एनीमिया से बचाव के लिए प्रोटीनयुक्त खाना का करें सेवन 

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– लक्षण दिखते ही समय पर कराएं इलाज, चिकित्सा परामर्श का करें पालन
– थोड़ी सी लापरवाही से हो सकती है बड़ी परेशानी, सर्तकता और सावधानी जरूरी
खगड़िया, 04 जुलाई-
एनीमिया से बचाव के लिए प्रोटीन युक्त खाना का सेवन करें। यह बीमारी खून की कमी से होती है। इसलिए, इससे बचाव के लिए आयरन युक्त खाना का भी सेवन करना जरूरी है। दरअसल, शरीर में पर्याप्त आयरन रहने से इस बीमारी की संभावना ना के बराबर रहती है। इसलिए, खान-पान एवं रहन-सहन का विशेष ख्याल रखें और सकारात्मक बदलाव ही बीमारी से बचाव का बड़ा उपचार है। यह बीमारी खून में पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं या हीमोग्लोबिन कम होने से होती है। इसलिए, लक्षण दिखते ही तुरंत इलाज कराएं और चिकित्सा परामर्श का पालन करें। अन्यथा थोड़ी सी लापरवाही से बड़ी परेशानी हो सकती है। इससे घबराने की भी जरूरत नहीं है। ऐसे में समय पर जाँच के लिए अस्पताल जाने एवं चिकित्सकों की सलाह का पालन करना चाहिए। जो आगे की परेशानी उत्पन्न नहीं होने देगी एवं आपके लिए फायदेमंद साबित होगा तथा आसानी के साथ आपको बीमारी से छुटकारा मिल सकता है।
– आयरनयुक्त खाना का करें सेवन :
सिविल सर्जन डाॅ अमरनाथ झा ने बताया, आयरन की कमी के कारण एनीमिया होती है। इसलिए इस बीमारी से लोगों को आहार बदलने एवं आयरन युक्त आहार का सेवन करने से बचाव होगा। साथ ही लक्षण दिखते ही मरीजों को तुरंत जाँच करानी  चाहिए और चिकित्सा परामर्श का पालन करते हुए आवश्यक इलाज भी कराना चाहिए।
– ये हैं एनीमिया के प्रारंभिक लक्षण :
एनीमिया बीमारी का शुरुआती लक्षण थकान, कमजोरी, त्वचा का पीला होना, दिल की धड़कन में बदलाव, साँस लेने में तकलीफ, चक्कर आना, सीने में दर्द, हाथों और पैरों का ठंडा होना, सिरदर्द आदि  होना है। ऐसा लक्षण होते ही ससमय इलाज कराएं।
– प्रोटीनयुक्त खाने का करें सेवन :
एनीमिया के दौरान प्रोटीन युक्त खाने का सेवन करें। जैसे कि पालक, सोयाबीन, चुकंदर, लाल मांस, मूँगफली का मक्खन, अंडे, टमाटर, अनार, शहद, सेब, खजूर आदि प्रोटीन युक्त आहार का सेवन करें। जो कि आपके शरीर की कमी को पूरा करता एवं हीमोग्लोबिन जैसी कमी भी दूर होती है । इससे आपको एनीमिया बीमारी से बचाव मिल सकता है।
– चिकित्सकों की सलाह का करें पालन :
एनीमिया के दौरान आप तुरंत किसी अच्छे चिकित्सक से दिखाएं एवं चिकित्सकों के अनुसार आवश्यक जाँच कराएं। जिसके बाद चिकित्सकों द्वारा दी गई आवश्यक चिकित्सा परामर्श का पालन करें, जो आपके लिए फायदेमंद साबित होगा।
– गर्भवती महिलाएँ रखें विशेष ख्याल :
गर्भवती महिलाएँ को गर्भस्थ शिशु के विकास के लिए शरीर में रक्त का निर्माण करना पड़ता है। जिसमें कमी होने के कारण एनीमिया होने की प्रबल संभावना हो जाती है। इसलिए गर्भवती महिलाएँ को गर्भ दौरान लगातार हीमोग्लोबिन समेत अन्य आवश्यक जाँच करानी चाहिए एवं चिकित्सकों के चिकित्सा परामर्श का पालन करना चाहिए।
– समय पर खाएं खाना :
एनीमिया से बचाव के लिए समय पर खाना ,खाना भी जरूरी है। इसलिए, इस बात विशेष ख्याल रखें कि समय पर खाना खाएं और परिवार के अन्य सदस्यों का भी खान-पान का ख्याल रखें। खासकर घर के बच्चे और बुजुर्गों के खान-पान को लेकर विशेष ख्याल रखें।

