सीपीजे कॉलेज नरेला में 11 मई को “करियर एक्सपो-2023” का आयोजन

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नईदिल्ली-

गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली से संबद्ध सीपीजे कॉलेज नरेला बीबीए(जी)/ बीबीए (सीएएम)/ बीसीए/ बीकॉम(ऑनर्स) के चौथे और छठे सेमेस्टर के छात्रों के लिए 11 मई, 2023 को करियर एक्सपो-2023 (पूल कैंपस प्लेसमेंट और इंटर्नशिप ड्राइव) का आयोजन कर रहा है  जिसमें 15 से अधिक कंपनियां, अनेक जॉब प्रोफाइल के साथ, हमारे कैंपस में बल्क भर्ती के लिए आने की उम्मीद है। डॉ. अभिषेक जैन, महासचिव और श्री युगांक चतुर्वेदी, महानिदेशक ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया कि यह एक मेगा अभियान होने जा रहा है जिसके लिए हम जीजीएसआईपी विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों से भाग लेने के लिए चौथे और छठे सेमेस्टर के छात्रों को आमंत्रित कर रहे हैं। इच्छुक छात्र इस भव्य अवसर का लाभ उठाने के लिए निम्नलिखित लिंक पर अपना नाम पंजीकृत कर सकते हैं: https://bit.ly/CPJCareerExpo_2023

राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम- निक्षय मित्र योजना के तहत मुंगेर जिला में सात निक्षय मित्रों ने 1521 टीबी मरीजों को लिया गोद 

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– निक्षय मित्र ,मटीबी मरीजों को गोद लेकर लगातार छह महीने तक उनके बीच कर रहे हैं फूड बास्केट का वितरण
– जिला भर में निक्षय मित्र योजना के तहत सामुदायिक सहयोग के लिए चिह्नित हैं कुल 2285 टीबी मरीज
मुंगेर-
राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के  निक्षय मित्र योजना के तहत मुंगेर जिला में आईटीसी सहित कुल सात निक्षय मित्रों ने कुल 1521 टीबी मरीजों को गोद लिया है। इस आशय की जानकारी जिला संचारी रोग पदाधिकारी डॉ ध्रुव कुमार शाह ने दी। उन्होंने बताया कि विगत 21 फरवरी को मुंगेर स्थित आईटीसी कंपनी ने जिला भर में निक्षय मित्र योजना के तहत सामुदायिक सहयोग के लिए चिह्नित किए गए कुल 2285 टीबी मरीजों में से एक साथ 1500 टीबी मरीजों को गोद लेते हुए अगले छह महीने तक लगातार फूड बास्केट उपलब्ध कराने का निर्णय लिया था। कंपनी के द्वारा प्रखंड स्तर से लेकर जिला मुख्यालय तक लगातार टीबी मरीजों के बीच फूड बास्केट का वितरण किया जा रहा है। इसके अलावा जिला भर में छह अन्य निक्षय मित्र हैं जो अन्य 21 टीबी मरीजों को गोद लेकर उनके बीच पोषक तत्वों से युक्त फूड बास्केट उपलब्ध करा रहे हैं।
जिला टीबी एचआईवी समन्वयक शैलेंदु कुमार ने बताया कि टीबी के मरीजों को इलाज के दौरान लगातार छह महीने तक दवाई के साथ- साथ पोषण संबंधी  सपोर्ट की भी बहुत आवश्यकता होती है। अक्सर ऐसा देखा गया है कि आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं होने के कारण वो खाने- पीने में पोषक आहार नहीं ले पाते हैं। टीबी मरीजों के शरीर में पोषक तत्वों की कमी की वजह से उनके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बहुत ही कम हो जाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार टीबी मरीजों के लिए मुफ्त जांच, इलाज और दवाइयों के साथ – साथ सही पोषण के लिए निक्षय पोषण योजना के तहत प्रत्येक महीने जब तक टीबी का इलाज चलता है 500 रुपया की सहायता राशि सीधे टीबी मरीजों के बैंक खातों में भेजती है। इसी के साथ विगत 9 सितंबर 2022 को सरकार ने निक्षय मित्र योजना शुरू किया है। इस योजना के तहत एनजीओ, कॉरपोरेट सेक्टर, समाजसेवी, जनप्रतिनिधि सहित अन्य लोग टीबी मरीजों को छह महीने से  3 साल तक गोद लेकर उनके लिए पोषक आहार उपलब्ध करा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि जिला भर में आईटीसी के द्वारा 1500 टीबी मरीजों को गोद को गोद लेकर विगत 21 फरवरी से अगले छह महीने तक उनके बीच लगातार फूड बास्केट उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके अलावा जमालपुर की समाजसेवी रीभा देवी के द्वारा 2 टीबी मरीजों को गोद लेकर पोषक तत्वों से युक्त फूड बास्केट उपलब्ध करायी जा रही है।
जमालपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में लैब टेक्नीशियन के पद पर कार्यरत विक्रम कुमार के द्वारा 1 और मुंगेर के कौरा मैदान के रहने वाले संजीव मंडल के द्वारा जमालपुर प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत टीबी के  दो मरीजों को गोद लेकर  लगातार छह महीने तक पोषक आहार उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि जमालपुर की समाजसेवी रीभा देवी के द्वारा जनवरी महीने से ही टीबी मरीजों के लिए फूड बास्केट उपलब्ध करायी जा रही है। हवेली खड़गपुर के रहने वाले मोहम्मद इस्लाम भी दो टीबी मरीजों को गोद लेकर लगातार पोषक आहार उपलब्ध करा रहे हैं।
दो निक्षय मित्र मई  महीने से टीबी मरीजों को उपलब्ध करा रहे हैं पोषक आहार :
डिस्ट्रिक्ट टीबी सेंटर के जिला कार्यक्रम समन्वयक सुमित सागर ने बताया कि दो निक्षय मित्र, हवेली खड़गपुर के मुस्कान टेलीकॉम , टीबी के 10 मरीजों को गोद लेकर कर मई के महीने से पोषक आहार उपलब्ध करा रहे हैं। इसके अलावा जमालपुर की  अनाइका नूर्वी भी मई के महीने से 2 टीबी के मरीजों को गोद लेकर पोषक आहार उपलब्ध करा रही हैं। जिला वासियों से अपील करते हुए उन्होंने कहा कि वो टीबी मरीजों की मदद करने के लिए निक्षय मित्र की भूमिका निभा कर मानवता की सेवा के लिए आगे आएं ।

