकर किशोरियों व महिलाओं के मन में आने वाले उन सभी सवालों का निदान किया गया जिसका वो हल घरों में नहीं ढ़ूढ़ पाती हैं. उनके सवालों का विशेषज्ञों द्वारा जवाब दिये गये। बताया कि कई बार ऐसा देखने का मिला है किशोरियों में माहवारी प्रारंभ होने के बाद इस बात की जानकारी मिलती है कि माहवारी असर में क्या है। इस प्रकार के प्रशिक्षण से किशोर होती बच्चियों में इसके प्रति जागरूकता आयेगी और वे पूर्व से ही मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार रहेंगी. माहवारी से शारीरिक रूप से होने वाले बदलाव के बारे में समझ आवश्यक उपायों का इस्तेमाल कर सकेंगी।

टीबी है एक संक्रामक बीमारी इसलिए हमेशा रहें सावधान 

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– दो हफ्ते से ज्यादा खाँसी रहने पर तुरंत कराएं जाँच सभी अस्पतालों में उपलब्ध है मुफ्त जाँच की व्यवस्था
– जिलाभर के हेल्थ एण्ड वेलनेस सेंटर स्तर पर हो रही है सैम्पलिंग
– निक्षय पोषण योजना के तहत टीबी मरीजों को सरकार द्वारा दी जाती है सहायता राशि
मुंगेर, 27 मई=
टीबी एक संक्रामक बीमारी है । इस बीमारी के लक्षण कोरोना से काफी हद तक मिलते-जुलते होते हैं। इसके कारण इस बीमारी का सही पता लगाने में भी परेशानी होती है। ऐसे में पहले से टीबी जैसी बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए यह दौर विशेष सतर्कता बरतने का है। क्योंकि इन मरीजों का इम्युन सिस्टम बहुत कमजोर होता है। इसके कारण उनमें कोरोना संक्रमण का खतरा अन्य मरीजों से कई गुना अधिक है। ऐसी परिस्थिति में सबसे जरूरी है कि टीबी मरीजों की दवा का क्रम न टूटे। कोरोना में जहां लगातार तेज बुखार और खांसी आती है। वहीं टीबी के लक्षणों में थकावट, आम बुखार, वजन गिरना, भूख न लगना और रात में पसीना आना है।
– हेल्थ एण्ड वेलनेस सेंटर पर टीबी की सैम्पलिंग शुरू :
डिस्ट्रिक्ट टीबी/एआईवी कॉर्डिनेटर शैलेन्दु कुमार ने बताया कि अब जिले के सभी हेल्थ एण्ड वेलनेस सेंटर पर भी टीबी सैम्पलिंग की सुविधा शुरू कर दी गई है । ताकि संबंधित मरीज सुविधाजनक तरीके से जाँच करा सके और जाँच कराने में उन्हें कोई असुविधा नहीं हो।
उन्होंने बताया कि उक्त सेंटर पर सैंपल लेकर जाँच के लिए स्थानीय स्वास्थ्य संस्थान भेजा जाता है। वहाँ से रिपोर्ट आने के बाद मरीजों को टीबी की दवा उपलब्ध करा दी जाती है।
आम लोगों से अपील करते हुए उन्होंने कहा कि टीबी का लक्षण महसूस होते ही ऐसे लोगों को बिना देर किए अपनी बलगम सहित अन्य टीबी की जाँच करवानी चाहिए। जिला के सभी स्वास्थ्य संस्थानों में मुफ्त जाँच एवं दवाई की सुविधा उपलब्ध है। इसके साथ ही ऐसे मरीजों को उचित पोषण आहार के लिए प्रधानमंत्री मंत्री निक्षय पोषण योजना के तहत सहायता राशि भी दी जाती है।
टीबी से बचाव के उपाय :-
1- 2 हफ्ते से ज्यादा खांसी होने पर डॉक्टर को दिखाएं। दवा का पूरा कोर्स लें। डॉक्टर से बिना पूछे दवा बंद न करें।
– हमेशा मास्क पहनें या हर बार खांसने या छींकने से पहले मुंह को पेपर नैपकिन से कवर करें।
– मरीज किसी एक प्लास्टिक बैग में थूकें और उसमें फिनाइल डालकर अच्छी तरह बंद कर डस्टबिन में डाल दें। यहां-वहां नहीं थूकें।
– टीबी मरीज हवादार और अच्छी रोशनी वाले कमरे में रहें। साथ ही एसी से परहेज करें।
– पौष्टिक खाना खाएं एवं एक्सरसाइज व योगाभ्यास करें।
– बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, तंबाकू, शराब आदि से परहेज करें।
– भीड़-भाड़ वाली और गंदी जगहों पर जाने से बचें।
ये हैं टीबी के लक्षण:—-
– भूख न लगना, कम लगना तथा वजन अचानक कम हो जाना।
– बेचैनी एवं सुस्ती छाई रहना, सीने में दर्द का एहसास होना, थकावट रहना व रात में पसीना आना।
– हलका बुखार रहना, हरारत रहना।
– लगातार खांसी रहना, खांसी में बलगम आना तथा बलगम में खून आना। कभी-कभी जोर से अचानक खांसी में खून आ जाना।
– गर्दन की लिम्फ ग्रंथियों में सूजन आ जाना तथा वहीं फोड़ा होना।
– गहरी सांस लेने में सीने में दर्द होना, कमर की हड्डी पर सूजन, घुटने में दर्द, घुटने मोड़ने में परेशानी आदि।
– आंखें ऊपर को चढ़ना या बेहोशी आना ट्यूबरकुलस मेनिन्जाइटिस के लक्षण हैं।
– पेट की टीबी में पेट दर्द, अतिसार या दस्त, पेट फूलना आदि होते हैं।
– टीबी न्यूमोनिया के लक्षण में तेज बुखार, खांसी व छाती में दर्द होता है ।