खान-पान पर दें ध्यान, एनीमिया से होगा आपका बचाव

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-शरीर में खून की कमी से होती है यह बीमारी
-भोजन में बदलाव कर इस पर पा सकते हैं काबू
बांका, 4 जुलाई-
एनीमिया की बीमारी शरीर में खून या हीमोग्लोबिन की कमी की वजह से होती है। इससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती  और व्यक्ति कमजोर होने लगता है। यह बीमारी काफी आम हो चुकी है। महिलाओं को इसका सबसे ज्यादा सामना करना पड़ता है। एनीमिया की समस्या अस्थायी भी हो सकती और यह लंबे समय तक भी चल सकती है। हालांकि, एनीमिया (खून की कमी) से बचाव किया जा सकता है। खान-पान पर ध्यान देकर, इस बीमारी से बचा जा सकता है।
एसीएमओ डॉ. अभय प्रकाश चौधरी कहते हैं कि हमारे खून में रेड ब्लड सेल्स होती हैं, जिसे आरबीसी  भी कहा जाता है। यह सेल्स शरीर में मौजूद सभी टिश्यू (ऊतकों) तक ऑक्सीजन ले जाने का काम करती है। जब शरीर में आरबीसी की मात्रा कम होने लगती है तो शरीर में ऑक्सीजन भी घटने लगती है और नया खून बनना बाधित हो जाता है। इसी समस्या को खून की कमी या एनीमिया कहा जाता है। खान-पान और जीवनशैली में बदलाव लाकर इस बीमारी से आसानी से हम अपना बचाव कर सकते हैं।
एनीमिया के ये हैं लक्षणः डॉ. चौधरी कहते हैं कि चक्कर आना, हाथ व पैर में ठंड लगना, त्वचा का पीला पड़ना, छाती में दर्द होना, सांस लेने में परेशानी होना और दिल की धड़कन का ठीक से काम नहीं करना, थकान, कमजोरी इत्यादि एनीमिया के लक्षण हैं। अगर ऐसा महसूस हो तो तत्काल डॉक्टर से संपर्क करें और उनके परामर्श के अनुसार रहें तो इस बीमारी पर काबू पा लेंगे।
बचाव के ये हैं उपायः डॉ. चौधरी कहते हैं कि एनीमिया से बचाव को लेकर आयरनयुक्त आहार लेना जरूरी है। खाना में पालक, सोयाबीन, चुकंदर, अनार व हरी सब्जियों को शामिल करें। इसके अलावा दूध, घी, मांस, मछली भी काफी असरदार है। फल में अनार का सेवन इसमें बहुत ही फायदेमंद रहता है। साथ ही चुकंदर भी बहुत फायदा पहुंचाता है। जो लोग मांस-मछली नहीं खाते हैं, वे लोग फल, दूध और हरी सब्जियों पर विशेष ध्यान दें। साथ ही समय पर भोजन करने की कोशिश करें। ये सबसे ज्यादा जरूरी है और सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाता है।
गर्भवती महिलाएं और किशोरियों को विशेष ध्यान देने की जरूरतः डॉ. चौधरी कहते हैं कि एनीमिया की चपेट में कोई भी आ सकता है, लेकिन गर्भवती महिलाएं और किशोरियों को इससे ज्यादा खतरा रहता है। इसलिए लक्षण का अहसास होने पर जरूरी जांच करवाएं। जांच में अगर एनीमिया की पुष्टि होती है तो उसके इलाज पर फोकस करें। खासकर गर्भवती महिलाओं को और विशेष ध्यान देने की जरूरत है। उसके पेट में पल रहे गर्भस्थ  शिशु के विकास के लिए शरीर में रक्त का निर्माण बहुत ही आवश्यक है। इसमें कमी होने पर एनीमिया की संभावना बढ़ जाती है। इससे बचने के लिए एएनसी जांच करवाएं।