नवजात शिशुओं को जन्म के शुरू के 42 दिनों तक विशेष देखभाल की जरूरत 

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-आशा घर-घर जाकर कर रही शिशुओं की देखभाल
– गृह प्रसव के मामलों में पहले दिन से ही नवजात को बेहतर देखभाल की जरूरत
-गृह आधारित नवजात देखभाल कार्यक्रम की शुरुआत की गयी है
लखीसराय –
प्रसव के बाद नवजात के बेहतर देखभाल की जरूरत बढ़ जाती है। संस्थागत प्रसव के मामलों में शुरुआती दो दिनों तक माँ और नवजात का ख्याल अस्पताल में रखा जाता है, लेकिन गृह प्रसव के मामलों में पहले दिन से ही नवजात को बेहतर देखभाल की जरूरत होती है। . शिशु जन्म के शुरुआती 42 दिन अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।  इस दौरान उचित देखभाल के अभाव में शिशु के मृत्यु की संभावना अधिक होती है। . इसको ध्यान में रखते हुए होम बेस्ड न्यू बॉर्न केयर (एचबीएनसी) यानि गृह आधारित नवजात देखभाल कार्यक्रम की शुरुआत की गयी है। . इस कार्यक्रम के तहत संस्थागत प्रसव एवं गृह प्रसव दोनों स्थितियों में आशा घर जाकर 42 दिनों तक नवजात की खास देखभाल करती हैं । .
गृह आधारित नवजात देखभाल पर अधिक ध्यान
 जिला के  सिविल सर्जन डॉ .बीपी सिन्हा  ने बताया नवजात देखभाल सप्ताह के दौरान आशाओं द्वारा किए जा रहे गृह आधारित नवजात देखभाल पर अधिक ज़ोर दिया गया है। . इसके लिए आशाओं को निर्देशित भी किया गया है कि वह गृह भ्रमण के दौरान नवजातों में होने वाली समस्याओं की अच्छे से पहचान करें एवं जरूरत पड़ने पर उन्हें रेफर भी करें। .
संस्थागत प्रसव में 6 एवं गृह प्रसव में 7 भ्रमण:
केयर इंडिया लखीसराय  के डीटीएल नावेद उर रहमान  ने बताया कि आशाएं गृह भ्रमण के दौरान ना सिर्फ बच्चों में खतरे के संकेतों की पहचान करती  बल्कि माताओं को नवजात देखभाल के विषय में आवश्यक जानकारी भी देती हैं। . एचबीएनसी कार्यक्रम के तहत आशाएं संस्थागत एवं गृह प्रसव दोनों स्थितियों में गृह भ्रमण कर नवजात शिशु की देखभाल करती हैं ।  संस्थागत प्रसव की स्थिति में 6 बार गृह भ्रमण करती हैं ( जन्म के 3, 7,14, 21, 28 एवं 42 वें दिवस पर)। . गृह प्रसव की स्थिति में 7 बार गृह भ्रमण करती  हैं ( जन्म के 1, 3, 7,14, 21, 28 एवं 42 वें दिवस पर)। .
जानिए कार्यक्रम का उद्देश्य:
-सभी नवजात शिशुओं को आवश्यक नवजात शिशु देखभाल सुविधाएँ उपलब्ध कराना एवं जटिलताओं से बचाना। .
-समय पूर्व जन्म लेने वाले नवजातों एवं जन्म के समय कम वजन वाले बच्चों की शीघ्र पहचान कर उनकी विशेष देखभाल करना.
-नवजात शिशु की बीमारी का शीघ्र पता कर समुचित देखभाल करना एवं रेफर करना.
-परिवार को आदर्श स्वास्थ्य व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित करना एवं सहयोग करना.
-माँ के अंदर अपने नवजात स्वास्थ्य की सुरक्षा करने का आत्मविश्वास एवं दक्षता को विकसित करना.।
इन लक्षणों की  नहीं करें अनदेखी : सही समय पर नवजात की बीमारी का पता लगाकर उसकी जान बचायी जा सकती है। . इसके लिए खतरे के संकेतों को समझना जरूरी होता है। . खतरे को जानकर तुरंत शिशु को नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र ले जायें.।
• शिशु को सांस लेने में तकलीफ हो
• शिशु स्तनपान करने में असमर्थ हो
• शरीर अधिक गर्म या अधिक ठंडा हो
• शरीर सुस्त हो जाए
• शरीर में होने वाली हलचल में अचानक कमी आ जाए।

बच्चों को निमोनिया से बचाने के लिए संपूर्ण टीकाकरण के साथ सतर्कता भी जरूरी

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– बदलते मौसम में बढ़ जाती है निमोनिया संक्रमण के खतरे की संभावना, बच्चों का रखें ख्याल