संस्थागत प्रसव को दें प्राथमिकता, सुरक्षा के हर मानकों का रखा जाता है ख्याल 

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– सुरक्षित प्रसव के लिए प्रसव पूर्व जाँच है जरूरी, हर माह नौ तारीख को पीएचसी में की जाती है मुफ्त जाँच
– गर्भावास्था के दौरान योग्य चिकित्सकों से कराएँ जाँच, सुरक्षित और सामान्य प्रसव को मिलेगा बढ़ावा
खगड़िया, 27 मई-
गर्भधारण के साथ ही गर्भवती महिलाओं के मन में तरह-तरह के सवाल उठने लगते हैं। खासकर हर महिला के मन में सामान्य और सुरक्षित प्रसव की लालसा निश्चित रूप से होती है। किन्तु, थोड़ी सी लापरवाही बड़ी मुसीबत का सबब बन जाती है। इसलिए, सुरक्षित और सामान्य प्रसव के लिए संस्थागत प्रसव को प्राथमिकता देने की जरूरत है। दरअसल, सुरक्षित और सामान्य प्रसव के लिए सरकारी स्वास्थ्य संस्थान यानी अस्पतालों में पर्याप्त सुविधा उपलब्ध है । सुरक्षा के हर मानकों का भी ख्याल रखा जाता है। इससे ना सिर्फ सुरक्षित और सामान्य प्रसव को बढ़ावा मिलेगा बल्कि, मातृ-शिशु मृत्यु दर में भी कमी आएगी।
– सुरक्षित प्रसव के लिए अस्पताल में उपलब्ध है पर्याप्त सुविधा :
सिविल सर्जन डाॅ अमरनाथ झा ने बताया, सुरक्षित प्रसव के लिए पीएचसी एवं जिले के अस्पतालों में पर्याप्त सुविधा उपलब्ध है ।  प्रसव के लिए आने वाली प्रसूति को बेहतर से बेहतर सुविधा मिले, इस बात का विशेष ख्याल भी रखा जाता है। इसके अलावा संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा लोगों को जागरूक किया जा रहा है। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी एएनएम और आशा अपने-अपने पोषक क्षेत्र में घर-घर जाकर लोगों को जागरूक कर रही हैं।
– सुरक्षित मातृत्व के लिए प्रसव पूर्व जाँच है जरुरी :
शिशु मृत्यु दर में कमी के लिए बेहतर प्रसव एवं उचित स्वास्थ्य प्रबंधन जरूरी है। प्रसव पूर्व जाँच से ही गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य की सही जानकारी मिलती है। गर्भावस्था में बेहतर शिशु विकास एवं प्रसव के दौरान होने वाले रक्तस्राव के प्रबंधन के लिए महिलाओं में पर्याप्त मात्रा में खून होना आवश्यक होता है। जिसमें प्रसव पूर्व जाँच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एनीमिया प्रबंधन के लिए प्रसव पूर्व जाँच के प्रति महिलाओं की जागरूकता ना सिर्फ एनीमिया रोकथाम में सहायक होती बल्कि सुरक्षित मातृत्व की आधारशिला भी तैयार करती है। ऐसे में प्रसव पूर्व जांच की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि यह मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
– हर माह की नौ तारीख को प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत की जाती है मुफ्त जाँच :
सुरक्षित मातृत्व के लिए प्रसव पूर्व जाँच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके लिए हर माह की नौ तारीख को सभी पीएचसी एवं सरकारी अस्पतालों में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत मुफ्त जाँच की जाती है। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग द्वारा विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस आदि कार्यक्रम के माध्यम से एनेमिक गर्भवती महिलाओं की जाँच की जा रही  एवं साथ ही सामुदायिक स्तर पर गर्भवती महिलाओं को बेहतर खान-पान के बारे में भी जानकारी दी जा रही है। इसके साथ ही अधिक से अधिक गर्भवती माताओं की प्रसव पूर्व जाँच सुनिश्चित कराने पर बल दिया जा रहा है। इसके लिए सभी एएनएम एवं आशाओं का क्षमतावर्धन भी किया गया है। गर्भवती महिलाओं की चारों प्रसव पूर्व जांच माता एवं उसके गर्भस्थ शिशु की स्थिति स्पष्ट करती है  इससे संभावित जटिलताओं का पता चलता है। लक्षणों के मुताबिक जरुरी चिकित्सीय प्रबंधन किया जाता है। ताकि माता और उसके शिशु दोनों स्वस्थ्य रहें।