कमजोर नवजात की पहचान करना सबसे अहम

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-पहचान हो जाने पर कमजोर नवजात को स्वस्थ बनाना मुश्किल नहीं
-कोरोना काल में कमजोर नवजात की विशोष देखभाल की है जरूरत
बांका, 4 जुलाई-
कमजोर नवजात की विशेष देखभाल की जरूरत होती है। इस लिहाज से कोरोना काल में मां की चुनौतियां और बढ़ गयी हैं। बेहतर साफ-सफाई और देखभाल के जरिए कोरोना संक्रमण काल में भी कमजोर नवजात को स्वस्थ बना सकते हैं। एसीएमओ डॉ. अभय प्रकाश चौधरी कहते हैं कि कमजोर नवजात की पहचान सबसे अहम है। अगर आप इसमें सफल हो जाते हैं तो उसे स्वस्थ बनाना बड़ी बात नहीं है। ऐसा देखा गया है कि कमजोर नवजात में तापमान की कमी की समस्या रहती है। इससे निजात पाने में कंगारू मदर केयर रामबाण साबित हो रहा है। कंगारू मदर केयर के जरिए मां या घर का कोई भी व्यक्ति नवजात को अपने सीने से चिपकाकर उन्हें गर्मी देती  हैं। यह प्रक्रिया तब तक करने की सलाह दी जाती है जब तक बच्चे का वजन 2.5 किलोग्राम न हो जाए। इसके साथ-साथ सदर अस्पताल में रेडिएंट वार्मर की भी व्यवस्था है। बच्चा अत्यधिक कमजोर है तो उसे एसएनसीयू में भर्ती कराया जाता है, जहां पर उसका उचित इलाज किया जाता है।
मां संक्रमित भी हो जाए तो स्तनपान कराना नहीं भूलें:
डॉ. चौधरी कहते हैं कि अगर मां कोरोना संक्रमित भी हो जाए तो बच्चे को स्तनपान कराना नहीं छोड़ना चाहिए। हां, सावधानी जरूर बरतनी चाहिए। जैसे कि बच्चे को छूने से पहले हाथ को साफ कर लेना चाहिए। दिन में एक बार स्तन की भी सफाई जरूर कर लेनी चाहिए। इसके अलावा जब बच्चा पास में हो तो मास्क जरूर पहनना चाहिए। इन सावधानियों के साथ हम कोरोना काल में भी कमजोर नवजात को स्वस्थ बना सकते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में किया जा रहा जागरूक: डॉ. चौधरी ने बताया कि कोरोना काल में कमजोर नवजात की देखभाल को लेकर स्वास्थ्य विभाग जागरूकता कार्यक्रम चला रहा है। आशा कार्यकर्ता और आंगनबाड़ी सेविका की मदद से गांव में जाकर लोगों को कमजोर नवजात की देखभाल से संबंधित उपाय बताए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि कमजोर नवजात पैदा नहीं हो, इसे लेकर गर्भावस्था की शुरुआत से ही देखभाल की जरूरत है।
कमजोर नवजात की पहचान के लिए इक्विपमेंट होना जरूरी: डॉ. चौधरी ने बताया कि सबसे महत्वपूर्ण बात कमजोर नवजात की पहचान है और इसके लिए जरूरी उपकरण होना जरूरी है। सदर अस्पताल में इसे लेकर डिजिटल मशीन उपलब्ध है। डिजिटल मशीन नहीं रहने से कमजोर बच्चे की पहचान में परेशानी होती है। अगर 50 ग्राम भी बच्चे का वजन कम है तो इसकी पहचान डिजिटल मशीन से ही की जा सकती है, जो मैन्युअल मशीन में छूट जाती है। उन्होंने कहा कि अगर एक बार बच्चे की पहचान हो गई तो फिर उसे स्वस्थ करना आसान हो जाता है।
कमजोर बच्चे की कैसे करें पहचान:
कमजोर नवजात की पहचान मुख्यतः 3 तरीके से होती है। इसमें पहला तरीका है उसका वजन 2000 ग्राम या इससे कम हो। दूसरा तरीका है कि बच्चा स्तनपान करने में सक्षम नहीं हो और तीसरा तरीका है कि बच्चे का जन्म गर्भावस्था के 37 सप्ताह के पहले हो गया हो। इन पैमानों पर नवजात को जन्म के बाद परखने की जरूरत है और अगर बच्चा कमजोर पाया जाता है तो उसकी देखभाल शुरू कर देने की जरूरत है।
जन्म से पहले जन्म लेने वाले नवजातों को मौत का अधिक ख़तरा:
नवजात शिशुओं में होने वाली मौतों में 35% बच्चे की मौत समय से पहले जन्म के कारण होती है। वहीं 32% बच्चे की मौत निमोनिया,सेप्सिस एवं डायरिया जैसी बीमारी से होती है, जबकि 19% मौतें बर्थ एसफिक्सिया के कारण होती है।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में भक्तों की उमड़ी भीड़

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राजधानी दिल्ली समेत भारत के अन्य हिस्से में भगवान जगन्नाथ यात्रा का शुभारंभ शुक्रवार को हुआ। दिल्ली के राजघाट बेला दरियागंज से साइकिल मार्केट होते हुए रथ यात्रा चांदनी चौक का भ्रमण करते हुए निकली। रथ यात्रा में बड़ी संख्या में भक्तों और श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान चारों और केवल एक ही आवाज सुनाई दे रही थी ” जय जगन्नाथ “. रथ यात्रा के दौरान लोग रथ के गुजरने वाले रास्तों पर फूल की बौछार कर भगवान जगन्नाथ के रथ का स्वागत किया। लोग सड़क के दोनों ओर हाथों में फूल और भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने के लिए प्रसाद हाथ में लिए नजर आए। रथ पर सवार सेवक लोगों को प्रसाद देते और लोगों को माथे पर चंदन लगाते नजर आए। इस दौरान चारों में भक्तिमय माहौल नजर आया। इस दौरान भारी संख्या में पुलिस बल भी मौजूद दिखाई दिया ताकि किसी प्रकार की परेशानी न हो।