– न्यूमो कॉकल वैक्सीन (पीसीवी) का टीकाकरण निमोनिया से बचाव के लिए है जरूरी

खगड़िया-

लगातार बदलते मौसम में निमोनिया से बचाव के लिए बच्चे का विशेष ख्याल रखने की आवश्यकता है। दरअसल, बच्चे और बुजुर्गों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बहुत कमजोर होती है। जिसके कारण इस बीमारी की चपेट में बच्चे व बुजुर्गों के आने की संभावना अधिक रहती है। क्योंकि, निमोनिया सांस से जुड़ी गंभीर बीमारी है। यह बैक्टीरिया, वायरस और फंगल की वजह से फेफड़ों में संक्रमण से होता है। इस वजह से बच्चों और बुजुर्गों को सांस लेने में काफी तकलीफ होती है। इस बीमारी से बचने का एकमात्र उपाय न्यूमो कॉकल वैक्सीन (पीसीवी) का टीकाकरण ही है।

– सभी स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध है निःशुल्क पीसीवी का टीका :
जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ देवनंदन पासवान ने बताया कि निमोनिया के प्रारंभिक लक्षण सर्दी- खांसी जैसे हो सकते हैं। ज्यादातर कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग इससे जल्दी ग्रसित हो जाते हैं। जिन बच्चों को पीसीवी का टीका नहीं पड़ा है, उन बच्चों को इस बीमारी की चपेट में आने की संभावना अधिक रहती । इस बीमारी में मवाद वाली खांसी, तेज बुखार एवं सीने में दर्द समेत अन्य परेशानी होती है। इस बीमारी को टीकाकरण से रोका जा सकता है। इसलिए, अपने बच्चों को संपूर्ण टीकाकरण के अंतर्गत स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध निःशुल्क पीसीवी का टीका निश्चित रूप से लगवाएं। वहीं, उन्होंने बताया, बच्चे को जन्म के पश्चात दो साल के अंदर सभी तरीके के पड़ने वाले टीके जरूर लगवाने चाहिए। इससे बच्चे की रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत तो होती ही है, इसके अलावा वह 12 से अधिक प्रकार की बीमारियों से भी दूर रहता ।

– जानें क्या है निमोनिया :
निमोनिया सांस से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है। इसकी वजह से फेफड़ों में संक्रमण होता है। आम तौर पर यह बीमारी बुखार या जुखाम होने के बाद ही होता है। सर्दी के मौसम में बच्चों और बुजुर्गों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने की वजह से यह बीमारी ज्यादा होती है। निमोनिया का प्रारम्भिक इलाज सीने का एक्स-रे करने के बाद क्लीनिकल तरीके से शुरू होता है। निमोनिया माइक्रो बैक्टीरिया वायरल, फंगल और पारासाइट की वजह से उत्पन्न संक्रमण की वजह से होता है। इसका संक्रमण सामुदायिक स्तर पर भी हो सकता है।

– निमोनिया से बचाव के उपाय :
ऐसे तो निमोनिया से बचाव का एक मात्र उपाय टीकाकरण ही है। यह एक सांस संबंधी बीमारी है, इसलिए कुछ सावधानी बरतने के बाद काफी हद तक इसके संक्रमण से बचा जा सकता । इसके लिए नवजात एवं छोटे बच्चों के रखरखाव, खान-पान एवं कपड़े पहनाने में सावधानी बरतने की आवश्यकता है। सर्दी के मौसम में हमेशा बच्चों को गर्म कपड़े पहनाने एवं खाने-पीने में गर्म पदार्थो का ही इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ ही वैसे लोगों के संपर्क से दूर रखने की आवश्यकता है, जिन्हें पहले से सांस संबंधी बीमारी हो। इसके साथ बुजुर्गों सहित अन्य लोगों को भी काफी सावधानी बरतने की जरूरत है।

– निमोनिया का यह है प्रारंभिक लक्षण :
निमोनिया का प्रारंभिक लक्षण, बुखार के साथ पसीना एवं कंपकपी होना, अत्यधिक खांसी में गाढ़ा, पीला, भूरा या खून के अंश वाला बलगम आना, तेज-तेज और कम गहरी सांस लेने के साथ सांस का फूलना (जैसे कि सांस लेने के दौरान आवाज होना), होंठ या अंगुलियों के नाखून नीले दिखाई देना, बच्चों की परेशानी व उत्तेजना बढ़ जाना है।

सात्विक काउंसिल ऑफ इंडिया ने “कलाकार के लिए तैयार किया गया सात्विक चेतना कार्यक्रम” शुरू किया !! SIFAS कला महोत्सव 2023 में

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सात्विक सर्टिफिकेशन सिंगापुर को “सिफास फेस्टिवल ऑफ आर्ट्स 2023” से जुड़कर गर्व हो रहा है। सात्विक काउंसिल ऑफ इंडिया और सात्विक सर्टिफिकेशन सिंगापुर ने मिलकर कला और खाद्य समुदाय में भारतीय सांस्कृतिक विरासत के बारे में जागरूकता और समझ पैदा की है, जिसमें सिंगापुर के स्वतंत्र कलाकार शामिल हैं। सात्विक चेतना कार्यक्रम के साथ कला का उत्पादन और प्रचार समुदाय को समृद्ध करता है और सिंगापुर और क्षेत्र में जीवंतता जोड़ता है। सिंगापुर इंडियन फाइन आर्ट्स सोसाइटी (सिफास) द्वारा आयोजित एक कला उत्सव में लगभग 100 स्थानीय कलाकार कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत, भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी और ओडिसी सहित विभिन्न कला रूपों का मंचन कर रहे हैं। “द फेस्टिवल ऑफ आर्ट्स 2023 दिखाता है कि कलाकार कैसे प्रयोग कर सकते हैं, सीमाओं को आगे बढ़ा सकते हैं और क्षितिज का विस्तार कर सकते हैं और फिर भी मनोरंजक, शुद्ध और भावपूर्ण हो सकते हैं।

