पोलियो अभियान को लेकर तैयारी करें शुरूः सिविल सर्जन

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-बच्चों को चिह्नित करने से लेकर टीम बनाने के काम में लग जाएं
-सदर अस्पताल के हॉल में स्वास्थ्य विभाग की हुई समीक्षा बैठक
भागलपुर, 18 मई
सदर अस्पताल के हॉल में बुधवार को स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता सिविल सर्जन डॉ. उमेश कुमार शर्मा ने की। इस दौरान एसीएमओ डॉ. अंजना, जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ. मनोज कुमार चौधरी, डीपीएम फैजान आलम अशर्फी एवं सभी अस्पतालों के प्रभारी, बीएचएम और बीसीएम मौजूद थे। बैठक को संबोधित करते हुए सिविल सर्जन डॉ. उमेश कुमार शर्मा ने बताया कि जिले में पल्स पोलियो अभियान शुरू होगा। इसे लेकर अभी से तैयारी शुरू कर दें। बच्चों को चिह्नित करने से लेकर टीम बनाने के काम पर अभी से लग जाएं।
एक भी बच्चा छूट न पाएः बैठक को संबोधित करते हुए जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ. मनोज कुमार चौधरी ने बताया कि पल्स पोलियो अभियान के दौरान एक-एक बच्चे को दवा पिलायी जाएगी। इस बात का ध्यान रखना होगा कि एक भी बच्चा छूट न जाए। इसलिए अभी से ही घर-घर जाकर बच्चों को चिह्नित करने का काम शुरू कर दें। सभी घरों से पांच वर्ष तक के बच्चों की सूची बना लें। अभियान के दौरान रजिस्टर से मिलान कर एक-एच बच्चे को दवा पिलाई जाएगी।
प्रीकॉशन डोज में लाएं तेजीः समीक्षा बैठक के दौरान सिविल सर्जन ने बताया कि कोविड टीकाकरण की गति को और तेज करें। बचे हुए लोगों को जल्द से जल्द टीका देने का काम करें। जिन लोगों ने एक डोज लेकर दूसरी डोज नहीं ली है, उन्हें जल्द से जल्द दूसरी डोज दिलाने को लेकर टीकाकरण केंद्रों तक लाएं। साथ ही अभी भी जो लोग कोरोना टीका की पहली डोज लेने से वंचित हैं, उनका भी टीकाकरण जल्द कराएं। इसके अलावा प्रीकॉशन डोज में भी तेजी लाने के लिए कहा गया। 18 साल से अधिक उम्र के सभी लोगों को कोरोना टीका प्रीकॉशन डोज दी जा रही है। इसका टारगेट भी जल्द पूरा करने के लिए कहा गया।
हर प्रसूता की एएनसी जांच करें सुनिश्चितः बैठक में सिविल सर्जन ने बताया कि हर एक प्रसूता की एएनसी जांच सुनिश्चित करें। हर महीने की नौ तारीख को एएनसी जांच के लिए शिविर तो लगता ही है, साथ में अन्य दिनों में भी इसकी जांच तेज गति से हो, यह सुनिश्चित करें। इसे लेकर एएनएम को क्षेत्र में दौरा करने के लिए कहें। एएनएम के दौरे की निगरानी करते रहें। बैठक में परिवार नियोजन को लेकर जिले में चल रहे कार्यक्रम में भी तेजी लाने के लिए कहा गया। खासकर अस्थायी सामग्री के वितरण पर भी जोर देने के लिए कहा गया।

