यूके में कोरोना वायरस के नए रूप को देखते हुए राष्ट्रीय कार्य बल सतर्क

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• कोविड-19 की जांच, उपचार और निगरानी की रणनीतियों पर किया विचार-विमर्श
• भारत में इस स्ट्रेन से संक्रमित लोगों की पहचान और इसके प्रसार पर रोकथाम की तैयारी
• पिछले 28 दिनों में यूके से आए सभी लोगों की सूची संबंधित राज्यों को की गयी साझा
• 5 प्रतिशत पॉजिटिव मामले डब्ल्यूजीएस जाँच के लिए भेजे जाएंगे
• आरटी-पीसीआर जांच के परिणाम मिलने के बाद ही यात्रियों को हवाई अड्डे से निकलने की होगी अनुमति
 भागलपुर/ 27, दिसम्बर: यूके( यूनाइटेड किंगडम) में कोरोना वायरस के नए रूप के मिलने की पुष्टि हुयी है. इसे देखते हुए राष्ट्रीय कार्य बल(एनटीएफ) काफ़ी सतर्क हो गया है. इसको लेकर आईसीएमआर ने नीति आयोग के सदस्य प्रो. विनोद पॉल और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग में सचिव और आईसीएमआर के महानिदेशक प्रो. बलराम भार्गव की सह अध्यक्षता में कोविड-19 पर बने राष्ट्रीय कार्य बल (एनटीएफ) की एक बैठक बुलाई। बैठक में एम्स के निदेशक प्रो. रणदीप गुलेरिया; भारतीय औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई); निदेशक, राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी); स्वास्थ्य मंत्रालय और आईसीएमआर के अन्य प्रतिनिधियों के साथ-साथ स्वतंत्र विषय विशेषज्ञों ने भी भाग लिया।
कोरोना के नए स्ट्रेन से संक्रमित लोगों की पहचान पर बल:
एनटीएफ द्वारा आयोजित बैठक का मुख्य उद्देश्य हाल में यूके में वायरस का नया रूप सामने आने की खबरों को देखते हुए सार्स-सीओवी-2 के लिए परीक्षण, उपचार और निगरानी की रणनीतियों में प्रमाण आधारित संशोधनों पर चर्चा करना था। वायरस के इस रूप में गैर समानार्थी (अमीनो एसिड में बदलाव) परिवर्तन, 6 समानताएं (गैर अमीनो एसिड बदलाव) और 3 विलोपन हैं। आठ परिवर्तन (म्यूटेशंस) स्पाइक (एस) जीन में मौजूद हैं, जो एसीई2 रिसेप्टर्स की बाइंडिंग साइट (रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन) का वहन करते हैं, जो मानव श्वसन कोशिकाओं में वायरस के प्रवेश का बिंदु है। एनटीएफ में सार्स-सीओवी-2 के साथ-साथ यूके वायरस के लिए वर्तमान राष्ट्रीय उपचार व्यवस्था, जांच रणनीति और निगरानी से संबंधित पहलुओं पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। इसमें जोर दिया गया कि चूंकि, वायरस के यूके संस्करण से वायरस का संक्रमण तेजी से फैलता है, इसलिए भारत में इस स्ट्रेन से संक्रमित लोगों की पहचान और इसके प्रसार पर रोकथाम काफी अहम है।
वायरस के नए स्ट्रेन को लेकर उपचार व्यवस्था में बदलाव की जरूरत नहीं:
एनटीएफ ने निष्कर्ष निकाला कि इस स्ट्रेन में परिवर्तन को देखते हुए वर्तमान उपचार व्यवस्था में बदलाव की कोई जरूरत नहीं है। इसके अलावा, चूंकि आईसीएमआर ने सार्स-सीओवी-2 के परीक्षण के लिए दो या ज्यादा जीन जांचों की वकालत करती रही है, इसलिए परीक्षण की वर्तमान रणनीति का इस्तेमाल करते हुए संक्रमित लोगों के बचने की संभावना कम ही है। एनटीएफ ने सिफारिश की कि निगरानी की वर्तमान रणनीतियों के अलावा, विशेष रूप से यूके से आ रहे यात्रियों में सार्स-सीओवी-2 के लिए ज्यादा जीनोमिक निगरानी कराना अहम है। इसके अलावा, प्रयोगशाला जांच के एस जीन के सामने आने, पुनः संक्रमण के प्रमाणित मामलों आदि से संबंधित नमूनों में जीनोम सीक्वेंसिंग कराना भी खासा अहम होगा। सभी नमूनों के प्रतिनिधि नमूनों में सार्स-सीओवी-2 की सामान्य जीनोमिक निगरानी जारी रखने और योजनाबद्ध गतिविधियों की आवश्यकता है। एनसीडीसी ने बताया कि भारत सरकार ने यूके में दर्ज सार्स-सीओवी-2 के परिवर्तित रूप की खबरों और इन खबरों पर दूसरे देशों की प्रतिक्रिया पर स्वतः संज्ञान लिया है। हालात की सक्रिय रूप से निगरानी की जा रही है। परिवर्तित वायरस का पता लगाने और रोकथाम  के लिए एक  रणनीति बनाई गई है।
भारत में सभी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर बरती जा रही सतर्कता :
वायरस के नए स्ट्रेन को देखते हुए 21 दिसंबर से 23 दिसंबर, 2020 के बीच यूके से आए सभी यात्रियों की हवाई अड्डों पर जांच की गई थी। सिर्फ आरटी-पीसीआर जांच का परिणाम मिलने के बाद ही नकारात्मक रिपोर्ट वाले यात्रियों को ही हवाई अड्डे से निकलने की अनुमति दी गई है। जांच में पॉजिटिव मिले सभी यात्रियों को संस्थागत आइसोलेशन में भेज दिया गया है और उनके नमूनों को व्होल जीनोम सीक्वेंसिंग (डब्ल्यूजीएस) के लिए भेज दिया गया है। डब्ल्यूजीएस परिणाम में गैर परिवर्तित वायरस की पुष्टि होने के बाद ही, पॉजिटिव मामलों में वर्तमान प्रबंधन व्यवस्था के तहत संस्थागत आइसोलेशन से जाने की अनुमति दी गई है।  पॉजिटव मरीजों के सभी संपर्कों को भी क्वारंटाइन केन्द्र में भेज दिया गया और आईसीएमआर दिशानिर्देशों के तहत जांच की गई है।
नए स्ट्रेन से रोकथाम को लेकर की जा रही सामुदायिक निगरानी :
पिछले 28 दिनों में यूके से आए सभी लोगों की सूची संबंधित राज्यों के आव्रजन ब्यूरो के साथ साझा कर दी गई है। वहीं 25 नवंबर- 20 दिसंबर, 2020 के बीच यूके से आए सभी यात्रियों पर आईडीएसपी राज्य निगरानी इकाइयों (एसएसयू) और जिला निगरानी इकाइयों (डीएसयू) द्वारा नजर रखी जा रही है।  आईसीएमआर के दिशानिर्देशों के तहत इन यात्रियों की जांच की जा रही है और सभी पॉजिटिव मामलों में आइसोलेशन के लिए भेजना अनिवार्य कर दिया गया है। सभी पॉजिटिव मामलों के नमूनों को डब्ल्यूजीएस के लिए भेजा जा रहा है. इन पॉजिटिव मामलों के संपर्कों की निगरानी बढ़ाई जा रही है और इन संपर्कों को भी क्वारंटाइन केन्द्रों में भेज दिया गया है।  पॉजिटिव मरीजों को 14 दिन बाद दो नमूनों की जांच नकारात्मक आने के बाद ही भेजा जा रहा है।
5 प्रतिशत पॉजिटिव मामले डब्ल्यूजीएस जाँच के लिए भेजे जाएंगे:
सभी राज्यों/ संघ शासित क्षेत्रों के 5 प्रतिशत पॉजिटिव मामलों को डब्ल्यूजीएस जांच के लिए भेजा जाएगा. देश में सार्स-सीओवी-2 के रूप के प्रसार की प्रयोगशाला और महामारी विज्ञान निगरानी के लिए एनसीडीसी, नई दिल्ली के नेतृत्व में एक जीनोमिक सर्विलांग कंसोर्शियम आईएनएसएसीओजी की स्थापना की गई है। इसके अलावा, यूके से लौटने वालों के 50 से ज्यादा नमूनों की प्रयोगशालाओं में सीक्वेंसिंग जारी है। कंसोर्शियम की अन्य प्रयोगशालाओं में राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र, दिल्ली; सीएसआईआर- जिनोमिकी और समवेत जीव विज्ञान संस्थान, दिल्ली; सीएसआईआर- सेलुलर और आणविक जीव विज्ञान केंद्र, हैदराबाद; डीबीटी- जीव विज्ञान संस्थान, भुवनेश्वर; डीबीटी- राष्ट्रीय बायोमेडिकल जीनोमिक्स संस्थान, कल्याणी; डीबीटी- इनस्टेम- राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र, बेंगलुरु; राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं स्नायु विज्ञान संस्थान (एनआईएमएचएएनएस), बेंगलुरु एवं आईसीएमआर- राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान, पुणे शामिल है।
सार्स-सीओवी-2 वायरस के यूके संस्करण का जल्दी पता लगाने और रोकथाम के लिए अतिरिक्त जीनोमिक निगरानी जारी रखने का प्रस्ताव किया गया है। हालांकि, यह समझना अहम है कि अन्य आरएनए वायरस की तरह ही सार्स-सीओवी-2 में परिवर्तन जारी रहेगा। सामाजिक दूरी, हाथ साफ रखने, मास्क पहनने और उपलब्ध होने पर एक प्रभावी वैक्सीन से परिवर्तित वायरस की भी रोकथाम की जा सकती है।