सात्विक प्रमाणन चिह्न 100% शुद्ध शाकाहारी/शाकाहारी/जैन भोजन और जीवन शैली सुनिश्चित करने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले सबसे प्रमुख चिह्नों में से एक है। यह हमारे प्राचीन भारत के समृद्ध सांस्कृतिक पाठ वेदों और पुराणों से प्रेरणा लेता है। दुनिया भर में अग्रणी और प्रमुख शाकाहारी / शाकाहारी / जैन प्रमाणन में से एक के रूप में, जहां एक उपभोक्ता 100% शुद्धता की उम्मीद कर सकता है और विभिन्न प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं को खरीद सकता है जो शाकाहारी होने के अपने विकल्पों के अनुरूप रहते हुए अपने स्वाद और जीवन शैली को संतुष्ट करते हैं, शाकाहारी और जैन। यह दुनिया भर में और विशेष रूप से सिंगापुर और अन्य देशों में हमारे भारतीय उपभोक्ताओं के लिए सात्विक सत्यापित उत्पादों और सेवाओं के नए विकास को संशोधित करता है।

SIFAS फेस्टिवल ऑफ आर्ट्स 2023 में हाइलाइट शो

SIFAS महोत्सव के उद्घाटन समारोह के दौरान, सात्विक प्रमाणन ने अपना “सात्विक चेतना कार्यक्रम कलाकार के लिए डिज़ाइन किया !! SCSG द्वारा प्रवर्तित मैनुअल’ विशेष रूप से कलाकारों के लिए डिज़ाइन किया गया है जो अपने आहार और जीवन शैली में आयुर्वेदिक सिद्धांतों को अपनाकर स्वस्थ भोजन और जीवन शैली के बारे में जागरूकता पैदा करते हैं। SIFAS के साथ SCI और SCSG का उद्देश्य सात्विक चेतना ड्राइव के माध्यम से अपनी प्रस्तुतियों को बढ़ाने और उत्थान करने के लिए विभिन्न विचारों को शामिल करने के तरीके खोजकर युवा पीढ़ी के लिए प्रासंगिक होना है।

समारोह के दौरान, श्री अभिषेक विश्वास, भारतीय सात्विक परिषद के संस्थापक और महासचिव ने महामहिम द्वारा सम्मानित किया। पेरियासामी कुमारन – SIFAS महोत्सव के दौरान सिंगापुर गणराज्य में भारत के उच्चायुक्त श्री वेंकटरमण कुमार निदेशक – सात्विक प्रमाणन सिंगापुर, श्री पुनीत पुष्करणा अध्यक्ष (प्रदर्शन और बाहरी संबंध) और श्री के वी राव निवासी निदेशक – आसियान, टाटा के साथ शामिल हुए संस प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष और बोर्ड के सदस्य, टाटा समूह की क्षेत्रीय सहायक कंपनियां – आसियान भी समारोह का हिस्सा बने।

प्रसिद्ध भारतीय ओडिसी प्रतिपादक गजेंद्र पांडा के सहयोग से मलेशिया स्थित नृत्य किंवदंती रामली इब्राहिम द्वारा निर्मित रामायण पर आधारित एक शानदार नृत्य उत्पादन। पदम श्री दातुम रामली इब्राहिम, एम एस मीनाक्षी सुंदरम को-ऑप्टेड कमेटी के सदस्य और सुश्री रजनी रंगन सीपीए चांगी एयरपोर्ट सिंगापुर भी सिफास का हिस्सा बने और कलाकार के लिए बनाए गए सात्विक चेतना कार्यक्रम को बढ़ावा देने में सक्रिय रूप से भाग लिया !!

सात्विक सर्टिफिकेशन सिंगापुर और सात्विक काउंसिल ऑफ इंडिया का उद्देश्य कलाकारों के आहार और दैनिक गतिविधियों में आयुर्वेदिक सिद्धांतों को अपनाकर उनकी प्रतिभा का पोषण करना है “कलाकारों के लिए सात्विक चेतना कार्यक्रम” जो स्वस्थ भोजन और स्वस्थ जीवन शैली के बारे में जागरूकता पैदा करता है। जैसा कि कलाकार अपनी प्रदर्शन क्षमता को अनलॉक करने और/या अपने शरीर के लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए एक संपूर्ण आहार के लिए प्रयास करते हैं। पूर्णता के लिए प्रयास करना, हालांकि, अस्वास्थ्यकर आदतों को जोखिम में डालता है, तब भी जब वे आदतें सार्थक स्थान से आ रही हों। “याद रखें, पूर्णता मौजूद नहीं है और जब हम अपने भोजन विकल्पों पर पूर्णता या स्वच्छ मानकों को लागू करने का प्रयास करते हैं, तो हम खाने की प्रतिबंधात्मक सुरंग में प्रवेश करने का जोखिम उठाते हैं, जो अंततः बर्नआउट का कारण बनता है”

टीबी एक संक्रमण है,लाइलाज नहीं बस इलाज है जरूरी: डॉ.श्रीनिवास

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-बीमारी को छुपायें नहीं,जाँच हेतु तय करें दूरी सरकारी संस्थान की
-जिले के सभी स्वास्थ्य संस्थान में उपलब्ध है निः शुल्क सुविधा