एनीमिया रोकथाम के लिए स्वच्छता एवं साफ-सफाई काफी कारगर 

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– गर्भवती महिलाएं साफ-सफाई का रखें विशेष ध्यान, स्वच्छ पानी के सेवन से कई रोगों से मिलेगी मुक्ति
लखीसराय, 27 मई-
स्वच्छता एवं साफ-सफाई किसी बीमारी से बचाव के लिए बेहद जरूरी है। क्योंकि, स्वच्छता एवं साफ-सफाई लोगों को बीमारियों के प्रभाव से काफी बचाव करता है। एनीमिया से बचाव एवं इसके रोकथाम के लिए स्वच्छता एवं साफ-सफाई काफी कारगर उपाय है। साथ ही ऐसे कई अन्य संक्रामक रोग भी हैं, जो दूषित पानी के सेवन या स्वच्छता के अभाव में फैलती है। जिसमें डायरिया एवं टाइफाइड प्रमुखता से शामिल होते हैं। इसलिए, लोगों को स्वच्छता एवं साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखना  बेहद जरूरी है।
– हुकवर्म से शरीर में संक्रमण के साथ होती है खून की कमी :
हुकवर्म एक परजीवी होता है। यह दूसरे जीवित प्राणी के शरीर में जीवित रहते हैं। हुकवर्म इन्फेक्शन छोटी आंत में होता है। हुकवर्म का लार्वा त्वचा के संपर्क में आने के बाद छोटी आंत में पहुँचता है। जिसके बाद शरीर में कई तरह के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। जिसमें पेट में दर्द, उल्टी का होना, भूख न लगना, शरीर में खुजली होना, वजन कम जाना एवं थकान जैसे लक्षण शामिल होते हैं। हुकवर्म के कारण शरीर में हीमोग्लोबिन यानी खून की कमी भी हो जाती है। सामान्य तौर पर यह संक्रमण गाँव में अधिक होता है। जिससे छोटे बच्चे भी प्रभावित होते हैं। यह संक्रमण ज्यादातर गंदगी के कारण ही होता है। खुले में शौच करना, हाथों की अच्छे से सफाई नहीं करना एवं नंगे पाँव जमीन पर चलने से इस संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इस लिहाज से साफ-सफाई पर अधिक ध्यान देने की जरूरत होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आँतों का वर्म विकासशील देशों की 10 फीसदी आबादी को संक्रमित करता है। जिससे एनीमिया, कुपोषण एवं बच्चों में विकास बाधित होता है।
– गर्भवती महिलाएं बरतें सावधानियां :
गर्भवती महिलाओं को साफ-सफाई पर अधिक ध्यान देने की जरूरत होती है। गर्भावस्था में खून की कमी के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। हाथों की उचित साफ-सफाई के आभाव में हुकवर्म का खतरा गर्भवती महिलाओं को भी हो सकता एवं इससे संक्रमण के साथ खून की कमी भी हो सकती है। इस लिहाज से गर्भवती महिलाएं हर बार हाथ धोते समय साबुन या राख का उपयोग करें। बहते या बहते पानी के नीचे हाथ धोएं। भोजन को तैयार करने या खाने से पहले हाथ धोएं और किसी को खिलाने या दवाइयाँ देने से पहले भी हाथों की सफाई करें। शौचालय जाने के बाद, शौच करने वाले व्यक्ति की सफाई करने, नाक बहने, खांसने, छींकने या किसी जानवर या जानवर के अपशिष्ट को संभालने के बाद और किसी बीमार व्यक्ति की देखभाल करने से पहले और बाद में भी हाथ धोएं। साथ ही घर में पीने के पानी को स्वच्छ रखें। पानी को उबालकर या फिल्टर युक्त पानी का सेवन करना जरुरी है। इससे दूषित पानी से फैलने वाले रोगों की आसानी से रोकथाम हो सकती है।
– स्वच्छता एवं साफ़-सफाई वर्तमान समय की माँग :
सिविल सर्जन डॉ देवेंद्र कुमार चौधरी ने बताया, वर्तमान समय में स्वच्छता एवं साफ-सफाई अनिवार्य है। इससे संक्रामक रोगों से भी निजात मिलेगी। उन्होंने बताया, बच्चों में डायरिया दूषित पानी एवं हाथों की साफ-सफाई की कमी के कारण ही होते हैं। इसको लेकर आशा कार्यकर्ता गृह भ्रमण के दौरान हाथों की सफाई के बारे में जानकारी भी देती है। उन्होंने लोगों से यह अपील भी की है कि सभी लोग साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें और अनावश्यक परेशानियाँ से दूर रहें।