नाटापन के अभिशाप से बांका के 3 प्रतिशत बच्चों को मिली निज़ात

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• पांच सालों में नाटापन घटकर 46.7% हुआ
• कुपोषण बढ़ाने में नाटापन की होती है अहम भूमिका
• सरकार की कई पोषण कार्यक्रमों का बेहतर क्रियान्वयन बना सहायक

बांका/ 27 दिसम्बर : कुपोषण सिर्फ शारीरिक या मानसिक रूप से बच्चों को कमजोर नहीं करता, बल्कि इससे देश का विकास भी बाधित होता है. लेकिन कोरोना जैसे महामारी के दौर में बिहार में बच्चों के सुपोषण में बढ़ोतरी की खबर राहत पहुंचा रही है. हाल में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार विगत पांच सालों में राज्य में नाटापन( उम्र के हिसाब से लम्बाई का कम होना) में 2.9% की कमी दर्ज हुयी है. बांका में यह आंकड़ा 49.6 से घटकर 46.7 पर आ गया है. जो यह दर्शाता है कि सरकार की पोषण संबंधी योजनाओं का समुदाय स्तर तक बेहतर क्रियान्वयन हुआ है. यह आंकड़े इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले सर्वेक्षण( 2015-16) में बांका में 49.6% बच्चे नाटापन से ग्रसित थे, जो अब राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (वर्ष 2019-20) के अनुसार घटकर 46.7 % हुयी है.

नाटापन में आ रही लगातार कमी:
बच्चों में नाटापन अपरिवर्तनीय होता है. इसका मतलब है कि यदि बच्चे एक बार नाटापन के शिकार हुए तो उन्हें पुनः ठीक नहीं किया जा सकता है. इस लिहाज से इसमें कमी लाना काफी जरुरी है. इस दिशा में नाटापन में पिछले 15 सालों में बिहार में निरंतर कमी आयी है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 (वर्ष 2005-06) में बिहार में 55.6% बच्चे नाटापन के शिकार थे, जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4(वर्ष 2015-16) में घटकर 48.3% हो गयी थी.

बच्चों में नाटापन होने के बाद इसे पुनः सुधार करने की गुंजाइश कम हो जाती है एवं यह बच्चों में कुपोषण की सबसे बड़ी वजह भी बनती है. इस लिहाज से नाटापन में आई कमी सुपोषित बिहार की राह आसान करने में प्रमुख भूमिका अदा करेगी. अपर्याप्त पोषण एवं नियमित संक्रमण जैसे अन्य कारकों के कारण होने वाला नाटापन बच्चों में शारीरिक एवं बौद्धिक विकास को अवरुद्ध करता है जो स्वस्थ भारत के सपने के साकार करने में सबसे बड़ा बाधक भी है.

बच्चों एवं महिलाओं के पोषण में आई सुधार:
आईसीडीएस निदेशक आलोक कुमार ने कहा कि राज्यत में बच्चों एवं महिलाओं के पोषण स्त1र में अपेक्षित सुधार लाने हेतु आई.सी.डी.एस. के माध्ययम से कई योजनाएँ क्रियान्वित की जा रही है। जिसका अनुश्रवण एवं मूल्यांुकन विभिन्न स्तरों ICDS-CAS, आँगन-एप, RRS के माध्येम से किया जाता रहा है। जिसके फलस्वारूप स्वा्स्था एवं पोषण के कुछ संकेतकों में सुधार है। आगे भी हमें निरन्तपर इस दिशा में प्रयास करने की जरूरत है।

अन्य स्वास्थ्य एवं पोषण सूचकांकों में भी सुधार:
बिहार में पांच सालों में पोषण एवं स्वास्थ्य के कुछ विशेष सूचकांकों में आयी कमी का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार विगत पांच सालों में बिहार में 6 माह तक केवल स्तनपान, संस्थागत प्रसव, महिला सशक्तीकरण, संपूरक आहार( 6 माह के बाद स्तनपान के साथ ठोस आहार की शुरुआत), कुल प्रजनन दर में कमी, 4 प्रसव पूर्व जाँच एवं टीकाकरण जैसे सूचकांकों में सुधार हुआ है। ये सूचकांक कहीं न कहीं नाटापन में कमी लाने में सहायक भी साबित हुए हैं। वहीं मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना, समेकित बाल विकास सेवा सुदृढ़ीकरण एवं पोषण सुधार योजना (आई एस एस एन पी), पोषण अभियान एवं ओडीएफ़ जैसे कार्यक्रमों का बेहतर क्रियान्वयन भी नाटापन में सुधार लाने में सकारात्मक प्रभाव डाला है.