मरीजों को दवा की कमी न हो, दवा का रहता है पर्याप्त स्टॉक

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-सदर अस्पताल में सर्दी, खांसी से लेकर कोरोना तक की दवा मौजूद
-टीबी और मलेरिया जैसी गंभीर बीमारी की भी दवा यहां पर उपलब्ध
भागलपुर, 2 जुलाई-
सदर अस्पताल आने वाले मरीजों को दवा मिल सके, इसलिए स्टॉक में पर्याप्त मात्रा में दवा उपलब्ध रहती है। दरअसल, सरकारी अस्पतालों में आमलोगों को लिए तमाम सुविधाएं हैं। जांच-इलाज से लेकर दवा तक मुफ्त में लोगों को मुहैया करवाई जा रही है। अभी बारिश का मौसम चल रहा है। इसलिए सर्दी-खांसी से लेकर टीबी और मलेरिया की दवा भी यहां पर उपलब्ध है। वहीं कोरोना के मरीज भी जिले में मिलने लगे हैं। इसलिए कोरोना की दवा भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। अगर अस्पताल में मरीज को दवा नहीं मिले तो उसे खासा परेशानी हो सकती है, लेकिन बांका सदर अस्पताल में सामान्य बीमारियों से संबंधित लगभग सभी तरह की दवा उपलब्ध है। सिविल सर्जन डॉ. उमेश शर्मा ने बताया कि फार्मासिस्ट को दवा की उपलब्धता बनाए रखने के लिए लगातार कहा जाता है। ऐसी स्थिति नहीं बने कि मरीजों को अस्पताल में दवा नहीं मिल सके। इसे लेकर हमलोग लगातार आकलन करते रहते हैं।
फार्मासिस्ट त्रिपुरारी कहते हैं कि हमलोग दवा की उपबल्धता पर नजर रखते हैं। मरीज को दवा लेने में किसी तरह की परेशानी नहीं हो, इसे लेकर तैयारी करते हैं। अभी जैसे बारिश का मौसम चल रहा है तो सर्दी-खांसी के मरीज ज्यादा आ सकते हैं। इसलिए इन दवाओं का पर्याप्त स्टॉक रहे, इस तरह से हमलोग इंतजाम करते हैं। साथ ही मलेरिया, टीबी, दुर्घटना में घायल जो इलाज कराने आते हैं, उनलोगों के लिए भी सदर अस्पताल में दवा का पर्याप्त स्टॉक रहता है। यहां आमतौर पर अधिकतर सामान्य लोग इलाज कराने के लिए आते हैं। उन्हें अगर दवा नहीं मिलेगी तो बाहर से खरीदने पर आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। इसलिए दवा खत्म होने से पहले ही हमलोग मंगाकर रखते हैं।
कोरोना को लेकर विशेष सतर्कताः पिछले सवा दो साल से कोरोना को लेकर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। तीन लहर आई और चली गई, इस दौरान कभी भी मरीजों को दवा की कमी नहीं होने दी गई। त्रिपुरारि कहते हैं कि अभी कोरोना के मरीज फिर से मिलने लगे हैं। इसे लेकर पर्याप्त स्टॉक है। ऐसा नहीं है कि अभी मरीज मिल रहे हैं तो अभी ही दवा की उपलब्धता है। कुछ समय पहले तक जब कोरोना के मरीज नहीं मिल रहे थे, उस समय  भी इसकी दवा का पर्याप्त स्टॉक मौजूद था। कोरोना को लेकर हमलोग विशेष सतर्क रहते हैं।
प्रतिदिन सैकड़ों मरीज लेते हैं दवाः सदर अस्पताल में प्रतिदिन सैकड़ों मरीज जांच औऱ इलाज कराने के बाद दवा लेने के लिए आते हैं। किसी दिन भी मरीजों की संख्या अधिक रहती है, उस दिन उसी हिसाब से तैयारी की जाती है। त्रिपुरारी कहते हैं कि हमलोगों को अहसास रहता है कि किस दिन अधिक मरीज रहेंगे, उस दिन उसी अनुसार तैयारी करते हैं। हालांकि आमदिनों में भी अगर मरीज ज्यादा आ जाए तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी।

मुख्यमंत्री बाल हृदय योजना • 04 वर्षीया बच्ची को मिली निःशुल्क समुचित स्वास्थ्य सुविधा, हुआ सफल इलाज 