चुनौतियों को दरकिनार कर समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुँचाई स्वास्थ्य सुविधा का लाभ

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– सराहनीय कार्य की बदौलत आशा कार्यकर्ता संयुक्ता देवी ने इलाके में बनाई अपनी अलग पहचान
– कोविड क्षेत्र में बेहतर कार्य के लिए जिलास्तर पर डीएम के हाथों हो चुकी सम्मानित

बाँका, 27 मई-

सामुदायिक स्तर पर बेहतर से बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुँच सके, इसको लेकर सरकार एवं स्वास्थ्य विभाग काफी गंभीर है। ताकि एक भी जरूरतमंद स्वास्थ्य सेवा से वंचित नहीं रहे और समाज के आखिरी व्यक्ति को सुविधाजनक तरीके से सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध सुविधाओं का लाभ मिल सके। जिसे सार्थक रूप देने के लिए स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी आशा कार्यकर्ता भी पीछे नहीं है। बल्कि, समाज के अंतिम व्यक्ति तक स्वास्थ्य सुविधा को पहुँचाने एवं सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों से लोगों को जोड़ने के लिए अपने कर्तव्य पथ पर चुनौतियों और परेशानियों का सामना करने के बाद भी अग्रसर है। ऐसे ही आशा कार्यकर्ताओं में जिले के अमरपुर रेफरल अस्पताल में कार्यरत सलेमपुर दक्षिण क्षेत्र की आशा संयुक्ता देवी का पूरे इलाके में नाम शुमार है। संयुक्ता, ना सिर्फ लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ पहुँचाने में सफल रही हैं। बल्कि, लोगों को सरकारी स्वास्थ्य से जोड़ने में भी सफल रही।