लखीसराय-

टीबी एक संक्रमण वाली बीमारी है जिसका जीवाणु हवा के माध्यम से फैलता । जब किसी इंसान में टीबी के जीवाणु होते हैं तो जब वह छींकता ,खांसता ,या बोलता है तो इसका जीवाणु हवा में फ़ैल जाता है। जो दूसरे इंसान को संक्रमित कर देता है । इसके लिए जरूरी है समय पर इलाज कराएं। जिससे संक्रमित अपने साथ और लोगों को इस संक्रमण से सुरक्षित रख सकता है। ये जानकारी दी है जिला संचारी रोग पदाधिकारी डॉ .श्रीनिवाश शर्मा ने।
.डॉ शर्मा बताते हैं कि हमारे समाज में अभी भी लोग टीबी की बीमारी को छुपाते हैं। कई बार ये भी देखने को मिलता है कि जो इस बीमारी से ग्रसित होते हैं मगर वो गाँव वाले डॉक्टर साहब की बात को मानकर इस बीमारी को बस, कमजोरी समझकर अपना इलाज करवाने लगते हैं। ग्रामीण डॉक्टर साहब भी सही बीमारी को छोड़कर दूसरी बीमारी का इलाज करने लगते हैं। जिसका नतीजा होता है कि वो इंसान दिनों -दिन कमजोर होता जाता है एवं लाचार हो जाता है ।इसका दुष्परिणाम भी कई बार मौत के रूप में देखने को मिलता है । इसलिए जरूरी है कि लोग घर से बाहर आकर नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य संस्थान तक आयें एवं जाँच के साथ अपना उचित निः शुल्क इलाज करवाकर अपनी जिन्दगी को नया आयाम दें ।
क्षेत्रों में लगे टीबी जाँच कैंप :
लखीसराय नगर परिषद के उपसभापति शिवशंकर राम ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग अगर हमारे शेत्र में टीबी जागरूकता एवं जाँच हेतु शिविर लगाये तो जो लोग किसी कारण से सरकारी अस्पताल तक जाँच करवाने नहीं जा पाते हैं तो वो भी जाँच करवा पायेंगे। साथ ही टीबी के बारे में पूरी तरह से जान भी पायेंगें। .इसका फायदा ये होगा कि लोग अपने द्वार पर शिविर को जानकर जरूर आयेंगे। अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि ये बात हमने कोविड के समय भी देखी है कि जब स्वास्थ्य विभाग ने जगह -जगह पर जाँच एवम टीका शिविर लगाया तो लोग उस शिविर तक आये ,जहाँ अपनी जाँच भी करवायी और टीके भी लगवाये। .उन्होंने आगे बताया कि शिविर का फायदा ये होगा कि अगर कोई एक इंसान अपनी जाँच करवाएगा तो उसे देखकर दूसरा भी जरूर शिविर तक आकर अपनी जाँच करवाएगा। इसका सफल प्रयोग हम कोविड के समय में देख चुके हैं ।.
ये हैं टीबी के प्रारंभिक लक्षण :
– भूख न लगना, कम लगना तथा वजन अचानक कम हो जाना।
– बेचैनी एवं सुस्ती रहना, सीने में दर्द का एहसास होना, थकावट व रात में पसीना आना।
– हलका बुखार रहना।
– खांसी एवं खांसी में बलगम तथा बलगम में खून आना। कभी-कभी जोर से अचानक खांसी में खून आ जाना।
– लगातार पन्द्रह दिनों तक खाँसी रहना
– गहरी सांस लेने में सीने में दर्द होना, कमर की हड्डी पर सूजन, घुटने में दर्द, घुटने मोड़ने में परेशानी आदि।
– बुखार के साथ गर्दन जकड़ना, आंखें ऊपर को चढ़ना या बेहोशी आना ट्यूबरकुलस मेनिन्जाइटिस के लक्षण हैं।
– पेट की टीबी में पेट दर्द, अतिसार या दस्त, पेट फूलना आदि होते हैं।

टीबी के मरीजों के लिए सही और पूरे इलाज के साथ पौष्टिक और विटामिन युक्त आहार का सेवन आवश्यक

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– कुपोषण की वजह से टीबी मरीजों की कम हो जाती है रोग – प्रतिरोधक क्षमता

– केंद्र सरकार के द्वारा निक्षय पोषण योजना के तहत टीबी मरीजों को सही पोषण के लिए दी जाती है प्रत्येक महीने 500 रुपए की सहायता राशि
– केंद्र सरकार के निक्षय मित्र योजना के अंतर्गत स्वयंसेवी संस्थाएं और व्यक्ति भी कर रहे हैं टीबी मरीजों की सहायता

मुंगेर, 06 मई-

टीबी के मरीजों के लिए सही और पूरे इलाज के साथ- साथ सही पोषण के लिए पौष्टिक और विटामिन युक्त आहार का सेवन भी आवश्यक है। इस आशय की जानकारी जिला संचारी रोग पदाधिकारी डॉ ध्रुव कुमार शाह ने दी। उन्होंने बताया कि टीबी मरीजों के द्वारा इलाज के साथ- साथ पौष्टिक आहार लेने से उनके शरीर की रोग – प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। जिससे टीबी मरीजों को पूरी तरह से ठीक होने में काफी मदद मिलती है । कम से कम समय में मरीज टीबी की बीमारी से पूरी तरह ठीक हो जाता है।
उन्होंने बताया कि टीबी मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मोटे अनाज के तौर पर ज्वार, बाजारा के साथ – साथ प्रत्येक दिन दूध और विटामिन युक्त फलों और हरी सब्जियों का नियमित सेवन बहुत ही उपयोगी है। विटामिन और पोषक तत्वों से भरपूर नींबू, संतरा, आंवला, अमरूद और आम जैसे फलों और हरी सब्जियों के अलावा टमाटर, शकरकंद और गाजर सहित अन्य सब्जियों जिनमें एंटी ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होता है ,के सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।