नाटापन बच्चों के शारीरिक एवं बौद्धिक विकास में भी बाधक:
उम्र के हिसाब से लंबाई कम होना ही नाटापन कहलाता है। गर्भावस्था से लेकर शिशु के 2 वर्ष तक की अवधि यानी 1000 दिन बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास की आधारशिला तैयार करती है. इस दौरान माता एवं शिशु का स्वास्थ्य एवं पोषण काफी मायने रखता है। इस अवधि में माता एवं शिशु का खराब पोषण एवं नियमित अंतराल पर संक्रमण नाटापन की सम्भावना को बढ़ा देता है। नाटापन होने से बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास अवरुद्ध होता है. साथ ही नाटापन से ग्रसित बच्चे सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक बीमार पड़ते हैं, उनका आई-क्यू स्तर कम जाता है एवं भविष्य में आम बच्चों की तुलना में वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ भी जाते हैं।

सामुदायिक जागरूकता भी जरुरी :

कुपोषण में कमी लाने के लिए सरकारी योजनाओं के साथ समुदाय की भागीदारी भी जरुरी है. ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य एवं पोषण को लेकर माताओं की सक्रियता अधिक है। अभी भी पुरुष अपने बच्चे के पोषण को लेकर गंभीर नहीं है। गर्भवती महिला का स्वास्थ्य एवं पोषण, बच्चों का स्तनपान एवं संपूरक आहार जैसे बुनियादी फैसलों में पुरुषों की सहभागिता होने से कुपोषण के दंश से बच्चों को बचाया जा सकता है।

नाटापन के अभिशाप से भागलपुर के 6% से अधिक बच्चों को मिली निज़ात

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• पांच सालों में नाटापन घटकर 40% हुआ
• कुपोषण बढ़ाने में नाटापन की होती है अहम भूमिका
• सरकार की कई पोषण कार्यक्रमों का बेहतर क्रियान्वयन बना सहायक

भागलपुर-
कुपोषण सिर्फ शारीरिक या मानसिक रूप से बच्चों को कमजोर नहीं करता, बल्कि इससे देश का विकास भी बाधित होता है. लेकिन कोरोना जैसे महामारी के दौर में बिहार में बच्चों के सुपोषण में बढ़ोतरी की खबर राहत पहुंचा रही है. हाल में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार विगत पांच सालों में राज्य में नाटापन( उम्र के हिसाब से लम्बाई का कम होना) में 5.4% की कमी दर्ज हुयी है. सुपरहिट भागलपुर में यह आंकड़ा 46.6 से घटकर 40 पर आ गया है. जो यह दर्शाता है कि सरकार की पोषण संबंधी योजनाओं का समुदाय स्तर तक बेहतर क्रियान्वयन हुआ है. यह आंकड़े इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले सर्वेक्षण( 2015-16) में भागलपुर में 46.7% बच्चे नाटापन से ग्रसित थे, जो अब राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (वर्ष 2019-20) के अनुसार घटकर 40 % हुयी है.

नाटापन में आ रही लगातार कमी:
बच्चों में नाटापन अपरिवर्तनीय होता है. इसका मतलब है कि यदि बच्चे एक बार नाटापन के शिकार हुए तो उन्हें पुनः ठीक नहीं किया जा सकता है. इस लिहाज से इसमें कमी लाना काफी जरुरी है. इस दिशा में नाटापन में पिछले 15 सालों में बिहार में निरंतर कमी आयी है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 (वर्ष 2005-06) में बिहार में 55.6% बच्चे नाटापन के शिकार थे, जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4(वर्ष 2015-16) में घटकर 48.3% हो गयी थी.

बच्चों में नाटापन होने के बाद इसे पुनः सुधार करने की गुंजाइश कम हो जाती है एवं यह बच्चों में कुपोषण की सबसे बड़ी वजह भी बनती है. इस लिहाज से नाटापन में आई कमी सुपोषित बिहार की राह आसान करने में प्रमुख भूमिका अदा करेगी. अपर्याप्त पोषण एवं नियमित संक्रमण जैसे अन्य कारकों के कारण होने वाला नाटापन बच्चों में शारीरिक एवं बौद्धिक विकास को अवरुद्ध करता है जो स्वस्थ भारत के सपने के साकार करने में सबसे बड़ा बाधक भी है.

बच्चों एवं महिलाओं के पोषण में आई सुधार:
आईसीडीएस निदेशक आलोक कुमार ने कहा कि राज्यत में बच्चों एवं महिलाओं के पोषण स्त1र में अपेक्षित सुधार लाने हेतु आई.सी.डी.एस. के माध्ययम से कई योजनाएँ क्रियान्वित की जा रही है। जिसका अनुश्रवण एवं मूल्यांुकन विभिन्न स्तरों ICDS-CAS, आँगन-एप, RRS के माध्येम से किया जाता रहा है। जिसके फलस्वारूप स्वा्स्था एवं पोषण के कुछ संकेतकों में सुधार है। आगे भी हमें निरन्तपर इस दिशा में प्रयास करने की जरूरत है।

अन्य स्वास्थ्य एवं पोषण सूचकांकों में भी सुधार:
बिहार में पांच सालों में पोषण एवं स्वास्थ्य के कुछ विशेष सूचकांकों में आयी कमी का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार विगत पांच सालों में बिहार में 6 माह तक केवल स्तनपान, संस्थागत प्रसव, महिला सशक्तीकरण, संपूरक आहार( 6 माह के बाद स्तनपान के साथ ठोस आहार की शुरुआत), कुल प्रजनन दर में कमी, 4 प्रसव पूर्व जाँच एवं टीकाकरण जैसे सूचकांकों में सुधार हुआ है। ये सूचकांक कहीं न कहीं नाटापन में कमी लाने में सहायक भी साबित हुए हैं। वहीं मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना, समेकित बाल विकास सेवा सुदृढ़ीकरण एवं पोषण सुधार योजना (आई एस एस एन पी), पोषण अभियान एवं ओडीएफ़ जैसे कार्यक्रमों का बेहतर क्रियान्वयन भी नाटापन में सुधार लाने में सकारात्मक प्रभाव डाला है.