– कोविड क्षेत्र में बेहतर कार्य के लिए डीएम के हाथों हो चुकी हैं सम्मानित :
रेफरल अस्पताल के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डाॅ सुनील कुमार चौधरी ने बताया, आशा कार्यकर्ता संयुक्ता देवी परिवार नियोजन, टीकाकरण, कोविड, प्रसव, गृह भ्रमण समेत स्वास्थ्य से संबंधित अन्य क्षेत्रों में बेहतर कार्य कर रही है। कोविड क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के लिए जिला स्तर पर जिलाधिकारी के हाथों सम्मानित की जा चुकी है। संयुक्ता को वर्ष 2006 में आशा की नौकरी मिली। इसके बाद उसने अपने क्षेत्र में कार्य करना शुरू किया। किन्तु, तब लोगों को समझाना और समाज में चल रही भ्रांतियाँ को दूर कर स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य करना आसान नहीं थी। इस दौरान संयुक्ता को अपने क्षेत्र के लोगों की काफी आलोचना, विरोध समेत तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वह इन परेशानियाँ से कभी घबराई नहीं। बल्कि, सकारात्मक उम्मीद के साथ अपने कार्य पर डटी रही है। जिसका नतीजा यह हुआ कि जैसे-जैसे समय बीतते गया, वैसे-वैसे लोगों में सकारात्मक बदलाव होने लगा और संयुक्ता की राह धीरे-धीरे आसान भी होने लगी। यही नहीं, जिसने शुरुआती दौर में जितना विरोध किया, वो उतना ही बदलते दौर के साथ समर्थक भी बनने लगा।

– कोविड के मुश्किल भरे दौर में भी लोगों तक पहुँचाती रही स्वास्थ्य सेवा :
कोविड के मुश्किल भरे दौर में जब लोग घरों से बाहर निकलना खुद को महफूज नहीं समझ रहे थे। अपनों से भी दूरी बनाने लगे थे। तब ऐसे मुश्किल भरे दौर में भी आशा कार्यकर्ता संयुक्ता देवी अपने कर्तव्य पथ से पीछे नहीं हटी, बल्कि अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रही और लोगों तक स्वास्थ्य सुविधा पहुँचाती रही। परिवार नियोजन के प्रति भी सामुदायिक स्तर पर लोगों को पुराने ख्यालातों और भ्रांतियों से दूर कर बेहतर कार्य करने में सफल रही है। इसके अलावा स्वास्थ्य से संबंधित अन्य कार्यों में भी बेहतर करने में सफल रही।

– चुनौतियों और परेशानियों की कभी नहीं की परवाह, अपने कर्तव्य पथ पर सकारात्मक उम्मीद के साथ चलती रही :
आशा संजुक्ता देवी ने बताया, समाज के अंतिम व्यक्ति तक स्वास्थ्य सेवा का लाभ पहुँचाना और लोगों को सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों से जोड़ने के साथ-साथ खुद व परिवार का भी ख्याल रखना, निश्चित रूप से चुनौतियों और परेशानियाँ से भरा हुआ था। किन्तु, कभी इसकी परवाह नहीं की। बल्कि, तमाम चुनौतियों और परेशानियों को नजरअंदाज कर अपने कर्तव्य पथ पर डटी रही। वहीं, उन्होंने बताया, चुनौती यह कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के प्रति लोगों को नजरिये को बदलना और परेशानी यह कि खुद व परिवार का भी ख्याल रखते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति तक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ पहुँचाना। मेरी मेहनत का सकारात्मक परिणाम यह है कि अब लोग खुद सरकार द्वारा जनहित में चलाई जा रही तमाम स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी लेने मेरे पास आने लगे हैं। वहीं, उन्होंने बताया, पुरस्कार मिलने से कार्य करने का जज्बा और ऊर्जा दुगुनी होती और अन्य कर्मियों में भी अपने कार्य के प्रति जिज्ञासा बढ़ती है।