तीन दिन में कुपोषित बच्चों की सूची तैयार कर कराएं उपलब्ध : जिलाधिकारी

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– आईसीडीएस की मासिक समीक्षात्मक बैठक के दौरान मौजूद सीडीपीओ और एलएस को दिए निर्देश
– समाहरणालय परिसर स्थित मंत्रणा कक्ष में बैठक का  आयोजन, कुपोषण मुक्त समाज निर्माण पर दिया गया बल
लखीसराय, 17 मई-
मंगलवार को समाहरणालय परिसर स्थित मंत्रणा कक्ष में जिलाधिकारी संजय कुमार सिंह की अध्यक्षता में आईसीडीएस की एक मासिक समीक्षात्मक बैठक हुई। जिसमें आईसीडीएस डीपीओ समेत जिले के सभी सीडीपीओ, एल एस (महिला सुपरवाइजर) के अलावा केयर इंडिया और महिला हेल्पलाइन के पदाधिकारी शामिल हुए। बैठक में चयन की पारदर्शिता , आंगनबाड़ी केंद्र भवन निर्माण हेतु भूमि की उपलब्धता, प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना, मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना समेत सरकार द्वारा जनहित में चलाई जा रही आईसीडीएस से संबंधित तमाम योजनाओं की बारीकी के साथ समीक्षा की गई। जिसके बाद लाभार्थियों को पूरी पारदर्शिता के साथ सुलभ तरीके से लाभ मिले, इस पर विस्तृत चर्चा की गई । साथ ही कुपोषण मुक्त समाज निर्माण पर भी बल दिया गया। जिसपर चर्चा करते हुए जिलाधिकारी ने मौजूद सभी एल एस को तीन दिन में अपने-अपने पोषक क्षेत्र के सभी कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों की सूची तैयार कर आईसीडीएस एवं जिला प्रशासन को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। साथ ही मौजूद सभी सीडीपीओ को इसे सुनिश्चित कराने को कहा। वहीं, जिलाधिकारी ने कहा आवश्यकतानुसार कुपोषण की समस्या से पीड़ित बच्चों को जिले में संचालित एनआरसी (पोषण पुनर्वास केंद्र) में भर्ती कराएं। साथ ही सरकार द्वारा ऐसे बच्चों के लिए चलाई जा रही योजनाओं से लाभान्वित भी कराएं। ताकि पीड़ित बच्चे को बेहतर सुविधा मिल सके और कुपोषण मुक्त समाज निर्माण हो सके। दरअसल, पूरे देश में कुपोषण गंभीर समस्या है। इसलिए, इसे खत्म कर सुपोषित समाज निर्माण के लिए हर जिम्मेदारों को जरूरी पहल करने की जरूरत है। इस मौके पर आईसीडीएस की डीपीओ रश्मि चौधरी, केयर इंडिया के डीटीएल नावेद उर रहमान, डीटीओ-ऑन राकेश कुमार साहु आदि मौजूद थे।
– सभी कुपोषित बच्चों को चिह्नित कर बनाई जाएगी सूची :
आईसीडीएस की डीपीओ रश्मि चौधरी ने बताया, आयोजित मासिक समीक्षात्मक बैठक के दौरान जिलाधिकारी के द्वारा तीन दिन में सभी कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों की सूची तैयार कर  विभाग समेत जिला प्रशासन को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। जिसे हर हाल में पूरा कर निर्धारित समयावधि के अंदर उपलब्ध करा दी जाएगी। इसे सुनिश्चित करने को लेकर जिले की सभी सीडीपीओ को जरूरी निर्देश दिए गए हैं एवं एक-एक बच्चे को चिह्नित कर सूची तैयार कराने को कहा गया है। वहीं, उन्होंने बताया, आवश्यकतानुसार बच्चों को एनआरसी में भर्ती कराया जाएगा।
– कुपोषित बच्चों के लिए संजीवनी है पोषण पुनर्वास केंद्र :
केयर इंडिया के डीटीएल नावेद उर रहमान ने बताया, राज्य सरकार के निर्देशानुसार जिले में भी बच्चों में पोषण की कमी से निपटने के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र की स्थापना की गई है, जो कुपोषण की समस्या से पीड़ित बच्चों के बीच संजीवनी साबित हो रही है। वहीं, उन्होंने बताया, कुपोषण की समस्या से जूझ रहे बच्चों को 14 दिनों के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र में रखा जाता है। जहाँ कुपोषित बच्चों को डाक्टर की सलाह के अनुसार ही उनका खानपान का विशेष ख्याल रखा जाता है। यहां रखे गए बच्चे यदि 14 दिनों के अंदर कुपोषण से मुक्त नहीं हो पाते हैं तो वैसे बच्चों को एक माह तक विशेष रूप से देखभाल की जाती है। पोषण पुनर्वास  केंद्र में मिलने वाली सभी सुविधाएं नि:शुल्क होती हैं। यहां भर्ती हुए बच्चों के वजन में न्यूनतम 15 प्रतिशत की वृद्धि के बाद ही उसे यहां से डिस्चार्ज किया जाता है।