नाटापन बच्चों के शारीरिक एवं बौद्धिक विकास में भी बाधक:
उम्र के हिसाब से लंबाई कम होना ही नाटापन कहलाता है। गर्भावस्था से लेकर शिशु के 2 वर्ष तक की अवधि यानी 1000 दिन बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास की आधारशिला तैयार करती है. इस दौरान माता एवं शिशु का स्वास्थ्य एवं पोषण काफी मायने रखता है। इस अवधि में माता एवं शिशु का खराब पोषण एवं नियमित अंतराल पर संक्रमण नाटापन की सम्भावना को बढ़ा देता है। नाटापन होने से बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास अवरुद्ध होता है. साथ ही नाटापन से ग्रसित बच्चे सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक बीमार पड़ते हैं, उनका आई-क्यू स्तर कम जाता है एवं भविष्य में आम बच्चों की तुलना में वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ भी जाते हैं।

सामुदायिक जागरूकता भी जरुरी :

कुपोषण में कमी लाने के लिए सरकारी योजनाओं के साथ समुदाय की भागीदारी भी जरुरी है. ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य एवं पोषण को लेकर माताओं की सक्रियता अधिक है। अभी भी पुरुष अपने बच्चे के पोषण को लेकर गंभीर नहीं है। गर्भवती महिला का स्वास्थ्य एवं पोषण, बच्चों का स्तनपान एवं संपूरक आहार जैसे बुनियादी फैसलों में पुरुषों की सहभागिता होने से कुपोषण के दंश से बच्चों को बचाया जा सकता है।

कुपोषित बच्चों के लिए संजीवनी है पोषण पुनर्वास केंद्र

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– यहां कुपोषित बच्चों के खानपान व देखभाल की रहती हैं विशेष सुविधाएं

– एनएफएचएस 5 के आंकड़ों के अनुसार नाटापन के प्रतिशत में आई है कमी

लखीसराय-

जिले भर के बच्चों को कुपोषण से मुक्त कराने के लिए राज्य सरकार काफी गंभीर है। इसको ले राज्य सरकार ने कुपोषण की इस स्थिति से निबटने के लिए पोषण पुनर्वास र्केंद्र की स्थापना की है।
लखीसराय जिले के सिविल सर्जन डॉ. आत्मानंद राय ने बताया कि राज्य सरकार के निर्देशानुसार जिले में भी बच्चों में पोषण की कमी से निपटने के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र की स्थापना की गई है। उन्होंने बताया कि कुपोषण की समस्या से जूझ रहे बच्चों को 14 दिनों के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र में रखा जाता है।

एनएफएचएस 5 के आंकड़ों के अनुसार जिले में बच्चों में नाटापन के प्रतिशत में हुआ सुधार :
सिविल सर्जन डॉ. आत्मानंद राय ने बताया कि एनएफएचएस 5 (2019-20) के आंकड़ों के अनुसार जिले में बच्चों के नाटापन के प्रतिशत में काफी सुधार हुआ है। उन्होंने बताया कि
एनएफएचएस 4 (2015- 16) के आंकड़ों के अनुसार जिले में 50.6 प्रतिशत बच्चे नाटापन के शिकार थे जो अब एनएफएचएस 5 (2019-20) के आंकड़ों के अनुसार घटकर मात्र 42.7 प्रतिशत रह गया है।

पुनर्वास केंद्र में बच्चों का रखा जाता है विशेष ख्याल :
पुनर्वास केंद्र में कुपोषित बच्चों को डाक्टर की सलाह के अनुसार हीं उनके खानपान का विशेष ख्याल रखा जाता है। यहां रखे गए बच्चे यदि 14 दिनों अंदर कुपोषण से मुक्त नहीं हो पाते हैं तो वैसे बच्चों को एक माह तक विशेष रूप से देखभाल की जाती है।

पुनर्वास केंद्र में भर्ती हुए बच्चे के वजन में न्यूनतम 15 प्रतिशत की वृद्धि के बाद ही किए जाते हैं डिस्चार्ज :
पोषण पुर्नवास केंद्र में मिलने वाली सभी सुविधाएं नि:शुल्क होती हैं। यहां भर्ती हुए बच्चों के वजन में न्यूनतम 15 प्रतिशत की वृद्धि के बाद ही उसे यहां से डिस्चार्ज किया जाता है।

पोषण पुर्नवास केंद्र में भर्ती होने के लिए तय किए गए है ये मानक :
कुपोषण के शिकार बच्चे को एनआरसी में भर्ती करने के लिए कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। इसके तहत बच्चों का विशेष जांच जैसे उनका वजन व बांह आदि का माप किया जाता है। इसके साथ हीं छह माह से अधिक एवं 59 माह तक के ऐसे बच्चे जिनकी बांई भुजा 11.5 सेमी हो और उम्र के हिसाब से लंबाई व वजन न बढ़ता हो वो कुपोषित माने जाते हैं। वैसे बच्चों को ही पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती किया जाता है। इसके साथ ही दोनों पैरों में पीटिंग एडीमा हो तो ऐसे बच्चों को भी यहां पर भर्ती किया जाता है।

मास्क सिर्फ कोविड-19 नहीं, बल्कि अन्य संक्रामक बीमारी से भी करता है बचाव

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– मास्क के उपयोग की का डालें आदत, शारीरिक पीड़ा से रहें दूर

– मास्क के उपयोग का दिखा सकारात्मक प्रभाव, पूर्व के सापेक्ष शारीरिक परेशानी से लोग रहे दूर

खगड़िया-
मास्क का उपयोग सिर्फ कोविड-19 से ही बचाव के लिए नहीं, बल्कि अन्य संक्रामक बीमारी से भी दूर रहने के लिए जरूरी है। दरअसल, मास्क कोविड-19 के साथ-साथ साँस से संबंधित एवं एलर्जी की बीमारी से भी दूर रखने के लिए सबसे बेहतर और आसान कारगार उपाय है। इसलिए, समाज के हर तबके के लोगों को कोविड-19 के अलावा अन्य संक्रामक बीमारी से दूर रहने के लिए मास्क का नियमित रूप उपयोग करना चाहिए। इसके अलावा लोगों को स्वस्थ रहने के लिए साफ-सफाई का भी विशेष ख्याल रखना चाहिए। क्योंकि, साफ-सफाई भी कई बीमारियों से दूर रखता है।

– मास्क किसी भी संक्रामक बीमारी से दूर रखने के लिए है कारगार उपाय :-
खगड़िया सदर अस्पताल के चिकित्सा पदाधिकारी डॉ राजीव कुमार ने बताया कि मास्क उपयोग से लोग सिर्फ कोविड-19 से सुरक्षित नहीं है। बल्कि, मास्क के का उपयोग से किसी भी संक्रामक बीमारी से लोग सुरक्षित हैं है। दरअसल, मास्क कोविड-19 के अलावा प्रदूषण, धूलकण धुलकन समेत अन्य परेशानियों से बचाव करता है और संक्रामक बीमारी से दूर रखता है। क्योंकि, मास्क का उपयोग करने से नुकसानदेह हवा समेत अन्य किसी भी प्रकार की का हानिकारक चीज हमारे शरीर में प्रवेश नहीं हो पाती पाता है। जिससे हम स्वस्थ रहते हैं है।