केंद्र सरकार के द्वारा निक्षय पोषण योजना के तहत के टीबी मरीजों को सही पोषण के लिए दी जाती है प्रत्येक महीने 500 रुपए की सहायता राशि : जिला यक्ष्मा केंद्र मुंगेर में जिला टीबी/ एचआईवी रोग समन्वयक शैलेंदु कुमार ने बताया कि टीबी मरीजों के सही पोषण के लिए केंद्र सरकार निक्षय पोषण योजना के तहत पूरे इलाज अवधि के दौरान 500 रुपए प्रति माह की दर से डायरेक्ट टू बेनिफिशियरी (डीबीटी) माध्यम से सहायता राशि देती है। इसके लिए बलगम जांच के बाद टीबी की बीमारी तय होने के बाद टीबी मरीज का पूरा डिटेल निक्षय पोर्टल पर अपलोड होना अनिवार्य है।
उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार की निक्षय मित्र योजना के अंतर्गत स्वयंसेवी संस्थाएं और व्यक्ति भी टीबी मरीजों की सहायता कर रहे हैं।

भारत सरकार के द्वारा सन 2025 तक निर्धारित किया गया है टीबी उन्मूलन का लक्ष्य :
डिस्ट्रिक्ट टीबी सेंटर मुंगेर के जिला योजना समन्वयक (डीपीसी) सुमित सागर ने बताया कि मुंगेर सहित पूरे बिहार और समूचे देश से टीबी की बीमारी के उन्मूलन के लिए भारत सरकार ने सन 2025 तक का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जिला और प्रखंड स्तर पर कार्यरत स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और कर्मियों के द्वारा लगातार एक्टिव टीबी पेशेंट सर्च अभियान चलाया जा रहा है। इस दौरान चिह्नित किए गए टीबी के मरीजों की पीएचसी और सीएचसी स्तर पर जांच और समुचित इलाज की पूरी व्यवस्था निः शुल्क उपलब्ध है। इसके अलावा टीबी मरीजों को पूरे इलाज की अवधि के दौरान निः शुल्क दवाइयां भी उपलब्ध कराई जाती हैं। उन्होंने बताया कि इस बीमारी पर पूरी तरह नियंत्रण के लिए पर्याप्त रूप में प्रचार – प्रसार कर बीमारी के लक्षणों, उपचार और बचाव के उपायों के बारे में लोगों को जागरूक किया जा रहा है।

टीबी संक्रमण से बच्चों के बचाव को अवश्य लगवाएं बीसीजी का टीका 

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– कम उम्र के बच्चों में टीबी के संक्रमण का खतरा अधिक
– दो सप्ताह से अधिक खांसी और  बुखार रहने पर अवश्य करवाएं जांच
मुंगेर-
कम उम्र के बच्चों को टीबी के संक्रमण से बचाने के लिए उन्हें अवश्य लगवाएं बीसीजी का टीका। जिला के सभी सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध है  बीसीजी का टीका। उक्त बातें डिस्ट्रिक्ट टीबी/एचआईवी कॉर्डिनेटर शैलेंदु कुमार ने कही । उन्होंने बताया कि कुपोषण के शिकार बच्चों के टीबी संक्रमित होने का खतरा अधिक होता है। टीबी मरीज के संपर्क में आने के बाद कुपोषित बच्चा टीबी से संक्रमित हो सकता है। टीबी से संक्रमित होने के बाद बच्चों की  रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती और वो शारीरिक रूप से कमजोर होने लगता है। , खाने – पीने में बच्चे की अभिरुचि कम होने लगती  जिसकी वजह से उसका वजन भी तेजी से कम होने लगता है।
उन्होंने बताया कि टीबी एक गंभीर संक्रामक बीमारी है जो किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है। आम तौर पर टीबी का संक्रमण हवा के माध्यम से फैलता है। टीबी संक्रमित व्यक्ति के छींकने और खांसने से नजदीकी व्यक्ति टीबी संक्रमण की चपेट में आ जाता है। इस बीमारी से कम उम्र के बच्चे भी प्रभावित हो सकते हैं। बच्चों में होने वाला टीबी का संक्रमण व्यस्कों कि तुलना में बहुत अलग होता है। सही समय पर संक्रमण की पहचान एवम समुचित इलाज से टीबी की बीमारी को पूरी तरह से ठीक हो जाता है। इसके अलावा मरीजों के बेहतर पोषण के लिए निक्षय पोषण योजना के तहत पांच सौ रुपए प्रति माह सरकारी सहायता भी उपलब्ध है।
जिला संक्रामक रोग पदाधिकारी डॉ ध्रुव कुमार शाह ने बताया कि कम उम्र के बच्चोंकी  रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम होती है। इसकी वजह से वो किसी भी प्रकार की  बीमारी की चपेट में आ जाता है। बच्चों में टीबी के लक्षण  की पहचान और इलाज दोनों ही चुनौतीपूर्ण है। बड़ों की तुलना में बच्चों में टीबी का संक्रमण ज्यादा घातक साबित हो सकता है।
फेफड़ों से जुड़े होते हैं बच्चों में होने वाले टीबी के अधिकांश मामले :
उन्होंने बताया कि टीबी माइक्रो बैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस नामक जीवाणु के कारण होने वाला एक गंभीर संक्रामक बीमारी है। बच्चों में टीबी के अधिकांश मामले फेफड़ों से जुड़े होते हैं। टीबी के संक्रमण से बचाव के लिए घर के आसपास लम्बे समय से खांसी या बुखार से पीड़ित लोगों के संक्रमण से उन्हें दूर रखें। ऐसे व्यक्ति को नजदीकी अस्पताल में जाकर जांच और इलाज कराने की सलाह अवश्य दें। इसके साथ ही व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान, संतुलित आहार के सेवन के साथ – साथ मास्क का नियमित उपयोग टीबी के संक्रमण से बचाव का महत्वपूर्ण तरीका है।
अधिक समय से खांसी और बुखार रहने के बाद अवश्य करवाएं जांच :
डिस्ट्रिक्ट टीबी सेंटर के डीपीसी सुमित सागर ने बताया कि बच्चों सहित अन्य लोगों को भी दो से अधिक सप्ताह तक खांसी और बुखार रहने के बाद अपने नजदीकी अस्पताल में जाकर बलगम और टीबी की जांच अवश्य करवा लेनी  चाहिए। बच्चियों में 60% टीबी संक्रमण के मामले फेफड़ों से जुड़े होते हैं। इसके अलावा नाखून और बाल को छोड़कर टीबी का संक्रमण शरीर के किसी भी अंग को प्रभावित कर सकता है।