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– समय पर बीमारी की पहचान और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की बदौलत बच्ची ने हृदय रोग को दी मात
– आरबीएसके टीम द्वारा बच्ची को चिह्नित कर कराया गया समुचित इलाज
बेगूसराय, 02 जुलाई-
हृदय रोग से पीड़ित बच्चों को इलाज के लिए जद्दोजहद का सामना नहीं करना पड़े और सुविधाजनक तरीके से समुचित और सफल इलाज हो सके, इस उद्देश्य से बिहार सरकार  मुख्यमंत्री बाल हृदय योजना की शुरुआत की गई है । यह योजना ऐसे पीड़ित बच्चों के लिए काफी सहयोगात्मक साबित हो रही  है। दरअसल, उक्त योजना के तहत ना केवल निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही है बल्कि, हृदय रोग से पीड़ित बच्चों का सफल और समुचित इलाज भी हो रहा है। जिसका  सकारात्मक परिणाम यह है कि लगातार ऐसे बच्चे हृदय रोग को मात भी दे रहे  हैं। इसी कड़ी में जिले के बरौनी इलाके के सबौरा निवासी दीपक पाठक एवं सरिता देवी की 04 वर्षीया पुत्री सौम्या कुमारी भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की  बदौलत हृदय रोग को मात देने में सफल रही। वह जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित थी। यह सबकुछ सरकार की मजबूत और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा बदौलत ही संभव हुआ। वहीं, सरकार द्वारा लाई गई उक्त योजना को सार्थक रूप देने के लिए जिले की आरबीएसके टीम जिले के हृदय रोग से पीड़ित अन्य बच्चों को भी चिह्नित   पूरी तरह निःशुल्क समुचित स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने में अग्रसर है।
– पहले निजी क्लीनिक में करायी  जाँच, फिर सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों का लिया सहारा :
सौम्या की माँ सरिता देवी ने बताया, जब मेरी बच्ची ठीक से चल नहीं पा रही थी और ना ही ढंग से खा पा रही थी  तो मैं अपनी बच्ची को जाँच के लिए पहले एक निजी क्लीनिक ले गई। , वहाँ डॉक्टर ने बताया कि   बच्ची के  दिल में छेद  है । यह सुनते ही मेरे होश उड़ गये। फिर कई अन्य निजी क्लीनिकों में भी हमलोग बच्ची की जाँच करवायी , सभी जगह एक ही बात बताई गई और समुचित इलाज में लाखों का खर्च बताया गया। इतना व्यापक खर्च करने में हमलोग समर्थ नहीं थे । जिसके कारण इलाज की  उम्मीद ही छोड़ दिए थे ।  इसी दौरान आस-पड़ोस के लोगों से जानकारी मिली कि  ऐसे रोग से पीड़ित बच्चे  का आरबीएसके टीम द्वारा मुख्यमंत्री बाल हृदय योजना के तहत पूरी तरह निःशुल्क  इलाज किया  जाता है। ये जानकारी मिलते ही हमलोगों को उम्मीद की एक नई किरण मिली और मैं अपनी  बच्ची  को जाँच के लिए स्थानीय पीएचसी ले गई। जहाँ से जिला अस्पताल भेजा गया। वहाँ जाँच के बाद स्क्रीनिंग के लिए एम्बुलेंस से पटना भेजा गया। स्क्रीनिंग के बाद पटना से हवाई जहाज से समुचित इलाज के लिए अहमदाबाद श्री सत्य -साईं अस्पताल भेजा गया। वहाँ मेरी बच्ची का समुचित इलाज हुआ।
– इलाज के दौरान मिली  बेहतर और समुचित सुविधाएं :
बच्ची के पिता दीपक पाठक ने बताया, मेरे पास अपनी बच्ची का इलाज कराने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था। किन्तु, पर  इस बीच आरबीएसके कार्यक्रम  के अंतर्गत मुख्यमंत्री बाल हृदय योजना की जानकारी मिली । इस योजना से मेरी बच्ची का इलाज शुरू हुआ और आज मेरी बच्ची हृदय रोग को मात देकर पूरी तरह स्वस्थ है। इस दौरान मेरी बच्ची को बेहतर और समुचित स्वास्थ्य सुविधा मिली  एवं आरबीएसके टीम का भी काफी सहयोग मिला।
– हृदय रोग से पीड़ित बच्चों को स्क्रीनिंग के लिए भेजा जाता है पटना :
सिविल सर्जन डाॅ प्रमोद कुमार सिंह ने बताया, स्थानीय आरबीएसके टीम द्वारा हृदय रोग से पीड़ित बच्चों की  पहले पहचान की  जाती है। इसके बाद स्क्रीनिंग यानी प्रारंभिक जाँच के लिए पटना भेजा जाता है, जहाँ इंदिरा गाँधी हृदय रोग संस्थान  में बच्चों की  समुचित जाँच की  जाती   है। जाँच में बीमारी की पुष्टि होने पर संबंधित बच्चे को समुचित व निःशुल्क इलाज के लिए अहमदाबाद के श्री सत्य साईं अस्पताल भेजा जाता है।
– हृदय रोग से पीड़ित बच्चों के  स्थाई निजात के लिए समय पर इलाज जरूरी :
आरबीएसके टीम के जिला समन्वयक डाॅ रतीश रमण ने बताया, हृदय रोग से पीड़ित बच्चों के  स्थाई निजात के लिए समय पर इलाज शुरू कराना जरूरी है। अन्यथा, परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, उन्होंने बताया, जिन बच्चों के होठ कटे हैं, उसका 03 सप्ताह से 03 माह के अंदर, जिसके तालु में छेद (सुराग) है, उसका 06 से 18 माह एवं जिसके  पैर टेढ़े-मेढ़े हैं , उसका 02 सप्ताह से 02 माह के अंदर शत-प्रतिशत सफल इलाज संभव है। वहीं, उन्होंने बताया, ऐसे पीड़ित बच्चों का इलाज के साथ-साथ आने-जाने का खर्च भी सरकार ही वहन करती है।