– पूर्व की सापेक्ष इस बार कम दिखे साँस से संबंधित पीड़ित लोग :-
वहीं, डॉ राजीव कुमार ने बताया कि पूर्व के सापेक्ष इस बार साँस समेत अन्य संक्रामक बीमारी से पीड़ित लोग काफी कम दिखे। इसका मुख्य कारण है कोविड-19 के दौर में मास्क का नियमित उपयोग। जो सामाजिक स्तर पर सकारात्मक साकारात्मक बदलाव का बड़ा संकेत है। दरअसल, कोविड-19 के दौर में अपने स्वास्थ्य के प्रति समाज के हर तबके के लोग काफी सजग रहे और कोविड-19 से बचाव के लिए नियमित रूप से मास्क का उपयोग किए। जिसके कारण लोग संक्रामक बीमारी से दूर रहे।

– मास्क के का उपयोग में दिखी दिखा सामाजिक जागरूकता :-
साँस समेत अन्य संक्रामक बीमारी से पीड़ित लोग पूर्व में मास्क का उपयोग करते थे। किन्तु, सामाजिक स्तर पर मास्क उपयोग करने में शर्मिंदा महसूस करते थे। किन्तु, कोविड-19 के दौर में जब मास्क का उपयोग सरकारी स्तर से भी अनिवार्य हो गया तो लोगों ने मास्क के उपयोग को अपनी अपने दिनचर्या में शामिल कर लिया करने लगे और लोगों में मास्क के प्रति जागरूकता दिखी दिखा। हालाँकि, देश के कई प्रदेशों में पूर्व से भी संक्रामक बीमारी से पीड़ित लोग मास्क का उपयोग करते देखे जाते थे।

– मास्क का उपयोग लोगों को जारी रखना जरूरी :-
कोविड-19 से बचाव के लिए शुरू किए मास्क का उपयोग लोगों को आगे भी जारी रखना चाहिए। क्योंकि, संक्रामक बीमारी से बचाव के लिए मास्क का उपयोग जरूरी है। इसलिए, मास्क का उपयोग कर कोविड-19 समेत अन्य संक्रामक बीमारी से भी दूर रहें। जिससे सभी प्रकार के प्रदूषण से दूर रहेंगे। इसके अलावा साफ-सफाई समेत रहन-सहन में अन्य सकारात्मक साकारात्मक बदलाव भी जरूरी है।

– इन मानकों का करें पालन, कोविड-19 संक्रमण से रहें दूर :-
– मास्क और सैनिसेनेटाइजर का नियमित रूप से उपयोग करें।
– साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें।
– बाहरी खाना खाने से परहेज करें।
– अनावश्यक यात्रा से परहेज करें।
– भीड़-भाड़ वाले जगहों से बिलकुल दूर रहें।
– साबुन या अल्कोहल युक्त पदार्थों से हाथ धोएं।

भागलपुर में 5 लाख से भी अधिक लोगों के कोरोना हुई जांच

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कोरोना की रोकथाम को लेकर स्वास्थ्य विभाग चौकस

जांच के जरिए कोरोना की चेन तोड़ने की चल रही कवायद

भागलपुर, 25 दिसंबर

कोरोना की चेन तोड़ने को लेकर स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह से मुस्तैद है. यही कारण है कि जबसे कोरोना कॉल शुरू हुआ है, तब से लेकर अब तक जिले में 5 लाख से अधिक लोगों के कोरोना जांच हो गई है. सबसे अच्छी बात यह है कि भागलपुर में रिकवरी रेट 97.62 है. जिले में अभी तक 9315 कोरोना मरीज पाए गए हैं. इनमें से 8984 मरीज पूरी तरह से स्वस्थ हो गए हैं. जबकि सक्रिय मरीजों की संख्या 146 है.

सिविल सर्जन विजय कुमार सिंह ने बताया कि भागलपुर में स्वास्थ्य विभाग जिला प्रशासन के सहयोग से कोरोना काल की शुरुआत से ही काफी सूझबूझ के साथ काम कर रहा है. इसी का परिणाम है कि यहां पर कोरोना मरीजों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है. जांच की संख्या बढ़ने से कोरोना के संक्रमण को रोकने में कामयाबी मिली. अब मरीजों की संख्या कम होती जा रही है.

ज्यादातर मरीज होम आइसोलेशन में जा रहे: जिले में कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए घंटाघर में कोविड केयर सेंटर बनाया गया था. जहां पर कोरोना के इलाज की हर तरह की सुविधा मौजूद थी, लेकिन जैसे-जैसे कोरोना के मरीज काम आने लगे और लोग इसके बारे में जागरूक होते चले गए. इसके बाद लोगों ने होम आइसोलेशन को बेहतर समझा. अब अधिकतर लोग होम आइसोलेशन में जाते हैं, जिन्हें एक किट भी दिया जाता है. साथ में किसी तरह की परेशानी होने पर परामर्श भी दिया जाता है.

गंभीर मरीज जाते हैं मायागंज अस्पताल: वैसे तो जिले में कोरोना मरीजों की संख्या लगातार कम होती जा रही है, लेकिन जांच में अगर कोई व्यक्ति संक्रमित पाया जाता है और उसकी स्थिति गंभीर हो तो उसे मायागंज अस्पताल भेजा जाता है. मायागंज में कोरोना के गंभीर मरीजों के लिए बेहतर व्यवस्था है.हालांकि कोविड केयर सेंटर में भी गंभीर मरीजों के इलाज की व्यवस्था है.

कोरोना की गाइडलाइन का करें पालन: सीएस ने बताया कि जब तक कोरोना की दवा नहीं आ जाती है या फिर टीके नहीं पड़ जाते हैं तब तक लोगों को एहतियात बरतने की जरूरत है. टीका पड़ जाने के बाद भी लोग सचेत रहें तो ज्यादा बेहतर है. मास्क पहनने और सामाजिक दूरी का पालन करने से लोग अन्य बीमारियों से भी बचे रहेंगे. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सफाई का ध्यान रखने से लोग बीमार नहीं पड़ेंगे और स्वस्थ भी रहेंगे.

कोविड 19 के दौर में रखें इसका भी ख्याल:
• व्यक्तिगत स्वच्छता और 6 फीट की शारीरिक दूरी बनाए रखें.
• बार-बार हाथ धोने की आदत डालें.
• साबुन और पानी से हाथ धोएं या अल्कोहल आधारित हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें.
• छींकते और खांसते समय अपनी नाक और मुंह को रूमाल या टिशू से ढंके.
• उपयोग किए गए टिशू को उपयोग के तुरंत बाद बंद डिब्बे में फेंके.
• घर से निकलते समय मास्क का इस्तेमाल जरूर करें.
• बातचीत के दौरान फ्लू जैसे लक्षण वाले व्यक्तियों से कम से कम 6 फीट की दूरी बनाए रखें.
• आंख, नाक एवं मुंह को छूने से बचें.
• मास्क को बार-बार छूने से बचें एवं मास्क को मुँह से हटाकर चेहरे के ऊपर-नीचे न करें
• किसी बाहरी व्यक्ति से मिलने या बात-चीत करने के दौरान यह जरूर सुनिश्चित करें कि दोनों मास्क पहने हों
• कहीं नयी जगह जाने पर सतहों या किसी चीज को छूने से परहेज करें
• बाहर से घर लौटने पर हाथों के साथ शरीर के खुले अंगों को साबुन एवं पानी से अच्छी तरह साफ करें