समय से पहले प्रसव होने पर चिकित्सकों की सलाह अनुसार ही कराएं उपचार

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– जच्चा-बच्चा दोनों को परेशानियाँ का करना पड़ सकता है सामना
– समय से पूर्व प्रसव होने पर शिशु रहता है बेहद कमजोर, इसलिए उचित इलाज जरूरी
मुंगेर, 17 मई-
प्रत्येक महिला में गर्भावस्था के दौरान ससमय एवं सुरक्षित प्रसव होने की लालसा रहती और इस दौरान मन में तरह-तरह के सवाल और खुशियाँ भी रहती हैं । हालाँकि, इस दौरान थोड़ी सी अनदेखी और लापरवाही बड़ी मुश्किल बन जाती और महिलाओं को तरह- तरह की परेशानियाँ से जूझना पड़ता है। ऐसी ही एक परेशानी समय पूर्व प्रसव होना है। जो जच्चा-बच्चा दोनों के लिए परेशानी बन जाती है। हालाँकि, समय पूर्व प्रसव होने के कई कारण हैं। किन्तु सामान्यतः कमजोर महिलाएं खासकर इस दायरे में आ ही जाती हैं। समय पूर्व प्रसव में जन्म लेने वाले शिशु भी बेहद कमजोर होते हैं। क्योंकि, समय पूर्व प्रसव होने के कारण शिशु गर्भ के दौरान मानसिक, शारीरिक रूप से संबल नहीं हो पाता है। इसलिए ऐसी स्थिति में जच्चा- बच्चा का योग्य चिकित्सकों की सलाह के अनुसार ही इलाज कराएं। क्योंकि, ऐसे शिशु जन्म लेने के साथ कई तरह की समस्याओं से घिर जाते हैं। इसलिए, ऐसे शिशु के स्वस्थ्य शरीर निर्माण के लिए उचित और समुचित इलाज जरूरी है।
– कम उम्र में गर्भधारण से भी होता है समय पूर्व प्रसव :
मुंगेर के अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी सह प्रभारी सिविल सर्जन डाॅ.आनंद शंकर शरण सिंह ने बताया कि समय पूर्व प्रसव होने के कई कारण हैं। जैसे कि माता का 40 किलोग्राम से कम वजन होना, शरीर में खून की कमी, गर्भावस्था के दौरान या प्रसव पूर्व ब्लीडिंग होना, गर्भाशय मुख का बेहद कमजोर होना आदि। इसलिए गर्भावास्था के दौरान समय- समय पर चिकित्सकों से जाँच करानी चाहिए एवं उनके चिकित्सा परामर्श के अनुसार आवश्यक इलाज भी कराना चाहिए। हालाँकि, इसमें कम उम्र में गर्भधारण करना और गर्भावस्था के दौरान उचित खान-पान का सेवन नहीं करना आदि मुख्य कारण हैं। क्योंकि, ऐसी स्थिति में महिलाएँ काफी कमजोर हो जाती हैं। जिसके कारण सुरक्षित प्रसव नहीं हो पाता है।
– गर्भधारण के लिए सही उम्र होना जरूरी  :
उन्होंने बताया कि गर्भधारण के लिए महिलाओं का सही उम्र होना भी बेहद जरूरी है। क्योंकि, कम उम्र में गर्भधारण होने से हमेशा समय पूर्व प्रसव होने की संभावना बनी रहती है। जिससे महिलाओं को कई प्रकार की जटिल परेशानियों से जूझना पड़ जाता है। इसलिए गर्भधारण के लिए महिलाओं का कम से कम 20 वर्ष का होना जरूरी है। इसलिए, इस उम्र में ही गर्भधारण करना चाहिए। ताकि किसी प्रकार की अनावश्यक परेशानी उत्पन्न नहीं हो।
– प्रसव पूर्व समय- समय पर कराते रहें जाँच :
केयर इंडिया की डीटीओ ऑफ डॉ. नीलू ने बताया कि सुरक्षित और सामान्य प्रसव के लिए गर्भवती महिलाओं को समय- समय पर जाँच कराते रहना चाहिए। प्रसव पूर्व जाँच के लिए सरकार द्वारा पीएचसी स्तर पर भी मुफ्त जाँच की व्यवस्था की गई है। जहाँ हर माह नौ तारीख को गर्भवती महिलाओं की निः शुल्क जाँच होती और जाँचोपरांत आवश्यक चिकित्सा परामर्श भी दिया जाता है।
 – गर्भावस्था के दौरान प्रोटीन, आयरन और कैल्सियम युक्त खाने का सेवन ज्यादा करना चाहिए :
उन्होंने बताया कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को प्रोटीन, आयरन और कैल्सियम युक्त खाने का ज्यादा से ज्यादा सेवन करना चाहिए। दाल, पनीर, अंडा, पालक, सोयाबीन, नॉनवेज, गुड़, अनार, नारियल, चना, हरी सब्जी आदि का सेवन करना चाहिए। साथ ही व्यक्तिगत साफ-सफाई का भी विशेष ख्याल रखना चाहिए।
– क्या है समय से पूर्व प्रसव :
37 हफ्ते के बाद होने वाले प्रसव को सामान्य एवं परिपक्व प्रसव कहा जाता है। किन्तु, इससे पूर्व प्रसव होने पर समय पूर्व प्रसव कहा जाता है। इस स्थिति में माँ के साथ-साथ जन्म लेने वाले शिशु काफी कमजोर होते हैं और दोनों को कई तरह की परेशानियाँ का सामना करना पड़ जाता। दरअसल, समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चे मानसिक एवं शारीरिक रूप से तो बेहद कमजोर होते ही हैं। इसके अलावा ऐसे शिशु में स्तनपान के लिए माँ की छाती को चूसने एवं साँस लेने की क्षमता भी नहीं होती है। जिसके कारण बच्चे कई तरह की समस्याओं से घिर जाते हैं।

फाइलेरिया उन्मूलन • अलौली पीएचसी में शिविर आयोजित कर संक्रमित मरीजों में एमएमडीपी किट वितरित 

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– जिले के स्वास्थ्य संस्थानों में बारी-बारी से शिविर आयोजित कर मरीजों में किट का वितरण
खगड़िया, 17 मई। फाइलेरिया उन्मूलन को लेकर सरकार एवं स्वास्थ्य विभाग काफी गंभीर और सजग है। इसको लेकर सरकार और प्रशासनिक स्तर पर हर जरूरी निर्णय भी लिए जा रहे हैं। जिसे सार्थक रूप देने के लिए जिले के विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों में निर्धारित तिथि के अनुसार लगातार बारी-बारी से शिविर आयोजित कर फाइलेरिया संक्रमित मरीजों के बीच एमएमडीपी किट का वितरण किया जा रहा है। ताकि मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा का लाभ मिल सके और वह सुविधाजनक तरीके से अपना उपचार करा सके। इसी कड़ी में मंगलवार को जिले के अलौली पीएचसी में संक्रमित मरीजों के बीच एमएमडीपी किट वितरण के लिए एक शिविर का आयोजन किया गया। जिसका उदघाटन प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डाॅ मनीष कुमार और डॉ रेखा कुमारी ने मरीजों के बीच एमएमडीपी किट वितरण कर किया। इसके बाद शिविर में मौजूद सभी मरीजों को बारी-बारी से एमएमडीपी किट उपलब्ध करायी गयी। इस दौरान किट के सही इस्तेमाल समेत फाइलेरिया से बचाव समेत इसके कारण, लक्षण एवं उपचार की विस्तृत जानकारी दी गई। साथ ही लक्षण दिखते ही तुरंत जाँच कराने और जाँच के पश्चात चिकित्सा परामर्श का पालन करने समेत अन्य आवश्यक जानकारी दी गई। ताकि संबंधित मरीज शुरुआती दौर में ही जाँच करा सके और ससमय इलाज शुरू हो सके। इस मौके पर भीबीडीएस अरुण  कुमार, केयर इंडिया के प्रखंड प्रबंधक रमण कुमार, प्रखंड समन्वयक श्रवण कुमार, स्वास्थ्य प्रशिक्षक राम हलीश चौधरी आदि मौजूद थे।
– किट वितरण के साथ मरीजों को आवश्यक चिकित्सा परामर्श  :
अलौली पीएचसी प्रभारी डाॅ मनीष कुमार ने बताया, आयोजित शिविर में मौजूद सभी मरीजों के बीच एमएमडीपी किट वितरण के साथ-साथ फाइलेरिया से बचाव से संबंधित आवश्यक और जरूरी जानकारी भी दी गई। जिसमें संक्रमित मरीजों को किन-किन बातों का ख्याल रखते हुए इलाज कराना है। फाइलेरिया से बचाव के लिए क्या-क्या सावधानी बरतनी है। इसके कारण और लक्षण समेत अन्य जरूरी जानकारी दी गई। इसके अलावा किट के उचित इस्तेमाल की भी जानकारी दी गई। वहीं, उन्होंने बताया, फाइलेरिया एक गंभीर बीमारी है, जो क्यूलेक्स मच्छर के काटने से होता है। इसका कोई पर्याप्त इलाज संभव नहीं है। लेकिन, इसे शुरुआत में ही पहचान करते हुए रोका जा सकता है। इसके लिए संक्रमित व्यक्ति को फाइलेरिया ग्रसित अंगों को पूरी तरह स्वच्छ पानी से साफ करना चाहिए। साथ ही सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जा रही डीईसी व अल्बेंडाजोल की दवा का नियमित सेवन करना चाहिए। वहीं, उन्होंने कहा, फाइलेरिया मुख्यतः मनुष्य के शरीर के चार अंगों को प्रभावित करता है। जिसमें पैर, हाथ, हाइड्रोसील एवं महिलाओं का स्तन शामिल है। हाइड्रोसील के अलावा फाइलेरिया संक्रमित अन्य अंगों को ऑपरेशन द्वारा ठीक नहीं किया जा सकता है। संक्रमित व्यक्ति को सामान्य उपचार के लिए किट उपलब्ध कराई जाती है, जबकि हाइड्रोसील फाइलेरिया संक्रमित व्यक्ति को मुफ्त ऑपरेशन की सुविधा मुहैया कराई जाती है।
– फाइलेरिया क्या है ?
– फाइलेरिया मच्छर के काटने से होने वाला एक संक्रामक रोग है।
– किसी भी उम्र का व्यक्ति फाइलेरिया से संक्रमित हो सकता है।
– फाइलेरिया के लक्षण हाथ और पैर में सूजन (हाथीपाँव) व हाईड्रोसील (अण्डकोष में सूजन) है।
– किसी भी व्यक्ति को संक्रमण के पश्चात बीमारी होने में 05 से 15 वर्ष लग सकते हैं।
– फाइलेरिया से बचाव के उपाय :
– सोने के समय मच्छरदानी का निश्चित रूप से प्रयोग करें।
– घर के आसपास गंदा पानी जमा नहीं होने दें।
– अल्बेंडाजोल व डीईसी दवा का निश्चित रूप से सेवन करें।
– साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें।