बदलते मौसम में मौसमी बीमारियों से रहें सतर्क और सावधान 

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– टायफाइड समेत अन्य बीमारियों से बचाव के लिए रहें सतर्क, अनावश्यक परेशानियाँ से रहेंगे दूर
– लगातार बुखार रहने पर निश्चित रूप से कराएं खून की जाँच और चिकित्सा परामर्श का पालन
खगड़िया, 02 जुलाई-
आग उगलती धूप और भीषण गर्मी के साथ तापमान में हो रहे उतार-चढ़ाव के कारण मौसमी बीमारियों की भी संभावना बढ़ गई। ऐसे में हर आयु वर्ग के लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति विशेष सावधान और सतर्क रहने की जरूरत है। दरअसल, ऐसे मौसम में कई तरह की बीमारियों के चपेट में आने का खतरा बढ़ गया है। इस मौसम में डायरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, कोविड समेत अन्य मौसमी और संक्रामक बीमारी के साथ  टायफाइड का खतरा भी  है।  ऐसे मौसम में हर आयु वर्ग के लोगों को टायफाइड से बचाव के लिए विशेष सतर्क और सावधान रहने की जरूरत है।
– टायफाइड से बचाव के लिए शुद्ध पेयजल और भोजन का करें सेवन :
खगड़िया सदर अस्पताल के उपाधीक्षक  डाॅ योगेन्द्र सिंह प्रायसी ने बताया, टायफाइड होने के  वैसे तो सामान्यतः कई कारण हैं । किन्तु, मुख्य रूप से गंदा (दूषित) पानी और भोजन के  सेवन से होता है। इसलिए, इस बीमारी से बचाव के लिए सभी लोगों को शुद्ध पेयजल  और भोजन का सेवन करना चाहिए।  साफ-सफाई का भी ख्याल रखना जरूरी है। इसलिए, गर्मी और बरसात के मौसम में पानी व भोजन का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। ऐसे मौसम में टायफाइड यानी मियादी बुखार के मरीज अधिक मिलते हैं। टायफाइड सालमोनेला टाइपी नामक बैक्टीरिया से फैलने वाला एक गंभीर रोग है। यह बैक्टीरिया दूषित पानी एवं संक्रमित भोजन में पनपते हैं। गंदे परिवेश वाली जगहों पर टायफाइड फैलने की संभावना अधिक होती है।
– टायफाइड के कारण लिवर  हो सकता है प्रभावित :
दूषित पानी व संक्रमित भोजन के सेवन से व्यक्ति मियादी बुखार से ग्रसित हो जाता है। टायफाइड के कारण लिवर में सूजन हो जाती है। ऐसे में साफ पानी और भोजन का ध्यान रखना जरूरी है। सब्जियों का सही से नहीं धोना, शौचालय का इस्तेमाल नहीं होना और खुले में मलमूत्र त्याग करना, खाने से पहले हाथों को नहीं धोना, आदि कई कारणों से टायफाइड हो सकता है। तेज बुखार के साथ दस्त व उल्टी होना, बदन दर्द रहना, कमजोरी और भूख नहीं लगना टाइफाइड के प्रमुख लक्षण हैं। इसके साथ ही पेट, सिर और मांसपेशियों में भी दर्द रहता है।
– पाचन तंत्र को बुरी तरह से करता है प्रभावित :
टायफाइड पाचन तंत्र को बुरी तरह प्रभावित करता है। खून की जांच कर इसका पता लगाया जाता है। बच्चों तथा गर्भवती महिलाओं में बुखार के लंबे समय तक रहने पर तुरंत चिकित्सीय परामर्श लेना चाहिए। टायफाइड होने पर मरीज को पूरी तरह आराम करना चाहिए। उन्हें ऐसे भोजन दिये जाने चाहिए जो आसानी से पचाया जा सके। पीने के लिए उबाले हुए पानी को ठंडा कर दें। रोगी को मांस-मछली का सेवन नहीं करने दें। अधिक से अधिक तरल पदार्थ लेना बेहतर है। भोजन में हरी सब्जियां, दूध और पाचन तंत्र को बेहतर बनाये रखने वाले भोजन लें। ताजे मौसमी फल का सेवन करें।
– बार-बार टायफाइड होना गंभीर बात :
चाय कॉफी तथा अन्य कैफिन युक्त पदार्थ, रिफाइंड और प्रोसेस्ड फूड और अधिक तेल मसाले वाले भोजन से दूरी बनायें। इसके अलावा घी, तेल, गरम मसाला व अचार तथा गर्म तासीर वाले भोजन से परहेज करें। सही तरीके से इलाज नहीं होने और अधिक समय तक टायफाइड रहने से व्यक्ति काफी कमजोर हो जाता है। बार-बार टायफाइड का होना गंभीर है। इसलिए, जिसे पहले कभी टायफाइड हुआ है, वह खास तौर पर सतर्क रहें।