कोरोना की तरह टीबी भी है संक्रामक बीमारी, रहें सावधान

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– लगातार खाँसी रहने पर तुरंत कराएं जाँच, अस्पताल में मुफ्त होती है जाँच
– हेल्थ एण्ड वेलनेस सेंटर पर सैम्पलिंग  शुरू, मरीजों को सरकार द्वारा दी जाती है सहायता राशि
लखीसराय, 26 मई-
कोरोना की तरह ही टीबी भी एक संक्रामक बीमारी है । दोनों बीमारियों के लक्षण भी करीब-करीब एक जैसे ही मिलते-जुलते होते हैं। जिसके कारण बीमारी का सही पता लगाने में भी परेशानी होती है। ऐसे में पूर्व से टीबी जैसी बीमारी से पीड़ित मरीजों के लिए यह दौर विशेष सतर्कता बरतने का है। क्योंकि इन मरीजों का इम्युन सिस्टम बहुत कमजोर होता है। जिसके कारण उनमें कोरोना संक्रमण का खतरा अन्य मरीजों से कई गुना अधिक है। सबसे जरूरी है कि मरीज की दवा का क्रम न टूटे। कोरोना में लगातार तेज बुखार और खांसी आती है। टीबी का लक्षण थकावट, आम बुखार, वजन गिरना, भूख न लगना, रात में पसीना आना आदि है।
– हेल्थ एण्ड वेलनेस सेंटर पर टीबी की सैम्पलिंग शुरू :
टीबी के नोडल पदाधिकारी डाॅ पीसी वर्मा ने बताया, अब जिले के सभी हेल्थ एण्ड वेलनेस सेंटर पर भी टीबी सैम्पलिंग की सुविधा शुरू कर दी गई है। ताकि संबंधित मरीज सुविधाजनक तरीके से जाँच करा सकें और जाँच कराने में कोई असुविधा नहीं हो। वहीं, उन्होंने बताया, उक्त सेंटर पर सैंपल लेकर जाँच के लिए स्थानीय स्वास्थ्य संस्थान भेजा जाता है। वहाँ से रिपोर्ट आने के बाद मरीजों को उपलब्ध करा दिया जाता है। वहीं, उन्होंने बताया, लक्ष्मण का महसूस होते ही ऐसे मरीजों को बिना देर किए अपनी जाँच करवानी चाहिए। जिले के सभी स्वास्थ्य स्थानों में मुफ्त जाँच एवं दवाई की सुविधा उपलब्ध है। साथ ही ऐसे मरीजों को उचित पोषण आहार के लिए सहायता राशि भी दी जाती है।
बचाव के उपाय:—-
1- 2 हफ्ते से ज्यादा खांसी होने पर डॉक्टर को दिखाएं। दवा का पूरा कोर्स लें। डॉक्टर से बिना पूछे दवा बंद न करें।
-मास्क पहनें या हर बार खांसने या छींकने से पहले मुंह को पेपर नैपकिन से कवर करें।
-मरीज किसी एक प्लास्टिक बैग में थूकें और उसमें फिनाइल डालकर अच्छी तरह बंद कर डस्टबिन में डाल दें। यहां-वहां नहीं थूकें।
-मरीज हवादार और अच्छी रोशनी वाले कमरे में रहें। साथ ही एसी से परहेज करें।
-पौष्टिक खाना खाएं, एक्सरसाइज व योग करें।
-बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, तंबाकू, शराब आदि से परहेज करें।
-भीड़-भाड़ वाली और गंदी जगहों पर जाने से बचें।
ये हैं टीबी के लक्षण:—-
-भूख न लगना, कम लगना तथा वजन अचानक कम हो जाना।
-बेचैनी एवं सुस्ती छाई रहना, सीने में दर्द का एहसास होना, थकावट रहना व रात में पसीना आना।
-हलका बुखार रहना, हरारत रहना।
-खांसी आती रहना, खांसी में बलगम आना तथा बलगम में खून आना। कभी-कभी जोर से अचानक खांसी में खून आ जाना।
-गर्दन की लिम्फ ग्रंथियों में सूजन आ जाना तथा वहीं फोड़ा होना।
-गहरी सांस लेने में सीने में दर्द होना, कमर की हड्डी पर सूजन, घुटने में दर्द, घुटने मोड़ने में परेशानी आदि।
– आंखें ऊपर को चढ़ना या बेहोशी आना ट्यूबरकुलस मेनिन्जाइटिस के लक्षण हैं।
-पेट की टीबी में पेट दर्द, अतिसार या दस्त, पेट फूलना आदि होते हैं।
-टीबी न्यूमोनिया के लक्षण में तेज बुखार, खांसी व छाती में दर्द होता है।

संपूर्ण शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए विटामिन, प्रोटीन, वसा एवं कार्बोहाइड्रेट कारगर