उच्च रक्तचाप दिवस- जीवनशैली में बदलाव लाकर उच्च रक्तचाप को रखें नियंत्रित

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-इस बीमारी पर नियंत्रण के लिए जीवन में अनुशासन बहुत जरूरी
-खान-पान पर दें ध्यान और लापरवाही करने से बचें
बांका, 17 मई-
हर साल 17 मई को उच्च रक्तचाप दिवस मनाया जाता है। अंग्रेजी में इसे हाईपरटेंशन भी कहते हैं। उच्च रक्तचाप दिवस मनाने का उद्देश्य इसके प्रति लोगों को जागरूक करना है। अघिक से अधिक लोगों को इस बीमारी के बारे में जानकारी मिल सके, ताकि वह इसकी चपेट में आने से बच सकें । समय रहते इस पर नियंत्रण पा लें। इसी को मद्देनजर रखते हुए इस बार का थीम रखा गया है अपने रक्तचाप को सटीक रूप से मापें, इसे नियंत्रित करें और लंबे समय तक जीवित रहें।
शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार चौधरी कहते हैं कि इस बार का थीम बिल्कुल ही सटीक है। उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने के लिए इसे नियमित तौर मापना बहुत ही जरूरी है। साथ ही उसके अनुकूल व्यवहार भी करना चाहिए। तभी आप इसे नियंत्रित कर लंबे समय तक जी पाएंगे। जीवनशैली में बदलाव लाकर ही आप उच्च रक्तचाप को नियंत्रित कर सकते हैं। खाने-पीने से लेकर टहलने और सोने तक में अनुशासन बहुत जरूरी है। रात में पहले सोना और सुबह जल्दी उठना, इन सब बातों को ध्यान में रखने की जरूरत है, तभी इस पर नियंत्रण कर पाएंगे।
बेलगाम जीवनशैली पर लगाएं लगामः डॉ. चौधरी कहते हैं कि उच्च रक्तचाप का सबसे प्रमुख कारण बेलगाम जीवनशैली है। खाने से लेकर सोने और उठने तक का समय निर्धारित नहीं रहना और फास्ट फूड का अधिक सेवन करना प्रमुख कारण है। लोगों को घर का खाना खाने पर जोर देना चाहिए। बाहर के खाने से परहेज करना चाहिए। साथ ही रूटीन बनाकर एक निर्धारित समय पर सोने का प्रयास करें और उठने का भी समय निश्चित कर लें। खाने में तेल-मसाले का अधिक इस्तेमाल नहीं करें। साथ ही हरी और पत्तेदार सब्जियों और फलों का अधिक से अधिक सेवन करें। ऐसा न सिर्फ जो उच्च रक्तचाप की चपेट में हैं उन्हें करना चाहिए, बल्कि सभी लोगों को अपनी जीवनशैली में इसे अपनाना चाहिए। जो चपेट में आ गए हैं, उन्हें तो बचाएगा ही। साथ में जो लोग अभी तक बचे हुए हैं, वह भी इस बीमारी की चपेट में आने से बचे रहेंगे।
प्रतिदिन 45 मिनट तक टहलें जरूरः डॉ. चौधरी कहते हैं कि आधुनिक जीवनशैली में सबसे बड़ी कमी यही है कि लोगों पर काम का अत्यधिक दबाव है। इस वजह से लोग स्वास्थ्य पर जरूरी समय नहीं दे पाते हैं। उच्च रक्तचाप होने की यह भी एक वजह है। आधुनिक जीवनशैली में एक तो समय का अभाव औऱ ऊपर से भोजन भी अधिकतर बाहरी ही हो पाता है। उससे मिलने वाले कैलोरी को बर्न करने का भी समय नहीं रह पाता है। ऐसा भूल से भी नहीं करें। काम कितना भी अधिक हो, लेकिन अपने शरीर के लिए प्रतिदिन 45 मिनट जरूर निकाल लें। सुबह अगर समय हो सुबह में ही, लेकिन अगर सुबह में समय नहीं मिलता है तो शाम में अवश्य 45 मिनट तक तेज कदमों से टहलें। यह सबसे ज्यादा जरूरी है।

हाईपरटेंशन को नजरअंदाज करना जानलेवाः डॉ. हेमशंकर शर्मा

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-आईएमए और एपीआई ने आईएमए बिल्डिंग में किया कार्यक्रम
-हाईपरटेंशन को लेकर किया गया जागरूक, बचाव की दी जानकारी
भागलपुर, 17 मई
विश्व हाइपरटेंशन दिवस के मौके पर मंगलवार को आईएमए बिल्डिंग में जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आईएमए और एपीआई भागलपुर द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में मायागंज अस्पताल के वरीय चिकित्सक डॉ. हेमशंकर शर्मा ने इसे लेकर लोगों को जागरूक किया और इससे बचाव की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हाईपरटेंशन यानी हाई बीपी को नजरंदाज करना जानलेवा हो सकता है। लंबे समय तक हाई बीपी होने से ब्रेन हेमरेज, किडनी और हार्ट तक फेल हो सकता है। ऐसे में इससे बचाव के लिए खाने में नमक का कम इस्तेमाल, रोजाना मॉर्निंग वॉक, नियमित बीपी जांच कराने के साथ-साथ मोटापे को नियंत्रित करें। इन चीजों पर नियंत्रण रखकर ही आप इससे बच सकते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईएमए भागलपुर के अध्यक्ष डॉ. संजय कुमार सिंह ने और संचालन सचिव डॉ. मनीष कुमार ने किया। इस मौके पर वरीय फिजिशियन डॉ. डीपी सिंह, डॉ. राजकमल चौधरी, डॉ. अभिलेश कुमार आदि की मौजूदगी रही।
हाईपरटेंशन की नियमित जांच कराएं- कार्यक्रम में शामिल अन्य डॉक्टरों ने बताया कि हाईपरटेंशन की नियमित जांच कराएं और उसके अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएं। खाने से लेकर सोने और उठने तक का समय निर्धारित नहीं रहना और फास्ट फूड का अधिक सेवन करना प्रमुख कारण है। लोगों को घर का खाना खाने पर जोर देना चाहिए। बाहर के खाने से परहेज करना चाहिए। साथ ही रूटीन बनाकर एक निर्धारित समय पर सोने का प्रयास करें और उठने का भी समय निश्चित कर लें। खाने में तेल-मसाले का अधिक इस्तेमाल नहीं करें। साथ ही हरी और पत्तेदार सब्जियों और फलों का अधिक से अधिक सेवन करें। ऐसा न सिर्फ जो उच्च रक्तचाप की चपेट में हैं उन्हें करना चाहिए, बल्कि सभी लोगों को अपनी जीवनशैली में इसे अपनाना चाहिए। जो चपेट में आ गए हैं, उन्हें तो बचाएगा ही। साथ में जो लोग अभी तक बचे हुए हैं, वह भी इस बीमारी की चपेट में आने से बचे रहेंगे।
काम का दबाव कितना भी अधिक हो, टहलने का समय जरूर निकालेः डॉ. चौधरी कहते हैं कि आधुनिक जीवनशैली में सबसे बड़ी कमी यही है कि लोगों पर काम का अत्यधिक दबाव है। इस वजह से लोग स्वास्थ्य पर जरूरी समय नहीं दे पाते हैं। उच्च रक्तचाप होने की यह भी एक वजह है। आधुनिक  जीवनशैली में एक तो समय का अभाव औऱ ऊपर से भोजन भी अधिकतर बाहरी ही हो पाता है। उससे मिलने वाले कैलोरी को बर्न करने का भी समय नहीं रह पाता है। ऐसा  भूल से भी नहीं करें। काम कितना भी अधिक हो, लेकिन अपने शरीर के लिए प्रतिदिन 45 मिनट जरूर निकाल लें। सुबह अगर समय हो ते सुबह में ही, लेकिन अगर सुबह में समय नहीं मिलता है तो शाम में अवश्य 45 मिनट तक तेज कदमों से टहलें। यह सबसे ज्यादा जरूरी है।

शेखपुरा जिले में मनाया गया राष्ट्रीय डेंगू दिवस, रोकथाम पर की गई जरूरी चर्चा 

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– जिले के स्वास्थ्य संस्थानों में कार्यक्रम का हुआ आयोजन, कारण, लक्षण, बचाव एवं उपचार पर की गई चर्चा
– डेंगू से बचाव को लेकर सामुदायिक स्तर पर लोगों को किया जाएगा जागरूक
शेखपुरा, 16 मई।
सोमवार को राष्ट्रीय डेंगू दिवस के अवसर पर जिले के विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों में जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसके माध्यम से डेंगू की रोकथाम पर विस्तृत चर्चा की गई। साथ ही साथ इस बीमारी से बचाव को सामुदायिक स्तर पर लोगों को जागरूक करने पर भी बल दिया गया। ताकि लोगों को इस बीमारी के शुरुआती लक्षण की जानकारी मिल सके और शुरुआती दौर में ही लोग इलाज शुरू करा सकें। वहीं, कार्यक्रम के दौरान डेंगू के कारण, लक्षण उपचार एवं इससे बचाव  पर विस्तृत चर्चा की गई। वहीं, सदर अस्पताल परिसर में डीभीबीडीसीओ डाॅ अशोक कुमार सिंह की अध्यक्षता में कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
– संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से होता है डेंगू :
डीभीबीडीसीओ डाॅ अशोक कुमार सिंह ने कहा, डेंगू बीमारी संक्रमित एडीज मच्छर काटने से होता है। इसलिए, अगर आप दिन में भी सोते हैं तो अनिवार्य रूप से मच्छरदानी लगाएं। पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें। घर एवं सभी कमरे को साफ-सुथरा एवं हवादार बनाएं रखें। साथ ही आसपास भी साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें। इसके लिए अपने पड़ोस में रहने वाले अन्य लोगों को भी जागरूक करें। ताकि इस बीमारी के दायरे से सामुदायिक स्तर पर लोग दूर रहें। इस बीमारी से बचाव के लिए रहन-सहन में बदलाव के साथ-साथ साफ-सफाई पर भी विशेष ध्यान देने की दरकार है। दरअसल, डेंगू के शुरुआती लक्षण बुखार से ही शुरू होते हैं। जिसके कारण लोगों को बीमारी की पहचान करने में भी काफी परेशानी होती है। इसलिए, लक्षण दिखते ही तुरंत नजदीकी अस्पताल में जाँच कराने की जरूरत है।
– लक्षण दिखते ही तुरंत करायें इलाज, अस्पतालों में समुचित व्यवस्था है उपलब्ध :
भीडीसीओ श्याम सुंदर ने कहा, लक्षण दिखते ही ऐसे मरीजों को तुरंत जाँच करानी चाहिए। जाँच रिपोर्ट के अनुसार इलाज करानी चाहिए। ताकि बड़ी परेशानियाँ का सामना नहीं करना पड़े और समय पर इलाज शुरू हो सके। इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में समुचित व्यवस्था उपलब्ध है। यह बीमारी संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से होता है, जो स्थिर साफ पानी में पनपता है। इसलिए, घर समेत आसपास में जलजमाव नहीं होने दें। जलजमाव होने पर उसे यथाशीघ्र वैकल्पिक व्यवस्था कर हटायें और पानी जमा होने वाले जगहों पर किरासन तेल या कीटनाशक दवाई का छिड़काव करें।
– डेंगू के लक्षण :
– तेज बुखार, बदन, सर एवं जोड़ों में दर्द तथा ऑखों के पीछे दर्द होना
– त्वचा पर लाल धब्बे या चकते का निशान
– नाक, मसूढ़े से या उल्टी के साथ रक्त श्राव होना
– काला पैखाना होना
– बचाव के उपाय :
– दिन में भी सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें।
– पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें अथवा मच्छर भगाने वाली दवा/क्रीम का उपयोग करें।
– टूटे-फूटे बर्तनों, कूलर, एसी/फ्रिज के पानी निकासी ट्रे, पानी टंकी, गमला, फूलदान, घर के अंदर एवं आसपास पानी नहीं जमने दें।
– जमे हुए पानी पर मिट्टी का तेल डालें अथवा कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करें।

राष्ट्रीय डेंगू दिवस : जागरूकता कार्यक्रम में डेंगू की रोकथाम को लेकर की गई चर्चा

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– डेंगू के कारण, लक्षण, बचाव एवं उपचार पर की गई चर्चा
– डेंगू से बचाव को लेकर सामुदायिक स्तर पर लोगों को किया जाएगा जागरूक
लखीसराय, 16 मई-
सोमवार को राष्ट्रीय डेंगू दिवस के अवसर पर एसीएमओ कार्यालय में सिविल सर्जन डाॅ देवेन्द्र कुमार चौधरी की अध्यक्षता में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें डेंगू की रोकथाम पर विस्तृत चर्चा की गई और इसे सार्थक रूप देने के लिए सामुदायिक स्तर पर लोगों को इस बीमारी से बचाव के लिए जागरूक करने का निर्णय लिया गया। साथ ही सामुदायिक स्तर पर लोगों को डेंगू के कारण, लक्षण, उपचार एवं इससे बचाव के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने पर बल दिया गया। इस मौके पर सिविल सर्जन डाॅ देवेन्द्र चौधरी ने कहा, डेंगू बीमारी संक्रमित एडीज मच्छर काटने से होता है। इसलिए, अगर आप दिन में भी सोते हैं तो अनिवार्य रूप से मच्छरदानी लगाएं। पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें। घर एवं सभी कमरे को साफ-सुथरा एवं हवादार बनाएं रखें। साथ ही आसपास भी साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें। इसके लिए अपने पड़ोस में रहने वाले अन्य लोगों को भी जागरूक करें। ताकि इस बीमारी के दायरे से सामुदायिक स्तर पर लोग दूर रहें। इस बीमारी से बचाव के लिए रहन-सहन में बदलाव के साथ-साथ साफ-सफाई पर भी विशेष ध्यान देने की दरकार है। दरअसल, डेंगु के शुरुआती लक्षण बुखार से ही शुरू होते हैं। जिसके कारण लोगों को बीमारी की पहचान करने में भी काफी परेशानी होती है। इसलिए, लक्षण दिखते ही तुरंत नजदीकी अस्पताल में जाँच कराने की जरूरत है।
– लक्षण दिखते ही तुरंत करायें इलाज, अस्पतालों में समुचित व्यवस्था है उपलब्ध :
लक्षण दिखते ही ऐसे मरीजों को तुरंत जाँच करानी चाहिए। जाँच रिपोर्ट के अनुसार इलाज करानी चाहिए। ताकि बड़ी परेशानियाँ का सामना नहीं करना पड़े और समय पर इलाज शुरू हो सके। इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में समुचित व्यवस्था उपलब्ध है। यह बीमारी संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से होता है, जो स्थिर साफ पानी में पनपता है। इसलिए, घर समेत आसपास में जलजमाव नहीं होने दें। जलजमाव होने पर उसे यथाशीघ्र वैकल्पिक व्यवस्था कर हटायें और पानी जमा होने वाले जगहों पर किरासन तेल या कीटनाशक दवाई का छिड़काव करें।
– डेंगू के लक्षण :
– तेज बुखार, बदन, सर एवं जोड़ों में दर्द तथा ऑखों के पीछे दर्द होना
– त्वचा पर लाल धब्बे या चकते का निशान
– नाक, मसूढ़े से या उल्टी के साथ रक्त स्राव होना
– काला पैखाना होना
– बचाव के उपाय :
– दिन में भी सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें।
– पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें अथवा मच्छर भगाने वाली दवा/क्रीम का उपयोग करें।
– टूटे-फूटे बर्तनों, कूलर, एसी/फ्रिज के पानी निकासी ट्रे, पानी टंकी, गमला, फूलदान, घर के अंदर एवं आसपास पानी नहीं जमने दें।
– जमे हुए पानी पर मिट्टी का तेल डालें अथवा कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करें।

बच्चों को विभिन्न रोगों से बचाने के लिए उनका टीकाकरण है आवश्यक : डीआईओ

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– बीसीजी, डीटीपी, रोटा वायरस व दूसरी बीमारियों से होता है बचाव
– बच्चों को बीमारी से दूर रखने के लिए जरूर कराएं नियमित टीकाकरण और अनावश्यक परेशानियाँ से रहें दूर
मुंगेर, 16 मई-
बच्चों के लिए नियमित टीकाकरण बहुत जरूरी है। यह शरीर में बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा करता है। इसके साथ ही एंटीबॉडी बनाकर शरीर को सुरक्षित भी रखता है। नियमित टीकाकरण से बच्चों में जानलेवा बीमारियों का खतरा बहुत हद तक कम हो जाता है। शिशुओं की मौत की एक बड़ी वजह उनका सही तरीके से टीकाकरण नहीं होना है। डीआईओ डॉ. राजेश कुमार रौशन ने टीकाकरण की आवश्यकता पर बल देते हुए बताया कि नियमित टीकाकरण विभिन्न बीमारी के संक्रमण के बाद या बीमारी के खिलाफ व्यक्ति की रक्षा करता और शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली को भी सुदृढ़ करता है। शिशुओं को स्तनपान कराने से भी उनकी रोग प्रतिरक्षण प्रणाली तेज होती है। नियमित टीकाकरण से बच्चों को चेचक, हेपेटाइटिस जैसी अन्य बीमारियों से बचाया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि नियमित टीकाकरण शिशु के लिए बहुत जरूरी है। बच्चों में होने वाली बीमारियों व संक्रमण का असर तेजी से उनके शरीर पर होता और उनके अंगों को प्रभावित करता है। बीसीजी, हेपेटाइटिस ए, हेपेटाइटिस बी, डीटीपी, रोटा वायरस वैक्सीन, इन्फ्लूएंजा व न्यूमोनिया के लिए टीकाकरण किये जाते हैं। मिशन इंद्रधनुष कार्यक्रम इसी उद्देश्य के साथ चलाया गया कि बच्चों का संपूर्ण टीकाकरण किया जा सके।
– ये वैक्सीन हैं जरूरी : उन्होंने बताया कि बच्चों के लिए ये वैक्सीन लगवाना आवश्यक है –
बी.सी.जी वैक्सीन : टीबी से  फेफड़ों, दिमाग और शरीर के अंग प्रभावित होते हैं। यह रोग पीड़ित व्यक्ति के खांसने या छींकने से फैलती है। बीसीजी टीका के जरिये बच्चे को टीबी की बीमारी से बचाया जा सकता है। बच्चों के जन्म लेने के तुरंत बाद उन्हें बैसिले कैल्मेट गुरिन (बीसीजी) के टीके लगाये जाते हैं। यह बच्चों के भविष्य में क्षयरोग, टीबी मेनिनजाइटिस आदि रोगों के संक्रमण की संभावना को कम करता है।
– हेपेटाइटिस ए : हेपेटाइटिस ए विषाणु जनित रोग है, जो लीवर को प्रभावित करता है। दूषित भोजन, पानी या संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने की वजह से यह रोग फैलता है। बच्चों में यह रोग ज्यादा होता है। बुखार, उल्टी और जांडिस जैसे रोगों से बच्चा प्रभावित होता है। हेपीटाइटिस ए वैक्सीन का पहला टीका बच्चों को जन्म के 1 साल बाद लगाया जाता और दूसरा टीका पहली डोज के 6 महीने बाद लगाया जाता है।
– हेपेटाइटिस बी : हेपेटाइटिस बी रोग से बच्चों के लिवर में जलन और सूजन हो जाती है। नवजात शिशुओं को जन्म के बाद पहली डोज, 4 हफ्ते बाद दूसरी डोज और  8 हफ्ते  के बाद हेपेटाइटिस बी की तीसरी डोज दी जाती है।
– डीटीपी : बच्चों को डिप्थीरिया, टेटनस, काली खांसी जैसी गंभीर बीमारियों की रोकथाम के लिए डीटीपी का टीकाकरण किया जाता है। बच्चों को जन्म के 6 हफ्ते बाद डीटीपी का पहला टीका लगाया जाता है। 4 हफ्ते बाद दूसरा, बाद में 4 हफ्ते के अंतराल पर तीसरा और चौथा टीका 18 महीने और पांचवा टीका 4 साल के बाद लगवाया जाता है।
– रोटा वायरस वैक्सीन : रोटा वायरस तीन माह से लेकर दो साल की उम्र के बच्चों को प्रभावित करता है। इस वायरस से संक्रमित बच्चों को बुखार, पेट में दर्द के साथ उल्टी और पतले दस्त होते हैं।
– टायफॉइड वैक्सीन : टायफाइड दूषित भोजन, पानी और पेय पदार्थ के सेवन से होता है। बच्चों में होने वाली डायरिया बीमारी दूषित भोजन व पानी के कारण ही होता है। नवजात के लिए मां द्वारा नियमित स्तनपान बच्चों को डायरिया से बचाता है। बच्चों को वैक्सीन का पहला टीका जन्म के 9 महीने बाद और दूसरा टीका इसके 15 महीने बाद लगता है।

निमोनिया से बचाव के लिए संपूर्ण टीकाकरण के साथ सतर्कता भी जरूरी

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– बदलते मौसम में बढ़ जाती है निमोनिया संक्रमण की संभावना, बच्चों का रखें ख्याल
– टीकाकरण निमोनिया से बचाव के लिए है जरूरी
खगड़िया, 16 मई-
बदलते मौसम में निमोनिया से बचाव के लिए बच्चे और बुजुर्गों का विशेष ख्याल रखने की जरूरत है। दरअसल, बच्चे और बुजुर्गों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बहुत कमजोर होती है। जिसके कारण इस बीमारी की चपेट में बच्चे व बुजुर्गों के आने की संभावना अधिक रहती है। क्योंकि, निमोनिया सांस से जुड़ी गंभीर बीमारी है। यह बैक्टीरिया, वायरस और फंगल की वजह से फेफड़ों में संक्रमण से होता है। इस वजह से बच्चों और बुजुर्गों को सांस लेने में काफी तकलीफ होती है। इस बीमारी से बचने का एक मात्र उपाय न्यूमो कॉकल वैक्सीन (पीसीवी) का टीकाकरण ही है।
– सभी स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध है निःशुल्क पीसीवी का टीका :
जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ देवनंदन पासवान ने बताया, निमोनिया के प्रारंभिक लक्षण सर्दी-खांसी जैसे हो सकते हैं। ज्यादातर कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग इससे जल्दी ग्रसित हो जाते हैं। जिन बच्चों को पीसीवी का टीका नहीं पड़ा है, उन बच्चों को इस बीमारी की चपेट में आने की संभावना अधिक रहती । इस बीमारी में मवाद वाली खांसी, तेज बुखार एवं सीने में दर्द समेत अन्य परेशानी होती है। इस बीमारी को टीकाकरण से रोका जा सकता है। इसलिए, अपने बच्चों को संपूर्ण टीकाकरण के अंतर्गत स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध निःशुल्क पीसीवी का टीका निश्चित रूप से लगवाएं। वहीं, उन्होंने बताया, बच्चे को जन्म के पश्चात दो साल के अंदर सभी तरीके के पड़ने वाले टीके जरूर लगवाने चाहिए। इससे बच्चे की रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत तो होती ही है, इसके अलावा वह 12 से अधिक प्रकार की बीमारियों से भी दूर रहता है।
– जानें क्या है निमोनिया :
निमोनिया सांस से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है। इसकी वजह से फेफड़ों में संक्रमण होता है। आम तौर पर यह बीमारी बुखार या जुकाम होने के बाद ही होता है। सर्दी के मौसम में बच्चों और बुजुर्गों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने की वजह से यह बीमारी ज्यादा होती है। निमोनिया का प्रारम्भिक इलाज सीने का एक्स-रे करने के बाद क्लीनिकल तरीके से शुरू होता है। निमोनिया माइक्रो बैक्टीरिया वायरल, फंगल और पारासाइट की वजह से उत्पन्न संक्रमण की वजह से होता है। इसका संक्रमण सामुदायिक स्तर पर भी हो सकता है।
– निमोनिया से बचाव के उपाय :
ऐसे तो निमोनिया से बचाव का एक मात्र उपाय टीकाकरण हीं है। यह एक सांस संबंधी बीमारी है, इसलिए कुछ सावधानी बरतने के बाद काफी हद तक इसके संक्रमण से बचा जा सकता है। इसके लिए नवजात एवं छोटे बच्चों के रखरखाव, खानपान एवं कपड़े पहनाने में सावधानी बरतने की आवश्यकता है। सर्दी के मौसम में हमेशा बच्चों को गर्म कपड़े पहनाने एवं खाने- पीने में गर्म पदार्थो का ही इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ हीं वैसे लोगों के संपर्क से दूर रखने की आवश्यकता है, जिन्हें पहले से सांस संबंधी बीमारी हो। इसके साथ बुजुर्गों सहित अन्य लोगों को भी काफी सावधानी बरतने की जरूरत है।
– निमोनिया का यह है प्रारंभिक लक्षण :
निमोनिया का प्रारंभिक लक्षण बुखार के साथ पसीना एवं कपकपी होना, अत्यधिक खांसी में गाढ़ा, पीला, भूरा या खून के अंश वाला बलगम आना, तेज-तेज और कम गहरी सांस लेने के साथ सांस का फूलना ( जैसे कि सांस लेने के दौरान आवाज होना), होठ या अंगुलियों के नाखून नीले दिखाई देना, बच्चों की परेशानी व उत्तेजना बढ़ जाना है।