अब बिना भौतिक सत्यापन के ही दिव्यांगों का बन सकेगा यूनिक डिसेबलिटी आइडेंटी कार्ड 

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– राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक ने सभी जिलों के सिविल सर्जन को जारी किए दिशा-निर्देश
– अभी जिला के सिविल सर्जन कार्यालय के द्वारा भौतिक सत्यापन के बाद बनता है दिव्यांगों का यूडीआईडी कार्ड
मुंगेर, 2 जुलाई-
जिला में अब बिना भौतिक सत्यापन के ही दिव्यांगों का यूनिक डिसेबलिटी आइडेंटी कार्ड (यूडीआईडी) कार्ड बन सकेगा । इसको ले राज्य स्वास्थ्य समिति बिहार के कार्यपालक निदेशक संजय कुमार सिंह ने सभी जिलों के सिविल सर्जन को पत्र जारी कर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए हैं। मालूम हो कि यूडीआईडी कार्ड दिव्यांग जनों के लिए बिहार सरकार और केंद्र सरकार की  विभिन्न योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए एकल दस्तावेज के रूप में मान्यता प्राप्त है। अभी दिव्यांग जनों के द्वारा यूडीआईडी पोर्टल पर यूडीआईडी कार्ड के लिए आवेदन (रजिस्ट्रेशन) पत्र जमा करने के बाद जिला मुख्यालय स्थित सिविल सर्जन कार्यालय के द्वारा भौतिक सत्यापन किया जाता है। इसके बाद ही संबंधित दस्तावेज और दिव्यांगता प्रमाण पत्र पोर्टल पर अपलोड कर दिया जाता है।
जिला स्वास्थ्य समिति मुंगेर के जिला कार्यक्रम प्रबंधक नसीम रजि ने बताया कि  दिव्यांग जनों को विशिष्ट पहचान पत्र यूडीआईडी कार्ड बनाने एवं डाटा बेस तैयार करने के उद्देश्य से यूडीआईडी परियोजना का क्रियान्वयन दिव्यांग जन सशक्तिकरण विभाग, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार एवं बिहार सरकार के द्वारा किया जाता है। सरकार के द्वारा दिव्यांग जनों का यूडीआईडी कार्ड बनाने के लिए निदेशालय के स्तर पर एमआईएस पोर्टल (http://www.swdbihar.in/UDID/Home.aspx) विकसित किया गया है।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित चिकित्सकीय प्राधिकार के द्वारा निर्गत दिव्यांगता प्रमाण पत्र ही यूडीआईडी पोर्टल पर अपलोड किया जाता है। इसके बाद उनका अभिलेख संबंधित जिला के सिविल सर्जन/ संबंधित स्वास्थ्य केंद्र कार्यालय में भी संधारित रहता है। इसके बावजूद सभी जिला के सिविल सर्जन कार्यालय के द्वारा यूडीआईडी कार्ड बनाने के लिए दिव्यांग जनों को अनुरोध पत्र के माध्यम से उन्हें भौतिक सत्यापन के लिए कार्यालय बुलाया जाता है जो कि दिव्यांगता से ग्रसित व्यक्ति के लिए अनुचित लगता है। इस पर सशक्तिकरण निदेशालय (समाज कल्याण विभाग) ने खेद भी प्रकट किया है।

दवा का नियमित सेवन किया तो आज स्वस्थ होकर जी रहे सामान्य जीवन

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-रजौन प्रखंड के भूसिया के रहने वाले विपिन सिंह ने नौ माह में टीबी को दी मात
-सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज कराकर मरीजों का ठीक होने का सिलसिला जारी
बांका, 2 जुलाई-
जिले के रजौन प्रखंड के भूसिया गांव के रहने वाले विपिन सिंह एक साल पहले टीबी की चपेट में आ गए थे। वह इलाज कराने के लिए भागलपुर स्थित मायागंज अस्पताल पहुंचे, लेकिन जब वहां के डॉक्टर ने उन्हें समझाया कि इसका इलाज आसान है और सभी सरकारी अस्पतालों में यह मुफ्त में उपलब्ध है तो वह जिला यक्ष्मा केंद्र बांका आ गए। यहां पर जांच में उनके टीबी होने की पुष्टि हुई। इसके बाद उनका इलाज शुरू हुआ। जिला यक्ष्मा केंद्र से विपिन की लगातार निगरानी होती रही। बीच-बीच में जांच और दवा के लिए वह पास के रजौन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जाते रहे। नौ महीने तक जब नियमित दवा का सेवन किया तो आज विपिन पूरी तरह से स्वस्थ हो चुके हैं। अब उन्हें किसी तरह की कोई परेशानी नहीं हो रही है।
जांच-इलाज से लेकर दवा तक मुफ्त में मिलीः विपिन कहते हैं कि जब मुझे टीबी होने का पता चला तो मैं चिंतित हो गया था। मायागंज अस्पताल भागलपुर इलाज करवाने के लिए चला गया। वहां डॉक्टर की सलाह के बाद मैं वापस जिला यक्ष्मा केंद्र बांका आया। यहां पर भी मुझे समझाया गया कि अब टीबी लाइलाज बीमारी नहीं रही। इसका इलाज संभव हो गया है। सबसे महत्पवूर्ण बात यह कि सभी सरकारी अस्पतालों में टीबी का मुफ्त इलाज संभव है। इसके बाद से मैं जांच और इलाज के लिए लगातार रजौन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गया। वहां से मुझे मुफ्त में दवा मिलती रही। साथ में जांच और इलाज का भी पैसा नहीं लिया गया। टीबी के इलाज को लेकर सरकारी सुविधा बेहतर है। मैं तो अब ठीक हो ही गया हूं। अब दूसरे लोगों को भी टीबी का इलाज सरकारी अस्पताल में ही कराने की सलाह दूंगा।
सराकारी सुविधाओं का लाभ लेकर जिले के लोग टीबी को दे रहे मातः जिला यक्ष्मा पदाधिकारी डॉ. उमेश नंदन प्रसाद सिन्हा कहते हैं कि 2025 तक जिले को टीबी से मुक्त बनाना है, इसे लेकर लगातार प्रयास हो रहे हैं। लोगों को टीबी के प्रति जागरूक किया जा रहा है। इसके लक्षणों के बारे में बताया जा रहा है। मुझे खुशी इस बात की है कि लोग इसका लाभ भी उठा रहे हैं। रजौन प्रखंड के भूसिया गांव के रहने वाले विपिन सिंह इसका जीता जागता उदाहरण हैं। उसने लगातार टीबी की दवा का सेवन किया। इसका परिणाम है कि आज वह पूरी तरह से स्वस्थ है। टीबी के इलाज में नियमित दवा का सेवन बहुत जरूरी होता है। अगर बीच में मरीज दवा खाना छोड़ देते हैं तो एमडीआर टीबी का खतरा हो जाता है। अगर एमडीआर टीबी हो गया तो उससे उबरने में समय लगता है। इसलिए लोगों से मेरी अपील है कि अगर टीबी की चपेट में आ गए हैं तो नियमित तौर पर दवा का सेवन करें। बीच में दवा नहीं छोड़ें।