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– विटामिन डी -3 हड्डी एवं ह्रदय रोगों से करता है बचाव
 – गर्भवती महिलाओं में विटामिन बी-12 की कमी के कारण नवजात शिशुओं पर पड़ता हैं बुरा असर : डॉ नीलू
– प्राकृतिक रूप में मिलने वाले खाद्य पदार्थों में विटामिन की रहती हैं प्रचुर मात्रा
मुंगेर, 26 मई
मानव के संपूर्ण शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए विटामिन,  प्रोटीन, वसा एवं कार्बोहाईड्रेट की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए। ह्रदय, स्नायु, मस्तिष्क एवं हड्डियों से संबंधित व्याधियों में विशेषकर विटामिन बी -12 एवं डी – 3 का अहम योगदान होता है। नियमित रूप से आहार लेने के साथ ही बी-12 एवं डी-3 युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन से इनकी कमी को पूरा करते हुए अन्य प्रकार की होने वाली गंभीर समस्याओं या रोगों से बचा जा सकता है।
मुंगेर के एसीएमओ सह प्रभारी सिविल सर्जन डॉ. आनंद शंकर शरण सिंह ने बताया कि विटामिन डी-3 हड्डी एवं ह्रदय रोगों से बचाव करता है। इसकी कमी के कारण नवजात शिशु रिकेट्स एवं युवा ओस्टियोमलेसिया नामक हड्डी रोग से पीड़ित हो जाते हैं। इन दोनों रोगों में हड्डी की कठोरता खत्म होने लगती है। इसके साथ ही यह लचीला भी हो जाता है। इससे हड्डी में विभिन्न प्रकार के रोग होने लगते हैं। इसके अलावा विटामिन डी-3 ह्रदय को भी स्वस्थ्य रखने में सहयोग करता है। इससे होने वाली मृत्यु में कमी भी लाता है। उम्र बढ़ने के साथ ही व्यक्ति का शरीर विटामिन डी को इसके सक्रिय अवस्था (डी-3) में परिवर्तित करने में अक्षम होने लगता है। जिसके कारण शरीर में विटामिन डी-3 की कमी होने लगती है।
गर्भवती महिलाओं में विटामिन बी-12 की कमी के कारण नवजात शिशुओं पर पड़ता है बुरा असर : डॉ. नीलू
केयर इंडिया मुंगेर की डीटीओ ऑफ डॉ. नीलू ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में विटामिन बी – 12 की कमी के कारण धातृ महिलाओं के स्वास्थ्य के साथ ही नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े संगठनों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में विटामिन बी-12 की कमी के कारण शिशुओं में स्नायु से संबंधित रोगों की संभावना काफ़ी बढ़ जाती है।
गर्भवती महिलाओं के प्रसव के दौरान होने वाली विभिन्न तरह की जटिलताएं जैसे: अचानक गर्भपात, उच्च रक्तचाप एवं पेशाब में प्रोटीन की अधिकता से विटामिन बी-12 माताओं का बचाव करता है। इसके अलावा विटामिन बी-12 स्नायु उत्तम स्वास्थ्य, मस्तिष्क विकास एवं लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी काफ़ी सहयोग करता है। इसकी कमी के कारण स्नायु तंत्रों में कमज़ोरी, शरीर में खून बनाने वाली कोशिकाओं में कमी (एनीमिया) एवं उम्र के मुताबिक मस्तिष्क के विकास में बाधा उत्पन्न करता है।
प्राकृतिक रूप में मिलने वाले खाद्य पदार्थों में विटामिन की रहती हैं प्रचुर मात्रा :
उन्होंने बताया कि प्राकृतिक रूप से मिलने वाले खाद्य पदार्थों में विटामिन बी-12 एवं डी- 3 की प्रचुर मात्रा होती है। जिसके नियमित सेवन से इसकी कमी को दूर किया जा सकता है। हालांकि मछली, मीट, मुर्गा, अंडा, दूध एवं दूध से बने खाद्द पदार्थों में विटामिन बी-12 अधिक मात्रा में पाया जाता है। सूर्य की पहली किरण विटामिन डी-3 का सर्वेश्रेष्ट प्राकृतिक स्रोत माना जाता है। बेहद कम खाद्य पदार्थ हैं जिनमें विटामिन डी-3 की प्रचुरता होती है। पनीर, अंडे एवं संतरे के जूस में विटामिन डी-3 की थोड़ी ज्यादा मात्रा पाई जाती है।