बेहतर सामुदायिक प्रबंधन से अति कुपोषित बच्चे होंगे सुपोषित: डॉ. कौशल किशोर 

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• समुदाय स्तर पर जरुरी दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरुरी: संजय कुमार सिंह
• अति कुपोषण एवं प्रारंभिक विकास विफलता पर राज्य स्तरीय कार्यशाला का हुआ आयोजन
• 80 फीसदी मष्तिष्क का विकास जीवन के प्रथम तीन वर्षों के अंदर
पटना-
अति-कुपोषित बच्चों को सुपोषित करना एक बड़ी चुनौति के साथ सभी की जिम्मेदारी भी है. जिसमें समुदाय स्तर पर अति-कुपोषित बच्चों को सुपोषित करने का प्रयास एक प्रभावी पहल है. बच्चों में कुपोषण उनकी शारीरिक एवं मानसिक दक्षता में कमी करने के साथ देश के विकास में भी बाधक साबित होती है. उक्त बातें समेकित बाल विकास सेवाएं के निदेशक डॉ. कौशल किशोर ने अति कुपोषण एवं प्रारंभिक विकास विफलता पर आयोजित राज्य स्तरीय कार्यशाला में बतायी. डॉ. किशोर ने बताया कि अति-कुपोषित बच्चों को सुपोषित करने की दिशा में पोषण पुनर्वास केंद्र की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता. लेकिन सभी अति-कुपोषित बच्चों को कुपोषण से बहार निकालने में सिर्फ पोषण पुनर्वास केंद्र पर्याप्त नहीं है. इसके लिए समुदाय स्तर पर अति-कुपोषित बच्चों की पहचान एवं इनके बेहतर प्रबंधन पर ध्यान देने की अधिक जरूरत है.
समुदाय स्तर पर जरुरी दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरुरी:
कार्यशाला को संबोधित करते हुए सचिव स्वास्थ्य सह राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक संजय कुमार सिंह ने बताया कि कुपोषण को दूर करने में आहार विविधिता को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है. लेकिन सामाजिक विकास के क्रम में आहार विविधिता को नजरंदाज किया गया. लेकिन अब फिर से श्री अन्न यानी मोटे आनाज की उपयोगिता बढ़ाकर कुपोषण दूर करने पर सरकार विशेष ध्यान दे रही है. उन्होंने कहा कि समुदाय स्तर पर सुपोषण को बढ़ावा देने के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों पर जरुरी दवाओं जैसे आईएफए, विटामिन ए सिरप आदि की पूर्व आपूर्ति सुनिश्चित करने में स्वास्थ्य विभाग मदद करेगा. इससे सही समय पर लाभुकों के लिए दवाएं उपलब्ध हो सकेंगी एवं इससे कुपोषण को दूर करने में सहूलियत भी होगी.
कुपोषण से बढ़ता है परिवार पर आर्थिक बोझ:
कार्यशाला को संबोधित करते हुए मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, जीविका, राहुल कुमार ने कहा कि अति गंभीर कुपोषण से ग्रसित बच्चे के कारण परिवार पर आर्थिक बोझ पड़ता है. बच्चे के उपचार के लिए उसके अभिभावक को खर्च करना पड़ता है. इसलिए जरुरी है कि सामुदायिक स्तर पर जागरूकता फैलाई जाये. पीएमसीएच के शिशु रोग विभाग के एचओडी डॉ. भूपेन्द्र नारायण ने बताया कि अति गंभीर कुपोषण से ग्रसित बच्चा आगे चलकर कई बिमारियों से ग्रसित होता है और शिशु मृत्यु का यह एक प्रमुख कारण है.
बच्चों को अति कुपोषित श्रेणी में जाने से पहले बचाना जरुरी:
राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी, शिशु स्वास्थ्य डॉ. बिजय प्रकाश राय ने बतया कि बच्चों को कुपोषण से बताना जरुरी है. स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस में नियमित रूप से क्षमतावर्धन किया जाता है. हमें प्रयास करना है कि बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती करने की जरुरत नहीं पड़े. इसके लिए हमें समुदाय में पोषण की महत्ता के संदेश को हर स्तर पर प्रसारित करने की जरुरत है.
कार्यशाला में यूनिसेफ के पोषण विशेषग्य रबी नारायण पाढ़ी ने बताया कि स्वास्थ्य एवं पोषण की सेवाओं को एक साथ अति गंभीर कुपोषित बच्चे तक पहुंचाने की जरुरत है. आंगनवाड़ी केंद्रों पर वृद्धि निगरानी के साथ बच्चे की माताओं को बताया जाये ताकि वह भी अपने बच्चे की पोषण संबंधी समस्याओं से एकाकार हो सकें. यूनिसेफ की शिवानी धर ने बताया कि बच्चे के मष्तिष्क का 80 फीसदी विकास उसके जीवन के पहले तीन वर्षों में होता है इसलिए जरुरी है गर्भवती माता के संपूर्ण पोषण एवं नवजात के लिए पहले 6 माह तक सिर्फ स्तनपान की महत्ता को समझा जाए. उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार राज्य के 42.9 प्रतिशत बच्चे नाटापन से ग्रसित हैं जबकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 में नाटापन का प्रतिशत 48.3 प्रतिशत था. पूसा कृषि विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सह मुख्य वैज्ञानिक डॉ. उषा सिंह ने बताया कि राज्य में प्रचुर खाद्य पदार्थों की उपलब्धता के बावजूद कुपोषण मौजूद है. यह जरुरी है कि उपलब्ध खाने की वस्तुओं में छुपी हुई पोषण के खजाने को पहचान कर उसे नियमित खान पान में शामिल किया जाये.
कार्यक्रम में जीविका, यूनिसेफ, कृषि विभाग, स्वास्थ्य, समेकित बाल विकास सेवाएं, विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित सहयोगी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने शिरकत की. कार्यशाला का संचालन समेकित बाल विकास सेवाएं के पोषण सलाहकार डॉ. मनोज कुमार ने किया.

खगड़िया जिला के छह प्रखंड क्षेत्र में कालाजार से बचाव को सिंथेटिक पायरोथाइराइड का हो रहा छिड़काव

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– 2020 से अभी तक जिला भर में पाए गए हैं 74 कालाजार के मरीज
– विगत 15 मार्च से 2 मई तक जिला के छह प्रखंडों में सिंथेटिक पायरोथाइराइड  का छिड़काव
– जिला भर में सदर अस्पताल खगड़िया, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अलौली, बेलदौर और गोगरी में है कालाजार ट्रीटमेंट सेंटर
खगड़िया-
कालाजार से बचाव के लिए जिला भर के छह प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत 29,194 घरों में रहने वाले  1,54,707 की आबादी के बीच विगत 15 मार्च से 2 मई तक कालाजार की  दवा सिंथेटिक पायरोथाइराइड (एसपी) का छिड़काव किया गया । इस आशय की  जानकारी मंगलवार को जिला वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल ऑफिसर डॉ विजय कुमार ने दी । उन्होंने बताया कि जिला के चौथम प्रखंड को छोड़कर शेष सभी छह प्रखंडों सदर प्रखंड, मानसी, अलौली, बेलदौर, गोगरी और परबत्ता में पाए गए कालाजार मरीजों के घरों के आसपास विगत 15 मार्च से 02 मई तक कालाजार की  सिंथेटिक पायरोथाइराइड  दवा का छिड़काव किया गया है। उन्होंने बताया कि जिला भर में सन 2020 में 24, 2021 में 27, 2022 में 20 और 2023 में अभी तक 3 सहित कुल 74 कालाजार के मरीज मिले हैं। 2023 में गोगरी में दो और परबत्ता प्रखंड में एक कालाजार का मरीज मिला है।
 अलौली प्रखंड के 12 राजस्व गांव में एसपी दवा का छिड़काव किया गया-
जिला के वेक्टर रोग नियंत्रण पदाधिकारी मो. शाहनवाज आलम ने बताया कि अलौली प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत 12 राजस्व गांव के 6310 घरों में रहने वाले 33,511 लोगों के बीच विगत 15 मार्च से 26 अप्रैल के दौरान एसपी दवा का छिड़काव किया गया । यहां 2020 में 13, 2021 में 18 और 2022 में 7 कालाजार के मरीज मिले थे । वहीं बेलदौर प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत 8 राजस्व गांव के 5726 घरों में रहने वाले 29610 लोगों के बीच विगत 15 मार्च से 14 अप्रैल के दौरान एसपी दवा का छिड़काव किया गया । यहां 2020 में 4, 2021 में 4 और 2022 में कालाजार के 2 मरीज मिले थे ।
इसी तरह गोगरी प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत 7 राजस्व  गांव के 5997 घरों में रहने वाले 31312 लोगों के बीच विगत 15 मार्च से 19 अप्रैल के दौरान एसपी दवा का छिड़काव किया गया। यहां 2020 में 2, 2021 में 2, 2022 में 4 और 2023 में अभी तक 2 कालाज़ार के मरीज मिले हैं।
उन्होंने बताया कि खगड़िया सदर प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत 5 राजस्व  गांव के 3597 घरों में रहने वाले 19,151 लोगों के बीच विगत 15 मार्च से 2 मई तक कुल 47 दिनों के दौरान एसपी दवा का छिड़काव किया गया । यहां 2020 में 4, 2021 में 0 और 2022 में कालाजार का  1 मरीज मिला था ।
वहीं मानसी प्रखंड क्षेत्र में अंतर्गत 3 राजस्व गांव के 4664 घरों में रहने वाले 24,123 लोगों के बीच भी विगत 15 मार्च से 2 मई तक  एसपी दवा का छिड़काव किया गया । यहां 2020 में 1, 2021 में भी 1 और 2022 में 4 कालाजार का मरीज मिला था।
इसके अलावा परबत्ता प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत 2 राजस्व  गांव के 2900 घरों में रहने वाले 17000 लोगों के बीच 15 मार्च से 2 मई तक कुल 45 दिनों के दौरान एसपी दवा का छिड़काव किया गया । यहां 2020 में 0, 2021 में 0, 2022 में 2 और 2023 में अभी तक 1 कालाजार का मरीज  मिल  चुका है।
जिला भर में चार जगहों पर  कालाजार का ट्रीटमेंट सेंटर कार्यरत है-
जिला वेक्टर जनित रोग सलाहकार बब्लू साहनी ने बताया कि जिला भर में चार जगहों, सदर अस्पताल खगड़िया, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अलौली, बेलदौर और गोगरी में कालाजार का ट्रीटमेंट सेंटर कार्यरत है।