सदर अस्पताल में सामान्य बीमारी की सभी दवा उपलब्ध

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-सर्दी- खांसी से लेकर कोरोना तक की दवा का है पर्याप्त स्टॉक
-मौसम के अनुसार दवा की उपलब्धता पर भी दिया जाता है ध्यान
बांका, 2 जुलाई-
जिले के सरकारी अस्पतालों में आमलोगों को लिए तमाम सुविधाएं हैं। जांच-इलाज से लेकर दवा तक मुफ्त में लोगों को मुहैया करवाई जा रही है। अभी बारिश का मौसम चल रहा है। वहीं कोरोना के मरीज भी जिले में मिलने लगे हैं। ऐसे में दवा की उपलब्धता बहुत मायने रखती है। अगर अस्पताल में मरीज को दवा नहीं मिले तो उसे खासा परेशानी हो सकती है, लेकिन बांका सदर अस्पताल में सामान्य बीमारियों से संबंधित लगभग सभी तरह की दवा उपलब्ध है। सिविल सर्जन डॉ. रविंद्र नारायण ने बताया कि फार्मासिस्ट को दवा की उपलब्धता बनाए रखने के लिए लगातार कहा जाता है। ऐसी स्थिति नहीं बने कि मरीजों को अस्पताल में दवा नहीं मिल सके। इसे लेकर हमलोग लगातार आकलन करते रहते हैं।
फार्मासिस्ट मिथिलेश कुमार झा कहते हैं कि हमलोग दवा की उपबल्धता पर नजर रखते हैं। मरीज को दवा लेने में किसी तरह की परेशानी नहीं हो, इसे लेकर तैयारी करते हैं। अभी जैसे बारिश का मौसम चल रहा है तो सर्दी-खांसी के मरीज ज्यादा आ सकते हैं। इसलिए इन दवाओं का पर्याप्त स्टॉक रहे, इस तरह से हमलोग इंतजाम करते हैं। साथ ही मलेरिया, टीबी, दुर्घटना में घायल जो इलाज कराने आते हैं, उनलोगों के लिए भी सदर अस्पताल में दवा का पर्याप्त स्टॉक रहता है। यहां आमतौर पर अधिकतर सामान्य लोग इलाज कराने के लिए आते हैं। उन्हें अगर दवा नहीं मिलेगी तो बाहर से खरीदने पर आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। इसलिए दवा खत्म होने से पहले ही हमलोग मंगाकर रखते हैं।
कोरोना को लेकर विशेष सतर्कताः पिछले सवा दो साल से कोरोना को लेकर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। तीन लहर आई और चली गई, इस दौरान कभी भी मरीजों को दवा की कमी नहीं होने दी गई। मिथिलेश कुमार झा कहते हैं कि अभी कोरोना के मरीज फिर से मिलने लगे हैं। इसे लेकर पर्याप्त स्टॉक है। ऐसा नहीं है कि अभी मरीज मिल रहे हैं तो अभी ही दवा की उपलब्धता है। कुछ समय पहले तक जब कोरोना के मरीज नहीं मिल रहे थे, उस समय  भी इसकी दवा का पर्याप्त स्टॉक मौजूद था। कोरोना को लेकर हमलोग विशेष सतर्क रहते हैं।
प्रतिदिन 300 से अधिक मरीज लेते हैं दवाः सदर अस्पताल में प्रतिदिन 300 से अधिक मरीज जांच औऱ इलाज कराने के बाद दवा लेने के लिए आते हैं। इन मरीजों को बिल्कुल ही मुफ्त में दवा दी जाती है। मंगलवार, शुक्रवार या कभी-कभी किसी और दिन भी मरीजों की संख्या अधिक रहती है। उस दिन उसी हिसाब से तैयारी की जाती है। मिथिलेश कुमार झा कहते हैं कि हमलोगों को अहसास रहता है कि किस दिन अधिक मरीज रहेंगे, उस दिन उसी अनुसार तैयारी करते हैं। हालांकि आमदिनों में भी अगर मरीज ज्यादा आ जाए तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी।