साफ-सफाई पर रखा ध्यान तो डेंगू से बचे रहे मोहल्ले के लोग

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तिलकामांझी के सुरखीकल मोहल्ले में इस बार डेंगू के नहीं आए कोई मामले
पिछले सीजन में मोहल्ले के 100 से ज्यादा लोग आ गए थे चपेट में

भागलपुर, 18 दिसंबर

तिलकामांझी के सुरखीकल मोहल्ले में वैसे तो कई रसूखदार लोग रहते हैं, लेकिन इस मोहल्ले का एक हकीकत यह भी है कि यहां बरसात के मौसम में जलजमाव हो जाता है. इस वजह से मच्छर पनपने लगते हैं. खासकर जब बारिश का मौसम जाने वाला रहता है और सर्दी शुरू होती है तो इस दौरान डेंगू के कई मामले सामने आने लगते हैं. साल 2019 में यहां पर डेंगू के 100 से ज्यादा मामले सामने आए थे. शायद ही ऐसा कोई घर था जिसमें डेंगू का मरीज नहीं था, लेकिन कोरोना काल में लोगों ने साफ सफाई पर ध्यान दिया. इसका परिणाम यह रहा कि 2020 में इस मोहल्ले से डेंगू का एक भी मरीज नहीं निकला.

मोहल्ले में जलजमाव नहीं होने दिया: मोहल्ले में बाबा टेंट हाउस चलाने वाले मिहिर झा कहते हैं कि कोरोना की वजह से कुछ तो सकारात्मक परिणाम निकला. कोरोना का दौर शुरू होने के बाद हमलोगों का काम बंद हो गया था. घर पर बैठे रहते थे. टीवी और अखबारों के जरिए लगातार कोरोना से जुड़ी नकारात्मक खबरें आ रही थी. ऐसे में हमने सोचा क्यों न इसे लेकर कुछ किया जाए. उन्होंने अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर लोगों को कोरोना को लेकर जागरूक करने का काम किया. इसके साथ ही मोहल्ले में साफ-सफाई पर भी ध्यान दिया. बारिश के मौसम में जलजमाव नहीं होने दिया. नगर निगम में जाकर मोहल्ले के नालों की सफाई करवाई. यही कारण रहा कि इस सीजन में बारिश का पानी जमा नहीं हुआ और लोग डेंगू से बचे रहे.

जलजमाव वाली जगहों का नोटकर नगर निगम को बताया: मोहल्ले के ही रहने वाले और सामाजिक कार्य में बढ़-चढ़कर अपने भूमिका निभाने वाले राजू कुमार कहते हैं कि कोरोना काल में हर तरफ से बुरी खबरें आ रही थी. ऐसे में जब मिहिर ने कोरोना को लेकर जागरूकता और साफ- सफाई का काम शुरू किया तो उन्होंने भी इसमें अपना योगदान शुरू कर दिया. हमलोग मोहल्ले के जलजमाव वाली जगहों को नोट करते थे और उसकी शिकायत जाकर नगर निगम से करते थे. दूसरे दिन निगम के कर्मी मोहल्ले में में आकर सफाई करने लगते थे. इस कारण इस बार मच्छर भी नहीं पनप सका और भगवान का शुक्र है कि मोहल्ले से कोई भी व्यक्ति डेंगू का शिकार नहीं हुआ.

कोरोना के खिलाफ अभियान चलाने के दूसरे फायदे भी मिले: मोहल्ले में किराना दुकान चलाने वाले राजेश कुमार कहते हैं कि हमलोगों ने कोरोना के खिलाफ अभियान चलाया था, लेकिन इसके दूसरे फायदे भी मिले. कोरोना से तो बचाव हुआ ही. साथ ही लोग गंदगी से भी बचाव करने लगे. इसका फायदा यह हुआ कि कोरोना समेत अन्य बीमारियों से लोग बचे रहे. हमलोग अब इस सिलसिला को लगातार आगे बढ़ाएंगे जिससे, कि आने वाले समय में भी मोहल्ले के लोग किसी भी तरह की बीमारी से पीड़ित नहीं हो.

मोहल्ले के युवाओं ने अपनी जिम्मेदारी को समझा: मोहल्ले के रहने वाले और शिक्षक सुभाष सिंह कहते हैं कि मोहल्ले के युवाओं ने अपनी जिम्मेदारी को समझा और साफ-सफाई पर ध्यान दिया. इन लोगों ने कोरोना काल में मास्क, ग्लव्स और सैनिटाइजर को लेकर लोगों को जागरूक किया. इन चीजों को लोगों में बांटा भी और साफ-सफाई पर ध्यान दिया. इसका परिणाम साफ दिख रहा है. आज मोहल्ला साफ-सुथरा है और सबसे सुखद बात यह है कि पिछले साल डेंगू को लेकर मोहल्ले के लोगों की काफी बदनामी हो गई थी. इस बार डेंगू के कोई मामले सामने नहीं आए. अब हमलोगों ने राहत की सांस ली है.

कोविड 19 के दौर में रखें इसका भी ख्याल:
• व्यक्तिगत स्वच्छता और 6 फीट की शारीरिक दूरी बनाए रखें.
• बार-बार हाथ धोने की आदत डालें.
• साबुन और पानी से हाथ धोएं या अल्कोहल आधारित हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें.
• छींकते और खांसते समय अपनी नाक और मुंह को रूमाल या टिशू से ढंके.
• उपयोग किए गए टिशू को उपयोग के तुरंत बाद बंद डिब्बे में फेंके.
• घर से निकलते समय मास्क का इस्तेमाल जरूर करें.
• बातचीत के दौरान फ्लू जैसे लक्षण वाले व्यक्तियों से कम से कम 6 फीट की दूरी बनाए रखें.
• आंख, नाक एवं मुंह को छूने से बचें.
• मास्क को बार-बार छूने से बचें एवं मास्क को मुँह से हटाकर चेहरे के ऊपर-नीचे न करें
• किसी बाहरी व्यक्ति से मिलने या बात-चीत करने के दौरान यह जरूर सुनिश्चित करें कि दोनों मास्क पहने हों
• कहीं नयी जगह जाने पर सतहों या किसी चीज को छूने से परहेज करें
• बाहर से घर लौटने पर हाथों के साथ शरीर के खुले अंगों को साबुन एवं पानी से अच्छी तरह साफ करें

सर्दी, खांसी और बुखार हो तो जांच कराएं, डरे नहीं

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-बुखार होने से जरूरी नहीं कि आप कोरोना की चपेट में आ गए
-समय पर इलाज शुरू हो जाने से जल्द हो जाएंगे स्वस्थ

बांका, 18 दिसंबर।
सर्दी के मौसम में आम तौर पर सर्दी, बुखार और खांसी के मामले बढ़ जाते हैं। अभी कोरोना काल भी चल रहा है। कोरोना का भी लक्षण इन्हीं बीमारियों से मिलता- जुलता है। इस वजह से लोग जांच कराने से डरने लगते हैं। लोगों के मन में इस बात का डर रहता है कि जांच कराने पर कहीं कोरोना नहीं निकल जाए। ऐसे लोगों को डरना नहीं चाहिए, बल्कि जांच करानी चाहिए। अगर कोरोना हो भी गया तो सही समय पर पता चल जाने से उसका इलाज शुरू हो जाएगा और लोग जल्द स्वस्थ हो जाएंगे।

जांच और इलाज तत्काल करवाने से व्यक्ति जल्द स्वस्थ हो जाता —
शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ सुनील कुमार चौधरी कहते हैं कि दरअसल कोरोना का डर अभी लोगों के मन से गया नहीं है। सर्दी, बुखार होने पर भी उन्हें कोरोना का डर सताने लगता है, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। अगर कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है तो उसकी जांच और इलाज तत्काल करवाने से वह व्यक्ति जल्द स्वस्थ हो जाता है। साथ में दूसरे व्यक्ति भी संक्रमित होने से बच जाता है।

कोई जरूरी नहीं कि आपको कोरोना ही हो:
डॉक्टर चौधरी कहते हैं कि अगर आप ने जांच नहीं कराई और आप कोरोना से पीड़ित हैं तो अनजाने में आप कई और लोगों को संक्रमित कर सकते हैं। इसलिए इस तरह की लापरवाही नहीं बरतें और सर्दी, बुखार खांसी होने पर तत्काल डॉक्टर को दिखा कर अपनी जांच करा लें। कोई जरूरी नहीं है कि आपको कोरोना ही होगा। अगर 3 दिनों तक लगातार बुखार रहा हो तभी आप कोरोना के शिकार हो सकते हैं।

घर के सदस्यों से बनाएं दूरी:
डॉ. चौधरी कहते हैं कि अगर आप सर्दी- खांसी और बुखार से पीड़ित हों तो घर के सदस्यों से दूरी बनाकर रखें। लोगों से बात करते वक्त मास्क लगा लें। ऐसा करने से आप दूसरों को संक्रमित नहीं कर सकेंगे। कोरोना हो या कोई और बीमारी, जागरूकता से ही इस पर लगाम लगाया जा सकता है। इसके लिए अपने बचाव के साथ दूसरों का भी बचाव जरूरी है। इसलिए अगर इस तरह की शिकायतें सामने आए तो घर के सदस्यों से दूरी बना कर रहें। बाहर जाने से बचें। अगर घर से बाहर जाएं तो सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करें।

खुद से इलाज नहीं करें:
ऐसा देखा जाता है कि जो लोग डॉक्टर से दिखाने से डरते हैं, ऐसे लोग अपना इलाज खुद ही शुरू कर देते। बहुत हुआ तो मेडिकल दुकानवालों से सलाह लेकर दवा का सेवन कर लेते हैं। ऐसा बिल्कुल भी ना करें। ऐसा करना सही नहीं है। दवा का विपरीत असर (साइड इफेक्ट) भी होता है। बीमार पड़ने पर डॉक्टर को दिखाकर उनकी सलाह पर ही दवा का सेवन करें।

कोविड 19 के दौर में रखें इसका भी ख्याल:
• व्यक्तिगत स्वच्छता और 6 फीट की शारीरिक दूरी बनाए रखें.
• बार-बार हाथ धोने की आदत डालें.
• साबुन और पानी से हाथ धोएं या अल्कोहल आधारित हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें.
• छींकते और खांसते समय अपनी नाक और मुंह को रूमाल या टिशू से ढकें .
•उपयोग किए गए टिशू को उपयोग के तुरंत बाद बंद डिब्बे में फेंके.
•घर से निकलते समय मास्क का इस्तेमाल जरूर करें.
•बातचीत के दौरान फ्लू जैसे लक्षण वाले व्यक्तियों से कम से कम 6 फीट की दूरी बनाए रखें.
•आंख, नाक एवं मुंह को छूने से बचें.
•मास्क को बार-बार छूने से बचें एवं मास्क को मुँह से हटाकर चेहरे के ऊपर-नीचे न करें
•किसी बाहरी व्यक्ति से मिलने या बात-चीत करने के दौरान यह जरूर सुनिश्चित करें कि दोनों मास्क पहने हों
•कहीं नयी जगह जाने पर सतहों या किसी चीज को छूने से परहेज करें
•बाहर से घर लौटने पर हाथों के साथ शरीर के खुले अंगों को साबुन एवं पानी से अच्छी तरह साफ क

ग्रामीणों की जागरूकता और सतर्कता से जिले के कई गांव रहे कोरोना संक्रमण से मुक्त

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– गांव के अधिकांश लोग कर रहे हैं भारत सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन का पालन

– गांव को कोरोना मुक्त रखने के लिए अधिकतर ग्रामीण करते हैं मास्क और सैनिटाइजर का इस्तेमाल

मुंगेर-
जिले के जागरूक लोगों की सतर्कता से कई गांव अभी तक कोरोना मुक्त हैं। इसके लिए उन गांवों के जागरूक लोगों ने खुद सतर्कता बरतते हुए न सिर्फ अपने परिवार के सदस्यों को कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाये रखा बल्कि पूरे गांव में जागरुकता अभियान चलाकर लोगों को कोरोना संक्रमण के प्रति सचेत किया। इन लोगों ने कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए न सिर्फ खुद भारत सरकार द्वारा जारी गएगाइड लाइन का पालन किया बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी इसके लिए जागरूक किया।

कोरोना संक्रमण को ले सदर अस्पताल परिसर में स्थापित जिला नियंत्रण कक्ष के नोडल पदाधिकारी अस्पताल उपाधीक्षक डॉ. निरंजन कुमार ने बताया कि कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण से बचाव के लिए लोगों को इसके प्रति जागरूक रहने के साथ ही सतर्क रहने की आवश्यकता है। इस दिशा में जिले के कुछ गांवों के ग्रामीणों द्वारा किया जा रहा प्रयास काफी सराहनीय है। इससे जिले के अन्य प्रखण्डों में रहने वाले ग्रामीणों को प्रेरणा मिलेगी।

खुद सतर्क रहने के साथ अन्य लोगों को भी कर रहे जागरूक :
जिला मुख्यालय के कासिम बाजार थाना क्षेत्र अंतर्गत हसनगंज गांव निवासी एवं समाजसेवी संजय कुमार सुमन ने बताया कि मार्च के महीने से ही जब से पूरे देश में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों को ले लॉकडाउन लगा उसी समय से वह और उनके पूरे परिवार ने गाइडलाइन का पूरी तरीके से पालन किया। इसके साथ ही अपने पूरे गांव में भी लोगों से सतर्क रहते हुए गाइडलाइन के पालन करने की अपील की। यही कारण है कि उनके हसनगंज गांव में कोरोना का एक भी मरीज सामने नहीं आया।

मास्क और सैनिटाइजर को कोरोना से लड़ने का बनाया हथियार :
जिला मुख्यालय के मुफसिल थाना क्षेत्र अंतर्गत शंकरपुर गांव निवासी पेशे से पारा मेडिकल डॉक्टर मनोज कुमार ने बताया कि वह और उनके पूरे परिवार ने कोरोना संक्रमण के शुरुआती दौर से हीं मास्क पहनने के साथ ही सैनिटाइजर का नियमित इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसके साथ ही अपने ग्रामीणों को भी इन दोनों चीजों के नियमित इस्तेमाल के प्रति जागरूक करना शुरू कर दिया। इसी का परिणाम है कि उनके गाँव से कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाला कोई मरीज नहीं मिला।

कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रति अभियान चलाकर किया जागरूक :
जिले के तारापुर अनुमंडल क्षेत्र अंतर्गत महमदपुर पंचायत के मुखिया ने बताया कि जिले में कोरोना संक्रमण के शुरुआती दिनों से ही पूरे पंचायत में लोगों को जागरूक करने के लिए युद्धस्तर पर अभियान चलाया। इसी का परिणाम है कि मेरे पंचायत में कोरोना का कोई मरीज नहीं मिला।

कोरोना काल में इन सावधानियों का करें पालन :
– घर से कहीं भी बाहर निकलने की स्थिति में हमेशा मास्क लगाएं।