कोविड-19 का आने वाली वैक्सीन को लेकर युवाओं में उत्साह, कहा अब दूर होगी परेशानी

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– लोगों को कर रहे हैं जागरूक, वैक्सीन को लेकर स्वास्थ्य विभाग द्वारा की जा रही तैयारियाँ का दे रहे हैं जानकारी

– वैक्सीन के आने तक लोगों को एहतियात जारी रखने के लिए भी कर रहे हैं प्रेरित

लखीसराय-

कोविड-19 का आने वाली वैक्सीन की सूचना से जिले के मुस्तफापुर के युवाओं भारी उत्साह है। युवाओं में सिर्फ उत्साह ही नहीं है। बल्कि, वैक्सीनेशन को लेकर स्वास्थ्य विभाग द्वारा की जा रही तैयारियाँ के साथ युवा वर्ग भी लोगों को जागरूक करने में जुट गये हैं। इतना ही नहीं, इस दौरान युवाओं ने वैक्सीन आने तक कोविड-19 से बचाव के लिए आवश्यक एहतियात जारी रखने को भी प्रेरित कर रहे हैं। युवाओं का मानना है कि एहतियात जारी रखने से संक्रमण का खतरा उत्पन्न नहीं होगा। क्योंकि, कोविड-19 संक्रामक बीमारी है। जिसके कारण एक भी लोग इसके चपेट में आया कि अन्य लोगों की भी परेशानी बढ़ सकती है।

वैक्सीनेशन अभियान को सफल बनाने के लिए हर लोगों की सहभागिता जरूरी :

मुस्तफापुर निवासी युवक गुंजन कुमार ने बताया कि वैक्सीन की सूचना से निश्चित रूप से समाज के हर तबके के लोगों में उत्साह का माहौल है। क्योंकि, लंबे समय बाद अब परेशानी दूर होने की उम्मीद जगी है। किन्तु, वैक्सीन आने बाद सिर्फ उत्साह और स्वास्थ्य विभाग के पहल से वैक्सीनेशन का कार्य सफल नहीं हो पाएगा। इसके लिए सामाजिक पहल भी जरूरी है। तभी सफल हो पाएगा। इसलिए, इस समाजहित के कार्यों में समाज के हर तबके के लोगों को सहभागिता जरूरी है।

कोविड-19 वैक्सीनेशन की सफलता को लेकर लोगों को कर रहे हैं जागरूक :

इसी गाँव के सोहन कुमार ने बताया कि कोविड-19 वैक्सीनेशन की सफलता को लेकर लोगों को जागरूक कर रहे हैं। ताकि वैक्सीन आने के बाद समाज में किसी प्रकार का अफवाह उत्पन्न नहीं हो और समाज के हर तबके के लोग वैक्सीनेशन अभियान के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों का सहयोग करे। साथ ही अपने स्तर से भी समाज को जागरूक करने में स्वास्थ्य विभाग का सहयोग कर सकें।

हर किसी के लिए वैक्सीन जरूरी :

वैक्सीन समाज के हर लोगों के लिए जरूरी है। वैक्सीन लगने के बाद ही लोगों को कोविड-19 से स्थाई निजात मिलेगी और लोग पूरी तरह स्वतंत्र होकर अपना कार्य कर सकेंगे। इसके लिए सामाजिक जागरूकता भी जरूरी है।

वैक्सीन आने का बेसब्री से है इंतजार :-
कोविड-19 से स्थाई निजात के लिए लोगों को वैक्सीन आने का बेसब्री से इंतजार है। दरअसल, लोग लंबे समय से इस इंतजार में थे। जो अब दूर होगा और लोगों को स्थाई समाधान मिलेगा। किन्तु, वैक्सीन आने तक लोगों को सावधान और सतर्क रहना भी जरूरी है।

– इन मानकों का करें पालन, कोविड-19 संक्रमण से रहें दूर :-
– साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें।
– जहाँ-तहाँ नहीं थूके।
– मास्क और सेनेटाइजर का नियमित रूप से उपयोग करें।
– अनावश्यक यात्रा से परहेज करें।
– बाहरी खाना खाने से परहेज करें।
– गर्म व ताजा खाना का सेवन करें।
– भीड़-भाड़ वाले जगहों से परहेज करें।
– साबुन या अल्कोहल युक्त पदार्थों से हाथ धोएं।

हिसुआ के डॉ. अविनाश सातवें अटल अवार्ड से हुए सम्मानित

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• लोकसभा सदस्य मनोज तिवारी ने दिल्ली के विज्ञान भवन में दिया सम्मान
• विज्ञान एवं अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए मिला सम्मान
• गोवा के एनसीपोआर में वैज्ञानिक के रूप में दे रहे हैं सेवा
• विगत सालों में कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मान से हो चुके हैं साम्मानित

हिसुआ-
बिहार के नवादा जिले के हिसुआ प्रखण्ड के निवासी डॉ. अविनाश कुमार ने फ़िर अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र को गौरवान्ति किया है। गुरुवार को लोकसभा के सदस्य मनोज तिवारी ने डॉ. अविनाश को दिल्ली के विज्ञान भवन में सातवें अटल अवार्ड से सम्मानित किया है। यह अवार्ड डॉ. अविनाश को विज्ञान एवं अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए प्रदान किया गया।

कई क्षेत्रों के लोगों को मिलता है अवार्ड:

अटल अवार्ड कई क्षेत्रों के लोगों को प्रदान किया जाता है. सातवें अटल अवार्ड में डॉ. अविनाश कुमार सहित देश के अन्य क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोगों को भी दी गयी है. यह अवार्ड कुल 19 लोगो को प्रदान किया गया, जिसमें आर्ट एवं कल्चर, संगीत, राजनीती, डिफेंस, शिक्षा, पोएट्री, स्वास्थ्य एवं मीडिया जैसे क्षेत्र को शामिल किया गया.