– कोई भी चीज छूने के बाद अनिवार्य रूप से साबून या सैनिटाइजर से अपने हाथों को करें साफ ।

– घर से बाहर भीड़- भाड़ वाले स्थान पर जाने पर शारीरिक दूरी के नियम का पालन करते हुए कम से कम दो गज या 6 फ़ीट की दूरी का करें पालन ।

नाटापन (स्‍टंटिंग) को मात देने में बिहार को फ़िर मिली सफ़लता, पांच सालों में 5% से अधिक की कमी

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– राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों से हुआ ख़ुलासा

– पोषण के अन्य सूचकांकों में सुधार बना सहायक

– वर्ष 2014 में ‘बाल कुपोषण मुक्त बिहार’ अभियान की शुरुआत बनी बदलाव की सूत्रधार

– नाटापन को कम करने में मुंगेर पांचवें स्थान पर, शिवहर रहा बिहार में अव्वल

मुंगेर-
बिहार के बच्चों को नाटापन के जाल से निकलने में फ़िर सफलता मिली है। आंकड़ों में मुंगेर जिला पूरे बिहार में पांचवें स्थान पर है जबकि शिवहर पूरे बिहार में अव्वल रहा है। नाटापन को ले हाल हीं में जारी किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 5 के आंकड़ों ने इस बात की पुष्टि की है। विगत पांच सालों में बिहार में नाटापन ( उम्र के हिसाब से लम्बाई का कम होना) में 5.4% की कमी आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 ( वर्ष 2015-16) के अनुसार में बिहार में 48.3% बच्चे नाटापन से ग्रसित थे, जो अब राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 5 (वर्ष 2019- 20) के अनुसार घटकर 42.9% हो गयी है। यह कमी वर्ष 2015- 16 में जारी हुई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 4 के दौरान भी दर्ज हुई थी। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 3 (वर्ष 2005- 06) में बिहार में 55.6% बच्चे नाटापन के शिकार थे, जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 4 (वर्ष 2015-16) में घटकर 48.3% हो गई थी।
बच्चों में नाटापन होने के बाद इसे पुनः सुधार करने की गुंजाइश कम हो जाती है एवं यह बच्चों में कुपोषण की सबसे बड़ी वजह भी बनती है। इस लिहाज से नाटापन में आई कमी सुपोषित बिहार की राह आसान करने में प्रमुख भूमिका अदा करेगी। अपर्याप्त पोषण एवं नियमित संक्रमण जैसे अन्य कारकों के कारण होने वाला नाटापन बच्चों में शारीरिक एवं बौद्धिक विकास को अवरुद्ध करता है जो स्वस्थ भारत के सपने के साकार करने में सबसे बड़ा बाधक भी है।

शिवहर नाटापन में कमी लाने में रहा अव्वल, 18.6 % की आयी कमी :
यदि विगत पांच सालों में नाटापन में कमी की बात करें तो बिहार का शिवहर जिला अव्वल है। वहीं मुंगेर जिला पांचवें स्थान पर है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 4 के अनुसार शिवहर में 53 % बच्चे नाटापन से ग्रसित थे जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 5 के अनुसार 18.6% घट कर 34.4% हो गया है। यह कमी राज्य के औसत से 3 गुना से भी अधिक है। वहीं वैशाली जिला दूसरे स्थान पर है जहाँ पांच सालों में नाटापन 15.2% कम होकर 38.3 % हो गया है। तीसरे स्थान पर खगड़िया जिला है जहाँ पिछले सर्वेक्षण की तुलना में 15 % की कमी आने के बाद नाटापन 34.8% हो गया है। चौथे स्थान पर नालंदा जिला है जहां 11.5% की कमी दर्ज होने के बाद नाटापन 42.6% हो गया है। जबकि पांचवे स्थान पर मुंगेर जिला है जहाँ नाटापन 11.1 % कम होकर 35.5 % हो गया है।

सुपोषित बिहार के सपने को करना है साकार :
आई.सी.डी.एस. निदेशक आलोक कुमार ने कहा कि राज्‍य में बच्‍चों एवं महिलाओं के पोषण स्‍तर में अपेक्षित सुधार लाने हेतु आई.सी.डी.एस. के माध्‍यम से कई योजनाएँ क्रियान्वित की जा रही है। जिसका अनुश्रवण एवं मूल्‍यांकन विभिन्न स्तरों आईसीडीएस – सीएएस, आँगन-एप, आरआरएस के माध्‍यम से किया जाता रहा है। जिसके फलस्‍वरूप स्‍वास्थ्य एवं पोषण के कुछ संकेतकों में सुधार है। आगे भी हमें निरन्‍तर इस दिशा में प्रयास करने की जरूरत है।

‘बाल कुपोषण मुक्त बिहार’ अभियान बना सूत्रधार :
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 5 के अनुसार विगत पांच सालों में बिहार में नाटापन में कमी आयी है। यद्यपि, इस सुधार में पोषण एवं स्वास्थ्य के कुछ विशेष सूचकांकों में आयी कमी का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण – 5 के अनुसार विगत पांच सालों में बिहार में 6 माह तक केवल स्तनपान, संस्थागत प्रसव, महिला सशक्तीकरण, संपूरक आहार ( 6 माह के बाद स्तनपान के साथ ठोस आहार की शुरुआत), कुल प्रजनन दर में कमी, 4 प्रसव पूर्व जाँच एवं टीकाकरण जैसे सूचकांकों में सुधार हुआ है। ये सूचकांक कहीं न कहीं नाटापन में कमी लाने में सहायक भी साबित हुए हैं। लेकिन वर्ष 2014 में शुरू की गयी ‘बाल कुपोषण मुक्त बिहार’ अभियान नाटापन पर अधिक केन्द्रित था। इस तरह अभियान के तहत किए गए सार्थक एवं सामूहिक प्रयास नाटापन में कमी लाने में सूत्रधार बना। वहीं मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना, समेकित बाल विकास सेवा सुदृढ़ीकरण एवं पोषण सुधार योजना (आईएस एसएनपी), पोषण अभियान एवं ओडीएफ़ जैसे कार्यक्रमों का बेहतर क्रियान्वयन भी नाटापन में सुधार लाने में सकारात्मक प्रभाव डाला है।

नाटापन के गंभीर दूरगामी परिणाम :
उम्र के हिसाब से लंबाई कम होना ही नाटापन कहलाता है। गर्भावस्था से लेकर शिशु के 2 वर्ष तक की अवधि यानी 1000 दिन बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास की आधारशिला तैयार करती है। इस दौरान माता एवं शिशु का स्वास्थ्य एवं पोषण काफी मायने रखता है। इस अवधि में माता एवं शिशु का खराब पोषण एवं नियमित अंतराल पर संक्रमण नाटापन की सम्भावना को बढ़ा देता है। नाटापन होने से बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास अवरुद्ध होता है साथ ही नाटापन से ग्रसित बच्चे सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक बीमार पड़ते हैं। उनका आई-क्यू स्तर कम जाता है एवं भविष्य में आम बच्चों की तुलना में वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ भी जाते हैं।

जिलावार रणनीति पर होगा कार्य :
यूनिसेफ के पोषण विशेषज्ञ रवि नारायण परही ने कहा कि हाल में जारी किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 5 के आंकड़ों के अनुसार बिहार में नाटापन (स्टंटिंग) में 5.4% की कमी आई है . जबकि देश के अन्य प्रमुख राज्यों में नाटापन की दर घटने की जगह बढ़ी है। बिहार ने स्टंटिंग दरों को कम करने के लिए उल्लेखनीय रूप से अच्छा कार्य किया है। की आवश्यकता है. विभिन्न विभागों के अभिसरण (कन्वर्जेन्स) के माध्यम से पोषण एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी विशेष जरुरत वाली माताओं को चिन्हित करने एवं 6 से 23 माह एवं खासकर 6 से 8 माह के बीच बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए आहार विविधता पर अधिक ध्यान देने की जरुरत है। इसके लिए जिलावार पोषण सूचकांकों के अनुसार रणनीति बनानी होगी जिससे पोषण लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकेगा।

घर के पुरुष भी सुनिश्चित करें अपनी सहभागिता :
घर-घर सुपोषण की अलख जगाने की दिशा में आईसीडीएस एवं स्वास्थ्य विभाग के साथ कई अन्य सहयोगी संस्था भी निरंतर कार्य कर रही है। लेकिन सरकारी प्रयासों के इतर इसको लेकर सामुदायिक जागरूकता एवं सहभागिता भी महत्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य एवं पोषण को लेकर माताओं की सक्रियता अधिक है। अभी भी पुरुष अपने बच्चे के पोषण को लेकर गंभीर नहीं है। गर्भवती महिला का स्वास्थ्य एवं पोषण, बच्चों का स्तनपान एवं संपूरक आहार जैसे बुनियादी फैसलों में पुरुषों की सहभागिता होने से कुपोषण के दंश से बच्चों को बचाया जा सकता है।

नाटापन (स्‍टंटिंग) को मात देने में बिहार को फ़िर मिली सफ़लता, पांच सालों में 5% से अधिक की कमी

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• राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों से हुआ ख़ुलासा
• पोषण के अन्य सूचकांकों में सुधार बना सहायक
• वर्ष 2014 में ‘बाल कुपोषण मुक्त बिहार’ अभियान की शुरुआत बनी बदलाव की सूत्रधार
• नाटापन को कम करने में शिवहर रहा बिहार में अव्वल

पटना-
बिहार के बच्चों को नाटापन के जाल से निकलने में फ़िर सफलता मिली है. हाल में जारी किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों ने इस बात की पुष्टि की है. विगत पांच सालों में बिहार में नाटापन( उम्र के हिसाब से लम्बाई का कम होना) में 5.4% की कमी आई है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4( वर्ष 2015-16) के अनुसार में बिहार में 48.3% बच्चे नाटापन से ग्रसित थे, जो अब राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (वर्ष 2019-20) के अनुसार घटकर 42.9% हो गयी है. यह कमी वर्ष 2015-16 में जारी हुई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के दौरान भी दर्ज हुयी थी. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 (वर्ष 2005-06) में बिहार में 55.6% बच्चे नाटापन के शिकार थे, जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4(वर्ष 2015-16) में घटकर 48.3% हो गयी थी.
बच्चों में नाटापन होने के बाद इसे पुनः सुधार करने की गुंजाइश कम हो जाती है एवं यह बच्चों में कुपोषण की सबसे बड़ी वजह भी बनती है. इस लिहाज से नाटापन में आई कमी सुपोषित बिहार की राह आसान करने में प्रमुख भूमिका अदा करेगी. अपर्याप्त पोषण एवं नियमित संक्रमण जैसे अन्य कारकों के कारण होने वाला नाटापन बच्चों में शारीरिक एवं बौद्धिक विकास को अवरुद्ध करता है जो स्वस्थ भारत के सपने के साकार करने में सबसे बड़ा बाधक भी है.

शिवहर नाटापन में कमी लाने में रहा अव्वल, 18.6 % की आयी कमी:
यदि विगत पांच सालों में नाटापन में कमी की बात करें तो बिहार का शिवहर जिला अव्वल है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के अनुसार शिवहर में 53 % बच्चे नाटापन से ग्रसित थे जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार 18.6% घट कर 34.4% हो गया है. यह कमी राज्य के औसत से 3 गुना से भी अधिक है. वहीं वैशाली जिला दूसरे स्थान पर है जहाँ पांच सालों में नाटापन 15.2% कम होकर 38.3 % हो गया है. तीसरे स्थान पर खगड़िया जिला है जहाँ पिछले सर्वेक्षण की तुलना में 15 % की कमी आने के बाद नाटापन 34.8% हो गया है. चौथे स्थान पर नालंदा जिला है जिसमें 11.5% की कमी दर्ज होने के बाद नाटापन 42.6% हो गया है. जबकि पांचवे स्थान पर मुंगेर जिला है जहाँ नाटापन 11.1 % कम होकर 35.5 % हो गया है.

सुपोषित बिहार के सपने को करना है साकार :
आई.सी.डी.एस. निदेशक आलोक कुमार ने कहा कि राज्‍य में बच्‍चों एवं महिलाओं के पोषण स्‍तर में अपेक्षित सुधार लाने हेतु आई.सी.डी.एस. के माध्‍यम से कई योजनाएँ क्रियान्वित की जा रही है। जिसका अनुश्रवण एवं मूल्‍यांकन विभिन्न स्तरों ICDS-CAS, आँगन-एप, RRS के माध्‍यम से किया जाता रहा है। जिसके फलस्‍वरूप स्‍वास्‍थ एवं पोषण के कुछ संकेतकों में सुधार है। आगे भी हमें निरन्‍तर इस दिशा में प्रयास करने की जरूरत है।

‘बाल कुपोषण मुक्त बिहार’ अभियान बना सूत्रधार:
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार विगत पांच सालों में बिहार में नाटापन में कमी आयी है. यद्यपि, इस सुधार में पोषण एवं स्वास्थ्य के कुछ विशेष सूचकांकों में आयी कमी का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार विगत पांच सालों में बिहार में 6 माह तक केवल स्तनपान, संस्थागत प्रसव, महिला सशक्तीकरण, संपूरक आहार( 6 माह के बाद स्तनपान के साथ ठोस आहार की शुरुआत), कुल प्रजनन दर में कमी, 4 प्रसव पूर्व जाँच एवं टीकाकरण जैसे सूचकांकों में सुधार हुआ है। ये सूचकांक कहीं न कहीं नाटापन में कमी लाने में सहायक भी साबित हुए हैं। लेकिन वर्ष 2014 में शुरू की गयी ‘बाल कुपोषण मुक्त बिहार’ अभियान नाटापन पर अधिक केन्द्रित था। इस तरह अभियान के तहत किए गए सार्थक एवं सामूहिक प्रयास नाटापन में कमी लाने में सूत्रधार बना। वहीं मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना, समेकित बाल विकास सेवा सुदृढ़ीकरण एवं पोषण सुधार योजना (आई एस एस एन पी), पोषण अभियान एवं ओडीएफ़ जैसे कार्यक्रमों का बेहतर क्रियान्वयन भी नाटापन में सुधार लाने में सकारात्मक प्रभाव डाला है.

नाटापन के गंभीर दूरगामी परिणाम:
उम्र के हिसाब से लंबाई कम होना ही नाटापन कहलाता है। गर्भावस्था से लेकर शिशु के 2 वर्ष तक की अवधि यानी 1000 दिन बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास की आधारशिला तैयार करती है. इस दौरान माता एवं शिशु का स्वास्थ्य एवं पोषण काफी मायने रखता है। इस अवधि में माता एवं शिशु का खराब पोषण एवं नियमित अंतराल पर संक्रमण नाटापन की सम्भावना को बढ़ा देता है। नाटापन होने से बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास अवरुद्ध होता है. साथ ही नाटापन से ग्रसित बच्चे सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक बीमार पड़ते हैं, उनका आई-क्यू स्तर कम जाता है एवं भविष्य में आम बच्चों की तुलना में वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ भी जाते हैं।

जिलावार रणनीति पर होगा कार्य:
यूनिसेफ के पोषण विशेषज्ञ रवि नारायण परही ने कहा कि हाल में जारी किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों के अनुसार बिहार में नाटापन (स्टंटिंग) में 5.4% की कमी आई है . जबकि देश के अन्य प्रमुख राज्यों में नाटापन की दर घटने की जगह बढ़ी है. बिहार ने स्टंटिंग दरों को कम करने के लिए उल्लेखनीय रूप से अच्छा कार्य किया है. की आवश्यकता है. विभिन्न विभागों के अभिसरण (कन्वर्जेन्स) के माध्यम से पोषण एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी विशेष जरुरत वाली माताओं को चिन्हित करने एवं 6 से 23 माह एवं खासकर 6 से 8 माह के बीच बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए आहार विविधता पर अधिक ध्यान देने की जरुरत है. इसके लिए जिलावार पोषण सूचकांकों के अनुसार रणनीति बनानी होगी जिससे पोषण लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकेगा.

घर के पुरुष भी सुनिश्चित करें अपनी सहभागिता :
घर-घर सुपोषण की अलख जगाने की दिशा में आईसीडीएस एवं स्वास्थ्य विभाग के साथ कई अन्य सहयोगी संस्था भी निरंतर कार्य कर रही है। लेकिन सरकारी प्रयासों के इतर इसको लेकर सामुदायिक जागरूकता एवं सहभागिता भी महत्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य एवं पोषण को लेकर माताओं की सक्रियता अधिक है। अभी भी पुरुष अपने बच्चे के पोषण को लेकर गंभीर नहीं है। गर्भवती महिला का स्वास्थ्य एवं पोषण, बच्चों का स्तनपान एवं संपूरक आहार जैसे बुनियादी फैसलों में पुरुषों की सहभागिता होने से कुपोषण के दंश से बच्चों को बचाया जा सकता है।

सामाजिक अंकेक्षण की सफलता को ले आंगनबाड़ी केंद्रों पर लगाएं जाएंगे पोस्टर

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– 21 दिसंबर को जिले के सभी आंगनबाड़ी केंद्रों पर किया जाना है सामाजिक अंकेक्षण कार्य

– आईसीडीएस निदेशक द्वारा जारी पत्र में डीपीओ एवं सीडीपीओ को दिए गए आवश्यक निर्देश

लखीसराय-
21 दिसंबर को जिले के सभी आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषक क्षेत्र के लोगों को सरकार द्वारा आं’गनबाड़ी केंद्र के माध्यम दी जारी रही सेवाओं की जानकारी देने एवं केंद्र के संचालन ब्यवस्था को सुदृढ़ करने को ले सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) किया जाना है। इसकी सफलता को लेकर जिले के सभी ऑगनबाड़ी केंद्रों के मुख्य द्वार पर निदेशालय द्वारा समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापन का फोटो लगाने संबंधित निर्देश विभाग द्वारा जारी किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक अंकेक्षण कार्य का प्रचार-प्रसार तेजी हो ताकि अधिक से अधिक लोगों को इससे संबंधित जानकारी मिल सके और लोग निर्धारित तिथि एवं समय पर आंगनबाड़ी आकर संबंधित सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सके। इस कार्य को सुनिश्चित कराने को ले आईसीडीएस के निदेशक ने एक पत्र जारी कर डीपीओ एवं सीडीपीओ को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके साथ ही जिलाधिकारी को भी जारी किए पत्र का प्रतिलिपि भेजा गया है।

सामाजिक अंकेक्षण की सफलता को ले की जा रही है आवश्यक तैयारी :-
आईसीडीएस की जिला कार्यक्रम पदाधिकारी कुमारी अनुपमा ने बताया कि सामाजिक अंकेक्षण कार्य की सफलता को ले आवश्यक तैयारी शुरू कर दी गई है। जिले के सभी सीडीपीओ को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही अपने-अपने प्रखंड के सभी सेविकाओं को भी व्यापक पैमाने पर प्रचार-प्रसार सुनिश्चित कराने के लिए सीडीपीओ को कहा गया है ताकि अधिक से अधिक लोगों को इसकी जानकारी मिल सकें और वो निर्धारित तिथि व समय पर आंगनबाड़ी केंद्र पर उपस्थित होकर सरकार की योजना से अवगत हो सकें।

वार्ड सदस्य की अध्यक्षता में की जाएगी सामाजिक अंकेक्षण कार्य, योजनाओं की दी जाएगी जानकारी :-
21 दिसंबर को जिले के सभी आंगनबाड़ी केंद्रों पर सामाजिक अंकेक्षण कार्य होगा। जो संबंधित ऑगनबाड़ी केंद्र के वार्ड सदस्य की अध्यक्षता में किया जायेगा। इसके साथ ही पंचायत के विकास मित्र, पंचायत सचिव एवं संबंधित केंद्र के दो चयनित लाभार्थी सदस्य के रूप उपस्थित रहेंगे। इसके अलावे पोषक क्षेत्र के सभी लाभार्थी भी मौजूद रहेंगे। इसके बाद मौजूद सभी लोगों को संबंधित पदाधिकारियों के द्वारा आंगनबाड़ी स्तर पर चल रही सभी सरकारी योजनाओं की जानकारी विस्तारपूर्वक दी जाएगी। इसके साथ ही संबंधित क्षेत्र की महिला पर्यवेक्षिका सभी केंद्रों का भ्रमण कर गतिविधियों की मॉनिटरिंग करेंगी।

इन बिंदुओं पर की जाती है चर्चा :-
सामाजिक अंकेक्षण के दौरान आंगनबाड़ी केंद्रों पर सफलता पूर्वक किए जाने वाले कार्यों की जानकारी मौजूद लोगों को विस्तार पूर्वक दी जाती है। इस दौरान आंगनबाड़ी केंद्रों के संचालन की नियमितता, बच्चों की उपस्थिति, एक माह में कम से कम 25 दिनों तक सभी लाभार्थियों को पूरक आहार एवं आवश्यक दवाईयों की आपूर्ति की समीक्षा, बच्चों का टीकाकरण, पोषण की स्थिति, वजन, ग्रोथ चार्ट की उपलब्धता, कुपोषित व अतिकुपोषित बच्चों की संख्या व उनके पोषण स्तर में सुधार के लिए उठाये गये कदम आदि बिंदुओं पर चर्चा की जाती है। इसके साथ हीं केंद्र संचालन से संबंधित सभी कार्यों पर भी विस्तार से चर्चा की जाती है।

डीपीओ भी सामाजिक अंकेक्षण में होते है शामिल :-
आईसीडीएस के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी अपने जिले के किसी एक केंद्र पर सामाजिक अंकेक्षण कार्य में शामिल होकर हर गतिविधियों का मूल्यांकन करेंगे। जबकि महिला पर्यवेक्षिका सामाजिक अंकेक्षण समिति के अध्यक्ष एवं सदस्यों को आईसीडीएस के तहत चल रही सरकारी योजनाओं की विस्तार पूर्वक जानकारी देंगी साथ ही अन्य नियमों की भी जानकारी देंगी।

सामाजिक अंकेक्षण के दौरान इन मानकों का पालन कर कोरोना संक्रमण से रहें दूर :-
– मास्क और सैनिटाइजर का नियमित रूप से करें उपयोग ।
– अनावश्यक कहीं यात्रा करने से बचें।
– भीड़-भाड़ वाले जगहों पर जाने से करें परहेज ।
– बाहरी खाना खाने से भी करें परहेज ।
– साफ-सफाई का रखें विशेष ख्याल ।
– शारीरिक दूरी के नियम का करें पालन ।

टीका पड़ना अच्छी बात, लेकिन सावधानी फिर भी जरूरी

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जिले के आईसीडीएस कर्मी कोरोना के टीकाकरण को लेकर हैं उत्साहित

पहले चरण में स्वास्थ्यकर्मियों के साथ आईसीडीएस के कर्मचारियों को भी पड़ना है कोरोना का टीका

बांका-

कोरोना के टीकाकरण को लेकर जिले में जोर-शोर से तैयारी चल रही है. पहले चरण में पड़ने वाले 10 हजार स्वास्थ्यकर्मियों की सूची बन गई है. उसका डाटा भी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है. अब बस इंतजार है टीका के आ जाने का. टीका आ जाने के बाद स्वास्थ्यकर्मियों को देने का काम शुरू कर दिया जाएगा. स्वास्थ्यकर्मियों के साथ आईसीडीएस के कर्मचारियों को भी पहले चरण में ही टीका पड़ेगा. ऐसे में इन लोगों का विचार जानना भी जरूरी है. टीका पड़ने से इनके कामकाज और व्यवहार में क्या बदलाव आएगा, यह समझ लेना भी जरूरी है.

फिर भी मास्क पहने और सामाजिक दूरी का पालन करें: आईसीडीएस के जिला समन्वयक शम्स तबरेज का कहना है कि “टीका पड़ना अच्छी बात है. कोरोना के टीका का इंतजार काफी समय से हो रहा है और हमलोग खुशकिस्मत हैं कि पहले चरण में हमलोगों को टीका पड़ेगा, लेकिन मेरा मानना है कि टीका पड़ने के बाद भी लोगों को सचेत रहना चाहिए. कोरोना ऐसी बीमारी है जो लापरवाही की वजह से अपना पांव पसारती है और सतर्कता ही इसका सबसे बेहतर बचाव है. मेरा मानना है कि टीका पड़ जाने के बाद भी लोगों को मास्क पहनते रहना चाहिए और सामाजिक दूरी का पालन करना चाहिए.”

पहले चरण में हमलोगों को चुना इसके लिए सरकार का शुक्रगुजार: आईसीडीएस के शंभूगंज प्रखंड समन्वयक अनंत कुमार का कहना है कि “टीका पड़ने से हमलोग थोड़ी राहत महसूस करेंगे. हमलोगों का काम आमलोगों के बीच में होता है, इसलिए हमलोगों को जोखिम भी ज्यादा रहता है. बहुत चीज ना चाहते हुए भी करना पड़ता है. ऐसे में टीका पड़ जाने से हमलोग बहुत राहत महसूस करेंगे और सरकार का शुक्रगुजार हैं कि पहले चरण के लिए हमलोगों को चुना गया है.”

आमलोगों को भी फायदा पहुंचेगा: बेलहर के प्रखंड समन्वयक अभिषेक कुमार का कहना है “ना सिर्फ हमलोगों को इसका फायदा होगा, बल्कि हमलोग जिनके बीच में काम करते हैं, उन्हें भी इससे फायदा पहुंचेगा. आखिर कोरोना संक्रमण से ही तो फैलता है और जब हम संक्रमण मुक्त रहेंगे तो हम जिनके साथ काम करते हैं वह भी संक्रमण मुक्त रहेगा. इसलिए कोरोना का टीका पड़ने से बहुत ही सकारात्मक संदेश जाएगा.”

निर्भीक होकर काम कर सकेंगे: बेलहर के प्रखंड परियोजना प्रबंधक संजय भारती का कहना है “टीका पड़ जाने से लोगों का भय खत्म हो जाएगा. हमलोग लोगों के बीच में काम करते हैं तो थोड़ा बहुत डर तो मन में रहता है, जब टीका पड़ जाएगा तो यह डर खत्म हो जाएगा. हमलोग अभी भी पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ काम कर रहे हैं. टीका पड़ जाने के बाद निर्भीक होकर भी काम कर सकेंगे.”

कोविड 19 के दौर में रखें इसका भी ख्याल:
• व्यक्तिगत स्वच्छता और 6 फीट की शारीरिक दूरी बनाए रखें.
• बार-बार हाथ धोने की आदत डालें.
• साबुन और पानी से हाथ धोएं या अल्कोहल आधारित हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें.
• छींकते और खांसते समय अपनी नाक और मुंह को रूमाल या टिशू से ढंके.
• उपयोग किए गए टिशू को उपयोग के तुरंत बाद बंद डिब्बे में फेंके.
• घर से निकलते समय मास्क का इस्तेमाल जरूर करें.
• बातचीत के दौरान फ्लू जैसे लक्षण वाले व्यक्तियों से कम से कम 6 फीट की दूरी बनाए रखें.
• आंख, नाक एवं मुंह को छूने से बचें.
• मास्क को बार-बार छूने से बचें एवं मास्क को मुँह से हटाकर चेहरे के ऊपर-नीचे न करें
• किसी बाहरी व्यक्ति से मिलने या बात-चीत करने के दौरान यह जरूर सुनिश्चित करें कि दोनों मास्क पहने हों
• कहीं नयी जगह जाने पर सतहों या किसी चीज को छूने से परहेज करें
• बाहर से घर लौटने पर हाथों के साथ शरीर के खुले अंगों को साबुन एवं पानी से अच्छी तरह साफ करें

महिलाओं के सुरक्षा की मांग हुई बुलंद 

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• निर्भया की घटना  के वर्षगाँठ पर किशोरियों-महिलाओं द्वारा विरोध स्वर बुलंद किया गया
• किशोरियों ने उठाई बेख़ौफ़ जीवन की मांग
• महिला सुरक्षा की मांग में युवा एवं पुरुष भी हुए शामिल
पटना: 16 दिसम्बर 2020: “सहयोगी” के द्वारा 8 वर्ष पूर्व हुए ज्योति सिंह (निर्भया की घटना ) को याद करते हुए ऐसी होने वाली सभी घटनाओं के खिलाफ आवाज बुलन्द किया गया। अलग-अलग गांवों से महिलाओं और किशोरियों ने बैनर, सेल्फी एवं सन्देश के माध्यम से महिला सुरक्षा के सवाल पर आपनी आवाज बुलंद की । गाँव हो या शहर, चौपाल हो या डगर, रात हो या दिन, भीड़ भरी सड़के हो या सुनसान रास्ता, एक महिला बेख़ौफ़ कही आ जा सके ये मांग रखा किशोरियों एवं महिलाओं ने.
16 दिसम्बर, 2012 को दिल्ली में 23 वर्षीया निर्भया के साथ चलती हुई बस में सामूहिक बलात्कार और हत्या करने की कोशिश की क्रूरतापूर्ण घटना हुई थी, आज उस घता के 08 वर्ष हो चुके हैं लेकिन दावे से यह नहीं कहा जा सकता है कि वो घटना आज भी दुहराई नहीं जा सकती. एक संवेदनशील समाज कि पहचान है कि कोई दुर्घटना हो तो जो कि समाज और न्यायिक व्यवस्था के विरुद्ध हो या फिर उस समाज में रह रहे लोगों को किसी भी तरह से हानि पहुंचाता हो तो उसे दुहराया न जा सके इसकी पूर्ण व्यवस्था की जाये. लेकिन 08 वर्षों के उपरांत भी यह नहीं किया जा सका है इसलिए यह जरुरी है कि महिला सुरक्षा की मांग को पुरजोर तरीके से उठाया जाय.
यद्यपि सरकार के द्वारा इस की घटना  के बाद लड़कियों-महिलाओं को सुरक्षित करने के उद्देश्य से ‘निर्भया कोष’ भी बनाया गया है, साथ ही सम्बद्ध कानून में भी बदलाव लाया गया है, परन्तु इस कोष में उपलब्ध राशि का अभी भी सही उपयोग नहीं हो सका है। आवश्यकता है कि सभी लोगों में महिलाओं के प्रति हो रहे भेदभाव और हिंसा के विषय में जागरूकता हो और इसे रोकने में उनका पूर्ण सहयोग हो। तो यह कोशिश है समाज और सरकार दोनों का इस मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करने का ताकि महिलाओं को भी पूर्ण बराबरी के साथ सुरक्षा मिल सके.
सहयोगी की निदेशिका रजनी ने कहा कि राष्ट्रीय परिवार स्वस्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़े महिला सशक्तिकरण के दिशा में कुछ उत्साहजनक जरुर हैं लेकिन इसके व्यवहारिक मायने तभी होंगे जब महिलाएं एवं किशोरियां अपने आप को सुरक्षित महसूस करें. राष्ट्रीय परिवार स्वस्थ्य सर्वेक्षण के हालिया आंकड़े दिखाते हैं कि पति द्वारा किये जाने वाले हिंसा में कमी आई है जो पिछले 5 वर्षों में 43.7 से घटकर 40 प्रतिशत हुई है साथ ही 18-29 वर्ष आयु समूह की महिलाएं या किशोरियां जो १८ वर्ष उम्र पूर्ण करने तक यौनिक हिंसा की शिकार होती थीं उनका प्रतिशत भी 14.2 से घटकर 8.3 हुआ है. लेकिन आज भी महिलाएं एवं किशोरियां सुरक्षित एवं आजाद महसूस नहीं कर रही हैं. इसके लिए समाज और सरकार दोनों के स्तर पर प्रयास की आवश्यकता है.
महिलाओं एवं किशोरियों के सुरक्षा की मांग को उठाने वालों में उनके साथ पुरुष एवं युवा भी शामिल हुए. सहयोगी की कार्यक्रम समन्वयक उन्नति ने बताया कि सहयोगी अपने सभी अभियान एवं कार्यक्रमों में पुरुषों को शामिल करने की रणनीति के साथ काम करना रही है. क्योंकि बिना उनके भागीदारी के यह संभव नहीं हो पायेगा क्योंकि एक तरफ सरकार अपनी भूमिका का निर्वहन करे और दूसरी ओर समाज. लेकिन परिवर्तन जहाँ होना है वह है पुरुषों का व्यवहार. इसलिए पूरी प्रक्रिया में उनका शामिल होना आवश्यक है.
राजू पाल ने कहा कि एक बेहतर समाज निर्माण के लिए यह जरुरी है कि हर व्यक्ति अपने आप को सुरक्षित महसूस करे. जेंडर के आधार पर होने वाली हिंसा किसी भी समाज में अस्वीकार्य होनी चाहिए. जब समाज में इसके प्रति अस्वीकार्यता आ जाएगी तभी यह रुकेगा.
तक़रीबन 300 लोगों ने अलग-अलग गाँव, बस्ती एवं मुहल्ले से इसमें भाग लेकर अभियान को अपना समर्थन दिया.

ईसीसीई गतिविधियों से घर पर रह रहे बच्चों की संवर रही सेहत एवं शिक्षा 

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– ईसीसीई गतिविधियों की ऑनलाइन दी जा रही जानकारी
– एक मिस्ड कॉल पर बच्चे सुन रहे दादी- नानी की अनोखी कहानियाँ
– टॉल फ्री नंबर 18001215725 पर कॉल कर घर बैठे ले सकते हैं जानकारी
लखीसराय, 16 दिसम्बर: कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों की रोकथाम देश के साथ राज्य के लिए भी चुनौतिपूर्ण साबित हो रहा है। इस महामारी में सरकारी महकमा प्रत्येक स्तर पर राहत एवं बचाव कार्य में जुटा है। कोरोना संक्रमण के कारण स्कूल एवं आंगनबाड़ी केंद्र भी लंबे समय से बंद है, जिसके कारण बच्चे स्कूल भी नहीं जा पा रहे हैं। ऐसे में आईसीडीएस द्वारा संचालित प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ईसीसीई) कार्यक्रम बच्चों की सेहत एवं शिक्षा का ख्याल उनके घर पर ही रख रही है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बच्चों की दैनिक गतिविधियों को रचनात्मक बनाना है। बच्चों के आंगनबाड़ी केन्द्रों पर नहीं जाने की स्थिति में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता घर- घर जाकर उन्हें ईसीसीई की गतिविधियों की जानकारी भी दे रही है।
एक मिस्ड कॉल पर बच्चे सुन रहे दादी-नानी की कहानियाँ :
कोरोना काल में छोटे बच्चों को साइको सोशल सपोर्ट देने के लिए एक अच्छी पहल शुरू की गई है। आईसीडीएस-यूनिसेफ और प्रथम बुक्स के तहत यह प्रयास किया गया है।  ‘‘मिस्ड कॉल दो कहानी सुनो’’  गतिविधि के तहत एक फोन नंबर 08033094243 उपलब्ध कराया गया है, जिससे केवल एक मिस कॉल देकर छात्र अपने उम्र के अनुसार कहानियों का आनंद ले सकते है। कहानी दादी- नानी की आवाज के साथ ही बॉलिवुड की सेलिब्रिटीज की आवाज में भी उपलब्ध है। इसका मुख्य उद्देश्य है कि बच्चों में पढ़ने और सुनने की संस्कृति को विकसित करना है। कोरोना संकट में स्कूल बंद है ऐसी स्थिति में छोटे बच्चों के मन में कई तरह के सवाल आते हैं। इन कहानियों के जरिए बच्चों को साइको सोशल सपोर्ट देने की कोशिश की जा रही है।
गतिविधि कैलेंडर के विषय में माताओं को किया जा रहा जागरूक:
बच्चों की बेहतर दैनिक दिनचर्या एवं उन्हें रचनात्मक कार्यों में संलग्न करने के उद्देश्य से गतिविधि कैलेंडर जारी किया गया है एवं आईसीडीएस के सभी जिला कार्यक्रम पदाधिकारी को यह कैलेंडर व्हाट्सएप एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से सभी महिला पर्यवेक्षकाओं एवं आंगनबाड़ी सेविकाओं को भेजने के निर्देश दिए गए हैं ताकि आंगनबाड़ी सेविकाएँ गृह-भ्रमण के दौरान बच्चों के माता-पिता को दैनिक गतिविधि कैलेंडर के विषय में जानकारी दे सकें और  माता- पिता आसानी से अपने घरों में बच्चों के साथ गतिविधि कर सके।
मनोरंजन के साथ शिक्षा:
आईसीडीएस के अपर मुख्य सचिव अतुल प्रसाद ने बताया कि कोरोना संक्रमण काल में ईसीसीई गतिविधियों की उपयोगिता बढ़ी है। आंगनबाड़ी केंद्र बंद होने के कारण बच्चे घर पर हैं। ऐसे में यह जरुरी है कि बच्चे खेल के माध्यम से भी शिक्षा ग्रहण करते रहें एवं उनका प्रारंभिक देखभाल घर पर ही सुनिश्चित किया जा सके। इस दिशा में ईसीसीई कैलेंडर काफ़ी प्रभावी साबित हो रहा है। इसमें पूरे महीने बच्चों के लिए विभिन्न गतिविधियों की चर्चा की गयी है। इससे बच्चे मनोरंजन के साथ पढेंगे भी।
बच्चों के बौद्धिक क्षमता के विकास के साथ अवसाद से बचाने में भी कारगर है यह प्रयास :
लखीसराय आईसीडीएस की डीपीओ कुमारी अनुपमा ने बताया कि आईसीडीएस और सीएलआर के सहयोग से सजग कार्यक्रम के तहत जिले में आंगनबाड़ी सेविका और सहायिका के सहयोग से घर -घर जाकर बच्चों के मां – बाप से अपने बच्चों को अपनी जीवन से जुड़ी सुनहरी यादों को कहानी के माध्यम से सुनाने की अपील की जा रही है ताकि बच्चों में अवसाद  घर न कर पाए। उन्होंने बताया कि आईसीडीएस द्वारा जारी की गई मिस्ड कॉल योजना का मुख्य उद्देश्य भी मनोरंजक तरीके से बच्चों के अकेलापन को दूर करते हुए उनका बौद्धिक व मानसिक विकास करना है।
दैनिक कैलेंडर में इन बातों को किया गया है शामिल:
दैनिक गतिविधि कैलेंडर यूनिसेफ एवं आईसीडीएस बिहार के संयुक्त सहयोग से निर्मित की गयी है। कैलेंडर में नियमित दिनचर्या में बच्चों के लिए मनोरंजक, स्वास्थ्यकर एवं खेल-कूद जैसी गतिविधियों को शामिल किया गया है। इस महामारी के दौरान बच्चे मानसिक रूप से परेशान हो सकते हैं। इसलिए बच्चों से बात करने के क्रम में माता-पिता का सकारत्मक दृष्टिकोण और ईमानदार रहना बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें माता-पिता एवं देखभाल करने वाले महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। दैनिक कैलेंडर में नियमित व्यायाम, खेल-कूद, चित्र बनाना, कहानी सुनाना, गीत गाना एवं  रोल प्ले आदि क्रियाओं को उत्साहवर्धक बनाया गया है ताकि बच्चे यह महसूस कर सकें कि वह एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण में हैं।
टॉल फ्री नंबर पर लें जानकारी:
आईसीडीएस निदेशालय ने आम जनता को पोषण और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा के बारे में जागरूक करने के लिए एक हेल्पलाइन नंबर जारी किया है। कोई भी व्यक्ति टॉल फ्री नंबर 18001215725 पर फ़ोन कर पोषण और प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ईसीसीई) से जुड़ी जानकारियां घर बैठे प्राप्त कर सकते हैं। पोषण के बारे में जन-जागरूकता के लिए यह  टॉल फ्री नंबर जारी किया गया है। इस निःशुल्क हेल्पलाइन नंबर से बच्चों, गर्भवती एवं धात्री माताओं, किशोर-किशोरियों समेत पूरे परिवार के पोषण की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। साथ ही इस हेल्पलाइन पर बच्चों के जीवन में शुरूआती वर्षों के महत्व, बच्चों के मस्तिष्क विकास की प्रकिया एवं प्रभावित करने वाले कारकों, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा की अवधारणा एवं महत्व और 3- 6 वर्ष के आयु के बच्चों की वृद्धि एवं विकास से जुड़ी हर जानकारी भी उपलब्ध है।

कोविड-19 वैक्सीन की सफलता को लेकर स्वास्थ्य विभाग के पदाधिकारियों को दिया जाएगा प्रशिक्षण 

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– ऑनलाइन के माध्यम से होगा दो दिवसीय प्रशिक्षण
-17 एवं 18 दिसंबर को होगा प्रशिक्षण
– राज्य स्वास्थ्य समिति के राज्य प्रतिरक्षण पदाधिकारी ने पत्र जारी कर दिए निर्देश
लखीसराय, 16 दिसंबर
कोविड-19 से बचाव के लिए शुरू होने वाले टीकाकरण की सफलता को लेकर स्वास्थ्य विभाग के संबंधित अफसरों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रशिक्षण की सफलता को लेकर राज्य स्वास्थ्य समिति के राज्य प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ नरेंद्र कुमार सिन्हा ने पत्र जारी कर जिला सिविल सर्जन समेत अन्य पदाधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए हैं।
– प्रशिक्षण की सफलता को लेकर प्रतिभागी सभी पदाधिकारियों को दिए गए हैं निर्देश :-
जिला सिविल सर्जन डॉ आत्मानंद राय ने बताया कि प्रशिक्षण की सफलता को लेकर प्रतिभागी सभी पदाधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं। उन्हें  हर हाल में निर्धारित समय पर प्रशिक्षण में शामिल होने को कहा गया है। ताकि सभी लोगों को वैक्सीन क्रियान्वयन को सफल बनाने के लिए पूरी जानकारी मिल सके।
–  दोनों दिन अलग-अलग समय पर होगा प्रशिक्षण :-
कोविड-19 वैक्सीन के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन के लिए 17 एवं 18 दिसंबर को दो दिवसीय प्रशिक्षण होगा। 17 दिसंबर को 11 बजे से दोपहर 02 बजे तक एवं 18 दिसंबर को दोपहर 01 बजे से 03 बजे तक वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से ऑनलाइन प्रशिक्षण होगा। जिसमें सिविल सर्जन, अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी, जिला कार्यक्रम प्रबंधक, जिला प्रतिरक्षण कार्यालय के डाटा संकलक एवं सहयोगी संस्थानों के जिलास्तरीय प्रतिनिधि प्रतिभागी के रूप में शामिल होंगे।
– एक जगह ही एकत्रित होकर प्रशिक्षण में शामिल होंगे सभी प्रतिभागी :-
प्रशिक्षण के लिए एक जिला में एक लिंक खुलेगा और वहीं सभी प्रतिभागी एकत्रित होकर एकसाथ प्रशिक्षण में शामिल होंगे। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद प्रखंड स्तरीय पदाधिकारियों एवं कर्मियों को प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके पदाधिकारियों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाएगा। ताकि प्रखंड स्तर पर भी टीकाकरण का सफलतापूर्वक बेहतर क्रियान्वयन हो सके।
– टीकाकरण के सफल क्रियान्वयन के लिए टास्कफोर्स का हो चुका गठन :-
टीकाकरण के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन के लिए पूर्व में जिला से लेकर प्रखंडस्तर पर टास्कफोर्स का गठन हो चुका है। इसके अलावा टीकाकरण के रखरखाव समेत अन्य व्यवस्था की तैयारी अंतिम चरण में है।
– जिला से लेकर पीएचसी स्तर पर उपलब्ध रहेगी वैक्सीन :-
कोविड-19 से बचाव के लिए संभावित वैक्सीन की सुविधा जिला से लेकर पीएचसी स्तर पर उपलब्ध रहेगी। ताकि क्रियान्वयन के दौरान किसी प्रकार की परेशानियों का सामना नहीं करना पड़े। साथ ही सुविधाजनक तरीके से प्रत्येक व्यक्ति को वैक्सीन की खुराक दी जा सके।
– इन मानकों का करें पालन, कोविड-19 संक्रमण से रहें दूर :-
– साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें।
– मास्क और सैनिटाइजर का नियमित रूप से उपयोग करें।
– भीड़-भाड़ वाले जगहों से परहेज करें।
– साबुन या अल्कोहल युक्त पदार्थों से हाथ धोएं।
– बाहरी खाना खाने से परहेज करें।
– अनावश्यक यात्रा से बचें और यात्रा के दौरान आवश्यक दूरी का ख्याल।