सम्मान से अनुसंधान जारी रखने में मिलेगा सहयोग :

सातवें अटल अवार्ड से सम्मानित होने के बाद अपनी खुशी जाहिर करते हुए डॉ. अविनाश कुमार ने बताया कि यह सम्मान उन्हें अपने अनुसंधान को इसी तरह आगे जारी रखने में भी सहयोग करेगा। उन्होंने कहा कि इस मुकाम तक पहुंचने में उनके परिवार के साथ हिसुआ के तमाम लोगों का सहयोग एवं आशीर्वाद शामिल रहा है।

ऐसी सफ़लता देखकर होता है गर्व:

डॉ. अविनाश के पिता डॉ. अमरनाथ राव ने अपने बेटे को राष्ट्र स्तरीय सम्मान से सम्मानित होने के बाद खुशी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि वह अपने पुत्र को ऐसे ही आगे भी अपने परिवार, समाज एवं प्रखण्ड का नाम रौशन करने की भगवान से प्रार्थना करते हैं। वहीं डॉ. अविनाश के बड़े भाई डॉ. शिशुपाल राव जो गोविंदपुर पीएचसी में मेडिकल ऑफिसर के तौर पर कार्यरत हैं, उन्होंने भी अपने छोटे भाई को सम्मान मिलने पर खुशी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि ऐसे सम्मान से सिर्फ परिवार को ही गर्व महसूस नहीं होता बल्कि उनके क्षेत्र के अन्य लोगों को भी गर्व महसूस होता है। कोडरमा के डीवीसी यूनिट में अपनी सेवा दे रहे डॉ. अविनाश के चाचा शिवलोचन राव ने भी उनकी सफलता पर उनको बधाई दी है।

विगत सालों में कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुका है:

गोवा के नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओसियन रिसर्च, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ( भारत सरकार) में सीनियर पोलर साइंटिस्ट के रूप में कार्यरत हैं. वर्ष 2020 में कोरिया पोलर रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा बेस्ट पोलर साइंटिस्ट का अवार्ड हासिल किया था. वर्ष 2019 में जापान में पोलर रिसर्च को लेकर देश का प्रतिनिधित्व कर देश का बढाया गौरव बढ़ाया. वहीँ वर्ष 2018 में कार्यशाला दाबोस, स्वीटजरलैंड में पोलर रिसर्च पर आयोजित वैश्विक कार्यशाला में सम्मलित होकर अपने अनुसंधान का लोहा मनवाया. साथ ही वर्ष 2017 में पोलर रिसर्च को लेकर दक्षिण कोरिया का दौरा किया, जहाँ उन्हें यंग रिसर्चर सम्मान से सम्मानित किया गया. वर्ष 2015-16 में अफ्रीका का दौरा करते हुए अंटार्कटिक महासागर में 4 महीने से अधिक पोलर रिसर्च पर कार्य किया. उनका रिसर्च अनुसंधान 50 से ज्यादा राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित में भी हुआ है.

कोरोना टीकाकरण के प्रति लोगों को जागरूक करें मीडिया कर्मी : सिविल सर्जन

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– जिले में कोरोना वैक्सीनेशन के लिए सभी आवश्यक तैयारियां पूरी

– सीफ़ार के सहयोग से मीडिया कार्यशाला का आयोजन

लखीसराय-

कोरोना टीकाकरण के प्रति लोगों में जागरुकता पैदा करते हुए उनमें वैक्सीनेशन के प्रति पनपने वाली भ्रांतियों को दूर करने में जिले के मीडिया कर्मी आगे आएं। उक्त बातें गुरुवार को जिला स्वास्थ्य समिति के सभागार में सेंटर फॉर एडवोकेसी एन्ड रिसर्च(सीफ़ार) के द्वारा नियमित टीकाकरण एवं कोविड वैक्सीन के ले आयोजित मीडिया कार्यशाला को सम्बोधित करते हुए जिले के सिविल सर्जन डॉ. आत्मानंद राय ने कही। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में भी मीडिया कर्मी ने कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव को लेकर समुदाय को जागरूक करने का प्रशंसनीय कार्य किया है। अब कोरोना का वैक्सीन बहुत ही जल्द आने वाला है। इसके लिए सभी आवश्यक तैयारियां कर ली गई है। बावजूद इसके कोरोना वैक्सीन को ले कुछ लोगों में कुछ भ्रांतियां भी पनपने लगी है। इसलिए यह जरूरी है कि अभी से ही समुदाय को कोरोना वैक्सीन संबंधी सही जानकारी दी जाए ताकि उनके मन में इसको लेकर कोई कोई भ्रांति शेष न हो।

कोरोना वैक्सीनेशन को लेकर सभी आवश्यक तैयारियां पूरी :

जिले के अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. देवेंद्र चौधरी ने बताया कि जिले में कोरोना वैक्सीनेशन को लेकर सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई है। जिले में तीन चरण में लोगों को कोरोना का वैक्सीन लगाया जाना है। पहले चरण में हेल्थ वर्कर सहित सभी फ्रंट लाइन वर्करों को वैक्सीन लगाया जाना है। दूसरे चरण में पुलिस कर्मियों, बुजुर्गों एवं बीमार लोगों को कोरोना का टीका लगना है। इसके बाद मास लेवल पर सभी लोगों को कोरोना का टीका लगाया जाना है।

कोरोना काल में दो महीने तक बाधित रहा नियमित टीकाकरण :

मीडिया कार्यशाला को संबोधित करते हुए जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ. अशोक कुमार भारती के बताया कि जिले में कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ने के बाद दो महीने तक नियमित टीकारण बाधित रहा। बावजूद इसके मई महीने से जिले भर में एक बार फिर से नियमित टीकाकरण शुरू है। उन्होंने बताया कि अप्रैल 2020 से नवंबर 2020 तक नियमित टीकाकरण के निर्धारित लक्ष्य का 67 प्रतिशत लक्ष्य पूरा कर लिया गया। इसके साथ ही सम्पूर्ण टीकाकरण के निर्धारित लक्ष्य का भी 90 प्रतिशत लक्ष्य पूरा कर लिया गया है।

कोरोना वैक्सीन के प्रति लोगों में सकारात्मक सोच पैदा करें मीडिया कर्मी :
नियमित टीकाकरण और कोरोना वैक्सीन विषय पर आयोजित मीडिया कार्यशाला में आये मीडिया कर्मियों का स्वागत करते हुए सेंटर फॉर एडवोकेसी एन्ड रिसर्च के सहायक राज्य प्रबंधक रंजीत कुमार ने बताया कि कोरोना का दौर चुनौतीपूर्ण था, लेकिन स्वास्थ्य कर्मीयों एवं फ्रंट लाइन वर्कर के सहयोग से लोगों को राहत मिली है। साथ ही मीडिया की भी भूमिका पूरे संक्रमण काल में सराहनीय रहा है। उन्होंने मीडिया कर्मीयों से अपील करते हुए कहा कि कोरोना टीकाकरण के सकारात्मक पहलुओं को समुदाय के सामने लाने में सहयोग करें।

कोरोना वैक्सीनेशन पर लगातार की जा रही है बैठक :
जिला स्वास्थ्य समिति के जिला कार्यक्रम प्रबंधक मो. खालिद हुसैन के बताया कि कोरोना वैक्सीनेशन को जिले से लेकर प्रखंड तक स्वास्थ्य कर्मियों के साथ तीन- तीन मीटिंग की गई है। उन्होंने बताया कि इसको लेकर सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई है। जिला मुख्यालय सहित सभी पीएचसी और एपीएचसी सेंटर पर प्रत्येक बुधवार और शुक्रवार को किए जा नियमित टीकाकरण के बाद एक भी बच्चा टीका लगाने से छुटा नहीं है।

उत्कृष्ट कार्य के लिए सीफार के प्रमंडलीय समन्वयक श्याम त्रिपुरारी सम्मानित :
कोरोना काल में कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से लगातार किए गए मीडिया कवरेज के लिए सेंटर फॉर एडवोकेसी एन्ड रिसर्च के मुंगेर प्रमंडलीय समन्वयक श्याम त्रियरारी को सिविल सर्जन, डीपीएम, एसीएमओ, डीआईओ,सहित कई पदाधिकारी ने संयुक्त रूप से प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया।

नियमित टीकाकरण और कोरोना वैक्सीन विषय पर आयोजित एक दिवसीय मीडिया कार्यशाला में शामिल मीडियाकर्मियों को केयर इंडिया के डिस्ट्रिक्ट टीम लीड नवेद उर रहमान ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों में जिले के नियमित टीकाकरण में हुए सुधार को बताया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के अनुसार 12 से 23 माह के 59.1% बच्चों का ही पूर्ण टीकाकरण होता था( एमसीपी कार्ड एवं माता के अनुसार), जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 में बढ़कर 68.9% हो गया है। इस तरह इसमें 10% की वृद्धि हुई है। जबकि पिछले सर्वेक्षण के अनुसार 12 से 23 माह के 61.1% बच्चों का सम्पूर्ण टीकाकरण होता था( केवल एमसीपी कार्ड के आधार पर) जो अब बढ़कर 76.8% हो गया है। इस तरह इसमें भी लगभग 15% की वृद्धि दर्ज हुई है।

इनके अलावा यूनिसेफ के प्रतिनिधि मनोज ने कोरोना वैक्सीनेशन की तैयारी में यूनिसेफ के द्वारा किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी।

कोरोना संक्रमण ही नहीं, सांस की बीमारी से भी बचा रहा मास्क

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दिनचर्या में मास्क पहनने की आदत को शामिल करने से हो रहा सकारात्मक बदलाव

मास्क पहनने की अनिवार्यता से लोगों के अंदर खत्म हुई झिझक, बीमारी से हो रहा बचाव

बांका-

कोरोना काल में लोगों की दिनचर्या में बहुत बदलाव आया है. संक्रमण से बचाव को लेकर लोगों में सावधानी बरतने की आदत सी पड़ गई है. लोग घर से बाहर कहीं भी जाते हैं तो मास्क पहनकर ही निकलते हैं. समय-समय पर हाथ की धुलाई भी करते हैं. भीड़भाड़ से बचते हैं. इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं. खासकर मास्क पहनने को लेकर लोगों में जो आदत पड़ी, उससे कई बीमारियों से बचाव हो रहा है. वायु प्रदूषण से लेकर सांस से संबंधित बीमारी से लोगों को मास्क बचा रहा है.
शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ सुनील कुमार चौधरी कहते हैं मास्क किसी भी संक्रामक बीमारी से बचाव के लिए बहुत ही उपयोगी होता है, लेकिन एक और महत्वपूर्ण बात सामने आ रही है. हर साल ठंड के मौसम में सांस से संबंधित बीमार लोगों की संख्या काफी रहती थी, लेकिन इस साल ऐसे लोगों की संख्या काफी कम दिख रही है. यह एक सकारात्मक बदलाव है. दरअसल, मास्क पहनने से सर्दी के मौसम में कोहरा और धुंध की वजह से लोग सांस की बीमारी से पीड़ित होते थे, लेकिन मास्क पहनने से कोहरा और धुंध में पाए जाने वाले नुकसानदायक चीज शरीर के अंदर प्रवेश नहीं कर पाता. इस वजह से लोग सांस की बीमारी से कम पीड़ित हो रहे हैं.

मास्क पहनने की झिझक खत्म हुई: डॉक्टर चौधरी कहते हैं दरअसल सांस से संबंधित बीमारी वाले लोग पहले भी मास्क पहनते थे, लेकिन सार्वजनिक तौर पर वे लोग मास्क पहनने से हिचकते थे. लेकिन कोरोना काल में जब सरकार ने मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया और लोगों को भी लगने लगा कि मास्क पहनने से उनका बचाव होगा. इसके बाद लोग नियमित तौर पर मास्क पहनने लगे. इसका असर देखने को मिल रहा है.

कोरोना काल के बाद भी लोगों को मास्क पहनते रहना चाहिए: डॉक्टर चौधरी कहते हैं मास्क पहनने से जिस तरह से सांस से संबंधित बीमार लोगों की संख्या में कमी आई है. इससे साफ है कि मास्क पहनने से सिर्फ कोरोना का ही बचाव नहीं होता है, बल्कि संक्रमित तरीके के जितने भी रोग हैं उन सभी का बचाव मास्क पहनने से होता है. इसके अलावा वायु प्रदूषण से भी लोग बचे रहते हैं. इसलिए जब कोरोना काल खत्म भी हो जाए और लोगों को टीके पड़ जाए, फिर भी मास्क पहनने की आदत को नहीं छोड़ना चाहिए.

अन्य सावधानिया भी जरूरी: डॉक्टर चौधरी कहते हैं जिस तरीके से मास्क पहनने से लोग कोरोना के साथ-साथ सांस की बीमारी से भी बच रहे हैं, उसी तरीके से हाथ धोने की आदत से हम अन्य बीमारी से बच सकते हैं या फिर सामाजिक दूरी का पालन करने से हमलोग बहुत सारी बीमारियों से बचे रहेंगे. इसलिए न सिर्फ मास्क पहनने की आदत, बल्कि कोरोना काल में जो भी सकारात्मक बदलाव आया है, उसे बरकरार रखने की जरूरत है.

कोविड 19 के दौर में रखें इसका भी ख्याल:

• व्यक्तिगत स्वच्छता और 6 फीट की शारीरिक दूरी बनाए रखें.

• बार-बार हाथ धोने की आदत डालें.

• साबुन और पानी से हाथ धोएं या अल्कोहल आधारित हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें.

• छींकते और खांसते समय अपनी नाक और मुंह को रूमाल या टिशू से ढंके.

• उपयोग किए गए टिशू को उपयोग के तुरंत बाद बंद डिब्बे में फेंके.

• घर से निकलते समय मास्क का इस्तेमाल जरूर करें.

• बातचीत के दौरान फ्लू जैसे लक्षण वाले व्यक्तियों से कम से कम 6 फीट की दूरी बनाए रखें.

• आंख, नाक एवं मुंह को छूने से बचें.

• मास्क को बार-बार छूने से बचें एवं मास्क को मुँह से हटाकर चेहरे के ऊपर-नीचे न करें

• किसी बाहरी व्यक्ति से मिलने या बात-चीत करने के दौरान यह जरूर सुनिश्चित करें कि दोनों मास्क पहने हों

• कहीं नयी जगह जाने पर सतहों या किसी चीज को छूने से परहेज करें

• बाहर से घर लौटने पर हाथों के साथ शरीर के खुले अंगों को साबुन एवं पानी से अच्छी तरह साफ करें